राष्ट्रहित में नकार भी आवश्यक

पिछले कुछ दिनों में जिन दो खबरों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रखा है उनमें से एक है भारत और चीन के बीच बिगड़ते हालात और दूसरी है सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या। इन दोनों ही घटनाओं ने लोगों के सामने कई प्रश्न खडे कर दिए हैं। इन दोनों ही खबरों का लोगों की दैनंदिन जीवनचर्या से वैसे कोई सीधा सम्बंध नहीं है, परंतु जैसे-जैसे लोगों के सामने इनसे जुड़ी आंतरिक बातों की परतें खुल रही हैं, लोग अधिकाधिक मुखर हो रहे हैं। वे इन घटनाओं को भूतकाल में घटित हुई घटनाओं से जोड़ रहे हैं और इनके भविष्य में होने वाले परिणामों के प्रति सचेत भी हो रहे हैं।
चीन का विश्वासघाती और विस्तारवादी रवैया, पूर्व की कांग्रेस सरकारों की उसके सामने सदैव घुटने टेकने की नीति और उसके जरा सा आगे बढ़ते ही दो कदम और पीछे हट जाने की आदत के कारण चीन इस गलतफहमी में था कि अभी भी वह अपने वही पुराने पैंतरे अपनाकर भारत को डरा सकता है, परंतु इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार चीन को उसकी ही भाषा में उत्तर दिया गया है और सेना की बढ़ती कार्रवाइयों से यह साफ संदेश भी दिया जा रहा है कि अगर उसने भारत की तरफ आंख भी उठाई तो इस बार भारत उसे क्षमा नहीं करेगा।

अपने पड़ौसियों को परेशान करके अपना दबदबा कायम रखने का चीन का यह पुराना खेल है। तिब्बत को उसने हड़प लिया और नेपाल व पाकिस्तान को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है। लेकिन वियतनाम को वह कुचल नहीं सका और महाशक्ति बने चीन को वियतनाम जैसे एक छोटे से देश ने युद्ध में हरा दिया। भूटान भी किसी प्रकार से चीन के सामने शरणागत नहीं हुआ। अब शेष बचा भारत तो उसके साथ चीन का अभी तक का अनुभव हमेशा ही उसके लिए सकारात्मक रहा था। परंतु कोविड-19 के बाद चीन के प्रति वैश्विक सोच में जिस तरह से परिवर्तन आया है, जिस तरह सारी दुनिया चीन को अविश्वासपूर्ण और भारत को विश्वासपूर्ण नजरों से देख रही है, यह चीन को खटकना स्वाभाविक है। इसीलिए चीन फिर से अपनी उन्हीं दगाबाज चालों पर उतर आया है। छोटी आंखों और कोमल मुस्कान वाले मुखौटे के पीछे छिपे ड्रैगन ने फुफकारना शुरू कर दिया है। पर इस बार भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया उसे जवाब देने के लिए तैयार है। इस बार चीन का जरूरत से ज्यादा फुफकारना उसके लिए आत्महत्या करने के समान होगा।

देश कभी आत्महत्या नहीं करते। आत्महत्या व्यक्ति करता है, जैसे सुशांत सिंह राजपूत ने की। ऐसा नहीं है कि सुशांत से पहले फिल्मी दुनिया की काली करतूतों का शिकार कोई नहीं हुआ। यहां की राजनीति तो बरसों पुरानी है। परंतु जिस व्यथा से वह गुजर रहा था, उस व्यथा को अभी तक किसी ने इस तरह सभी के सम्मुख नहीं रखा था। बॉलिबुड में लॉबिंग का शिकार हुए कितने ही प्रतिभाशाली कलाकार चुपचाप गुमनामी के अंधेरे में खो गए। दर्शकों ने तो उन्हें खूब सराहा परंतु बॉलिवुड ने नहीं, क्योंकि वे ‘आउटसाइडर्स’ थे। अर्थात विगत कई वर्षों से बॉलिवुड पर राज कर रहे परिवारों से नहीं थे। उनके चले जाने के बाद उनके पक्ष में बोलने वाला नहीं था या उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने वालों के विरोध में कोई आवाज नहीं उठाई गई। परंतु सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद जैसे इस क्षेत्र में बरसों से अन्याय सहन करने वालों का धैर्य छूट गया। एक के बाद एक बयान आने लगे, जिनमें इसी इंडस्ट्री के लोग इस चकाचौंध से भरी दुनिया के पीछे की काली सच्चाई खुद अपनी ही जुबानी बता रहे हैं। और आम जनता धीरे-धीरे यह समझने लगी है कि क्यों कोई कलाकार इतना अच्छा अभिनय करने के बाद आगे फिल्मों में नहीं आ पाता, या क्यों किसी अच्छे संगीतकार की धुनें अचानक कानों पर पड़ना बंद हो जाती हैं।

जैसा कि शुरुआत में लिखा है कि अब आम जनता ने घटनाओं का विश्लेषण करना शुरू कर दिया है, अत: यह आवश्यक है कि इस बात का भी विचार किया जाए कि जो घटनाएं घटित हो रही हैं उनमें हमारी क्या भूमिका हो सकती है। यह सही है कि देश का हर व्यक्ति सीमा पर जाकर युद्ध नहीं कर सकता और न ही बॉलीवुड में लॉबिंग कर रहे लोगों का गिरेबान पकड़कर यह नहीं पूछ सकता कि तुम्हें किसी की प्रतिभा को मारने का हक किसने दिया? परंतु आम नागरिक के पास सबसे अच्छा हथियार है, नकार।

चीन केवल सीमा पर लड़ने वाले देशों में से नहीं है। वह आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतितीनों तरीकों से लड़ता है। भारत के साथ उसके व्यापारिक सम्बंध हैं। उसके द्वारा भेजे गए कच्चे माल से यहां वस्तुओं का निर्माण होता है। चीनी एप आज लगभग हर भारतवासी के मोबाइल में हैं। उसका व्यापार ही उसकी रीढ़ की हड्डी है। चीन से आयातित जिन सामानों को खरीदा जा चुका है, उन्हें फेंकना व्यर्थ है। परंतु नए चीनी सामानों को नकारा जाए यह अभी भी हमारे हाथ में है। मोबाइल से चीनी एप हटा देना हमारे हाथ में है। भारतीय सरकार कुछ अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कानूनों के कारण चीन का माल भारत में लाने पर पाबंदी भले ही न लगा सकती हो परंतु वह आम नागरिकों को माल खरीदने पर मजबूर भी नहीं कर सकती। और अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार अगर मांग घटेगी तो आपूर्ति करने वाले को नुकसान होगा ही।

जिस तरह व्यापार में ग्राहक राजा होता है उसी तरह मनोरंजन की दुनिया में दर्शक राजा होता है। अगर बॉलिवुड में लॉबिंग करने वाले लोगों की फिल्मों को दर्शक नकारने लगेंगे तो उनके साम्राज्य को धक्का जरूर लगेगा। पूरी इंडस्ट्री यह सोचने पर विवश जरूर हो जाएगी कि प्रतिभा को प्राथमिकता दी जाए या परिवारवाद को।

क्या अब यह सोचने का समय आ गया है कि एक देश के रूप में जिस तरह हमने उन सभी बातों को स्वीकार किया जो देशहित में थीं, उसी तरह उन सभी बातों को नकारा भी जाए जो राष्ट्रहित में नहीं हैं?
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