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एक बंगाली कहावत है “सोरसे मोद्हे भूत , तहाले भूत केमोन भाग्बे”
यानि सरसों की जड़ में सरसों का भूत है , तो भूत भागेगा कैसे ? यानि जब समस्या के मूल में ही समस्या है तो समस्या जायेगी कैसे? इसे हम इस प्रकार भी कह सकतें हैं कि पश्चिम बंगाल में वामपंथ की समस्या के जड़ में ममता बनर्जी की तृण मूल नामक समस्या पहुँच गई है. अब समस्या के मूल में एक और समस्या है जिसे हल करना है.

          यदि देश भर में भाजपा की विजय नरेंद्र मोदी और अमित शाह का करिश्माई अध्याय है तो इस अध्याय के इस विशिष्ट बंगाली संस्करण या दृश्य के विशिष्ट दिग्दर्शक के रूप हम एक ही व्यक्ति का नाम ले सकते है, और वह नाम है, कैलाश विजयवर्गीय!! अमित शाह ने इस बंगाली दृश्य में भरपूर हिंसा, मारपीट, हमले, मुठभेड़ और रक्त से रंगे हुए तृण मूल के अभियान का पूर्वाभास कर लिया था. भाजपा के नई शैली के अध्यक्ष अमित शाह को तलाश थी किसी ऐसे व्यक्ति की जिसमें जनता से प्रेम करने की क्षमता हो, जिसे लोगों की संवेदनाओं को जागृत करते आता हो, जो स्वयं कलाकार होकर बंगाल की कला प्रेमी जनता के साथ तादात्म्य बैठा सके   और साथ ही साथ जो वामपंथ प्रेरित और तृण मूल द्वारा अग्रेषित हिंसा को भी दमित करना भी जानता हो. अटलजी ने अपनी एक कविता में बंगाल को भारत की भुजा की संज्ञा दी थी, इससे भी आगे बढ़कर बंगाल को भारत की सांस्कृतिक भूजा, या सास्कृतिक द्वार और कोलकाता को भारत की साहित्यिक राजधानी भी कहा जा सकता है.

इमोशन, संवाद एक्शन, गति, मारकाट हिंसा के सभी रूपों से भरा पूरा यह बंगाल चुनाव यदि भाजपा की दृष्टि से किसी व्व्यक्ति के बस में था, तो भाजपा के पास वह केवल और केवल कैलाश विजयवर्गीय के रूप में ही उपलब्ध था. समूचा राजनैतिक जगत एक हिंदी भाषी और बंगाली पृष्ठभूमि से दूर दूर तक किसी प्रकार का सम्बन्ध न रखने वाले कैलाश जी को बंगाल प्रभारी बनने से न केवल हैरान बल्कि अचंभित भी था किंतु कैलाश जी के इतिहास पलट देने के स्वभाव से आशान्वित भी था.  २०१४ में हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए विजयवर्गीय बीजेपी के चुनाव प्रभारी बनाये गए थे और उन्होंने वहां अभूतपूर्व विजय पताका लहरा दी थी. कैलाश विजयवर्गीय के नेतृत्व के बाद ही हरियाणा  विधानसभा चुनाव में भाजपा पहली बार स्पष्ट बहुमत लेकर सत्ता में आई. हरियाणा विजय के बाद कैलाश जी की क्षमताओं से भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व आशान्वित ही नहीं बल्कि आशवस्त हो गया था और उन्हें कोई बड़ी चुनौती पूर्ण जिम्मेदारी देने के मूड में आ गया था. जून २०१५ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त करके व बाद में पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाकर इस हाई वोल्टेज ड्रामे की पटकथा लिख दी थी.

     दीदी की सत्ता ने वामपंथियों के गढ़े हुए तंत्र वाले बंगाल में न केवल सतत हिंदू विरोधी खेल खेले बल्कि बेशर्मी व अराजकता की हद तक खेले. मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के शीर्ष केंद्र के रूप में यदि किसी राज्य को देखा और गिना जाएगा तो उसमें बंगाल सर्वोच्च स्थान पर होगा. अपने नागरिकों और स्थानीय मूल निवासियों के मूंह का निवाला छीन कर पड़ोसी देशों से बंगाल में घुस आये अवैध घुसपैठियों को खिलाने का कोई अवसर बंगाल की इस महिला राजनीतिज्ञ ने छोड़ा नहीं.  वहां मदरसे बढ़ रहे हैं, मौलवियों को वेतन दिया जा रहा है, पुजारियों को हतोत्साहित व भयभीत किया जा रहा है, मूल बंगालियों के साथ हिंसा, मारकाट, दबाव, भयभीत करने, अपहरण, फिरौतियों की घटनाएं हो रही हैं और ऐसे लोगों को किसी का सरंक्षण नहीं था न शासन का न प्रसाशन का. हिंदू त्यौहार, उत्सव, पर्व तो जैसे उपेक्षा व उपहास का केंद्रबिंदु बन गए हैं.

हिंदुओं के अतीव शोषण व मुस्लिमों के आकाशीय आकार के तुष्टिकरण के चरम वातावरण में कैलाश विजयवर्गीय को एक चुनौती के रूप में बंगाल में भाजपा की विकास संभावनाओं को परखने भेजा गया था. विजयवर्गीय ने अपना काम बखूबी किया उन्होंने बंगाल के बड़े नेताओं से संपर्क बाद में किया और पहले जमीनी कार्यकर्ताओं के घर की बैठकों में और रसोईयों में भीतर तक अपनी और साथी टीम की पहुँच बना दी. इसी का परिणाम निकला कि बंगाल में जितना अराजकता विरोधी, शांति पसंद, संस्कृति प्रेमी, साहित्य प्रेमी और भद्र समाज का वोट था वह भाजपा के खाते में आ गिरा. पूरे चुनाव के दौरान राज्य में शासन द्वारा सरंक्षित गुंडातंत्र हावी रहा.   यदि चुनाव आयोग इस गुंडा तंत्र को रोकने में सफल रहता तो भाजपा बंगाल में निम्नतम तीस सीटें जीतती. पूरा चुनाव दीदी के इशारे पर वैध एवं अवैध हथियारों के उपयोग लड़ा गया. एक और ममता दीदी के कार्यकर्ताओं के हथियार थे तो दूजी ओर टीम विजयवर्गीय का भद्र बंगाली जन को एक बेहतर  शांतिपूर्ण व सांस्कृतिक बंगाल के वचन का साथ. विजयवर्गीय के नेतृत्व वाली “भद्र बंगाल के पुनर्निर्माण” वाली इस टीम ने बंगाल में भगवा पताका लहराने का बड़ा मूल्य भी चुकाया है, पिछले चार वर्षों में 102 निरपराध साथियों की राजनैतिक हत्याएं देखी हैं इन्होने और उनकी अर्थियां उठाई हैं. पहले रक्त पिपासु  वामपंथ ने और बाद में अहंकारी और तुष्टिकरण की पुरोधा ममता बनर्जी ने बंगाल में राजनीति और हिंसा को एक दूसरे का  पर्याय बना दिया था. पिछले लगभग पैतीस वर्षों के इस क्रम में देश भर को सांस्कृतिक व साहित्यिक नेतृत्व देने वाले बंगाल को अपराधियों के राज्य जैसी घृणित संज्ञा मिलने लगी थी. बंगाल के भद्र समाज ने सीपीएम की हिंसा से परेशान होकर दीदी की तृण मूल को लाए किंतु वहां  हिंसा कम होने की बजाय अतीव बढ़ गई. इस लोकसभा चुनाव में अपनी जमीन खसकती देखकर ममता बनर्जी ने अपने हिंसक दस्तों को खुली छूट दे दी फलस्वरूप बंगाल में लोकसभा चुनाव के सातों चरणों में भरपूर में हिंसा देखने को मिली. सूबे में भारतीय जनता पार्टी और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच जमकर हिंसक झड़पें हुई किंतु टीम लीडर के रूप में कैलाश विजयवर्गीय अपने स्वभाव के विपरीत जाकर बंगाल में अपनी सज्जनता व भद्रता को बनाये रहे व हिंसक अभियान के अत्याचारों को झेलकर भी अपने कार्यकर्ताओं को शांत रखने में सफल रहे. इसी का परिणाम रहा कि अंतिम चरण आते आते बंगाल की जनता पूर्णतः उद्वेलित हो गई व एतिहासिक संख्या में मतदान करने आई. इन चुनावों में टीम कैलाश ने १८ लोकसभा सीटें और विधानसभा उपचुनावों की ४ सीटें जीतकर बंगाल में भगवा की नीवं उठा दी है. २९४ विस सीटों वाले बंगाल में टींम भाजपा ने ४०.३ प्रतिशत मत लेकर १२९ विस सीटों में बढ़त बना ली है.  यह भी बड़ा चमकदार तथ्य है कि भाजपा साठ विधानसभा क्षेत्रों में मात्र चार हजार मतों के अंतर से पराजित हुई है, जबकि वर्ष २०१६ के चुनावों में भाजपा को बंगाल में मात्र ३ विस सीटों से संतोष करना पड़ा था. तो भद्र बंगाल के पुनर्निर्माण का लक्ष्य लिए चल रहे नरेंद्र जी मोदी व अमित जी शाह के सिपाही कैलाश विजयवर्गीय के लिए अगला लक्ष्य बंगाल विधानसभा में भगवा पताका फहराने का होगा यह तय है.

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