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****डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री****
आ म आदमी पार्टी की कम्पनी के भीतर की लड़ाईअनुमान से भी कम समय में जगज़ाहिर हो गई है। पार्टी के दो संस्थापक सदस्यों, योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में राजनैतिक मामलों की समिति से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। केजरीवाल की और उनके समर्थकों की इच्छा तो उनको मुहल्ले से ही बाहर कर देने की थी, लेकिन वे भी आख़िर कम्पनी के घर के भेदी थे, इसलिए मोहल्ले से ही बाहर जाने से तो बच गए, अलबत्ता कमरे से बाहर आंगन तक पहुंचा ही दिए गए।
मतदान के लिए ज़िद हुई तो दोनों खेमों के अशंधारकों की संख्या स्पष्ट हो गई। योगेन्द्र यादव के साथ आठ और केजरीवाल के साथ ग्यारह। यादव का खेमा मतदान के लिए इसलिए भी इच्छुक था ताकि साफ़ साफ़ पता चल जाए कि इस लड़ाई में कौन अंशधारी किसके साथ हैं। तीन अंशधारी सदस्यों ने फ़िलहाल मतदान में हिस्सा लेना उचित नहीं समझा। वे शायद ऊंट किस करवट बैठता है, इसकी प्रतीक्षा में रहे होंगे। ऊंट बड़ा जानवर होता है, बैठते बैठते भी करवट बदल सकता है। इसलिए संक्रमणकाल में कम्पनी का कोई भी अतिरिक्त बुद्धिमान अंशधारक मतदान से बचेगा ही। वैसे कम्पनी ने अपने लिए जो लोकपाल नियुक्त कर रखा था, उसने भी केजरीवाल पर आरोप लगाए थे और अब योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण की दुर्गति के बाद मयंक गांधी ने भी अरविंद केजरीवाल की तानाशाही को लेकर लम्बे पत्र लिखने शुरू कर दिए हैं।
एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि आप कम्पनी के भीतर की यह लड़ाई वैचारिक नहीं है। यह शुद्ध कम्पनी नियमों के अनुसार अंशधारकों में सत्ता लाभ बांटने की लड़ाई है। वैचारिक लड़ाई आप कम्पनी के भीतर हो भी नहीं सकती, क्योंकि इस समूह की कांग्रेस से अलग हट कर कोई विशिष्ट विचारधारा है भी नहीं। इसलिए वैचारिक आधार पर इसे कांग्रेस की प्रतिलिपि कहा जा सकता है। कांग्रेस भी समय समय पर बातचीत में ‘लैफ्ट टू दी सेंटर’ होने का आभास देती रहती थी। इसी प्रकार के संकेत आप के समूह की आपसी बातचीत में पकड़े जा सकते हैं।
सोनिया गांधी ने भी सफलतापूर्वक कांग्रेस को पारिवारिक पार्टी में परिवर्तित कर लिया था, अब आप में भी अरविंद केजरीवाल इस प्रकार के प्रयास कर रहे हैं। अलबत्ता इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनका परिवार अभी स्वयं उन तक ही सीमित है। लेकिन पार्टी रूपी कम्पनी के भीतर संदेश साफ़ रूप से चला गया है कि कम्पनी में खुदरा अंशधारकों की संख्या चाहे ज़्यादा क्यों न हों लेकिन कम्पनी के मालिकाना हक़ अरविंद केजरीवाल के पास ही सुरक्षित हैं। जो उसको चुनौती देगा, उसका हश्र योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण जैसा ही होगा। लेकिन ऐसा नहीं कि आरोप केवल केजरीवाल विरोधी ही लगा रहा हो। केजरीवाल के समर्थक अंशधारकों ने भी आक्रमण किया है। उनका कहना है कि पार्टी पर शांति भूषण, उनका बेटा प्रशांत भूषण और बेटी शालिनी क़ब्ज़ा करना चाहते थे। उसको विफल करने के लिए पार्टी को रणनीति बनानी ही थी। मसलन, आप के हमाम में धीरे धीरे सब नंगे हो रहे हैं।
आप कम्पनी अब तक बाहर के विरोधियों को चित करने के लिए स्टिंग आपरेशन के हथियार का प्रयोग करती रही है। केजरीवाल सार्वजनिक रूप से कहते रहते हैं कि अपनी जेब में सदा मोबाइल रखो और जिससे बातचीत कर रहे हो, गुप्त रुप से उसको रिकार्ड भी करते रहो ताकि वक़्त बेवक्त काम आए। लेकिन आप के एक विधायक केजरीवाल के भी गुरु निकले। उन्होंने अपनी और केजरीवाल की बातचीत भी रिकार्ड कर ली। जब वह रिकॉर्डिंग बाज़ार में आई तो पता चला कि केजरीवाल उसमें अपने विधायक को आचरण, लोकपाल एवं ईमानदारी के बारे में नसीहत नहीं दे रहे थे बल्कि उसको कह रहे थे कि किसी तरह से सोनिया कांग्रेस के छह विधायकों को तोड़ कर आप पार्टी में शामिल करवाओ ताकि सरकार बनाई जा सके। वे उसे गाइड भी कर रहे थे कि सोनिया कांग्रेस के तीन विधायक तो मुसलमान हैं वे तो किसी भी हालत में भाजपा के साथ नहीं जा सकते। लेकिन आप में शामिल होने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होगी। लेकिन अभी तक किसी को यह नहीं पता था कि कम्पनी का निदेशक मंडल आपस में भी एक दूसरे की बातचीत रिकार्ड करवाने के लिए अपने फ़ोन सदा आन रखता है।
योगेन्द्र यादव को घेरने के लिए कम्पनी के निदेशकों ने इस प्रकार का भी एक लघु सिटिंग आपरेशन कर डाला। केजरीवाल कम्पनी के भीतर लड़ाई केवल केजरीवाल की तानाशाही को लेकर ही नहीं है। बहस का मुद्दा यह भी है कि कम्पनी का व्यवसाय क्षेत्र का विस्तार करना चाहिए या नहीं? दरअसल इस कम्पनी को स्थापना काल में ही जितनी ज़बरदस्त सफलता मिली है उससे निदेशक मंडल के सदस्यों को लगता है कि कम्पनी के व्यवसाय का विस्तार भारत के अन्य प्रांतों में भी करना चाहिए ताकि ज़्यादा लाभ हो और निदेशक मंडल के सभी सदस्य मालामाल हो सकें।
फ़िलहाल कम्पनी के एम डी केजरीवाल दिल्ली में मुख्यमंत्री का पद संभाल कर बैठ गए हैं और घोषणा कर रहे हैं कि अन्य प्रांतों में कम्पनी के दफ़्तर तो खोल दिए जाएंगे ताकि वहां केजरीवाल चालीसा पढ़ा जा सके लेकिन वहां व्यवसाय नहीं किया जाएगा। अब कम्पनी के निदेशक मंडल के दूसरे सदस्य जो अन्य प्रांतों में मुख्यमंत्री बनने के लिए लालायित हैं, वे क्या केवल झाड़ू लगाने का काम ही करेंगे? हरियाणा और पंजाब को देख कर निदेशक मंडल के सदस्यों के मुंह में पानी आ रहा है। लेकिन केजरीवाल ने लक्ष्मण रेखा खींच दी है। इसलिए आप में घमासान मचना लाज़िमी था। केजरीवाल को अपना सत्ता सिंहासन पुख़्ता करने के लिए शिष्यों की जरूरत है न कि साथियों की। जिस वक़्त कोई भी आंदोलन शुरू होता है, उस वक़्त आपस में साथी जुटते हैं। शिष्य उस समय नहीं होते। लेकिन जब सत्ता प्राप्त हो जाती है तो शिष्यों की बाढ़ आती है और जय-जयकार का नाद होता है। उस समय साथी भार लगने लगते हैं। यदि कोई आंदोलन सचमुच वैचारिक आंदोलन हो तो वह इन नवोदित शिष्यों की बाढ़ को झेलते हुए भी साथियों में संवाद को बनाए रखता है। लेकिन यदि आंदोलन चलाने वालों का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना ही हो तो वह सत्ता प्राप्ति के बाद आंदोलन के साथियों को निपटाने के काम में लग जाता है। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की जोड़ी आम आदमी पार्टी में इसी काम को करने में लगी हुई है।
केजरीवाल जानते हैं कि सत्ता के बाद ताक़त विधायकों के हाथ में आ जाती है। दिल्ली में सभी जानते हैं कि आम आदमी पार्टी के विधायक भी कमोवेेश उन्हीं गुणों अवगुणों से ग्रस्त हैं, जिनसे दूसरी राजनैतिक पार्टियों के होते हैं। यही कारण है कि कोई विधायक भी योगेन्द्र यादव के खेमे में झांकने तक नहीं आया।
इस मामले में एक बात तो माननी पड़ेगी कि अरविंद केजरीवाल किसी सिद्धहस्त शिकारी की तरह बहुत ही सावधानी से अपना शिकार चुनते हैं। केजरीवाल और मनीष की जोड़ी अपने विरोधियों को पार्टी की निर्णय करने वाली प्रमुख समितियों में से निकाल कर ही शांत नहीं हुई बल्कि उनको पार्टी में से ही बाहर निकाल देने के अभियान में जुट गई। मेघा पाटकर जैसे अनेक सदस्य तो पार्टी में चल रहे इस सत्तावादी नाटक को देखकर ही इसे अलविदा कह गए। किसी ने अरविंद केजरीवाल से वह नीली कार मांगनी शुरू कर दी जो उसने केजरीवाल को दान में दी थी। पार्टी द्वारा अपने प्रशंसकों को धोखा देने का ग़म इतना गहरा था कि एक दानदाता ने पार्टी फ़ंड में दिए गए अपने पैसे वापिस लेने की चिट्ठी लिख दी। दूसरे ने वह लोगो वापिस मांग लिया जो उसने पार्टी को निःशुल्क बना कर दिया था।
दरअसल आम आदमी पार्टी का जन्म ही पाखंड, धोखे और रहस्य में हुआ था। आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की कार्बन कापी के रूप में ही राजनीति में उतारा गया था। अन्ना की छाया तले जो पनप रहा था वह राजनीति में नई व्यवस्था लाने वाला वैचारिक अनुष्ठान नहीं था बल्कि सोनिया कांग्रेस के सत्ताच्युत हो जाने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही थी ताकि राष्ट्रवादी शक्तियां देश के केन्द्र बिन्दु में न आ सकें। अन्ना हज़ारे जब तक इसे समझ पाते तब तक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी काफ़ी आगे निकल गए थे और उन्होंने अन्ना के विरोध को दर किनार करते हुए नया राजनैतिक दल बनाने की घोषणा कर दी थी।
अन्ना कोई नया राजनैतिक दल बनाने के लिए सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि हमारी लड़ाई सत्ता प्राप्त करने की लड़ाई नहीं है, बल्कि व्यवस्था को बदलने की लड़ाई है। इसके लिए पूरे देश में इतना सशक्त जनमत बनाया जाए ताकि, सत्ता चाहे किसी भी राजनैतिक दल की हो, लेकिन वह विपरीत जनमत के डर से भ्रष्टाचार में लिप्त न हो सके। इसके कारण देश की राजनैतिक व्यवस्था साफ़ होगी। यदि हमने भी एक अलग राजनैतिक पार्टी बना ली, तो यह सींग कटा कर भेड़ों के रेवड़ में शामिल होने के समान हो जाएगा। लेकिन न केजरीवाल माने और न ही पर्दे के पीछे से संकट काल में कांग्रेस का विकल्प तलाशते लोग माने। सोनिया कांग्रेस के पिट जाने की सूरत में उन्हें एक ऐसा दल चाहिये था जिसे दिल्ली के सिंहासन पर बिठाया जा सके; ताकि वह १९४७ से चली आ रही कांग्रेस की नीतियों को ही भारत में चालू रख सके। इसलिए आम आदमी पार्टी का गठन हुआ।
यदि आम आदमी पार्टी राष्ट्रवादी शक्तियों के रथ को रोक न सकी तो कम से कम इतना तो कर ही सकेगी कि राष्ट्रवादी ताक़तें स्पष्ट बहुमत प्राप्त न कर सकें। उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली। उनको सत्ता प्राप्त करनी है। उनका मानना है कि उनका उद्देश्य अच्छा है। भ्रष्टाचार को समाप्त करना। अच्छे उद्देश्य के लिए सत्ता की चाह रखना बुरी बात नहीं है।
राजनैतिक नेताओं और उनके नित नए उजागर हो रहे कारनामों के प्रति आम जनता की अनास्था उस सीमा तक पहुंच गई थी कि उसने अरविंद केजरीवाल के इस जादूटोनानुमा कार्यक्रमों को भी सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई समझना शुरू कर दिया। टी. वी चैनलों ने बहती गंगा में हाथ धोने के लिए अरविंद केजरीवाल के नए कुनबे के इन कारनामों को भी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, की तरह धारावाहिक शैली में प्रसारित करना शुरू कर दिया। यह भारतीय राजनीति का स्टिंग आपरेशनकाल कहा जा सकता है।
जब तक अन्ना हजारे और उनके साथी यह समझ पाते कि उनका उपयोग केवल लॉन्चिंग पैड की हैसियत में ही किया गया है तब तक अरविंद केजरीवाल को मीडिया की सहायता से लांच किया जा चुका था। मीडिया के देशीविदेशी मालिकों ने भी इस पूरे प्रयोग में अपनी भूमिका सफलता पूर्वक निभाई। ताज्जुब है इस लांचिंग समारोह में वे लोग भी जश्न में भागीदारी निभा रहे थे, जिन्हें आने वाले दिनों में इसका शिकार होना था।
लेकिन भारत में राष्ट्रवाद की आंधी इतनी सशक्त थी कि सभी पूर्वानुमान ध्वस्त हुए और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लोक सभा में पूरा बहुमत प्राप्त कर लिया। देश का सबसे पुराना राजनैतिक दल कांग्रेस अस्तित्व बचाता नज़र आने लगा और आम आदमी पार्टी आंधी में सूखे पत्तों की तरह उड़ गई। दिल्ली विधान सभा के लिए हाल ही में हुए नए चुनावों में सभी दल परोक्ष-अपरोक्ष राष्ट्रवादी ताक़तों को हराने के लिए एकत्रित हो गए और इस ध्रुवीकरण में आम आदमी पार्टी सत्ता में आ गई।
भाजपा का वोट प्रतिशत तो सुरक्षित रहा लेकिन ध्रुवीकरण के कारण वह सीटें न ले सकी। कांग्रेस सीटों और वोटों दोनों से ही हाथ धो बैठी। केजरीवाल ने सत्ता को कम्पनी के शेयर होल्डर में बांटने से इनकार कर दिया तो विवाद तो होना ही था। फ़र्क़ बस इतना ही है कि पहले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया व्यवस्था बदलने की लड़ाई का पाखंड कर रहे थे और अब यही काम योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण कर रहे हैं।
लेकिन दुख तो इस बात का है कि दिल्ली की जनता ने आप को एक राजनैतिक दल समझ कर वोट दिया था, लेकिन थोड़ी सी बारिश होते ही उसका रंग उतर गया और पता चला कि यह तो राजनैतिक दल के भेष में एक कम्पनी थी जिसका निदेशक मंडल शुद्ध रूप से सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर अंशधारकों की शैली में लड़ता हुया बीच बाज़ार में आ गया है। जब बिना किसी वैचारिक आधार के कोई समूह अच्छे प्रबंधन और बढ़िया प्रचार नीति और संवाद कला से सत्ता हथिया लेता है तो उसके बाद उसकी कार्य शैली वही होती है जो आप की दिखाई दे रही है। प्रश्न यह नहीं है कि इस लड़ाई में कौन ठीक है और कौन ग़लत है। सत्ता पर आधारित परस्पर हितों और लाभांशों के टकराव का मामला है, जिसमें सभी एक रंग में ही रंगे हैं। ठगी केवल दिल्ली की जनता गई है। कम्पनी की जिस पालिसी को चुनावों के समय जनहितकारी कह कर प्रचारित किया गया था, अब उसकी नए सिरे से शब्दकोश के आधार पर व्याख्या करके बताया जा रहा है कि साधारण लोग इसके सही अर्थ पकड़ नहीं पाए थे। पार्टी के भीतर जो जूतमपैज़ार हो रही है, लगता है वही उसके सही अर्थ थे।
मो.: ९४१८१७७७७८
 

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