मुद्रा-विज्ञान एवं रंग चिकित्सा

एक पुरानी कहावत है: पहला सुख निरोगी काया; दूसरा सुख घर में माया; तीसरा सुख सुलक्षणी नारी; चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी। इन सुखों में सबसे बड़ा सुख स्वस्थ शरीर को बताया गया है। क्योंकि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ-मन निवास करता है। शरीर से भी काफी महत्वपूर्ण बातें होती हैं, लेकिन उन सबको पाने के लिए स्वस्थ शरीर होना परमावश्यक है। रोग मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। जो व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं होता, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता- अपनी मंजिल हासिल नहीं कर सकता।

स्वस्थ कौन ?
सामान्य चिकित्सकीय भाषा में स्वस्थ वह है, जिसे समय पर भूख लगती है, समय पर नींद आती है, जो समय पर शौच को जाता है और जो अनुकूल या प्रतिकूल हर परिस्थिति में सदैव प्रसन्नचित्त रहता है। लोग कहते सुने जाते हैं कि कि देखो विज्ञान ने कितनी प्रगति कर ली है। हम लोग कहां-से-कहां पहुंच गये। बैलगाड़ी से राकेट की दुनिया में आ गये। कितना आविष्कार हो गया है। हम कितने साधन संपन्न हो गये। पहले औषधालय-अस्पताल बहुत छोटे-छोटे हुआ करते थे- अब कितने बड़े-बड़े हो गये हैं। पहले दवाइयां कम हुआ करती थीं, अब इनकी कोई कमी नहीं रही। आज हर गली, नुक्कड़, चौराहे पर दवाइयों की दुकानें मिल जायेंगी। मगर इतनी सुविधाएं होने के बावजूद, जरा सोचें कि क्या रोग कम हुए हैं- तो उत्तर मिलेगा बिलकुल नहीं। इसका मूल कारण यही है कि हम प्रकृति से दूर भाग रहे हैं। हमारी जीवन-शैली बदल गयी है। अनुचित आहार-विहार से हमारा शरीर मानो बीमारियों का घर होकर रह गया है।

एक छोटा बच्चा संपूर्ण प्रकृति में जीता है। इसलिए बाल्यावस्था में प्रकृति के सब गुण सुरक्षित रहते हैं। लेकिन जब बच्चा बड़ा होता जाता है, तब वह प्रकृति के गुणों से दूर हटता जाता है। बच्चा जब तीन महीने को होता है, तब दिन में 300 बार हंसता है। जब थोड़ा बड़ा हो जाता है और स्कूल जाना आरंभ करता है, तो उसके हंसने की यह संख्या घट कर 150 रह जाती है। एस.एस.सी तक पहुंचते यह संख्या महज 50 तक सिमट जाती है। लेकिन स्नातक बन कर जब वह नौकरी की तलाश में जुटता है, तब यह संख्या 10 से भी कम हो जाती है। नौकरी मिलने के बाद 5 से भी नीचे चली जाती है। फिर शादी के बाद तो उसे हंसने का मौका ही नहीं मिलता- मुश्किल से एक-दो बार हंस पाता है। इस तरह वह अपनी वास्तविक प्रकृति से दूर भागता-भागता अंतत: तनाव का शिकार हो जाता है। यह शरीर बीमारियों का घर हो जाता है। आत्मिक आनंद से कोसों दूर हो जाता है। इस तरह वह लौकिक और आध्यात्मिक दोनों जीवन से वंचित हो जाता है।

यह एक बड़ी विडंबना है कि इनसान बाहर की दुनिया – कोलकाता, दिल्ली हो या चेन्नई; या फिर अमेरिका, जापान, इंग्लैंड हो या अफ्रीका- सबकी पल-पल की खबर रखता है। लेकिन खुद उसके अंदर क्या हो रहा है उसकी खबर नहीं रखता। वैसे भी अगर इनसान रखना भी चाहे तो नहीं रख सकता। दुनिया का बड़ा-से-बड़ा डॉक्टर हो या वैज्ञानिक शरीर के रहस्यों को नहीं समझ सकता। आखिर समझे तो कैसे जब इसमें मस्तिष्क जैसा सुपर कंप्यूटर हो; फेफड़े व गुर्दे जैसा रक्त-शुि्ध्दकरण यंत्र हो; हृदय जैसा गतिशील रक्त-पंपिंग मशीन हो; आमाशय, लीवर एवं तिल्ली जैसा रासायनिक कारखाना हो; आंख जैसा सुंदर कैमरा हो; कान जैसा अनुपम श्रवण-यंत्र हो; लिंफ जैसी सफाई प्रणाली हो; नाड़ी तंत्र जैसी मीलों लंबी संचार व्यवस्था हो; अंत:स्रावी ग्रंथियों के समान संतुलित, नियंत्रित, संयमित, न्यायिक, प्रशासनिक व्यवस्था हो; और प्रकाश से तीव्र चलनेवाला मन हो।

क्या आपने कभी कल्पना की है? शरीर के आवरण के रूप में त्वचा न होती तो, हमारी क्या हालत होती ? शरीर अपने लिए जरूरी रक्त, मांस-मज्जा, हड्डियों, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण स्वयं करता है। इसको किसी प्रयोगशाला में अभी तक नहीं बनाया जा सका है। त्वचा के छिद्रों से पसीना तो आसानी से बाहर आ जाता है, मगर क्या वजह है कि घंटों बारिश में भीगने या फिर तालाब में तैरने के बावजूद एक बूंद पानी भी शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता। हर व्यक्ति के शरीर का अपना एक वजन होता है, मगर किसी को भी इसका एहसास नहीं होता। हमारा शरीर सामान्य तापमान 98.4 डिग्री फारेनहाइट होता है- भले ही बाहर कितनी गर्मी या ठण्ड़ पड़ रही हो। हम बर्फीले उत्तरी-दक्षिणी ध्रुवों पर चले जायें या तपती रेगिस्तानी सरजमी पर हों-शरीर का तापमान वैसा-का-वैसा ही बना रहता है।

हम व्यवहार में देखते हैं कि आंधी या तेज हवा के दौरान हल्के पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं, मगर हलन-चलन, उठने-बैठने या दौड़ते समय शरीर की पतली-से-पतली नाड़ी अपना स्थान नहीं छोड़ती। शीर्षासन करने के दौरान भी हृदय या इस तरह का शरीर का कोई अंग अपना स्थान नहीं बदलता। इससे बड़ा कोई आश्चर्य हो सकता है? हमारे शरीर की कार्यप्रणाली इतनी सशक्त है, तो निश्चय ही उसमें स्वयं को चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ रखने की क्षमता भी है। आश्चर्य की बात है कि हम सभी इससे बिलकुल अनभिज्ञ हैं। यही नहीं हम इसके बारे में जानने की कोशिश भी नहीं करते। लेकिन हम आपको बता दें कि हमारे ऋषियों और मुनियों ने इसको एक वैज्ञानिक रूप दिया हुआ है, जिसे मुद्रा-विज्ञान एवं रंग चिकिस्ता का नाम दिया जा सकता है। दरअसल यह बगैर किसी औषधि के बीमारियों से लड़ने का प्राकृतिक उपाय है। स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी देने वाली इस मुद्रा-विज्ञान चिकित्सा में हथेली और उंगलियों का काफी महत्व है। हथेलियों में इनसान के भाग्य खोलने वाली शक्तियों का अदभुत वास है। मनीषियों ने सुबह उठते ही अपनी हथेलियों के दर्शन के महत्व को समझाने की कोशिश की है। हथेलियां प्राण-ऊर्जा और जीवन के रहस्यों का का भंडार हैं। यही वजह है कि शरीर के किसी भी हिस्से में अगर दर्द हो तो हाथ सहज में ही वहां चला जाता है। उंगलियां अपेक्षाकृत ज्यादा संवेदनशील होती हैं। यही वजह है कि नाड़ी की गति जानने के लिए डॉक्टर उंगलियों की काफी मदद लेते हैं।

रेकी चिकित्सा में भी हथेली का ही ज्यादा उपयोग होता है। रत्न-चिकित्सा में भी विभिन्न प्रकार के नगीनों को अंगूठी में जड़कर उंगलियों में पहना जाता है। इनसे निकली तरंगें शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार साबित होती हैं। सुजोक बियोल मेरिडियंस के सिद्धांत के अनुसार उंगलियों से ही शरीर के विभिन्न अंगों में प्राण उर्जा के प्रवाह को नियंत्रित व संतुलित किया जा सकता है। इससे यही सिद्ध होता है कि हथेली और उंगलियों का इनसान की जीवन-शैली से सीधा संबंध होता है। जब शरीर में जीवन-तत्वों की घट-बढ़ होती है, तो इससे हम बीमार पड़ जाते हैं। शरीर में इन तत्वों को संतुलित रखने के लिए मुद्रा-विज्ञान चिकित्सा एक अचूक उपाय है।

मुद्राओं पर एक नये ढंग से विचार करने का श्रेय आचार्य केशव देव को जाता है। उनका मानना है, ‘‘उचित मुद्राओं के निरंतर अभ्यास से शारीरिक तत्वों में पुन: संतुलन कायम कर व्यक्ति निरोगी हो सकता है।’’ आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा अन्वेषित प्रेक्षाध्यान प्रद्धति में मुद्राओं को सहायक अंग के रूप में समुचित स्थान दिया गया है। प्रेक्षाध्यान में मुद्रा का महत्वपूर्ण स्थान है।

मुद्राओं की संख्या हजारों में है। आध्यात्मिक साधना, देवताओं की पूजा-उपासना और मंत्र-तंत्र, धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य, योग-साधना आदि में इन मुद्राओं का उपयोग होता रहा है। लेकिन अनेक मुद्राएं ऐसी हैं, जिसमें केवल अंगूठे व उंगलियों का ही उपयोग होता है। पांचों उंगलियां पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं: अंगूठा अग्नि, तर्जनी वायु, मध्यमा आकाश, अनामिका पृथ्वी एवं कनिष्ठिका जल तत्व का।

अंगूठे के अग्रभाग को अंगुलियों के अग्रभाग से मिलाने पर, ठीक नाखून के नीचे लगाने पर (स्पर्श करने पर) उंगली से संबंधित तत्व संतुलित होते हैं। तत्व बढ़ गया हो तो उसे कम करने के लिए उंगलियों के अग्रभाग को अंगूठे के मूलभाग पर लगाकर अंगूठे से दबाने से तत्व घटता है।

इस तरह व्यक्ति अपनी इच्छा व शरीर की जरूरत के अनुसार मुद्राओं का प्रयोग करके तत्वों को घटा सकता या बढ़ा सकता या संतुलित कर सकता है। अनेक बीमारियों का इलाज घर बैठे स्वयं करके अपना डॉक्टर स्वयं बन सकता है। यह पूर्णता नि:शुल्क इलाज है। इसे करने के लिए औषधालय या किसी चिकित्सकीय संस्थान की जरूरत नहीं है। कोई भी व्यक्ति घर, आफिस, ट्रेन, बस, हवाई जहाज, बगीचा कहीं भी बैठा हो या प्रवचन सुनते, टीवी देखते अपनी सुविधानुसार कर सकता है। वह इस तरह सुखी, शांति और आनंदपूर्ण जीवन जी सकता है।

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