भावी परिदृष्य

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एक ओर मैदानी क्षेत्रों के लोग कृषि को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, जबकि पहाड़ों में इस व्यवसाय को उपेक्षित या हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। इस कारण से भी उत्तराखंड के लोगों ने अपने प्राचीन व परंपरागत व्यवसाय को अपनाने की अपेक्षा शहरों में जाकर नौकरी करना उपयुक्त समझा। इसलिए हमें चाहिए कि हम लोगों के मन में अपनी खेती, पशुपालन व परंपरागत व्यवसाय को अपनाने के प्रति पुनः आकर्षण उत्पन्न करें।

सवाल अभी जिंदा हैं

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निरंतर हो रहे पलायन को रोकने के लिये जरूरी था कि पहाड़ों में आधारभूत औद्योगिक ढांचा तैयार करते हुए रोजगारपरक उद्योग स्थापित किये जाते। स्वरोजगार की योजनाएं सही ढंग से ईमानदारी से लागू की जातीं। कौशल विकास योजनाओं पर बल देते हुए क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य योजना तैयार की जाती मगर ऐसा नहीं हुआ। नतीजा राज्य बनने के बाद एक ओर पहाड़ के गांव के गांव खाली होते चले गए और दूसरी ओर देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार में बड़े पैमाने पर दूसरे राज्यों से भी पलायन कर लोग पहुंचने लगे।

शौर्य और बुध्दिमत्ता की प्रतीक उत्तराखंड की नारी

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समय की मांग है कि गांवों में रह रही अभावग्रस्त मातृशक्ति के हित में सरकार और समाजसेवियों द्वारा उसी ईमानदारी से पहल हो जैसी आजादी से पहले या उसके बाद के शुरुआती दौर में हो रही थी। परिस्थितियां थोड़ा भी अनुकूल हुईं तो पलायन के भयावह संकट पर भी काबू पाने का माद्दा रखती है उत्तराखंड की नारी। विषम आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों ने यदि यहां नारी के जीने की राह मुश्किल की है तो उनसे लड़ने का हौसला भी दिया है।

महिला सशक्तिकरण पर टिका देश का भविष्य

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जब हमारा देश आजाद हो चुका है, तो नारी आजाद क्यों नहीं है, ? यह सवाल मेरी अंतरात्मा को बहुत कचोटता है l मजदूर तबके से लेकर शिक्षित परिवारों तक की महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती है ।नारी के बढ़ते हुए कदमों को पुरुषों की सत्ता स्वीकार नहीं कर…

देर से ही सही पर मिल गया न्याय

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यह जीत एक उम्मीद जगाती है कि एक मां की जिद, एक पिता का हौसला और सीमा कुशवाहा जैसे वकीलों का जूनून जब एक साथ मिलता है, तो निर्भया की तरह देश की हर बेटी को न्याय मिल सकता है।

महिलाएं बीमारी से कैसे बचें?

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मानसिक तैयारी और शारीरिक तैयारी आपको बीमारियों के कष्ट को कम करने में बहुत मदद कर सकती है। खान - पान, नियमित व्यायाम शरीर और मन दोनों को स्वस्थ रखने का पहला हथियार है। कष्ट को टाले नहीं, डॉक्टरी सलाह समय पर अवश्य लें।

वीरांगणाओं की भूमि भारत

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भारतीय नारी के इस शक्ति स्वरूप की विषद् व्याख्या भारतीय वाङ्मय में मिलती है। ... पुराण काल से वर्तमान समय तक हमारी भारतभूमि तमाम ऐसी पुरुषार्थ साधिकाओं के शौर्य से गौरवान्वित होती आ रही है।

डिप्रेशन को ना करें नज़रअंदाज़

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जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों विशेष कर महिलाओं में भी जागरूकता फैलें और वे अपनी परेशानियों में दब कर ना रहें। इसके लिए परिवार का संवेदनात्मक सहयोग जरूरी है।

हम किसी से कम नहीं…

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महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग करियर की संकल्पना ही गलत है। आज कुछ ऐसे हटके करियर ऑप्शन्स उपलब्ध हैं, जिनमें पिछले कई सालों में महिलाओं का बोलबाला रहा है।

अब और नहीं!

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हम सभी के लिए शर्मसार होने वाली बात है कि ’घरेलू हिंसा’ को आज भी हर परिवार का आंतरिक मामला ही समझा जाता है। इन घटनाओं को रोकने के बजाय लोग इनसे दूरी बना लेना बेहतर समझते हैं। आखिर कब जागेगी दुर्गा?

भारतीय ग्रामीण महिलाए

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महिला आंदोलनों में ग्रामीण महिलाओं की आवाज दब कर रह गई है। आज जो कुछ भी अधिकार मिल रहे हैं वे सिर्फ शहरी मध्यम वर्ग की महिलाएं प्राप्त कर रही हैं।

सबलता से होगा महिला सशक्तिकरण

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महिलाओं को मानसिक रूप से सशक्त और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ ही सकारात्मक, मितभाषी और मित्रवत बने रहना चाहिए, वरना उनमें और पुरुषों में फर्क ही क्या रह जाएगा। महिलाओं के इसी गुण की वजह से ही तो उन्हें ‘देवी’ की संज्ञा दी जाती है।

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