सिया राम मय अवनि अम्बर, और अयोध्या धुरी महत्तर

जिन हिन्दुओं को, जिन भारतीयों को यह क्षण देखने, उसका साक्षी बनने, उसे अनुभव करने का सौभाग्य मिला है उस क्षण के सौभाग्य की तुलना सबके सहस्त्रों वर्षों के पुण्य से हो सकती है। यह भारत माता के प्रति अनन्य भक्ति का पुण्य है।

पांच अगस्त एक स्वप्न, एक अविश्वसनीय दिन, एक अवाक बनाने वाला महिमामय पवन दिवस आ बन पड़ा है।
स्वयं को चिकोटी काटने पर भी यकीन होना कठिन। चार सौ वर्षों की अनथक संघर्ष यात्रा का यूं मधुर परिणाम- धन्य हैं हमारे पूर्वज, राम जन्मभूमि के हुतात्मा, सरयू को अपने बलिदानी रक्त से अर्घ्य अर्पित करने वाले सेनानी, धन्य है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वीर धीर अनथक राष्ट्र सेनानी स्वयंसेवक, धन्य हैं डॉ हेडगेवार के अनुयायी और हिन्दू धर्मरक्षक साधु संत महात्मा, जिन्होंने आनंद मैथ की पुनः याद ताजा करा, धन्य है नरेंद्र मोदी के माता पिता और उनका स्वयंसेवकत्व, उनकी प्रखर प्रज्ज्वल, दीप्तिमान भारत भक्ति का वज्र संकल्प कि यह दिन हमें देखने को मिल रहा है।

यही वो सरयू है और यही वह अयोध्या, जहां राम का बचपन बीता, जहां राम लक्ष्मण भारत शत्रुघ्न की किलकारियों से अयोध्या गूंजीं, जहां ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया की मधुरता व्यापी, जहां से किशोर राम संत मुनियों की रक्षा के निमित्त ऋषि विश्वमित्र संग वन गए, दुष्टों से सज्जनों की रक्षा की। यही वो अयोध्या है जहां श्री राम मिथिला में धनुर्भंग कर सीता से विवाह कर धूमधाम से लौटे तो पिता दशरथ सहित सभी माताओं और अयोध्यावासियों ने स्वागत किया, राम के अभिषेक की तैयारी शुरू की लेकिन मंथरा का आगमन हुआ, और राम एक और लक्ष्यपूर्ति हेतु सीता और लक्ष्मण सहित वन गमन को गए।

यह वही अयोध्या है- त्रेता युग से कलयुग तक बहती आ रही सरयू किनारे बसी अयोध्या, जिसके के आंचल में अनेक महान गाथाएं छिपी हुई हैं। इस अयोध्या के कण कण को साष्टांग प्रणाम। जिस अयोध्या की धूलि में श्री राम खेले हों, जहां श्री राम दरबार का अद्भुत दिव्य दृश्य अयोध्या वासियों ने देखा हो, जहां के राज्य ने, राम राज्य ने, सारी दुनिया को एक श्रेष्ठ प्रजावत्सल मर्यादा रक्षक शासन की प्रेरणा दी हो, जो राम राज्य गांधी जी का भारत वर्ष के लिए स्वप्न रहा हो, जिस राम राज्य के लिए गांधी जीये और अंतिम श्वांस तक जिनके अधरों पर श्री राम का ही नाम रहा, उस श्री राम के स्पर्श से पावन, उस राम राज्य की पावन धरा अयोध्या जी को कोटि कोटि प्रणाम।

यह अयोध्या भारत वर्ष का प्राण है। राम भारत हैं और भारत राम हैं। श्री राम उस समय, उस काल के विश्व के आराध्य हैं जब विश्व में भारत से ही ज्ञान और आस्थाओं का अमृत स्वर गूंजा था, जब विश्व में और कोई संप्रदाय आस्था का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, जब श्री राम और उनकी अयोध्या पूर्व में कोरिया और जापान तक, कम्बोडिआ, लाओस और इंडोनेशिया तक, सुगंधित विचारों का स्रोत बनी थी। इतना ही नहीं जब ब्रिटिश अमानुषिक अत्याचारों से संत्रस्त स्त्री पुरुष गिरमिटिया के रूप में हज़ारों मील दूर निर्जन अंजान भूमियों में काम करने भेजे गए तो केवल और केवल राम नाम की धुन ने, श्री रामचरितमानस के पाठों ने, ’सिया राम मय सब जग जानी’ के विश्वास ने उनको जीवित रखा। आज भी उनके उत्तराधिकारी गर्व के साथ ‘सिया राम जय राम जय जय’ राम के साथ दुनिया के समृद्धतम सुशिक्षित और प्रतिभावान राष्ट्रों के नायक बने अपने पूर्वजों की कीर्ति के शिखर बने मुस्कुरा रहे हैं।

ऐसी है अयोध्या और सिया राम की महिमा।
इस अयोध्या ने सारे विश्व के अनेकानेक देशों, नागरिकों, सम्राटों, महारानियों, बौद्ध भिक्षुओं और सामान्य गृहस्थों को हजारों वर्ष से प्रेरणा दी है। प्रेरणा भी ऐसी कि हमारे पड़ोस में थाईलैंड- पूर्ववर्ती स्याम देश, उसकी तीन सौ वर्षों से भी अधिक जो राजधानी रही उसका नाम है अजोध्या। ऐसी प्रेरणा कि वहां के सम्राट आज भी अपने नाम के आगे राम परंपरा की पदवी लगा कर गौरवान्वित होते हैं, हम उनसे, उनकी इस भक्ति से प्रेरित होते हैं।

इस महान अयोध्या जी के बारे महाकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा- देख लो साकेत नगरी है यही, स्वर्ग को छूने गगन में जा रही।

तमिल के महान कवि, कम्ब रामायण के रचयिता कम्ब ऋषि ने अयोध्या और श्री राम के बारे में अद्भुत चरित लिखा है। उन्होंने लिखा- यहां कोई दानदाता नहीं क्योंकि कोई दान लेने वाला अर्थात गरीब नहीं। यहां कोई शौर्य पराक्रम के नायक नहीं क्योंकि कोई शत्रु नहीं। यहां कोई सत्य कहो सत्य वचन बोलो जैसा कहता नहीं क्योंकि कोई कभी झूठ बोलता ही नहीं। यहां कोई अज्ञान दूर करो ऐसा कहता नहीं क्योंकि सभी ज्ञानी हैं।

यह अयोध्या, राम राज्य की अयोध्या हमारे नवीन भारत के अभ्युदय की प्रेरणा है।
यहां से हम ऐसे भारत के निर्माण का स्वप्न, संकल्प लेकर चलें जहां न कोई गरीब हो, न अशिक्षित, न अस्वस्थ, न ही निराश। हर्ष और आनंद भारत में व्याप्त हो, समृद्धि और शक्ति का विश्वास भारत में व्याप्त हो, परस्पर भ्रातत्व और राष्ट्रभक्ति काभाव भारत में व्याप्त हो- श्री राम के अयोध्या के प्रति अनुराग के शब्द- अपि स्वर्णमयी लंका लक्ष्मण न मे रोचते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी – हमें शताब्दियों से अपनी मातृभूमि के प्रति जीने और बलिदान होने की प्रेरणा देते आए हैं। वह भाव हमें उस भारत के निर्माण की शक्ति दें जहां अयोध्या जी की भांति ’दैहिक दैविक भौतिक तापा राम राज नहीं काहुहि ब्यापा’ चरितार्थ हो।

श्री राम के जीवन का क्षण क्षण हमारे जीवन को शुभ मंगलमय बनाता है, सार्थक करता है। निषाद राज केवट गुह के आगे प्रणम्य राम, रीछ, वानर को गले लगाने वाले राम, गिद्धराज से गिलहरी तक को प्रेम करने वाले राम, प्रायश्चित विहीन दुष्ट का दलन करने वाले राम, विद्वान् रावण के अंत समय बैर भूल उनसे भी सीख लेने लक्ष्मण को भेजने वाले राम, मर्यादारक्षक राम, सीता के रूप में स्त्री की गरिमा के रक्षक राम, जनमनरंजक पर स्वयं पर कठोर राम, प्रजा के प्रति मां के समान ममत्व रखने वाले राम…

राम सुशासन के आदर्श मूर्तिमंत भारतवर्ष हैं।
सदैव मर्यादा का इस तरह पालन जीवन में कभी सुख भोगा हो स्मरण नहीं। बाल्यकाल में मुनि रक्षा हेतु वनगमन, युवा राम ने धनुषभंग किया तो परशुराम का भयानक क्रोध सहा, सीता ब्याह कर अयोध्या आए, प्रजा और पिता ने स्वागत किया और अभिषेक की तैयारी की तो मंथरा का आगमन हो गया, अभिषेक की ओर जाते कदम चौदह वर्ष वनवास की ओर मुड़ गए, सीता अपहरण, लंका की चुनौती, वानर सेना गठन, लंका विजय के पश्चात् सीता माता की भयानक ह्रदय द्रावक अग्नि परीक्षा, अयोध्या लौटे तो कथन- सीता का गर्भावस्था में वन की ओर जाना, पुत्र हुए तो दर्शन नहीं, अश्वमेध में पुत्रों की चुनौती मिली…

राम के आंसूओं पर भी कोई लिखेगा क्या?
जिन हिन्दुओं को, जिन भारतीयों को यह क्षण देखने, उसका साक्षी बनने, उसे अनुभव करने का सौभाग्य मिला है उस क्षण के सौभाग्य की तुलना सबके सहस्त्रों वर्षों के पुण्य से करता हूं। यह भारत में जन्म लेने का पुण्य है। यह श्री राम चरणों के प्रति अनुराग का पुण्य है। यह भारत माता के प्रति अनन्य भक्ति का पुण्य है।
जय श्री राम। जय नव भारत निर्माण।
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