नया भारत

आज देश का नेतृत्व ऐसे हाथों में है जिसके मन में राष्ट्रभक्ति है, मस्तिष्क में नए भारत की निर्द्वंद्व संकल्पना है और उसे वास्तविकता में उतारने की ताकत है। अब हमें उस संकल्पना को साकार करने में अपनी भूमिका निभानी है।

‘नया भारत’! कैसा होगा नया भारत? क्या है नए भारत की संकल्पना? कोरी कपोल कल्पना या यथार्थ पर आधारित मजबूत राष्ट्र की संकल्पना। नए भारत की कल्पना बिलकुल उस हाथी जैसी है जिसे चार-पांच अंधे छू कर देखते हैं और अपना-अपना मत बनाते हैं। भारत का जो नागरिक जिस तरह के नए भारत की कल्पना करेगा, नया भारत वैसा ही बनेगा। परंतु एक बात तो तय है कि ‘नया भारत’ कोई तुरंत अस्तित्व में आने वाली संकल्पना नहीं है। ऐसा नहीं होगा कि कोई नया दिन शुरू होगा और किसी किताब के पन्ने पलटने की तरह नया भारत बन जाएगा। यह धीरे-धीरे और प्रयत्नपूर्वक बनाई जाने वाली इमारत होगी। विश्वगुरु या वैश्विक महाशक्ति की बनने की दिशा में इसे पहला पायदान कहा जा सकता है। अत: यह आवश्यक है कि हम अंधों की तरह हाथी को टटोलने की कोशिश न करें बल्कि एक जागरूक नागरिक के रूप में अपने सामने राष्ट्र को महाशक्ति बनाने का स्वप्न रखें।

समग्र चिंतन

किसी भी राष्ट्र का समग्र चिंतन करते समय, उसे महाशक्ति बनाने का स्वप्न देखते समय उसकी कमजोरियों और शक्तियों पर ध्यान देना आवश्यक होता है। अतः नया भारत बनाते समय हमें भी हमारी कमजोरियों और क्षमताओं की ओर ध्यान देना होगा। भारत में असीम क्षमताएं हैं और कुछ कमजोरियां हैं। परंतु आज परिस्थिति यह है कि हम अपनी क्षमताओं को भुलाए बैठे हैं और कमजोरियों का रोना रो रहे हैं।

हमें सबसे पहले स्वयं की ओर देखने का दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा। दुनिया का हमारी ओर देखने का दृष्टिकोण बदल रहा है परंतु हमारे ही मन में न्यूनगंड है। आज दुनिया के जो देश विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं, वे भी जीवन मूल्यों के आधार पर खोखले हैं। भारत के जीवन मूल्य ही भारत की ताकत हैं। मानसिक शांति और परमानंद की जिस भावना को हम परम्परा से अनुभव करते आ रहे हैं, उसकी कल्पना तक विकसित राष्ट्रों ने नहीं की है। नए भारत की नींव यही जीवन मूल्य होना आवश्यक होगा। हमारी नींव मजबूत है, उसकी मजबूती को कायम रखते हुए अब उस पर नया भवन बनाना है।

परिवर्तित हो, परिवर्तन बनें

परिवर्तन की आशा करना बहुत आसान है परंतु स्वयं परिवर्तित होना बहुत कठिन है। नए भारत की दिशा में कदम बढ़ाते समय हमें सबसे पहले स्वयं में परिवर्तन करने होंगे। कहा जाता है ‘जो जीव में है, वही जगत में है’ अर्थात हम स्वयं जैसे होंगे वैसा ही संसार होगा। इसका दार्शनिक पहलू छोड़कर अगर यर्थाथ की ओर देखा जाए तो कहा जा सकता है कि चूंकि मनुष्य ही समाज और राष्ट्र की पहली इकाई है अत: शुरुआत मनुष्य से अर्थात स्वयं से करनी होगी।

इस बारे में एक कहानी याद आती है। एक राज्य में राजा अपनी प्रजा के लिए भोज आयोजित करता है। वह कहता है कि सारे पकवान राजमहल की ओर से होंगे, केवल खीर बनाने के लिए सभी ग्रामवासी एक लोटा दूध लाएं और एक बड़े हौद में डालें। वह हौद पर बडा ढ़क्कन ढ़ांक देेता है और दूध डालने के लिए उसमें गोल छेद करवा देता है। रात्रि में सारी प्रजा जब भोजन करना शुरू करती है तो हाहाकार मच जाता है क्योंकि उनके द्वारा दिए गए दूध की खीर परोसी ही नहीं जाती। प्रजा राजा को कोसने लगती है, उस पर आरोप करने लगती है। जब राजा के कानों तक यह समाचार पहुंचता तो वह सभी को हौद के पास बुलाता है, और अपने अधिकारियों से ढ़क्कन हटाने को कहता है। ढ़क्कन के हटते ही प्रजा की आंखें खुली ही रह जाती हैं क्योंकि उस हौद में दूध नहीं वरन सफेद रंग का पानी होता है। वह सफेद पानी दर्शाता है कि कुछ लोगों को छोड़कर सभी ने हौद में पानी यह सोचकर डाला कि बाकी लोग तो दूध डालेंगे ही। उनके पानी डाल देने से क्या फर्क पड़ जाएगा। उस भोज में किसी को भी खीर नहीं मिलती। उन लोगों को भी नहीं जिन्होंने सच में दूध डाला था।

आज कुछ यही हाल भारतीय समाज का भी हो रहा है। राजा भोज का आयोजन कर चुका है। कुछ लोगों ने दूध डालने की शुरुआत भी कर दी है, अब हमें सोचना है कि हमें क्या डालना है। अगर खीर खानी है तो सभी को दूध ही डालना होगा। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि ये खीर केवल हमारे लिए नहीं हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पक रही है, अत: दूध डालने की हमारी जिम्मेदारी दुगुनी हो जाती है।

हम जो परिवर्तन देखना चाहते हैं वे परिवर्तन हमें स्वयं में लाने होंगे। अगर हम स्वच्छ भारत चाहते हैं तो पहले हमें स्वच्छ रहना होगा और अपने परिसर को स्वच्छ रखना होगा, वह भी दूसरे के परिसर को गंदा किए बिना।

अगर कोई कहता है कि प्रधान मंत्री के द्वारा शुरू किया गया स्वच्छता अभियान ‘फ्लॉप शो’ साबित हो रहा है तो इसमें गलती किसकी है? देश के मुखिया के द्वारा किसी अभियान को शुरू करने का अर्थ यह नहीं कि सारी जिम्मेदारी उसकी ही है। हमारे घर का गीला-सूखा कचरा अलग करने के लिए प्रधानमंत्री नहीं आएंगे, वह हमें ही करना होगा। महानगर पालिका की जो गाडियां कचरा उठाने आती हैं, वे भी इसे अलग-अलग ही ले जाएं यह जिम्मेदारी महापालिकाओं के कर्मचारियों-अधिकारियों की है। इसे भी प्रधानमंत्री नहीं करेंगे। समाज तंत्र की हर कड़ी को अपना कार्य सही तरीके से और सम्पूर्ण निष्ठा के साथ करना ही होगा। तभी सामूहिक विकास सम्भव होगा।

नियम पालने के लिए या तोड़ने के लिए

सरकार या प्रशासन के द्वारा समाज व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं। वे नियम यातायात, कर प्रणाली, बैंकिंग, भवन निर्माण आदि अलग-अलग क्षेत्रों से सम्बंधित होते हैं। सामान्य भारतीय मानस नियमों का उल्लंघन करने की ओर अधिक उद्यत दिखाई देता है। सिग्नल तोड़ना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, निर्धारित गति से अधिक गति में गाडियां चलाना, हेल्मेट और सीट बेल्ट का उपयोग केवल ट्रैफिक हवालदार को दिखाने के लिए करना आदि कई ऐसे कार्य हैं, जो इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

कर की चोरी, सामान के क्रय-विक्रय में बिल न लेना-देना इन सब से पैसा बचाने की प्रवृत्ति आम है। कर की प्रक्रिया सही करने का काम निश्चित ही सरकार का है परंतु कर भरने की जिम्मेदारी हमारी है।

भ्रष्टाचार केवल पैसों तक सीमित नहीं

आजकल भ्रष्टाचार के सम्बंध में आम धारणा यह बन गई है कि पैसों के लेन-देन में किया जाने वाला दुर्व्यवहार ही भ्रष्टाचार है। मूलत: किसी भी तरह से किया जाने वाला भ्रष्ट आचरण, भ्रष्टाचार है। महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार, भ्रूण हत्या जैसे अपराध भी भ्रष्ट आचरण ही हैं। परस्त्री को माता मानने के संस्कार हम भूल रहे हैं।

अतिथि देवो भव की हमारी परम्परा को तब धब्बा लग जाता है जब कोई विदेशी पर्यटकों का सामान चुरा लेता है या विदेशी महिलाओं के साथ गलत हरकतें करता है। जिस संस्कृति के आकर्षण के कारण लोग भारत आते हैं उन्हें हम क्या दिखाना चाहते हैं, यह हमें सोचना होगा।

आरक्षण- सामाजिक समरसता की बाधा

आरक्षण भारतीय समाज का इतना संवेदनशील मुद्दा बन चुका है कि इस पर कोई भी बात करने की हिम्मत नहीं करता। राजनैतिक हितों के कारण इसमें कोई भी नीतिगत या संवैधानिक निर्णय करने में भी बहुत मुश्किल होती है। परंतु समाज को एकात्म करने के लिए जिस प्रकार जातियां आड़े आती हैं उसी तरह आरक्षण भी आड़े आता है। वैसे भी ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जाति आधारित आरक्षण देश की प्रतिभा को आगे नहीं आने दे रहे हैं। कौशल के आधार पर चयन की प्रक्रिया को आरक्षण ने इतना शिथिल कर दिया है कि इतनी प्रतिभा होते हुए भी हमारा देश अभी भी विकासशील देशों की श्रेणी में आता है।

सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले चुटकुलों में हम बड़ी आसानी से दिखा देते हैं कि यहां के प्रतिभावान लोगों को विदेशों में कंपनियां नौकरी देती हैं, उनकी बुद्धि का उपयोग करती हैं क्योंकि भारत में आरक्षण के बल पर कम प्रतिभावान लोग भी उच्च पदों पर पहुंच जाते हैं। जाति के आधार पर आरक्षण जब तक लागू रहेगा तब तक समाज में समरसता और एकात्मता लाना बहुत कठिन होगा। आरक्षण कुछ विशिष्ट वर्गों को कुछ समय के लिए मिली सहूलियत थी। परंतु अब यह एक प्रकार की लड़ाई बन गई है। आरक्षण हमें हमारा हक लगने लगा है। मेहनत करके अपनी प्रतिभा को निखारकर उच्च पद तक पहुंचने की बजाय आरक्षण की बैसाखी का सहारा लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जिन जातियों को आरक्षण मिल रहा है, उन्हें ही यह सोचने की जरूरत है कि आरक्षण के बल पर मिली चीजें उन्हें सम्मान दिलाएंगी या मेहनत के बल पर मिली चीजें।

निश्चित रूप से बिना योग्यता के केवल आरक्षण के बल पर डॉक्टर बनने वाले लोग डिग्री तो लेंगे परंतु मरीज का इलाज वही बेहतर कर सकेंगे जिन्होंने मेहनत करके ज्ञान अर्जित किया है।

शिक्षा सामाजिक संज्ञान की

आज हम अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें अच्छे से अच्छे विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजते हैं। एक बहुत बड़ा अंतर है शिक्षित होने में और साक्षर होने में। विद्यालय और समाज दोनों ही साक्षर भावी पीढ़ी के निर्माण पर इतने आमादा हैं कि वे बच्चों को सामाजिक संस्कार देना ही भूल रहे हैं। तीन साढ़े तीन वर्ष के बच्चों को वर्णमाला और अंकों की पहचान कराने के पहले नैतिक मूल्य सिखाना आवश्यक हैं। वे सीखें कि जब समाज के सभी लोग खुश होंगे तभी वे खुश रह सकेंगे। अन्य लोगों को नुकसान पहुंचाकर या किसी से कुछ छीनकर वे कभी खुश नहीं रह सकते। अगर सार्वजनिक परिवहन में किसी वृद्ध व्यक्ति को देखकर आप अपनी सीट उसे बैठने के लिए नहीं देते तो आपकी डिग्रियों का क्या फायदा। अगर बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर भी आप नो पर्किंग में अपनी गाड़ी पार्क करते हैं तो आपकी डिग्रियों का कोई मूल्य नहीं है।

*राजा भोज का आयोजन कर चुका है। कुछ लोगों ने दूध डालने की शुरुआत भी कर दी है, अब हमें सोचना है कि हमें क्या डालना है। अगर खीर खानी है तो सभी को दूध ही डालना होगा।

*  जाति के आधार पर आरक्षण जब तक लागू रहेगा तब तक समाज में समरसता और एकात्मता लाना बहुत कठिन होगा।

* पर्यावरण और जनसंख्या आज हमारे सामने बड़े प्रश्न हैं परंतु अफसोस इसी बात का है कि आज भी हमें इसकी भयावहता दिखाई नहीं देती। समय से आगे की सोच रखने वाले विद्वान हमें इंगित भी कर रहे हैं, परंतु हम नहीं जाग रहे हैं।

*  नया भारत किसी भी तरह की आयात की हुई सभ्यता के आधार पर खड़ा नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए।

सब कुछ सरकार के भरोसे

आज भारतीय समाज की वस्तुस्थिति यह है कि हम चाहते हैं कि सब कुछ सरकार करे। यह सही है कि व्यवस्था बनाने का कार्य सरकार का है। परंतु अपने आपको उस व्यवस्था के अनुरूप ढालने का काम हमारा है। सौभाग्य से आज देश का नेतृत्व ऐसे हाथों में है जिसके मन में राष्ट्रभक्ति है, मस्तिष्क में नए भारत की निर्द्वंद्व संकल्पना है और उसे वास्तविकता में उतारने की ताकत है। अब हमें उस संकल्पना को साकार करने में अपनी भूमिका निभानी है। लोकतंत्र की जिस ताकत के भरोसे पर नई सरकार चुनकर आई है, वह भरोसा प्रत्यक्ष में उतारना भी आवश्यक है। सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त करना, उनसे लाभान्वित होने की कोशिश करना और इन पर अमल करते समय आने वाली अड़चनों की जानकारी पुन: सरकार तक पहुंचाना यह एक श्रृंखला है। इस श्रृंखला का हिस्सा बने बिना केवल घर बैठे सारे काम हो जाने की राह देखना गलत होगा।

आज का स्वप्न कल का यथार्थ     

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से प्लास्टिक के उपयोग को कम करने का तथा जनसंख्या पर नियंत्रण का आवाहन किया है। पर्यावरण और जनसंख्या आज हमारे सामने बड़े प्रश्न हैं परंतु अफसोस इसी बात का है कि आज भी हमें इसकी भयावहता दिखाई नहीं देती। समय से आगे की सोच रखने वाले विद्वान हमें इंगित भी कर रहे हैं, परंतु हम नहीं जाग रहे हैं।

नया भारत कैसा होगा यह हमारी आज की तैयारियों पर निर्भर करता है। असीमित जनसंख्या विस्फोट के कारण प्राकृतिक संसाधनों को तरसने वाला नया भारत या सीमित जनसंख्या वाला प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाला खुशहाल नया भारत। निश्चित ही दूसरा विकल्प हम सभी चुनेंगे। जनसंख्या पर नियंत्रण के कारण खुशहाली और सम्पन्नता का उत्तम उदाहरण हम सिंगापुर के रूप में देखते हैं। ली कुआन यू को सिंगापुर का राष्ट्रपिता कहा जाता है। उन्होंने जनसंख्या वृद्धि पर बहुत ही कड़ा रुख अपनाया था। उस समय लोगों ने उनका भी बहुत विरोध किया था। परंतु वे अपने रुख पर कायम रहे और परिणामत: आज एक सिंगापुर समर्थ राष्ट्र है।

भारत भी समर्थ राष्ट्र है। परंतु अभी हमारी अवस्था सागर तट पर खड़े हनुमान जी की तरह है जो अपने सामर्थ्य को भूल बैठे थे। परंतु जब जामवंत और वानर सेना के अन्य लोगों ने उन्हें उनके सामर्थ्य की याद दिलाई तो वे एक ही छलांग में सागर पार करके लंका पहुंच गए थे। हमारे प्रधानमंत्री ने भी हमें हमारे सामर्थ्य की याद दिलाई है, परंतु छलांग तो हमें ही लगानी होगी।

असीमित जनसंख्या निश्चित ही समस्या है परंतु इस समस्या में अवसर भी है। अवसर है कि आज भारत दुनिया का सबसे अधिक युवाओं का देश है। युवा अर्थात जोश, उमंग, उत्साह और आविष्कार। अधिकतम कार्य करने की शक्ति। यही युवा शक्ति कल का नया भारत बनाएगी। अत: उसे सही दिशा देना आवश्यक है।

नए भारत की क्षमताएं

विगत पांच वर्षों में आम भारतीय नागरिक के रूप में हम समाज में एक सकारात्मक ’व्हायब्रेशन’ महसूस कर रहे हैं। सरकार के द्वारा विभिन्न अवसरों पर लिए गए कठोर, दृढ़ परंतु साहसी निर्णयों ने देश में चेतना फूंकने का कार्य किया है। राष्ट्र की सुरक्षा की चिंता अब हमें नहीं सताती। दो बार की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने हमें भरोसा दिला दिया है कि हम सुरक्षित हाथों में हैं।

मंगलयान, चंद्रयान जैसे मिशन पूर्ण करके हमने दुनिया को यह दिखा दिया है कि अनुसंधानों में हम पीछे नहीं हैं। परमाणु हथियारों का परीक्षण कर हम पहले ही अपनी क्षमता सिद्ध कर चुके हैं। विश्व योग दिवस को यूएन में मान्यता प्राप्त हो चुकी है। कश्मीर, जो कि वर्षों से किसी घाव की तरह रिस रहा था, अब उसकी ठीक से मरहमपट्टी की जा रही है। ये सारे सकारात्मक संकेत हैं जो नए भारत की ओर इशारा करते हैं।

नया भारत इन क्षमताओं पर ही आधारित होगा

नए भारत में चिकित्सा सुविधाओं की कमी नहीं होगी। भारत के डॉक्टर इतने सक्षम होंगे कि वे सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज कर सकेंगे। चिकित्सा क्षेत्र में किए जाने वाले अनुसंधानों के लिए नए भारत में अवसर होगा।

कश्मीर को सामान्य राज्य का दर्जा प्राप्त होने के बाद अब सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा पर्यटन पर। कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। दुनिया भर से सैलानी यहां आते हैं। अभी तक कश्मीर के पर्यटन पर आतंकवाद की काली छाया थी। धीरे-धीरे यहां भी सब सामान्य होगा। प्रकृति ने सुंदरता का उपहार केवल कश्मीर को ही नहीं दिया है; भारत के अन्य राज्यों में भी पर्यटन की असीम सम्भावनाएं हैं। भारत में पाई जाने वाली जैव विविधता को भी पर्यटन के माध्यम से दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। भारतीय पर्यटन मूलत: आध्यात्मिक पर्यटन रहा है और भारतीय अध्यात्म का आकर्षण तो विदेशों को भी बहुत रहा है। हमें हमारे आध्यात्मिक स्थलों को पर्यटन के अनुकूल सभी सुविधाओं से युक्त बनाना होगा। विदेशी लोग गीता की ओर आकर्षित हैं। अत: हमें सोचना चाहिए कि क्या हम कुरुक्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में रूपांतरित कर सकते हैं। इसी प्रकार से अवसरों को पहचान कर हमें नवीन पर्यटन स्थलों का निर्माण करना होगा।

संस्कृत, योग तथा आयुर्वेद की शिक्षा

जस प्रकार से संस्कृत, योग तथा आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार हो रहा है, निकट भविष्य में दुनिया की ओर से इन दोनों की ही मांग बढ़ेगी। इन मांगों को पूरी करने की क्षमता भारत में है। हमें अभी से ही इनके विशेषज्ञ तैयार करने होंगे, जो विदेशों में जाकर वहां के लोगों को सिखा सकें।

एक बात तो तय है कि नया भारत किसी भी तरह की आयात की हुई सभ्यता के आधार पर खड़ा नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए। भाषा, संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं के आधार पर विकसित भारत ही नया भारत होगा। जो उन्न्नत तकनीक के आधार पर अपनी सुरक्षा के लिए किसी को मार भी सकेगा और वैद्यकीय ज्ञान और सुविधाओं के आधार पर किसी को जीवन भी दे सकेगा।

 

This Post Has One Comment

  1. prof. s. r. agarwal

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