पासपोर्ट कैसे आया अस्तित्व में, क्या जानते हैं आप?

जब आप विदेश यात्रा के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले आपको आपके पासपोर्ट की ज़रुरत पड़ती है। यही पासपोर्ट आपको एक देश से दूसरे देश में प्रवेश दिलाता है, अतः पासपोर्ट किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद अनिवार्य माना जाता है। यदि आप सोचते हैं कि फ्लाइट के ज़रिए  हवाई यात्रा की शुरुआत होने के बाद ही लोगों को पासपोर्ट की ज़रुरत पड़ी, तो आप गलत हैं। दरअसल पासपोर्ट आधुनिक युग की खोज नहीं, बल्कि सर्वप्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया जा चुका है। आइये जानते हैं पासपोर्ट के अस्तित्व में आने की एक रोचक कहानी।

पासपोर्ट का प्राचीन समय में उल्लेख 

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पासपोर्ट को ‘शाही अनुमति पत्र’ के नाम से जाना जाता था, जिसका इस्तेमाल राजाओं ने कई सालों तक किया। लेकिन दूसरी और कुछ इतिहासकारों का मत है कि इसका इस्तेमाल प्राचीन समय में भी किया जाता रहा है। हिब्रू बाइबिल में शाही अनुमति पत्र का उल्लेख आता है। साथ ही शेक्सपियर के नाटक में भी ऐसे शाही अनुमति पत्र को ‘राजपत्र’ के रूप में सम्बोधित किया गया है। भले ही इस राजपत्र का उल्लेख प्राचीन समय में किया गया हो, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान खास तौर पर किया गया है।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इस्तेमाल 

उद्योग क्रान्ति के दौर में पहले-पहल इसकी आवश्यकता लोगों को महसूस होने लगी थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पासपोर्ट का इस्तेमाल तेज़ी से हो रहा था। उस दौरान हर राजा को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरा मंडराता दिखाई दे रहा था। जिसकी वजह से इन शाही अनुमति पत्रों का इस्तेमाल एक मात्र जरिया रह गया था।

फ़्रांस और ब्रिटेन के बीच हुए मतभेद 

पासपोर्ट या शाही अनुमति पत्र को लेकर फ्रांस और ब्रिटेन के बीच में सन 1400 से मतभेद रहे हैं। इतिहासकारों की माने तो 1464 में पासपोर्ट को लेकर हर जगह चर्चा छाई हुई थी। पासपोर्ट एक ऐसा दस्तावेज माना जाता था जो किसी पोर्ट से गुज़रने के लिए आधिकारिक अनुमति पत्र के रूप में इस्तेमाल होता था। वहीँ ब्रिटेन ने पासपोर्ट को देश में रहने वाली आम जनता के लिए जारी किया था, जिसकी ज़रूरत राजा या रानी को नहीं थी। यही वजह थी कि पासपोर्ट शब्द को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच मतभेद रहे। वर्तमान समय में भी ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ बिना किसी पासपोर्ट के यात्रा करती हैं। दुनिया का सबसे पुराना पासपोर्ट भी ब्रिटेन के पास ही मौजूद है। जिसे सन 1941 में चार्ल्स ने जारी किया था। ब्रिटेन का सबसे पहला पासपोर्ट साल 1914 में अस्तित्व में आया था। जिसे नेश्नालिटी एंड स्टेटस एलियंस एक्ट के अंतर्गत बनाया गया था। इस पासपोर्ट में व्यक्ति के कद, चेहरे के आकार और शरीर के रंग इत्यादि के बारे में जानकारी होती थी। साथ ही इस पासपोर्ट की अवधि 2 साल तक मान्य होती थी। इसके बाद ब्रिटेन में 1920 में पासपोर्ट को स्टैंडर्ड कर दिया गया, जिसका नाम ओल्ड ब्लू रखा गया। 1947 में इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइजेशन ने पासपोर्ट से संबंधित सारी ज़िम्मेदारी ले ली और इसीलिए पासपोर्ट से संबंधित मामलों में आईसीएओ के पास ही सारे फैसले लेने का हक है।

वर्तमान में भारतीय पासपोर्ट 

बात करें भारतीय पासपोर्ट की, तो यह तीन रंगों में पाया जाता है। सबसे पहले भारत में 1914 में पासपोर्ट का इस्तेमाल किया गया था। उस दौरान भारत में  पासपोर्ट डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन यह 6 महीनों से ज्यादा नहीं चल पाया। साल 1920 में दोबारा पासपोर्ट एक्ट लागू किया गया, जिसके बाद भारत में स्वतंत्रता मिलते ही पासपोर्ट का काम विदेश मंत्रालय को दे दिया गया। वर्तमान समय में भी पासपोर्ट, इंडियन पासपोर्ट एक्ट के तहत जारी किए जाते हैं। भारत में तीन अलग-अलग रंगों में पासपोर्ट का इस्तेमाल होता है, जिसे तीन भागों में बांटा गया है। रेगुलर, ऑफिशियल और डिप्लोमेटिक पासपोर्ट। जहां एक ओर नीले रंग का पासपोर्ट भारत के नागरिकों के लिए जारी किया जाता है, वहीं सफेद रंग का गवर्नमेंट ऑफिशल्स के लिए दिया जाता है। इस पासपोर्ट को उनकी ऑफिशियल आईडी के रूप में भी देखा जाता है। तीसरा रंग मरून कलर का होता है, जिसे इंडियन डिप्लोमेट्स और सीनियर गवर्नमेंट ऑफिशल द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही मरून पासपोर्ट धारकों को वीज़ा की ज़रूरत नहीं होती और यात्रा के दौरान उन्हें आम लोगों से ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं।

इस तरह शाही अनुमति पत्र से पासपोर्ट का इतिहास काफी रोचक रहा है और समय के साथ इसमें बदलाव किए जाते रहे हैं।

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