भगवान विश्वनाथ के आराधक भारतरत्न बिस्मिल्ला खां

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भगवान विश्वनाथ के त्रिशूल पर बसी तीन लोक से न्यारी काशी में गंगा के घाट पर सुबह-सवेरे शहनाई के सुर बिखरने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को ग्राम डुमराँव, जिला भोजपुर, बिहार में हुआ था। बचपन में इनका नाम कमरुद्दीन था। इनके पिता पैगम्बर बख्श भी संगीत…

सिनेमा और वायु सेना की साझी उड़ान

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हम देखते हैं कि रजतपट के रंगीन होने के बाद सिनेमा ने भारतीय वायु सेना को भी अपने बहुविध विषयों की माला के मनके के रूप में शामिल किया है। सिनेमा और वायु सेना के साझे सफर की यह उड़ान आगे चलकर कहां तक पहुंचेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

रियल से रील पर

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इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का वक्त अब जा चुका है। अब वक्त उसे ठीक करने का है। इसमें दर्शक वर्ग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वे अच्छे कंटेंट को अपना समर्थन देंगे तो उसी तरह का कंटेंट बनाने के लिए फिल्मकार मजबूर होंगे। आज का दर्शक जागरूक है। अब वे किसी बात को ऐसे ही स्वीकार नहीं करता है। ये बात ‘शेरशाह’ को मिली सफलता और ‘भुज द प्राइड‘ को मिली असफलता से सिद्ध हो जाती है। वहीं जिस तरह से ‘द एम्पायर’ का विरोध हो रहा है, उससे आगे की कड़ियों को बनाने से पहले निर्माताओं को अवश्य सोचना पड़ेगा।

आत्मनिर्भरता में मनोरंजन क्षेत्र की भूमिका

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आज भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात हो रही है। उसी स्वर्णिम गौरव शाली वैभव को वापस पाने की बात की जा रही है जब हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस स्वप्न को साकार करने में मनोरंजन जगत की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।

फिल्मों में बढ़ती अभारतीयता और इस्लामिक प्रभाव

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सच पूछिए तो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिल्मों ने एक मीठे जहर की तरह हमें हमारे ही विरुद्ध कब खड़ा कर दिया गया पता ही नहीं चला। आज भगवान का मज़ाक उड़ाती ‘ओह माई गॉड’, ‘पीके’ जैसी फिल्मों को देख कर लोग ताली बजाते हैं। लेकिन क्या कभी अल्लाह का मज़ाक उड़ाती किसी फिल्म को आपने देखा है?

पति बेचारा….. कोरोना और बारिश का मारा

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“पत्नी ने भी झूठा गुस्सा दिखाते हुए एक गैस पर चाय का बर्तन और दूसरे पर कढ़ाई चढ़ा दी। साथ ही अपने भी वॉट्सएप्प ज्ञान का परिचय देते हुए पति को नसीहत भी दे डाली कि कल से रोटियां बनाना सीख लो क्योंकि मोदी जी ने कहा है कि जब तक देश के सारे मर्द गोल रोटियां बनाना नहीं सीख लेते तब तक लॉकडाउन नहीं खुलेगा।”

अभिनय में भी झंडे गाड़ रहे कास्टिंग डायरेक्टर अभिषेक बनर्जी

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"वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई"। फ़िल्म में उनके काम को सराहा गया और बतौर कास्टिंग डायरेक्टर उन्होंने पहली फ़िल्म की विद्या बालन, नसीरुद्दीन शाह और इमरान हाशमी जैसे सितारों से सजी "डर्टी पिक्चर"। अपनी टीम के साथ उन्होंने कई फिल्मों की कास्टिंग की। एक अभिनेता के रूप में..

बॉलीवुड हॉरर फिल्में भी हैं दर्शकों की ख़ास पसन्द

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बॉलीवुड में फिल्में तो हर शुक्रवार रिलीज़ होती हैं लेकिन वो फिल्में जो जनता को सिनेमा घर से लेकर अपने घर तक एक डर के साये से घेर लें, हर हफ्ते देखने को नहीं मिलतीं - जी हाँ "हॉरर फिल्में" अपनी विशिष्टता के कारण लोगों में एक क्रेज़ पैदा करतीं हैं।

 क़लम के बादशाह – कैफ़ी

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 1951 में फ़िल्म 'बुज़दिल' से फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर गीतकार प्रवेश करने वाले और फिर वर्षों तक गीतों की दुनिया पे राज करने वाले कैफ़ी आज़मी ने अपने जीवन में पहली बार शायरी तब की थी जब वे मात्र ग्यारह वर्ष के थे।

फिल्मों में बढ़ता देशभक्ति का ज्वार

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आज जिस प्रकार समाज में राष्ट्रीय विचारों की, देशभक्ति की, सेना के प्रति आदर की प्रबल भावना दिखाई देती है, उसका ही प्रतिबिम्ब फिल्मों में भी दिखता है।

गीतों की रिमझिम

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कहते हैं कि शब्दों में बहुत ताकत होती है इतनी की अगर प्रेम के हों तो ज़िन्दगी खुशियों से रौशन हो जाती है और अगर नफ़रत की हों तो वही ज़िन्दगी अंधेरे में डूब जाती है। शब्द ही हैं जो अपने पराये का भेद समझा जाते हैं।

नायक को नायक ही रहने दो – कोई नाम न दो

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क्या ये कह देना भर काफी है कि कमर्शियल सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन है, स्कूली शिक्षा बाँटना नहीं! और यदि येे काफी है तो फिर क्या ऐसा मनोरंजन देकर, विद्यालयों में दी जा रही  शिक्षा को भी अनावश्यक सिद्ध नहीं किया जा रहा ?

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