राम के जीवन मूल्य ही वर्तमान समस्याओं का हल                                

प्रभु रामच्रद्र के दिव्य जीवन का आविष्कार यदि आज के समय हो गया तो श्रीराम का अयोध्या में बन रहा भव्य मंदिर सम्‍पूर्ण विश्व के लिए वरदान साबित होगा। सम्‍पूर्ण विश्व का हित साधने वाली भारतीय जीवन दृष्टि इस तरह पुनः उदित होकर विश्व में पहुंची तो आज का अशांत वैश्विक मानव कुछ शांति पा सकेगा और वर्तमान समस्याओं का बहुत बड़ी मात्रा में निराकरण हो सकेगा।

प्रभु रामचंद्र का जीवन सबको प्रेरणा देने वाला है। भारतीय जनमानस में राम का स्थान अटल होने का क्‍या कारण है? इसलिए कि राम हमारे जीवन के असाध्य गुणों के पूर्णत्व का दर्शन है। जो भी मंगल है, उदात्त है, सुंदर और मधुर है उन सबकी श्रीराम में उपस्‍थिति की अनुभूति भारतीय जनमानस करता है। भगवान कृष्ण ने गीता में २६ दैवी गुणों को उल्‍लेख किया है। भागवत में महर्षि व्यास ने ३० सद्‌गुण बताए हैं। इन सभी गुणों का एकत्रित दर्शन जिस व्यक्‍तित्व में होता है उसका नाम श्री राम है। प्रभु रामचंद्र ने व उनके परिवार ने धर्माचरण किया, याने क्‍या किया? इसे ठीक से समझ लेना होगा। धर्मशास्‍त्रों का विचार करें तो राम के बाद भरत द्वारा अपना राज्‍याभिषेक करवा लेना अनुचित नहीं होता। अथवा, श्रीराम अयोध्या लौटते तो भी कुछ गलत नहीं होता। लक्ष्मण को राम के साथ बनवास में जाने का कोई कारण नहीं था। सीता त्‍याग के अनपेक्षित प्रसंग के बाद सीता के लिए अयोध्या के न्यायालय में श्री राम के विरुद्ध शिकायत करना कठिन नहीं था। यह सबकुछ धर्म के तहत राम के परिवार के सभी सदस्य कर सकते थे। लेकिन धर्म का मूल अर्थ ध्यान में रखकर इस सम्पूर्ण परिवार ने अपना आचरण किया। सम्‍पूर्ण विश्व को अबतक राम के व्यक्‍तित्‍व व कथा के प्रति इतना आकर्षण है इसका कारण यही है। व्यक्‍ति, परिवार, समाज परस्पर पर निर्भर होने से उनके विकास में ही संतुष्‍टि व पूर्णता है। विकास की इस भावना को आत्‍मसात करने के लिए राम के परिवार के प्रत्‍येक सदस्य द्वारा अपनी लक्ष्मण रेखा तय कर लेना भी अलौकिक ही है। भगवान श्रीराम व सीता इन जीवन मूल्‍यों के प्रत्यक्ष व सर्वोच्च प्रतिनिधि हैं। और इसीलिए वे अनुकरणीय हैं। भारतीय संस्‍कृति का यह स्वर हजारों वर्षों से है।

हम जैसे आम लोगों के लिए क्‍या ऐसे गुणों पर चलना वाकई असंभव है? इस तरह का प्रश्न आम लोगों के मन में हो इस तरह का प्रभु रामचंद्र का जीवन है। हमें ध्रुव तारे पर जाना नहीं होता, लेकिन अथाह सागर में सही दिशा दिखाने के लिए ध्रुव तारे का उपयोग हमें होता है। जीवन की सही दिशा तय करने के लिए तथा अपने चारित्र्य का मूल्‍यांकन करने के लिए राम के जीवन के आदर्श का हम उपयोग करते हैं। भारतीय संस्‍कृति के चिरंतन आदर्श का दीपस्तंभ है राम का जीवन। राम के व्यक्‍तित्व पर भारतीयों की अपार श्रद्धा है। इस श्रद्धा के कारण ही भारत विश्व में अपना अलग अस्‍तित्व निर्माण कर सका है।

इतिहास के प्रवाह में असंख्य राजा सिंहासनारूढ़ हुए तथा उनमें से कई काल के प्रवाह के साथ यादों से भी विदा कर गए। अनेक पुण्यश्लोक राजाओं ने इतिहास बनाया है। उनके आदर्श का स्मरण आज भी हमें हो रहा है। अति प्राचीन काल से आजतक ॠषि-मुनि, संत-महंत, प्रतिभावान साहित्यिक, जेष्ठ-श्रेष्ठ महाकवि, महान लोक नेता तथा छोटे-बड़े सामान्य जन इन सबको सम्‍मोहित करने वाला एक ही राजा है और वह है राजा राम। हमारी चर्चा में आदर्श राज्‍य की जब कल्‍पना आती है तब राम राज्‍य का उल्‍लेख हम करते हैं। इसलिए कि राम राज्य ने हृदय में लोभ, व्यक्‍तिवाद का निर्मूलन कर राज्यसंस्था का आदर्श हमारे समक्ष रखा। इन शब्‍दों का निश्चित अर्थ जनसामान्य को पता न हो तब भी राम के समय में आदर्श राज्य-व्यवस्‍था का महत्व स्पष्ट होता है। समाज के आत्‍यंतिक विकास के काल में राजदण्ड की आवश्यकता थी। भारतीय सांस्कृतिक जीवन की श्रेष्‍ठता के लिए किस तरह के परिणाम अभिप्रेत हैं? राम के जीवन में इसका स्पष्ट निर्देशन किया गया है। इसीलिए भारतीयों के विकास कल्पनाओं के एक तरह का मानचित्र के रूप में इसे हजारों वर्षों से स्‍वीकार किया जाता है।

श्रीराम लोगों की आराधना के लिए सिंहासन पर बैठे थे। राजा के रूप में आनंद-विलास का उपभोग करने के लिए नहीं। केवल अधिकार की परिभाषा की नैतिकता के लिए मैं सत्ता व सम्पत्ति का स्वीकार नहीं करूँगा, यह कहने वाले राम-भरत जैसे भाई भारतीय संस्कृति ने विश्व को दिए हैं। जीवन की अनेक बातों को प्रजा की राय के आगे दोयम मानने वाले राम ने अपने राजनीतिक जीवन में अपनी प्रजा को ही महत्व दिया। प्रजा की सेवा करते समय अपने व्यक्‍तिगत सुख व प्रेम का भी कभी विचार नहीं किया। अपनी पत्‍नी तक का राम ने त्‍याग कर दिया। लेकिन यह उपभोगशून्य स्वामी राम एक प्रसंग में कहते हैं कि राजा ने रानी का त्याग किया है। यह राम का सीता त्‍याग नहीं है। एक ओर कर्तव्य व दूसरी ओर मानवीय रिश्तों में से मार्ग निकालते हुए प्रभु रामचंद्र ने अपना जीवन मार्ग आलोकित किया है। वह अलौकिक ही है। व्यक्‍तिगत, पारिवारिक, संस्थागत अथवा सामाजिक जीवन में व्यक्‍ति को कब कैसा निर्णय करना चाहिए? कौनसा निर्णय उचित व कौनसा अनुचित है? इस बारे में धर्म क्‍या कहता है? इन सब का मार्गदर्शन प्रभु रामचंद्र के जीवन में आता है। महर्षि वशिष्ट ने रामचंद्र के बारे में कहा, ‘‘रामो विग्रहवान धर्मः’’। सैकड़ों धर्मग्रंथ पढ़ने की जरूरत नहीं है। सारे वेद, पुराण, सारे शास्‍त्र, विभिन्न पुराण कथाएं पढ़ने की जरूरत नहीं है। मानवी गुणों के सर्वोत्तम गुणों का साक्षात दर्शन याने भगवान रामचंद्र का जीवन। इसका क्‍या अर्थ है? किस बात को धार्मिक कहें व किस बात को धार्मिक न कहे? हम भारतीय लोगों को धर्मशास्त्र की उलझनों में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। राम कथा का श्रवण करें। प्रभु रामचंद्र का जीवन समझ लें। राम का जीवन समझ गया कि धर्म अपने आप में आ जाएगा। अंत में धर्म क्‍या है? प्रभु रामचंद्र जैसा जीवन बनाने का प्रयास करना याने धर्म है। इस तरह भारतीय जनमानस का मन बना है। राम के त्‍यागमय जीवन से अखिल मानव जाति को दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन मिला है और आगे भी होता रहेगा।

   भारतीयों में एक कहावत है, जैसे लोग होते हैं वैसे उनकी देवताएं व नेता होते हैं। लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहीं है। भारतीय जनमानस की ओर देखा तो हम यह कह सकते हैं कि लोग उनकी देवताएं जैसी होते हैं वैसा बनने की कोशिश करते हैं। इस भारतीय जीवन दृष्टि की देखें तो यह त्रिवार सत्य लगता है। समाज में जितनी मात्रा में चारित्र्य सम्‍पन्न, पुरुषोत्तम देव होंगे वैसा उस देश के लोग बनने का प्रयास करते हैं। विश्व में किसी भी देश का पतन या उसकी पुनर्निर्मिति को ठीक से समझने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि उनके आदर्श क्‍या थे? उस आराध्य व्यक्‍तित्व का शील व चारित्र्य किस तरह का है? इसकी पड़ताल करें तो उस देश का खाका अपने सामने उपस्‍थित होता है। भारतीय जनमानस में उपस्‍थित व्यक्‍तित्वों की ओर हम देखें तो भारत ने विश्व को भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, छत्रपति शिवाजी महाराज, सम्राट अशोक जैसे अलौकिक व्यक्‍तित्व दिए हैं। इसके पीछे के कारणों को खोजें तो पता चलेगा कि राम क्‍यों हमारे हमारे जनमानस में समाया हुआ है। इस राम के प्रभाव से ही इस तरह के व्यक्‍तित्व भारत में निर्माण किए जा सके।

सम्पूर्ण विश्व में हो रहा साम्राज्य विस्‍तार, मानवों का हो रहा शोषण, सत्ता स्‍वार्थ के लिए खून की नदियां बहाने वाले सत्ताधारी तथा अति भौतिक सुख की ओर ले जाना वाला विज्ञान- इसका अर्थ क्‍या है? इस तरह का दुनिया में माहौल दिखाई दे रहा है। राम व रावण में क्‍या फर्क है? इस पर सोचें तो कहना होगा कि राम का हृदय अखिल विश्व का सुख देखने वाला था, जबकि रावण पूरी तरह व्यक्‍तिवादी था। व्यक्‍तिवाद स्‍वाभाविक प्रवृत्ति है। सम्‍पूर्ण विश्व का कल्‍याण संस्‍कार से निर्माण होने वाली बात है। अपने भारतीयों के मन पर राम के संस्‍कार हुए हैं। भारतीय जनमानस पर प्रभु रामचंद्र की महिमा के प्रति बचपन से श्रद्धा अंकित की गई है। इसीसे भारत के जनमानस में मनुष्यत्व के बीज बोये जाते हैं। लेकिन राम के व्यक्‍तित्व में जो शाश्वत जीवनमूल्‍य हैं उन्हें पहचानने की दृष्टि भारत के कुछ राजनीतिक नेताओं में नहीं है, ऐसा लगता है। शायद राजनीति के अति मोह के कारण वे जानबूझकर ऐसा करते होंगे।

मानव हित के एकमात्र साधन की जीवन दृष्टि जिस संस्‍कृति के कारण हमें मिलती है वह संस्‍कृति याने राम का सम्‍पूर्ण जीवन। लोग इतने सज्जन हो जाते हैं कि उनकी सज्जनता में कोई दम नहीं होता। इसके विपरीत जिनमें खूब शक्‍ति होती है उन्हें सज्जन बनना संभव नहीं होता। लेकिन प्रभु रामचंद्र में इन दोनों बातों का संगम व मध्य सिद्ध हुआ है। धर्म व वीरता को प्रभु रामचंद्र ने जोड़ा है। केवल गुणवान ही नहीं वीर्यवान व्यक्‍ति अपेक्षित है। राम ने अपने जीवन मे वीरता से यह दिखा दिया है कि देवी शारदा की वीणा के कारण ही हमेशा उनका देवत्व कायम रहता है ऐसा नहीं है। लेकिन पुस्तक धारण करने वाली शारदा देवी जब हाथ में आयुध लेकर राक्षसों का संहार करती है तब उसका तेज प्रकट होता है। शारदा का वीणा वादन सुनने की स्‍थिति विश्व में पैदा होती है। राम ने अपने जीवन से आध्यात्मिकता व उसकी रक्षा के लिए आवश्यक भक्‍ति इन दो बातों का समन्वय कर दिया है। राम का पारिवारिक, सांस्‍कृतिक, व्यक्‍तिगत व राजनीतिक जीवन एक अलग दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए।

आज के आधुनिक जीवन में आदमी ने विभिन्न खोजें की हैं। विज्ञान की ज्ञानोपासना अविरत जारी है। लेकिन विश्व में सुख का नंदनवन निर्माण होने की अपेक्षा आत्यंतिक भय से पीड़ित मानवी जीवन हम देख रहे हैं। इसका निश्चित कारण यह है कि भौतिक व विज्ञान से निर्मित ज्ञान ने मनुष्य के भीतर की पशुता नष्ट नहीं की है। मनुष्य के मन का भय खत्म करने के लिए विज्ञान का कोई उपयोग नहीं हुआ है। यह हम कोरोना के जरिए आज अनुभव कर रहे हैं।

भारतीय संस्‍कृति को विश्व में क्‍या निर्माण करना है? इसका उत्तर भारतीय संस्‍कृति में उत्पन्न रामायण व राम के आदर्श जीवन से मिलता है। जब जब भारतीय समाज नैराश्य की स्‍थिति की सीमा रेखा पर आ गया था तब तब समाज नेताओं ने रामायण का पूरा उपयोग किया है? यह हम देख सकते हैं। इस्‍लामी सत्ता की जकड़ से हिंदू समाज के हो रहे नैतिक अधःपतन को रोकने के लिए संत एकनाथ व समर्थ रामदास ने लोकभाषा में जन मनोबल को ऊंचा रखने के लिए राम के व्यक्‍तित्व का दर्शन पूरे समाज को कराया। इसी कारण छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा आदर्श राजा निर्माण हो सका। सम्‍पूर्ण उत्तर भारत इस्‍लामी आतंकवाद के शिकंजे में जब फंसा था तब धर्म व तत्वज्ञान के जरिए सामाजिक जीवन दर्शन राम कथा के माध्यम से गोस्‍वामी तुलसीदास ने जनभाषा में प्रस्‍तुत किया। समाज में केवल राज्य निर्माण होने से नहीं चलता। एक महान जीवन दृष्टि से परिपूरित एक जीवन सूत्र में कटिबद्ध राज्य उत्पन्न करना होता है। राम के आदर्श के रूप में इस तरह का समर्थ राष्ट्र

निमार्ण होने का अवसर अब उदित हो चुका है। राम मंदिर भारतीय जनमानस की आकांक्षा है। वह भावनात्मक अपेक्षा अब पूर्ण होने वाली है। ध्येयवादी जीवन का सम्‍पूर्ण आविष्कार राम के रूप में भारतीय अनुभव कर सकेंगे। वर्तमान में उत्पन्न महाविनाश से विश्व को किस तरह बचाए इस पर दुनिया भर के बड़े-बड़े दार्शनिक सोचते-सोचते त्रस्त हो चुके हैं। मानवता के समक्ष उपस्‍थित इस गुरुतर प्रश्न का उत्तर भारतीय जीवन मूल्‍यों में ही है। प्रभु रामच्रद्र के दिव्य जीवन का आविष्कार यदि आज के समय हो गया तो श्रीराम का यह भव्य मंदिर सम्‍पूर्ण विश्व के लिए वरदान साबित होगा। भारतीय जीवन दृष्टि सम्‍पूर्ण विश्व का हित साधने वाली है। ‘‘कण्वनतो  विश्व मारयम्‌”  इस भारतीय संस्‍कृति का ज्ञान सम्‍पूर्ण विश्व को देने का सामर्थ्य भारतीय संस्‍कृति में है। इस भव्य राम मंदिर के माध्यम से वह दृष्टि पुनः उदित होकर भारतीय संस्‍कृति के माध्यम से विश्व में पहुंच सकेगी।

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