सबलता से होगा महिला सशक्तिकरण

महिलाओं को मानसिक रूप से सशक्त और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ ही सकारात्मक, मितभाषी और मित्रवत बने रहना चाहिए, वरना उनमें और पुरुषों में फर्क ही क्या रह जाएगा। महिलाओं के इसी गुण की वजह से ही तो उन्हें ‘देवी’ की संज्ञा दी जाती है।

हम 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं और आधुनिकीकरण हमारे सिर चढ़ कर बोल रहा है। हम पाश्चात्य संस्कृति से काफी प्रेरित हैं। यह संस्कृति हमारी नई पीढ़ी के मन-मस्तिष्क में पूरी तरह अपने पैर पसारने में सफल है। किसी भी संस्कृति से प्रभावित होना या उसका अनुकरण करना कोई बुरी बात नहीं है, बशर्ते ऐसा करने के साथ ही हम जड़ों से विलग न हों। अपनी भारतीय संस्कृति को न भूले। उसकी शिक्षाओं और खूबियों को भी साथ लेकर चलें। तभी हम अपने आप को मानसिक तौर पर खुली और विस्तृत विचारधारा वाले व्यक्ति के रूप में विकसित कर सकते हैं, जिसमें हर श्रेणी के लोगों के लिए सम्मान भाव हो खास कर महिलाओं के लिए।

महिलाओं के सम्मान का ‘एक खास दिन’

प्रति वर्ष इसी उद्देश्य से महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिवस महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 1917 से इस दिन को मनाने की शुरुआत हुई थी और तब से लेकर आज तक यह पूरे विश्व में जोश और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन लोगों में महिलाओं के लिए अचानक से ही सम्मान भाव उमड़ पड़ता है। व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उसके लिए दिल छू जाने वाले मैसेज से भर जाते हैं। यही नहीं अखबारों और टीवी चैनलों में भी उसकी उपलब्धियों की गाथाओं को जगह दी जाती है। पूरा विश्व गुलाबी रंग में रंग जाता है। लोग महिलाओं की तुलना देवी दुर्गा के रूप में करते हैं। इस लिहाज से देखें, तो यह एक दिन वाकई महिलाओं को भरपूर ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देता है। उन्हें बेहद स्पेशल फील करवाता है । लेकिन अगली सुबह…??

दुर्भाग्यवश अगले ही सुबह यह सम्मान भाव अचानक से विलुप्तप्राय जीव बन जाता है। अगले दिन फिर से महिलाओं को उसी दुनिया में वापस लौटने की अनुभूति होती है, जिसमें उसे हर कदम पर खुद को साबित करने का संघर्ष करना होता है। जहां उसे घर और बाहर दोनों जगह अपनी आबरू बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। घर-परिवार, बच्चे और ऑफिस आदि की टेंशन में उसका पूरा दिन गुजर जाता है। एक बार फिर से न्यूज़ चैनल और अख़बार महिलाओं के प्रति अलग-अलग प्रकार की प्रताड़नाओं की खबरों से भर जाते हैं। पिछले कुछ सालों में तो कई महिलाओं के साथ ऐसे गंभीर अपराध हुए हैं, जिनके बारे में सोच कर भी रूह कांप उठती है और खुद की तथा अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता सताने लगती है।

सरकारी योजनाओं के प्रति उदासीनता

महिलाओं की इस स्थिति का एक प्रमुख कारण है उनका आर्थिक रूप से स्वतंत्र और स्वाबलंबी न होना। कुछ महिलाएं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं भी, वे मानसिक रूप से किसी-न-किसी पुरुष पर निर्भर हैं, फिर चाहे वे उनके भाई, पिता, पति या पार्टनर हों। हमारी सरकार ने महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए कई सारी योजनाएं बनाई हैं, जैसे कि- बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, महिला किसान सशक्तिकरण योजना, नारी-उत्थान योजना, टैक्स में रिबेट आदि। बावजूद इसके महिलाओं की स्थिति में आज भी अपेक्षित बदलाव संभव नहीं हुआ है। इस दिशा में और भी गंभीर प्रयास करने की जरूरत है और खुद महिलाओं को भी इसके प्रति जागरूक होना होगा।

कई सुपर वुमेन भी हैं हमारे समाज में

कई ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्होंने महिला अपराध और महिलाओं के प्रति उदासीन परिस्थितियों के बीच से निकल कर भी अपनी अलग पहचान बनाई है। आज वे न केवल पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि आत्मविश्वास से लबरेज भी हैं। उन्होंने कठिनाईपूर्ण परिस्थितियों का सामना करते हुए जीवन के हरेक क्षेत्र में खुद को साबित किया है। ऐसी महिलाएं अपने परिवार और समाज के लिए एक मजबूत आधार स्तंभ की भूमिका निभाती हैं। इन महिलाओं को ’सुपर वुमेन’ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि ऐसी महिलाओं की संख्या काफी कम है और उनमें से भी कुछ ऐसी हैं, जो घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण गुरुग्राम के एक सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत मेरी एक दोस्त है। उसकी शादी कम उम्र में ही हो गई थी। सुंदर, सुशील और पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उसके पति और ससुरालवालों ने कभी उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। लंबे समय उसे मानसिक और शारीरिक हिंसा का शिकार भी होना पड़ा, लेकिन उसने हार नहीं मानी। विपरीत परिस्थितियों में भी होने के बावजूद अपने आपको संभाला। अपनी पढाई पूरी करके पीएचडी की डिग्री हासिल की और जॉब ज्वॉइन किया। इस बीच उसके पति की नौकरी चली गई। ऐसे में उसने अपने परिवार को आर्थिक रूप से संभाला। आज भी वह अपने परिवार के लिए एक मजबूत पिलर बन कर डटी है। अब उसके पति और ससुरालवाले भी उसकी क़द्र करते हैं।

महिला सशक्तिकरण का दूसरा उदाहरण मैं सुषमा का देना चाहूंगी, जो गुरुग्राम हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं। सुषमा की शादी भी कम उम्र में हो गई थी। उसके पति का अपना व्यापार है। उसने सुषमा को वर्षों काफी प्रताड़ित किया। कम पढ़ी-लिखी होने के कारण मजबूरी में सुषमा उस प्रताड़ना को बर्दाश्त करती रही, पर जब पानी उसके सिर के ऊपर से गुजरने लगा, तब तंग आकर एक रोज वह अपने दो बच्चों को साथ लेकर पति के घर को छोड़ कर निकल आई। सुषमा के सास-ससुर उसके प्रति काफी सहायक थे। उन्होंने सुषमा की हर संभव मदद की। सुषमा ने बड़ी ही दृढ़ता के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की। आज वह डी. जी. सी गर्ल्स कॉलेज में पुस्तकालय संचयक (Library Storer)के रूप में कार्यरत है और पति से अलग रहते हुए स्वतंत्र रूप से अपना परिवार चला रही है।

ऐसी ही एक अन्य महिला है तारा, जो कि एक कुक है। वह गुरुग्राम की ही एक हाउसिंग सोसाइटी के कुछ घरों में खाना बनाने का काम करती है। उसने भी अपने पति की प्रताड़नाओं से तंग आकर घर छोड़ दिया था और अब घरों में काम करके अपना जीवनयापन कर रही है। आज वह न सिर्फ अच्छी कमाई कर रही है, बल्कि अपने जीवन स्तर को भी उसने काफी सुधारा है।

अत: महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्षम होना हर तरह से सकारात्मक है। हालांकि कुछ महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद या अपने पति से ज्यादा सफल होने के बाद नकारात्मक मनोवृत्तियों से भर जाती हैं। इसका प्रभाव उनके व्यवहार में स्पष्ट रूप से झलकने लगता है। उनमें आक्रामकता देखने को मिलती है। कुछ लोग यह दलील देते हैं कि ऐसा करके कहीं-न-कही वे अपना नैराश्य प्रकट कर रही होती हैं, लेकिन गलत है।  मेरी राय में महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर होने के साथ ही सकारात्मक, मितभाषी और मित्रवत बने रहना चाहिए, वरना उनमें और पुरुषों में फर्क ही क्या रह जाएगा। महिलाओं के इसी गुण की वजह से ही तो उन्हें ’देवी’ की संज्ञा दी जाती है।

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