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चील और लोमड़ी एक चील और लोमड़ी काफी लंबे अर्से से एक अच्छे पड़ोसी की तरह रहते चले आ रहे थे। चील का घोसला पेड़ के ऊपर स्थित था और लोमड़ी की माँद उसी पेड़ के नीचे।.
एक दिन चील को अपने बच्चों का पेट भरने के लिए कोई भोजन नसीब नहीं हुआ। उसने यहाँ-वहाँ देखा तो उसे पता लगा कि लोमड़ी अपने घर पर नहीं है।
वह झट से नीचे उतरी और लोमड़ी का एक बच्चा पंजे में दबाकर अपने घोसले में ले गयी। वह आश्वस्त थी कि उसके घोसले की ऊँचाई उसे लोमड़ी के प्रतिशोध से बचायेगी।
 चील उस लोमड़ी के बच्चे को अपने भूखे बच्चों में बांटने ही वाली थी कि लोमड़ी अपनी माँद में लौटी और अपने बच्चे की सुरक्षित घर वापसी का याचना करने लगी।
चील ने उसकी अनुनय-विनय पर कोई ध्यान नहीं दिया। लोमड़ी को जब अपने तमाम प्रयास व्यर्थ जाते दिखाई दिए, त
वह पड़ोस के एक किसान के खेत पर पहुँची। वह किसान खाना पका रहा था। लोमड़ी वहाँ से जलती हुई मशाल उठा लायी और पेड़ को आग लगा दी।
अपने बच्चों और स्वयं के जीवन पर खतरा मंडराता देख चील ने लोमड़ी के बच्चे को सही सलामत वापस कर दिया। “
एक तानाशाह उन लोगों से कभी सुरक्षित नहीं होता जिन पर वह तानाशाही करता है।”

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