हिंदुत्व के पुनर्जागरण का शक्तिकेंद्र

इस माह की पांच तारीख भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिवस लेकर आ रही है जिसका स्वप्न भारत में और भारत के बाहर रहने वाले लाखों हिंदुओं की आंखों में था। विगत कई वर्षों की लम्बी लड़ाई के बाद अंतत: अयोध्या में श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर बनने जा रहा है। कई सरकारें आईं, गईं, अदालतों में कई जिरहें, कई सुनवाइयां हुईं, कई जनांदोलन हुए, तब कहीं जाकर श्रीराम मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है। परंतु अभी भी इसमें अडंगे लगाने वालों की कोई कमी नहीं है। अब जबकि कोई ठोस कारण नहीं मिल रहा है तो मुहूर्त सही न होने की दलील दी जा रही है। परंतु अडंगे लगाने वाले स्वयं भी यह जानते हैं कि अब किसी भी कारण से मंदिर निर्माण के कार्य को शुरू होने से नहीं रोका जा सकता।

भारत में श्रीराम मंदिर का निर्माण आस्था से अधिक अस्मिता और विवाद का विषय बन गया था। ये विवाद दो प्रकार के लोगों के बीच था। पहले तो वे जिन्हें स्वयं को हिंदू कहलवाने में कोई झिझक, कोई हीन भावना महसूस नहीं होती थी। और दूसरे वे जो हिंदू होने का न्यूनगंड पाले स्वयं को सेक्यूलर साबित करने में लगे रहे। दूसरे प्रकार के लोगों को कभी हिंदुत्व समझा ही नहीं। वे केवल पैदायशी हिंदू रहे, वैचारिक हिंदू नहीं बन पाए। इन लोगों को समाज के उस वर्ग का भी साथ मिला जो पैदायशी भी हिंदू नहीं था। चूंकि दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद देश की सत्ता और शक्ति भी अधिकतम समय तक दूसरे प्रकार के लोगों के हाथों में ही रही अत: समाज में पहले प्रकार के लोगों के दमन का सिलसिला चलता रहा और हिंदुओं की आस्थाओं, मान्यताओं पर निरंतर कुठाराघात होते रहे। राम जन्मभूमि विवाद भी इसी की उपज थी।

भारत में राम तो विवाद का विषय होना ही नहीं चाहिए था। जिस सनातन संस्कृति की शक्ति के आधार पर भारत खड़ा है, राम उसके आदि पुरुष हैं, हिंदुओं के आदर्श हैं। अपने आदर्श को इतने वर्ष तक अपनी ही जन्मभूमि से विलग रखने का दंश पूरा हिंदू समाज झेल रहा था। यह दंश उसे इस बात का भी संज्ञान करवा रहा था कि हिंदू होने का अर्थ शक्तिविहीन होना नहीं है, शांत भाव से सब कुछ सहते रहना भी नहीं है। और जब विभिन्न आंदोलनों के द्वारा हिंदुओं में शक्ति का संचार हुआ तब बाबरी ढ़ांचा गिरा दिया गया और हिंदुओं ने अपने आदर्श श्रीराम को मुक्त कराया। श्रीराम मुक्त तो हो गए थे परंतु अभी तक ससम्मान अपने मंदिर में विराजित नहीं हुए थे। आखिरकार एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद संवैधानिक तरीके से जीत हासिल कर अब हिंदू समाज अपने आदर्श की, श्रीराम की उचित स्थान पर प्राणप्रतिष्ठा करने जा रहा है।

राम मंदिर बनना इतना आवश्यक क्यों था? क्या मंदिर बनने से गरीबों को दो समय की रोटी मिल जाएगी? क्या मंदिर बनने से कोरोना देश से चला जाएगा? क्या मंदिर बनने से भारत की अर्थव्यवस्था ठीक हो जाएगी? क्या भारत के प्रधानमंत्री का राम जन्मभूमि की आधारशिला रखना उचित है? ये और ऐसे अन्य कुछ प्रश्न अभी भी पूछे जा रहे हैं। ये प्रश्न पूछने वाले अपनी बुद्धिहीनता का प्रदर्शन करके यही साबित कर रहे हैं कि अब उनके पास खिसियाने के अलावा और कुछ नहीं बचा है। परंतु इनके उत्तर निश्चित ही हिंदू समाज को जागृत करने का काम करेंगे।

भारत एक हिंदू राष्ट्र है। श्रीराम भारत के आदर्श हैं। उनका जन्म भारत में स्थित अयोध्या में हुआ है। उनके प्राचीन मंदिर को तोङकर वहां बाबरी मस्जिद बनाई गई थी, यह न्यायालय में भी सिद्ध हो चुका है। अत: अब राम जन्मभूमि पर मंदिर बनना सर्वथा उचित ही है। मंदिर निर्माण कोई तात्कालिक कार्य नहीं होते। मंदिर हमारी संस्कृति की वह धरोहर होते हैं जो आनेवाली कई पीढ़ियों को विरासत में मिलते हैं। इन मंदिरों केमाध्यम से आनी वाली पीढ़ियां अपने गौरवमयी इतिहास को जानती हैं। चारधाम, बारह ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ, जगन्नाथ मंदिर, द्वारका का मंदिर ये सभी वे शक्ति केंद्र हैं जहां से सम्पूर्ण हिंदू समाज को ऊर्जा और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिए ताकत मिलती है। विदेशों में ये भारतीय संस्कृति की धरोहर के रूप में पहचाने जाते हैं। जो कालातीत है, उसकी तुलना गरीबी, कोरोना और अर्थव्यवस्था जैसी तात्कालिक घटनाओं से कैसे की जा सकती है?

रही बात प्रधान मंत्री के द्वारा शिलान्यास करने की तो प्रधान मंत्री भी अन्य आम नागरिकों की तरह ही भारत के नागरिक हैं और जिस तरह भारत का संविधान भारत के हर नागरिक को अपनी-अपनी उपासना पद्धति को अक्षुण्ण रखने का अधिकार देता है, उसी प्रकार भारत के प्रधान मंत्री को भी संविधान वही अधिकार देता है। अब अगर भारत के प्रधान मंत्री अपने उस अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं तो इसमें आक्षेप उठाने वाली कौन सी बात है?

अभी तक उठाए गए आक्षेपों को अगर गहराई से देखें तो ये केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं हैं। इनका मूल कारण भारत को हिंदू संस्कृति से विलग करना है। जो भी आक्रमणकारी भारत में आए उन्होंने यही किया था। भारत की जड़ों पर ही आघात किया था। उसी का परिणाम यह हुआ कि भारत का मूल हिंदू निवासी अपने ही देश में डर कर जीने लगा था। उसका क्षात्र तेज समाप्त हो रहा था। परंतु हिंदू समाज के आदर्श श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण होना इस बात का प्रतीक है कि अब वह तेज पुन: लौटेगा।

जब आदर्श अपने उचित स्थान पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं तो अपने आप ही समाज उस आदर्श की दिशा की ओर बढ़ने लगता है। अगर राम के आदर्शों पर हिंदू समाज पुन: चलने लगेगा तो वह निश्चित ही अपनी खोई हुई अस्मिता पुन: प्राप्त कर लेगा और राम मंदिर हिंदुत्व के पुनर्जागरण का शक्ति केंद्र सिद्ध होगा।
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