इस्लामिक दुनिया में जनक्रांति

एक बार जब लोग अपने- अपने गली-मुहल्ले, समाज और देश में बदलाव लाने के लिए कटिबद्ध हो जाएंगे, तो उनके सैलाब को बड़े से बड़ा तानाशाह भी नहीं रोक पाएगा। इस्लामी देशों में इस सच्चाई का सबूत मिल गया है।

उत्तरी अफ्रीकी इस्लामी देश ट्यूनेशिया की राजधानी ट्यूनुश की प्रमुख भीड़ भरी सड़क पर इसी वर्ष 16 जनवरी को जब ठेले पर फल बेचने वाले 26 वर्षीय मुहम्मद अली बौजीजी ने अपने शरीर पर पेट्रोल छिड़क कर आत्मदाह किया, तो वह आग देखते ही देखते देश के कोने-कोने में फैल गयी। दूसरे ही दिन यानी 17 जनवरी को हजारों लोगों ने देश के तानाशाही राष्ट्रपति जैनुल आबेदीन बिन अली के महल को घेर कर उनकी बरखास्तगी के नारे लगाने शुरू कर दिए। राष्ट्रपति और प्रशासन के बैठे दूसरे
लोगों को गुमान भी नहीं था कि आत्मदाह की एक घटना से प्रभावित होकर हजारों लोग सड़कों पर आ जाएंगे। प्रशासन विरोधी नारे लगाएंगे और राष्ट्रपति के महल को घेरने का प्रयास करेंगे। लाख कोशिश करने पर भी प्रशासन को पता नहीं चल पाया कि आखिर इस आंदोलन का मुखिया लीडर कौन है? या फिर वे कौन लोग हैं जिन्होंने चौबीस घंटे से भी कम समय में लोगों को इतना जर्बदस्त ढंग से आंदोलित किया? राजनीतिक दलों और सामाजिक संस्थाओं की गतिविधियों से भी ऐसे आंदोलन की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, तो फिर इस विशाल जनांदोलन का कर्ता-धर्ता कौन था?

देखते ही देखते अपने ढंग का यह अनोखा आंदोलन अफ्रीकी ट्यूनेशिया से शुरू होने के बाद मिदाा, यमन, बहरीन, लीबिया में भी फैल गया। दिलचस्प बात यह है कि वहां भी, खासकर मिदाा में ट्यूनेशिया की तरह यह एक विचित्र जनांदोलन था। मिदाा में भी वहां के सत्तासीन तानाशाह राष्ट्रपति हुसनी मुबारक को उनके पद से हटाने की मांग को लेकर नौ दिनों के बाद 25 जनवरी को हजारों लोग राजधानी काहिरा की प्रमुख चौराहे तहरीर चौक पर जमा होने लगे। बाद में वहां के लोगों ने ट्यूनेशिया के राष्ट्रपति की तरह 1982-83 से तानाशाही शासन चलाने वाले राष्ट्रपति हुसनी मुबारक के महल को घेर कर उनसे पद छोड़ने
की मांग करने लगे। लोगों को हटाने और डराने- धमकाने के लिए तहरीर चौक पर फौज की एक टुकड़ी भी भेजी गयी। लेकिन लोग वहां डटे रहे। किसी ने भी मौत की परवाह नहीं की। देखते ही देखते आंदोलन स्कंदरिया समेत दूसरे शहरों में भी फैलने लगा। स्थिति को देखते हुए हुसनी मुबारक के वफादारों की टीम भी उनसे अलग होने लगी। मुबारक ने कुछ सुधारों की घोषणा की। आगामी चुनाव की बात की, लेकिन आंदोलनकारी टस से मस नहीं हुए। तहरीर चौक पर लाखों लोगों का वह सत्याठाही आंदोलन मिदाा ही नहीं अरब संसार के इतिहास का भी एक नया अध्याय लिख रहा था। हालांकि सुरक्षा बलों से वहां झड़प भी हुई। लगभग एक हजार आंदोलनकारी मारे गये और सैकड़ों जख्मी हुए। लेकिन जिन्न बोतल सेें बाहर आ चुका था। अंत में आंदोलन के शुरू के 15-16 दिन के साथ ही 11 फरवरी को मिदाा के भी लौह पुरुषो कहे जाने वाले राष्ट्रपति हुसनी मुबारक को मोम की तरह पिघल कर पद छोड़ना पड़ा। तब से लेकर आज तक वह कैद में है और उनपर कुशासन के आरोप में मुकदमा चलाया जा रहा है।

मिदाा के बाद सीरिया, यमन, लीबिया और बहरीन में भी अचानक एक बाद एक जनांदोलन चल पड़ा है। मई के अंत में यमन की राजधानी सन की प्रमुख सड़क पर हजारों लोग तानाशाह राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के विरोध में जमा हो गये। दो चार दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा तो प्रशासन ने बल का प्रयोग किया। नतीजे में लोगों के साथ देश के कुछ संगंठित कबीलों ने भी प्रशासन और राष्ट्रपति के खिलाफ हथियार उठा लिया। आज भी वहां जंग जारी है। एक झड़प में राष्ट्रपति जख्मी हुए। उनसे कहा गया कि वे प्रयाम छोड़ दें। लेकिन उन्हें गद्दी छोड़ना पसंद नहीं। उनके हटने तक आंदोलन जारी रहेगा। मिदाा के पड़ोसी देश सीरिया में भी वहां के तानाशाह राष्ट्रपति बशारूल असद को हटाने के लिए पिछले मार्च से आंदोलन चल रहा है।
ट्यूनेशिया, यमन, मिदाा की तरह सीरिया में भी तानाशाही है। भूतपूर्व राष्ट्रपति हाफिज पासद ने 40-45 वर्ष तक बंदूक की गोली के सहारे शासन किया। विरोधियों को कुचला। मानवाधिकारों का हनन और देश में डर का माहौल फैलाकर हुकूमत की। पिछले वर्ष उनकी मौत के बाद उनके बेटे और वर्तमान राष्ट्रपति ने कुर्सी संभाली। वह राष्ट्रपति भी अपने पिता की राह पर चले और हर तरह के विरोध को कुचला। लोकतांत्रिक अधिकार जो पहले भी नहीं थे, इनके आने से और भी समाप्त कर दिये गए। ट्यूनेशिया के बाद मिदाा के जनांदोलन से प्रभावित होकर सीरिया में भी लोगों ने वैसा ही आंदोलन शुरू किया। प्रशासन ने यहां यानी सीरिया में आंदोलन को दबाने के लिए हिंसा का उपयोग किया। फौजी कार्रवाई की। नतीजे में लोगों ने और कुछ सरकार विरोधी संगठनों ने भी हथियार उठा लिया। दोनों में पिछले चार पांच महीने से खूनी जंग जारी है।

सीरिया की तरह, अफ्रीकी-अरब इस्लामी संसार में एक और लौह पुरुष समझे जाने वाले लीबिया के तानाशाह राष्ट्रपति मोहम्मर गद्दाफी के खिलाफ भी जब जनांदोलन उमड़ा, तो उससे निपटने के लिए वहां भी फौज का सहारा लिया गया। लेकिन दूसरी ओर गद्दाफी के दुश्मन पश्चिमी देशों की सहायता से उनके विरोधी भी सेना का खुले आम सामना कर रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से जंग जारी है। अब तक बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है कि गद्दाफी का पलड़ा कमजोर पड़ रहा है और उन्हें किसी भी समय गद्दी छोड़ना होगा। या फिर संभव है कि जंग के दौरान ही उनका सफाया हो जाए। हालात तो कुछ ऐसे ही हैं। लीबिया में राजधानी तरअबल्स में यूरोपीय यूनियन की सेना लगातार गद्दाफी के महल पर बमबारी कर रही है।

ध्यान देने की बात यह है कि अफ्रीकी अरब इस्लामी देशों में जनांदोलन की सुनामी किसी ने संगठित आयडियालॉजी या ठुप के
कारण नहीं आई है। इसके पीछे कोई भी विदेशी हाथ नहीं है। जनांदोलन का यह सैलाब अचानक फूट पड़ा है। इसके लिए माहौल
सुलग रहा था। वर्षों की तानाशाही, आम नागरिक अधिकारों का हनन, भयंकर रूप में हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार, बेतहाशा बढ़ती हुई, नई-नई कठिनाइयां इन सब से लोग परेशान और बेहाल थे। प्रशासन विरोधी राजनीतिक दल उनके लिए कुछ भी करने में असमर्थ थे। उन पर पहले से ही कड़ी बंदिशें थीं। यहां तक कि समाचार-पत्रों और टेलीविजनों पर भी कड़ी सेंसरशिप थी।

दिलचस्प बात यह है कि इस सुनामी में इंटरनेट और फेसबुक ने कमाल दिखाया। लोगों ने एक दूसरे से इसी के द्वारा संपर्क
बनाए रखा और दिशा-निर्देश करते रहे कि उन्हें कब और कहां मिलता है। यकीनन कंम्प्यूटर ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ट्यूनिश में अली नाम के एक युवा ने लगातार 18 घंटे कंप्यूटर के द्वारा हजारों लोगों को आंदोलन के लिए तैयार किया। इस वैज्ञानिक सुनामी ने तानाशाहों को हिलाने और आम लोगों को जोड़ने का महत्वपूर्ण काम किया।

इतना तो तय है कि एक बार जब लोग अपने-अपने गली-मुहल्ले, समाज और देश में बदलाव लाने के लिए कटिबद्ध हो जाएंगे, तो उनके सैलाब को बड़े से बड़ा तानाशाह भी नहीं रोक पाएगा। इस्लामी देशों में इस सच्चाई का सबूत मिल गया है।

 

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