संकल्प शिलाओं का पूजन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन शिलाओं का पूजन किया वे शिलाएं केवल पत्थर या धातु की नहीं हैं वरन वे देश को वैभव संपन्न करने वाली ’संकल्प शिलाएं’ हैं। यह संकल्प भारत और विश्व के सभी राम भक्तों का है। यह राष्ट्रीय संकल्प है। यह सत्य संकल्प है। राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं है।

5 अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से श्री राम के भव्य मंदिर का भूमि पूजन समारोह संपन्न हुआ। यह संपूर्ण कार्यक्रम हम सभी र्ीी दूरदर्शन पर देखा, अतः वह कार्यक्रम कैसा रहा, प्रधानमंत्री ने क्या कहा, सरसंघचालक जी क्या बोले, यह यहां बताने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा करना याने जिस प्रकार अलग अलग चैनल एक वाक्य का समाचार सौ वाक्यों का करके बताते हैं वैसा करना होगा।

इस कार्यक्रम की ओर देखने के अलग-अलग दृष्टिकोण होंगे, उस पर विवेचन करने वाले विभिन्न लेख प्रकाशित होंगे। प्रत्येक विषय को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने वाले लिखेंगे कि नरेंद्र मोदी का यह राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक है। इससे हिंदुत्व की भावनाओं का उफान पैदा हो गया है। 2024 के चुनाव में उन्हें इसका फायदा मिलेगा। नेहरूवादी, सेक्यूलर, प्रगतिशील, परिवर्तनवादी, कहेंगे कि अब भारत हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। धर्मराज्य यह भयानक कल्पना है। इससे मुसलमान, ईसाई, दलित, आदिवासी भयभीत होंगे। वे एक और मुद्दा बार-बार उछालेंगे कि प्रधानमंत्री द्वारा अयोध्या में जा कर पूजा करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है।

ये लोग यह भी कहेंगे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना एजेंडा बड़ी ही कुशलता से आगे बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री संघ के, सरसंघचालक मोहन जी भागवत कार्यक्रम में मंच पर उपस्थित, सभा का सूत्र संचालन करने वाले श्री चंपत राय संघ प्रचारक, श्री गोविंद गिरी जी महाराज भी संघ स्वयंसेवक। संघ वालों ने अपना कार्यक्रम दूरदर्शन पर पूरे विश्व में प्रसारित किया। जिसका जैसा चश्मा होगा, उसी रंग में वह कार्यक्रम देखेगा। सेकुलर और प्रगतिशील वर्ग के सभी विश्व गुरु, जगत गुरु, मानवता गुरु, संविधान गुरु, और जिन्ना के शिष्य इसके बाद क्या लिखेंगे एवं लिखते रहेंगे, इसे केवल पढें, किसी पर नाराज ना हो। राम की पूजा के बाद मर्यादा पालन करने का जो बंधन आता है, उसका पालन करें। अपने अपने शारीरिक गुणधर्म के अनुसार केकड़ा तिरछा चलता है, कौवा कांव-कांव करता है, आवारा कुत्ते भोंकते रहते हैं, हम उन्हें नहीं बदल सकते।

5 अगस्त के कार्यक्रम का विचार सभी विचारधाराओं को अलग रखकर केवल राष्ट्रीय अस्मिता की कसौटी पर करना चाहिए। भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का दर्शन इस दिन विश्व को हुआ। गत 70 वर्षों में एक भी प्रधानमंत्री हनुमानगढ़ी नहीं गया, न ही रामलला के दर्शन करने गया। नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जो दर्शन हेतु गए। रामलला को उन्होंने साष्टांग दंडवत किया। यह दृश्य देखकर आंखें भर आई। राज्य सत्ता राष्ट्रीय अस्मिता के सामने दंडवत होकर नमस्कार कर रही है, इसके कुछ अर्थ हैं। मोदी द्वारा एक संघ स्वयंसेवक, संघ प्रचारक की भूमिका में दंडवत प्रणाम करना कोई आश्चर्य नहीं। प्रत्येक स्वयंसेवक यह सहजता से करता है। परंतु देश का प्रधानमंत्री, देश की राज्य शक्ति का मुखिया रामलला के सामने दंडवत होता है इसका अर्थ ही निराला है। ऐसा कभी इस देश में नहीं हुआ।

परंतु इसके विपरीत बहुत कुछ हुआ। देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने बहुसंख्यकों के सांप्रदायिकता की खोज की। उन्होंने हिंदुओं को सांप्रदायिक करार दिया। उनके चेलों ने ’हिंदू आतंकवाद’ शब्द की खोज की। एक साध्वी को बंदी बनाकर उस पर अत्याचार किए। हिंदू धर्म, हिंदू देवता, हिंदू अस्मिता इन सब के विषय में उन्हें कोई आस्था नहीं थी। यह हमारी चैतन्यमयी मातृभूमि है, यह भाव भी उनमें नहीं था। लद्दाख का सैकड़ों मील का प्रदेश चीन ने हड़प लिया। नेहरू ने कहा, वहां घास का तिनका भी नहीं उगता। मातृभूमि के प्रति यह भावना बहुत ही धक्कादायक है। मेरे सिर पर एक भी बाल नहीं है इसलिए यदि कोई कहता है कि मेरा सिर काट डालो तो उसे हम क्या कहेंगे? 5 अगस्त के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी एवं अनेकों ने ’जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इस प्रभु रामचंद्र के वाक्य का उच्चारण कर योग्य संदेश दिया।

राष्ट्रीय अस्मिता याने भारत माता यह विश्व की सर्वश्रेष्ठ भूमि है, हम सब उसकी संतान हैं, और प्रत्येक संतान का परम कर्तव्य है मां को परम वैभव के शिखर पर रखना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन शिलाओं का पूजन किया वे शिलाएं केवल पत्थर या धातु की नहीं हैं वरन वे देश को वैभव संपन्न करने वाली ’संकल्प शिलाएं’ हैं। यह संकल्प भारत और विश्व के सभी राम भक्तों का है। यह राष्ट्रीय संकल्प है। यह सत्य संकल्प है। राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं है। उसे राजनीतिक रंग देने का कोई कारण नहीं है।

राजनीति का ही विचार करना हो तो जिस प्रकार 6 दिसंबर 1992 राजनीतिक परिवर्तन का ऐतिहासिक दिन है वैसे ही 5 अगस्त 2020 यह दिन भी भारतीय राजनीति में पूरी तरह परिवर्तन लाने वाला दिन है। यहां से, भविष्य में जो मुसलमानों की चापलूसी करने वाली राजनीति करेगा, उनके अलगाववाद को प्रोत्साहन देगा, वह धराशायी होगा। जो राष्ट्रीय अस्मिता की चिंता करेगा, वह खड़ा रहेगा। आज तक हिंदू हितों की राजनीति, हिंदू अस्मिता, इन शब्दों का प्रयोग किया गया। 5 अगस्त के भाषणों को यदि ध्यानपूर्वक सुना जाए तो उनमें 130 करोड़ भारतीयों का संकल्प दृष्टिगोचर होता है। ’हम सब भारतीय हैं और राम भक्त हैं’ यह भाव भाषणों से प्रकट हुआ है। अब सभी राजनीतिक दलों को अपनी भाषा में सुधार करना होगा। विचारों को प्रकट करते समय सर्वसमावेशकता दर्शानी होगी। जातिवाद, उपासना पद्धति, एवं पंथवाद को तिलांजलि देनी होगी। सभी राजनीतिक दलों को फिर वह कांग्रेस, समाजवादी, तृणमूल या तेलुगू देशम कोई भी हो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक चिह्नों की खोज करनी होगी। जातीय अस्मिता एवं अल्पसंख्यक अस्मिता के दिन अब लद गए हैं। राजनीतिक दल एवं उनके नेता वैसे तो चतुर होते हैं। वर्तमान में देश भावना क्या है, यह उनको अच्छी तरह समझ में आता है। जिन्हें वह नहीं समझता, उनका शरद पवार जैसा हाल होगा।

5 अगस्त का दिन जिस प्रकार भारतीय राजनीति को बदलने वाला दिन है, वैसा ही वह नई पीढ़ी की आशा आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने वाला भी सिद्ध होगा। ऐसा कहते हैं कि राष्ट्र की प्रत्येक पीढ़ी बहुतांश स्वायत्त राष्ट्र ही होती है। पिछली पीढ़ी की सभी बातें वह स्वीकार नहीं करती। आगे बढ़ने हेतु जो उपयुक्त है, उसका स्वीकार कर वह खड़ी रहती है। 92 की पीढ़ी ने हमारी अस्मिता को कलंकित करने वाला बाबरी ढांचा ध्वस्त कर दिया। उनका यह कार्य इतिहास बनाने वाला था। उनका उतना ही काम था। उसके बाद की पीढ़ी ने जन्म स्थान पर भव्य मंदिर हो इस विषय को जीवित रखा। उसके लिए प्रदीर्घ न्यायालयीन लड़ाई लड़ी। साबरमती एक्सप्रेस में 57 कारसेवकों ने बलिदान दिया, परंतु मंदिर बनाने का संकल्प नहीं छोड़ा। पर्वत गिरे, भयंकर आग लगे या जल प्रलय हो तब भी संकल्प नहीं छोड़ना यह निश्चय इस पीढ़ी ने कायम रखा। यह संकल्प उस पीढ़ी ने अब नई पीढ़ी को सौंप दिया है। इस पीढ़ी को इसे पूरा करना है। 130 करोड़ भारतीय यदि एक समय एकसाथ फूंक मारे तो पाकिस्तान में जल प्रलय आ जाएगा, यह संकल्प शक्ति का सामर्थ्य होता है। वर्तमान पीढ़ी को यह सामर्थ्य प्रकट करना होगा। 5 अगस्त द्वारा दी गई यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।

सामर्थ्य संगठन में होता है। संगठन का सामर्थ्य बंधुभाव में होता है। बंधु भावना समाज के सभी घटकों को प्रेम भाव से बांधे रखती है और कर्तव्य भावना का निर्माण करती है। बंधु भावना एवं कर्तव्य भावना की यह समझ अर्थात समरसता। आज देश को इस समरसता की सर्वाधिक आवश्यकता है। जात पात एवं छुआछूत समाप्ति का सामर्थ्य इस समरसता में है। वैसे ही उपासना पद्धति के भेद भी समरसता मिटाती है। प्रभु रामचंद्र समरसता के आदर्श हैं। हमारे यहां कहा जाता है कि शिव की पूजा शिव बनकर करें। अर्थात जिसकी पूजा कर रहे हैं उस जैसा बनने का प्रयत्न करें। इस पीढ़ी ने यह करने की दिशा में कदम बढ़ाना प्रारंभ कर दिया है एवं समय आने पर वे इसे अगली पीढ़ी को सौंप देंगे। जनप्रवाह यह सरयू के प्रवाह के समान है। सरयू का प्रवाह निरंतर बहता रहता है।

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