श्रीरामचरितमानसकार गोस्वामी तुलसीदास

विश्व साहित्य में शेक्सपियर के बाद गोस्वामी तुलसीदास ही हैं जिन पर सबसे अधिक शोध प्रबंध प्रस्तुत हुए हैं। …तुलसी ने जो कुछ कहा है, वह सिर्फ राम की कथा नहीं बल्कि जीवन का महाकाव्य है।

गोस्वामी तुलसीदास के जन्म को लेकर ही यह बात कही जाती है कि वे ऐसे पुरुष है जो जिस तारीख यानी तिथि को जन्मे उसी तिथि को उनकी मृत्यु या कहें कि देहावसान हुआ। एक दोहा कहा जाता है-

  1554 बिसै कालिंदी के तीर
श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरयो शरीर

और इसी तरह श्रावण शुक्ला सप्तमी को ही तुलसी ने अपना देह त्याग किया उस संदर्भ का दोहा है-

1680 असी गंग के तीर

श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर ।

गोस्वामी तुलसीदास इतिहास की दृष्टि से 1554 में पैदा हुए कालिंदी के पास राजापुर गांव में। तुलसी भक्तिरस के कवि हैं। प्रभु श्रीराम उनके आराध्य हैं। वह परब्रह्म के रूप में मानव लीला कर रहे हैं ऐसा तुलसीदास कहते हैं। राम गोस्वामी तुलसीदास के परब्रह्म हैं, जो मानव लीला कर रहे हैं। तुलसीदास कहते हैं इस कलिकाल में एक राम का नाम ही सहारा जान पड़ता है।
बिना श्रद्धा के आप राम भक्ति को नहीं पा सकते। वे कहते हैं कि भक्ति या आस्था तर्क का विषय नहीं है। वैसे भी कहा जाता है ‘गॉड इज द मोस्ट इललॉजिकल थिंग इन दिस वर्ल्ड’ अर्थात परमात्मा तर्क का विषय नहीं है। इसीलिए गोस्वामी कहते हैं-

बिनु श्रद्धा संबल रहित नहीं संतनकर साथ
तिन करमानस अगमनअति, जिन्हें न प्रिय रघुनाथ।

तुलसी रूपक बांधने में बेजोड़ हैं। अपने दोहे में कहते हैं चातक पक्षी को स्वाति की बूंद ही चाहिए। मोक्ष के लिए हमारे मुख में गंगा जल डाला जाता है, वाह रे चातक, बाण मारा वह गंगाजल में गिरा। पर गिरते ही पलट कर चोंच उठा दी, कि कहीं गंगा जल न आ जाए।

बधिक हत्यो पर्यो पुन्यजल उलट उठाई चोंच
तुलसी चातक प्रेमपट, मरतहु लगी न खोंच

अपने प्रेम रूपी वस्त्र पर खरोंच तक नहीं आने दी। यही है प्रेम की दिव्यता। तुलसी के राम अति दयालु हैं। नाथों के नाथ हैं और इसीलिए वे कहते हैं कि प्रभु आप कृपालु हैं और मैं दीन। आप दानी हैं और मैं याचक। आपके और मेरे अनेक नाते हैं, जैसा भी आप स्वीकार करें। इसीलिए उनका पद है-

तू दयालु दीन हों, तू दानी हों भिकारी
हों प्रसिद्ध पातकी, तू पापपुंज हारी ।

गोस्वामी तुलसीदास और राम को लेकर अनेक विद्वानों में आज बड़ी चर्चा है और हम यहां एक आश्चर्य की बात उल्लेखित करना चाहेंगे कि साहित्य जगत में सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में शेक्सपियर के बाद गोस्वामी तुलसीदास ही हैं जिन पर सबसे अधिक शोध प्रबंध प्रस्तुत हुए और तुलसी पर पहला शोध ग्रंथ किसी भारतीय ने नहीं बल्कि इटली के विद्वान एल सी तेसीतोरी ने 1911 में फ्लोरेंस विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया।

कहा जाता है कि शेक्सपियर ने अपने साहित्य में लगभग 35000 शब्दों का प्रयोग किया जबकि तुलसी ने छत्तीस हजार। तुलसी ने जो कुछ कहा है, वह सिर्फ राम की कथा नहीं बल्कि जीवन का महाकाव्य है।

तुलसी तुलसी सब कहे, तुलसी बन की घास।
जापर कृपा राम की बन गए तुलसीदास॥

यदि हम तुलसी के साहित्य पर विचार करें तो उन्होंने महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की, खंडकाव्य में जानकी मंगल और पार्वती मंगल है, विनय पत्रिका है कवितावली गीतावली और दोहावली और भी कुछ रचनाएं। मानस की रचना 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन में पूरी हुई। संवत् 1631 में उसका आरंभ रामनवमी के दिन हुआ और 1633 में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों कांड पूरे हुए। नवमी तिथि या नवा अंक महत्वपूर्ण है।

एक और संयोग देखें, वर्णमाला का 27 वां अक्षर है र। राम लिखें तो 27 अ की मात्रा यानी 2 और म यानी वर्णमाला का 25 वां अक्षर अब 27 + 2+ 25 = 54। 5 + 4 मतलब 9।

और अब हम सीता शब्द पर विचार करें। वर्णमाला का 32 वा अक्षर स, ई की मात्रा 4, 16 वां अक्षर त और आ की मात्रा, यानी 2। तो अब 32+4+16+2=54। 5 + 4 मतलब 9।  सीताराम  दोनों को मिला दें यानी कि 54 + 54 तो 108। 108 फिर से नौ। इन अक्षरों की गणना और संख्या को आप क्या कहेंगे?
इतना ही नहीं एक शायर जाफर रजा कहते हैं-

786 में राम रहीम मिल जाए
बिस्मिल्लाह के वही आयद जो हरे कृष्ण में आएं

उर्दू लिपि में बिस्मिल्लाह लिखने पर अंक उतने ही आएंगे जितने हरे कृष्ण लिखने पर। भारतीय परंपरा में राम और कृष्ण ऐसे दो महानायक हैं, जिनकी भक्ति की गंगा में भारतीय मानस अवगाहन करता है। इस देश में राम और कृष्ण की व्यापकता है। वह देश और काल, भाषा और जाति से परे हैं। कई मुस्लिम शायरों और कवियों ने राम के संदर्भ में लिखा है। नजीर कहते हैं-

दिल का इरादा तो है कि वहां तक पहुंचूं
अब यह अपनी पहुंच पर है कि कहां तक पहुंचूं
तुलसी पर लिखा तो यहां तक पहुंचे
अब राम पर लिखूं तो कहां तक पहुंचे

तुलसीराम पर लिखा कि रत्ना ने लिखवाया इस पर भी अक्सर चर्चा होती है। तुलसी अपनी पत्नी से मिलने अपनी ससुराल चले गए। रत्ना को अच्छा नहीं लगा और उसने कहा-

लाज ना आवत आपको डोरे आए आप
धिकधिक ऐसे प्रेम को, कहा कहों मैं नाथ
अस्थि चर्म मय देह मम जामे ऐसी प्रीत
जो होती श्रीराम में होती नब भव भीतीथ

राम ने लिखवाया कि रत्ना ने पता नहीं, पर हमें मानस जैसा ग्रंथ मिल गया, जो दिशाबोध कराने वाला ग्रंथ है जो जीवन का महाकाव्य है। तुलसी भक्त कवि तो हैं, लेकिन उनकी भक्ति में राम कथा के माध्यम से वे राजनीति, समाज नीति के संकेत भी करते हैं। वे कहते हैं-

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी
ते नृप अवश्य नरक अधिकारी
महिलाओं की दशा पर भी कहते हैं-
कत विधि सृजी नारी जग माही
पराधीन सपनेहु सुख नाही

इतना ही नहीं वे तीन लोगों द्वारा राज्य के हित में, अस्वस्थ व्यक्ति के हित में, और शिष्य के हित में सदा सत्य बोलने की बात करते हैं।

सचिव वैद्य गुरु तीन जो, प्रिय बोलहीं भय आस
राज धर्म तन तीन के हुई हैं वे गई नास

आज कन्या भ्रूण हत्या की बहुत बात की जा रही है। तुलसी कितने पहले कन्या के महत्व को प्रतिपादित कर चुके हैं। तुलसी कहते हैं-

पुत्री पवित्र किए कुल दोउ
सुजस धवल जग कहै सब कोउ।

यही कारण है कि तुलसीदास की रामचरितमानस और स्वयं तुलसीदास के संबंध में प्रगतिशील समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने कहा- तुलसी की कविता से निकली अनगिनत उक्तियां और कहावतें रोज आदमी को टिकाती हैं, सहारा देती हैं और सीधे रखती हैं। तुलसी एक रक्षक कवि थे, जब चारों तरफ से हमले हो रहे हों, तब बचाना, ढांढ़स देना, टेक देना, शायद ही तुलसी से बढ़कर कोई कर सकता है।

रूसी के हिंदी विद्वान वारान्नीकोव ने मानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया उनकी वसीयत के मुताबिक उनकी कब्र पर देवनागरी में लिखा है-

भले भलाई ही लहें, लहें नीचाइ नीच
सुधा सराहहीं अमरता गरल सराहहीं मीच

सज्जन भलाई देखता है। इसके विपरीत अधम नीच कृत्य में मग्न रहता है।
तुलसी सिर्फ कवि नहीं बल्कि एक द्रष्टा हैं। इतना सब होने पर भी वे कहते हैं-

कवि ना होउं नहीं चतुर कहांऊं
मति अनुरूप राम गुन गाऊं

लेकिन निसंदेह तुलसी के काव्य से जीवन को बहुत कुछ अर्थों में समझा जा सकता है और इसीलिए तुलसी ने न केवल जीवन की बात की बल्कि कहते हैं कि राम कथा जन-जन में जो आज व्याप्त है वह तुलसी के कारण ही है। राम को चरित्र नायक बनाया तो तुलसी ने बनाया। उनके विषय में यानी तुलसी के विषय में बेनी कवि कहते हैं

वेद मत सोधि, सोधि के पुरान सबै
संतन ओ असतंन को भेद को बताऊतो
कपटी कुराली कूर कलिके कुचाली जीव
पाहन हृदय में कौन प्रेम उपजाऊ तो
बेनी कवि कहै मानो मानो हो प्रतीतीयह
कौन राम नाम की चर्चा चलाउतो
भारी भवसागर उतारतो कवन पार
जो पे यह रामायण तुलसी ना गाउतो॥

तुलसीदास जब राम की लीला का वर्णन करते हैं तो एक अद्भुत चमत्कार करते हैं। तुलसी के राम का चरित्र व चेतना इतनी एक सी है कि जो उसका रूप सोचता है वैसा ही होने लगता है। यह है तुलसी की कविता का सामर्थ्य और राम के चरित्र का आदर्श। राम में मर्यादा है। वे अपने जीवन में अनेक संघर्षों और विरोधाभासों के बीच भी अपने आदर्श को नहीं छोड़ते, और इसीलिए हमारे संविधान में वर्णित रूप के कारण राम केवल एक मिथक नहीं रह गए हैं बल्कि उनका एक संवैधानिक अस्तित्व है। कहा गया है कि भारतीय संविधान में वर्णित रूप के कारण राम केवल एक मिथक नहीं है बल्कि उनका संवैधानिक अस्तित्व है और वे भारतीय संस्कृति की अंतर्निहित वास्तविकता है, और इस वास्तविकता को हमें स्वीकार करना ही होगा।

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