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1951  में फ़िल्म ‘बुज़दिल’ से फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर गीतकार प्रवेश करने वाले और फिर वर्षों तक गीतों की दुनिया पे राज करने वाले कैफ़ी आज़मी ने अपने जीवन में पहली बार शायरी तब की थी जब वे मात्र ग्यारह वर्ष के थे। जिस उम्र में बच्चा अपने दोस्तों से लगाव को केवल समझने का प्रयास कर रहा होता है उस उम्र में कैफ़ी आज़मी ज़िन्दगी की गहराइयों को समझने चल पड़े थे। अपनी पहली ग़ज़ल जब उन्होंने अपने गाँव मिजवाँ के एक सम्मलेन में सुनाई तो श्रोताओं को विश्वास ही नहीं हुआ कि वो गज़ल उनकी स्वयं की रचना थी। उस ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह है-

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े

हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

कैफ़ी ने बड़े ही शौक़ से ये ग़ज़ल रच कर सभी के सम्मुख प्रस्तुत की थी लेकिन, जैसी सराहना की  उम्मीद  उन्होंने  की थी वैसी उन्हें नहीं मिल सकी । सराहना या प्रशंसा तो दूर, वे इतनी कम उम्र में इतना बेहतरीन लिख सकते हैं, इस बात पर ही जब किसी ने विश्वास ना किया तो कैफ़ी आज़मी के मन को काफ़ी ठेस पहुँची। लेकिन लोगों की इस बेपरवाही ने उन्हें हताश नहीं किया बल्कि उन्होंने इस घटना के बाद ये ठान लिया कि कोई सराहे या नहीं वे अपनी राह नहीं छोड़ेंगे।

कैफ़ी आज़मी की वो ग़ज़ल जिसे उनके बचपन में दाद ना मिल सकी, सालों बाद सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका बेग़म अख़्तर द्वारा गाई गई और खूब लोकप्रिय हुई।

अपनी शायरी में सदा ही उन्होंने समाजिक चिंतन और न्यायशीलता को स्थान दिया। बहुत से आलोचकों द्वारा उन्हें एक क्रान्तिकारी शायर भी कहा गया है। धार्मिक रूढ़िवादिता से वे हमेशा दूर ही रहते थे और यही कारण रहा कि उन्होंने साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हो, साम्यवादी दल के माध्यम से सामाजिक हित में लेखन कार्य शुरू किया जिसके चलते जब 1943 में साम्यवादी दल का एक कार्यालय मुम्बई में खोला गया तो कैफ़ी आज़मी को उसका कार्यभार सौंपते हुए मुम्बई भेजा गया।  यहीं उनका विवाह शौक़त से हुआ जिन्हें खुद भी साहित्य से बेहद लगाव था। और मुंबई में ही उनके बेटे बाबा और बेटी शबाना आज़मी का जन्म हुआ।

कैफ़ी आज़मी ने अपना करियर जब शुरू किया तब उनकी तनख्वाह मात्र चालीस रुपए थी, लेकिन उनकी लेखनी ने एक दिन उन्हें मुशायरों के मंचों और फ़िल्मी गीतों का बेताज बादशाह बना दिया।

रूमानी शायरी हो या कोई देशभक्ति गीत- कैफ़ी की कलम से निकला हर लफ्ज़ इंडस्ट्री पर राज कर गया। जीवन दर्शन, संवेदना, दुःख सुख, प्रेम, और विछोह – मानव जीवन के  हर पहलू पे कैफ़ी साहब के लेखन का जवाब नहीं था। गीत और ग़ज़लों के साथ ही कैफ़ी आज़मी ने फिल्मों में पटकथा लेखन भी किया। ‘हीर राँझा’ जैसी फ़िल्म लिखकर इस विधा में भी अपनी श्रेष्ठता को उन्होंने सिद्ध किया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि  हिन्दी फिल्मों के लिए लिखे उनके गीत और ग़ज़लें सदाबहार हैं और आज भी संगीत प्रेमियों के जीवन में रस घोल रहे हैं – जैसे –

तुम जो मिल गए हो – (हँसते ज़ख्म)

वक्त ने किया क्या हसीं सितम- (कागज के फूल)

मिलो न तुम तो हम घबराए- (हीर-रांझा)

बहारों मेरा जीवन भी सँवारो- (आखिरी खत)

धीरे-धीरे मचल ए दिल-ए-बेकरार- (अनुपमा)

सारा मोरा कजरा चुराया तूने -(दो दिल)

तुम इतना जो मुस्करा रहे हो – (अर्थ)

कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है – (अर्थ)

जरा सी आहट होती है तो दिल पूछता है- (हकीकत)

ये दुनिया ये महफिल, मेरे काम की नहीं – (हीर-रांझा)

कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों – (हकीकत) इत्यादि।

एक शायर गीतकार होने के साथ ही वे एक समाज सेवक भी थे। औरतों के अधिकारों के हित में, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध, रूढ़िवादी विचारों के विरुद्ध और मानव हित में उन्होंने बहुत कुछ लिखा ही नहीं बल्कि वास्तविक जीवन में भी अपनी लिखी बातों को साकार भी किया। उत्तर प्ररेश में अपने गाँव मिजवाँ में उन्होंने स्कूल,पोस्ट ऑफिस, अस्पताल और सड़कें बनवाने में पूरा योगदान दिया। अपने जीवन के अंतिम बीस वर्ष उन्होंने अपने इसी गाँव में रहकर वहां की उन्नति को अपना लक्ष्य बनाकर बिताए।

चौदह जनवरी उन्नीस सौ उन्नीस में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव मिजवाँ में जन्में कैफ़ी आज़मी का असली नाम अख़्तर हुसैन रिज़वी था। एक ज़मींदार के वंशज होकर भी कैफ़ी आज़मी बहुत ही सादगी पसंद थे। जुहू में उनके आलीशान बंगले के भीतर एक साधारण जीवन शैली को ही उन्होंने अपनाया। फ़िल्म इंडस्ट्री के उनके कई मित्रों में उनकी सादगी और हँसमुख स्वभाव के चर्चे आज भी आम हैं। दस मई दो हज़ार दो में उन्होंने ब्रेन हैमरेज से ग्रस्त होकर शारीरिक रूप से इस संसार से विदा ली लेकिन अपने लिखे गीतों से वे आज भी अपने प्रशंषकों के जीवन को खूबरसूरत बनाए हुए हैं।

 

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