महामारी का असर कम होते ही घर बंदी से रियायत

बस, दो-चार हफ्ते और लॉकडाउन सहना पड़ेगा। कोरोना महामारी धीरे-धीरे सिमटती जाएगी। जैसे जैसे महामारी का असर कम होगा, हम घर बंदी से रियायत पाते रहेंगे।लेकिन इसके लिए जरूरी है कि नियमों का कड़ाई से पालन करें। इंदौर के अरविंदो अस्पताल को म.प्र. सरकारने कोविड-19 अस्पताल घोषित किया है। प्रस्तुत है, अस्पताल के एच ओ डी डॉ. रवि दोशी से कोविड-19 की स्थिति, चिकित्सा, सावधानियों के बारे में हुई विशेष बातचीत के महत्वपूर्ण अंशः

भारत में कोरोनावायरस की मौजूदा स्थिति क्या है? क्या हमारे हालात भी इटली जैसे हो सकते हैं या हम इस पर नियंत्रण कर सकेंगे?

हम इस पर नियंत्रण कर रहे हैं। इटली और अमेरिका से कहीं बेहतर स्थिति में है। हमारे यहां के नेतृत्व तथा प्रशासन की मुस्तैदी कई गुना अच्छी है। लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग, सें सेटिवजोन का निर्धारण, टास्क फोर्स का गठन, अस्पतालों को सभी सुविधाएं मुहैया कराना इत्यादि सभी अपेक्षित चीजें शुरुआत से ही होने लगी हैं। नेतृत्व हमें नियमित रूप से जानकारी भी दे रहा है।

     भारत की जन संख्या को देखते हुए क्या आपको लगता है लॉकडाउन अधिक लंबे समय तक संभव है?

बिल्कुल! हमारे यहां जन संख्या अधिक अवश्य है, परंतु हमारा सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत है। हमारी जन संख्या निश्चित समूहों में वर्गीकृत है। ये समूह धार्मिक हो सकते हैं, सामाजिक हो सकते हैं। इन समूहों के नेतृत्व को अगर कोई संदेश देते हैं तो वह और अच्छी तरीके से लोगों तक पहुंचता है। इन समूहों का नेतृत्व करनेवाले लोगों को साथ में रखना अत्यंत आवश्यक है।

    ऐसा कहा जा रहा है कि भारत में अभी कोरोनावायरस अपने उच्चतम बिंदु पर है। 3 मई के बाद इस का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगेगा। क्या यह सही है?

जब भी हम किसी गंभीर बीमारी का इलाज करते हैं तो उस बीमारी के कुछ स्तर होते हैं। मेडिकल के प्रथम वर्ष में ही हमें यह सिखाया जाता है। निश्चित रूप से हर बीमारी इन स्तरों से होकर गुजरती है। भारत में कोरोनावायरस का उच्च स्तर आया है या नहीं यह तो समय ही बताएगा परंतु दूसरे देशों की तुलना में जिसे उच्च स्तर कहा जाना चाहिए वह भारत में आ चुका है। हमारे यहां आंकड़ा भले ही उस स्तर तक नहीं पहुंचा है परंतु सर्वोच्च समय यही है। वास्तव में इसका अध्ययन करने के लिए दो प्रकार के तरीके होते हैं। पहली है प्रोस्पेक्टिव अर्थात जो चल रहा है तथा दूसरा है रेट्रोस्पेक्टिव अर्थात जो हो चुका है। अभी हम प्रोस्पेक्टिव फेज़ में है। चूंकिै बीमारी आगे बढ़ रही है अतः हम केवल अनुमान लगा सकते हैं। परंतु इन अनुमानों को हम निश्चित नहीं कह सकते।

पूरी दुनिया में कोरोना के प्रभाव को लगभग 2 महीने पूरे हो चुके हैं, परंतु अभी तक इसका कोई इलाज नहीं मिल पाया है इसका क्या कारण है?

प्राय: वायरल बीमारियों में दवाइयोंका असर बहुत कम होता है।उन्हें वैक्सीनेशन या रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर ही कम किया जा सकता है। चूंकि यह नई बीमारी है अतः टीका बनने में समय लग रहा है। यह न तो इन्फ्लुएंजा है, न सार्स है, न टीबी है, जिसे पहले दुनिया ने देखा हो। अत: किसीके पास उससे लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में एंटी बॉडी जन हीं हैं।अत: उसे तैयार होने में समय लगेगा। उदाहरण के तौर पर हम देखें      कि हमारे आस पास के कुछ लोगों को जुकाम होता है और कुछ समय बाद वह ठीक भी हो जाता है। इसी तरह समय के साथ कोरोना की तीव्रता भी कम हो जाएगी क्यों कि जैसे-जैसे अधिक संक्रमित हो रहे हैं, उनमें संक्रमण की मात्रा दूसरों की तुलना में कम है। जैसे-जैसे हमारे शरीर में एंटी बॉडीज का स्तर बढ़ेगा वैसे-वैसे हमें अधिक फायदा होगा।

यह कहा जा रहा कि गर्मी बढ़ने के साथ कोरोना का असर कम होता जाएगा। यह कितना सही है?

वैसे तो इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, परंतु हम भारतीय बहुत आशावादीलोग हैं। इसलिए इसे केवल आशा के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत होता है।

   कोरोना से बचने के लिए हमें अपने आहार में क्या परिवर्तन करने चाहिए?

भारतीय गृहणियों के द्वारा बनाया गया भोजन पूर्ण आहार है। हम दाल, चावल, सब्जी, रोटी के साथ जो धनिया तथा मेथी की बनी हुई हरीचटनी खाते हैं, वह जिंकसे भरपूर होती है। भारतीय भोजन में नींबू का भरपूर उपयोग किया जाता है। यह नींबू विटामिन सी का खजाना है। अगर सम्पूर्ण भारतीय भोजन को देखें तो वे अपने आप में ‘इम्युनिटीबूस्टर्स’ हैं। कोरोना के प्रादुर्भाव में खट्टाखाना थोडा नुकसान देह है, कयोंकि उससे खांसी होने का डर होता है। परंतु पकी हुई सब्जियों पर ऊपर से नींबू डालकर खाना बेहतर होगा। अभी से लोगों को बहुत अधिक दवाइयों पर आश्रित कर देना केवल नकारात्मकता को बढ़ाना होगा। उससे अच्छा होगा कि अपने भोजन में विटा मिन सी और अन्य विटामिन की मात्रा को बढ़ाया जाए जो कि नींबू और दूध आदि में प्रचुर मात्रा में होते हैं।

     विदेशों में कोरोना के कारण मृत कों की संख्या की तुलना में भारत में संक्रमितों की संख्या और मृत्यु दर बहुत कम है। इस का कारण क्या है? क्या हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक बेहतर है?

मेरे हिसाब से तो इसका श्रेय मुस्तैद प्रशासन, समुचित व्यवस्था, समय रहते लॉकडाउन का निर्णय इसीने कमाल किया है। हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता, जेनेटिक्स का इस में कितना श्रेय है यह कहने का अभी सही समय नहीं है। जिन आंकड़ों के दावे किए जा रहे हैं वो बहुत कम समय और कम स्थानों से लिए गए हैं। अत: उन पर बहुत अधिक विश्वास करना सही नहीं होगा। अभी अगर आंकड़े कम हैं तो उसका सारा श्रेय सख्त प्रशासनिक व्यवस्था को ही जाता है।

भारतीय मानसिकता को देखते हुए क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि अगर लॉकडाउन और बढ़ातो लोगों की सहन शक्ति जवाब दे जाएगी और लोग लॉकडाउन तोड़कर बाहर निकल आएंगे?

नहीं! मेरा नजरिया कुछ अलग है। मेरे हिसाब से तो लोगों की व्याकुलता कम हुई है और समझदारी बढ़ी है। लोग समझ रहे हैं कि घर के अंदर रहना ही कयों जरूरी है। लोगों घर के अंदर सभी प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराई जा रहीं हैं। कई लोग घरों से ही अपने ऑफिस के कार्य कर रहे हैं। अत:  ऐसा नहीं है कि काम काज बिल्कुल रुक गया है। हां, यह एक स्वाभाविक बात है कि किसी पिंजरे में बंद पंछी को मौका मिला तो वह बाहर तो घूमकर आएगा ही। परंतु आज की तारीख में भारत एक मध्यम वर्ग प्रधान देश है। लोग अब धीरे-धीरे स्थिति को समझ रहे हैं।

आपके पास आने वाले कोरोना के मरीज किस अवस्था में होते हैं? और आप उन पर उपचार की प्रक्रिया का निर्धारण कैसे करते हैं?

दरअसल हमारे पास आनेवाले रोगी अलग-अलग तरह के होते हैं। कुछ लोगों में कोरोना के लक्षण होते हैं। कुछ लोग जो बाहर से आए हैं उनमें लक्षण नजर नहीं आते, पर उन्हें संक्रमण होने की आशंका होती है। कुछ स्वास्थ्य कर्मी हैं जो बताते हैं कि मैंने चार दिन पहले एक मरीज का बीपी या शुगर लिया था वह मरीज अब कोरोना पॉजिटिव है। कुछ लोग बहुत गंभीर अवस्था में होते हैं। उन्हें सांस लेने में परेशानी होती है, खांसी होती है, बुखार होता है। उन्हें तुरंत भर्ती करना पड़ता है। इन तीन-चार प्रकार के रोगियों में अगर निम्नस्तर का रोगी है तो हम चेकअप करके सारी सावधानियां लेने की हिदायतों के साथ उसे घर भेज देते हैं। अगर चिकित्सा कर्मी है जो गलती से कोरोना पॉजिटिव मरीज के सम्पर्क में आया है तो उसे क्वारंटीन रहने के लिए और खुद पर नजर रखने के लिए कहते हैं। जिन लोगों को अत्यधिक परेशानी होती है उन लोगों को आइसोलेशन वॉर्ड में भर्ती कर लिया जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि समाज के कुछ वर्गों में यह गलत धारणा है कि जैसे ही पता चला कि कोरोना पॉजिटिव है सब कोक्वारंटीन कर देंगे या भर्ती कर देंगे। क्या वाकई ऐसा है?

सच कहूं तो अभी कोरोना से ज्यादा लोग अफवाहों से डरे हुए हैं। और डर एक ऐसी स्वाभाविक प्रक्रिया है जो अक्सर मनोबल कम करती है। कभी-कभी तो हमें ऐसे फोन आते हैं जिसमें लोग लक्षण बताते हैं और जब  हम कहते हैं कि आप अस्पताल में आकर टेस्ट कराओ तो वे कहते हैं कि हम अस्पताल नहीं आएंगे अगर वहां  आने से हमें कोरोना हो गया तो। जब फोन ही लक्षणों के कारण किया है तो अस्पताल आने से कैसे कोरोना हो जाएगा बल्कि यहां आने से समय पर चिकित्सा हो सकेगी। पर लोग डर जाते हैं। हमें तो एम्स और अन्य चिकित्सा संस्थानों से उपयुक्त दिशा निर्देश दिए गए हैं। हम उन्हीं निर्देशों के अनुसार कार्य कर रहे हैं। अत: किसी को भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। पहले लोग टीबी के लोगों के पास जाने से घबराते थे, उनसे घृणा करते थे। परंतु अब टीबी का इलाज हो जाता है। रोग छुपाने से अधिक बढ़ता है यह लोगों की समझ में आ रहा है। यह केवल हमारे देश में ही नहीं अन्य देशों में भी है।

     आपके यहां आने वाले मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए आप क्या तैयारियां करते हैं?

सबसे पहले तो उनसे वार्तालाप कर के उन्हें सामान्य मानसिकता में लाने की कोशिश करते हैं। अगर संक्रमित व्यक्ति हैं तो उसके नजदीक नहीं  जा    सकते या उसे सांत्वना देने के लिए उसे स्पर्श नहीं कर सकते परंतु उससे बात करते रहते हैं। जो लोग भर्ती हैं उनके बिस्तर छह फुट  की दूरी पर होते हैं। जब आप किसी एक रोगी से बात कर रहे हों तो दूसरे भी आपकी बात सुनते हैं। रोगी भले ही उस समय आपकी बातें समझे या न समझे उसके साथ वाले लोग उसे बाद में समझाते हैं कि डॉक्टर नर्स सही कह रहे हैं। कई बार हमने देखा कि सुबह जब हम चेकअप करने जाते हैं तो रोगी हमारी बात नहीं मानते पर शाम को मान जाते हैं।

    क्या आप इन दिनों के कुछ अनुभव बता सकते हैं?

जी बिलकुल, इन वार्ड में विशेष प्रकार के कपड़े पहनकर जाना होता है। उन कपड़ों में डॉक्टर हों या चायवाला सब एक जैसे दिखते हैं। कई बार हम डॉक्टरों को भी लोग शिकायत करने लगते हैं कि ‘अरे तुम चाय लेकर नहीं आए, दूध लेकर नहीं आए।’ अब चूंकि मैं मोटा हूं तो लोग समझन लगे हैं कि अरे ये मोटावाला आदमी है तो ये डॉक्टर होगा। परंतु ऐसी स्थिति में भी वॉर्ड में ठहाके लग जाते हैं। मजाक करने लगते हैं। पहले दिन ही डर का माहौल रहता है, फिर सब सामान्य होने लगता है।

सबसे ज्यादा परेशानी ‘फेक न्यूज’ से होती है। उससे छोटे बच्चे जल्दी डर जाते हैं। कई बार कुछ छोटे बच्चों के घर के सदस्य उनके साथ नहीं होते तो वार्ड के बड़े लोग उन्हें संभालते हैं। मैं कह सकता हूं कि इस कठिन परिस्थिति में भी एक अनोखा सामाजिक ताना बाना देखने को मिलता है।

     क्या किसी विशिष्ट आयु वर्ग के लोगों को ज्यादा परेशानी होती है?

यह कहा जा सकता है कि बुजुर्ग लोगों को अधिक परेशानी हो सकती है। सत्तर से अधिक आयु वर्ग के लोगों को सबसे अधिक दिक्कत होती है। साठ से कम उम्र के लोगों को तुलनात्मक रूप से कम परेशानी होती है।

    तब्लीगी जमात के लोगों द्वारा चिकित्सा कर्मियों को परेशान करने की खबरें देशभर से आ रही हैं। क्या आपके यहां ऐसा कुछ हुआ है?

सच कहूं तो सब बहुत डरे हुए हैं। डर आदमी से हर तरह का व्यवहार करा लेता है परंतु जैसे ही यह डर मन से निकलता है, आदमी सामान्यहो जाता है। मेरी नजर में तो यह आया है कि घृणा के कारण लोग एक दूसरे से बातचीत नहीं करते। एक बार जहां बातचीत का रास्ता खुल जाता है तो लोग डॉक्टर का साथ देने लगते हैं। मेरा मानना है कि समय के साथ वे भी इस लड़ाई में हमारे साथ होंगे।

     कई जगहों पर चिकित्सा कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, परंतु फिर भी चिकित्सा कर्मी लोगों की सेवा कर रहे हैं। यह भावना कैसे उत्पन्न होती है?

वास्तविकता तो यह है कि सेवा की भावना रखने वाला व्यक्ति ही स्वास्थ्य क्षेत्र में आता है। हम समझते हैं कि बीमारी शारीरिक भले ही हो परंतु वह मानसिक नकारात्मकता भी लाती है। अत: हम यह स्वीकार करते हैं कि वे हमें नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं बल्कि यह उनका डर है जो उन्हें आक्रामक बना रहा है। अत: हर स्वास्थ्य कर्मी यह विश्वास रखता है कि जैसे-जैसे उनका डर कम होगा वे समझ जाएंगे कि हम उन्हें स्वास्थ्य का वरदान देने आए हैं।

  आप और अन्य चिकित्सा कर्मी अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए क्या करते हैं?

अस्पताल में दो तरह की ड्यूटी होती है। एक जो सीधे मरीजों के साथ होती है और एक मैनेजमैंट करना होता है। मरीजों के पास जब किसी चिकित्सा कर्मी की ड्यूटी होती है तो उसके बाद कम से कम चार दिन तक वह स्वयं को आइसोलेट रखता है। बाकी लोग सामान्य कार्य करते रहते हैं।

     आपके अनुसार भारत को कोरोनामुक्त होने में कितना समय लगेगा?

मेरे हिसाब से दो हफ्ते का समय और लगेगा और लॉकडाउन की स्थिति पंद्रह मई तक और चलेगी।

आप ‘हिंदी विवेक’ के माध्यम से पाठकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

लॉकडाउन का पालन करें। सबसे बड़ी बात कि हम सकारात्मक रहें। भारत की प्रशासनिक प्रणाली बहुत अच्छी है। हम स्वयं पर विश्वास रखें कि हम इस बीमारी को हरा देंगे।

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