पोस्ट ऑफिस के खिलाफ याचिका खारिज

कोई भी व्यक्ति कितना भी जानकार क्यों न हो वह सभी नियम और कानून नहीं जान सकता। यद्यपि कानून की जानकारी न होना कोई बचाव नहीं माना जाता लेकिन यदि किसी योजना से संबद्ध सरकारी कर्मचारी और नागरिक दोनों ही कानून से अनभिज्ञ हों तो उसका खामियाजा नागरिक को ही भुगतना पड़ता है।

तमिलनाडु के पालानी नामक स्थान पर अरिलमिमु धंडायुद्धपनिस्वामी तिरुक्कोइल का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के ट्रस्ट का प्रबंधन तमिलनाडु सरकार द्वारा किया जाता है। मंदिर के ट्रस्ट ने ‘पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट स्कीम’ के तहत 5 मई 1995 से पांच वर्षोंं की अवधि के लिए 1.4 करोड़ रुपये पालानी पोस्ट ऑफिस में जमा किए।

दिसम्बर 1995 में पोस्ट ऑफिस ने एक पत्र लिख कर ट्रस्ट को सूचित किया कि योजना एक अप्रैल 1995 से बंद की जा चुकी है। अत: मंदिर ट्रस्ट ने जो सारी जमा की है वह बिना किसी व्याज के वापस दी जाएगी। तीन जनवरी 1996 को पोस्ट ऑफिस ने मंदिर द्वारा जमा की गई राशि बिना व्याज के वापस लौटा भी दी। मंदिर के ट्रस्ट ने पोस्ट ऑफिस को एक नोटीस भेजकर 12 प्रतिशत की दर से 193951 रुपये व्याज की मांग की। पोस्ट ऑफिस ने इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। पोस्ट आफिस के रवैए से नाराज मंदिर ट्रस्ट ने तमिलनाडु राज्य उपभोक्ता अदालत में शिकायत दायर की। राज्य उपभोक्ता अदालत ने मंदिर ट्रस्ट की शिकायत खारिज कर दी। अंत: मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि क्या पोस्ट ऑफिस सेवा में कमी का दोषी है, सुप्रीम कोर्ट ने ‘पोस्ट ऑफिस सेविंग जनरल रुल्स 1991’ पर विचार किया। यह नियम बचत खातों, टाइम डिपॉजिट एकाउंट आदि पर लागू होता है। ये नियम सरकारी बचत बैंक अधिनियम 1873 के तहत बनाए गए हैं। नियम 17 के तहत कहा गया है कि यदि कोई खाता नियम के विपरीत जाकर खोला गया है तो उसे किसी भी समय बंद किया जा सकता है और बिना किसी व्याज के जमा राशि वापस कर दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों के तहत जारी अधिसूचना में कहा गया था कि 5 अप्रैल 1995 से किसी भी संस्था की ओर से कोई भी टाइम डिपॉजिट स्कीम स्वीकार नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि इस अधिसूचना के प्रभावी होने के बाद मंदिर ट्रस्ट ने पोस्ट ऑफिस मे टाइम डिपॉजिट किया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि पोस्ट ऑफिस द्वारा व्याज देने से इनकार करना न्यायोचित है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों मे कहा कि व्याज देने से इनकार करने के कारण इस मामले में पोस्ट ऑफिस को सेवा में कमी का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने उपयुक्त फैसला पूर्व दृष्टांतों के आधार पर दिया। इन सभी मामले में जहां किसी अधिसूचना का उल्लंघन कर कोई निवेश किया गया था कोर्ट ने फैसला दिया था कि ये निवेश गैर कानूनी और शून्य होने के कारण बंधनकारी नहीं थे। ऐसे मामलों में सरकार कोई भी व्याज देने के लिए जिम्मेदार नहीं थी।

मंदिर ट्रस्ट चाहता था कि कोर्ट पोस्ट मास्टर को जिम्मेदार घोषित करे और उसे व्याज देने का निर्देश जारी करे। सुप्रीम कोर्ट मंदिर ट्रस्ट के इस दलील से तो पूरी तरह सहमत था कि अधिसूचना के बारे में पोस्ट मास्टर की अज्ञानता के कारण मंदिर ट्रस्ट को व्याज के पैसे नहीं मिले। परंतु सुप्रीम कोर्ट ने व्याज भुगतान के लिए पोस्ट मास्टर को जिम्मेदार ठहराने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना नियम के खिलाफ होगा। मंदिर ट्रस्ट की अपील खारिज करते हुए भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक गाइड लाइन्स का सुझाव दिया।

सुप्रीम कोर्ट के इस गाइड लाइन्स के मुताबिक सार्वजनिक पैसों से व्यवहार करने वालें अधिकारियों या डिपॉजिट स्वीकार करने के प्रभारी लोगों को योजनाओं पर लागू होने वाले सभी तरह के डिपॉजिटों, उनकी अवधि, व्याज दर, पात्रता की शर्तों आदि की जानकारी होनी चाहिए। इन सभी बातों के ब्योरे देसी भाषाओं में सहज दृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। सरकार जब भी कोई अधिसूचना या निर्देश जारी करती है, उस निर्णय को तत्काल आधुनिक प्रौद्योगिकी जैसे कि फैक्स, ई मेल आदि के जरिए संबंधित अधिकारियों को संप्रेषित कर दिया जाना चाहिए जिससे कि उन्हें अद्यतन जानकारी रहे। यह जानकारी अधिनस्थ कर्मचारियों को भी संप्रेषित की जानी चाहिए जिससे कि वे सही प्रक्रिया का पालन कर सकें।

डाक सेवाओं को भी उपभोक्ता संरक्षण कानून में सेवा के अधीन माना गया है। केंद्र सरकार ने शहरों, कस्बों और गावों में चिट्ठियों और मनीऑर्डर आदि की डिलीवरी के लिए पोस्ट ऑफिसों की स्थापना की है। पोस्ट ऑफिस अब इसके अतिरिक्त अन्य कई तरह की सेवाएं की प्रदान करने लगे हैं। भारतीय पोस्टल विभाग द्वारा पोस्टल सेवाएं प्रदान की जाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति को डाक प्रभार के रूप में अपेक्षित शुल्क भुगतान कर डाक सेवा प्राप्त करने का अधिकार है।

उपभोक्ता संरक्षण कानून की धारा 2(ण) में ‘सेवा’ की परिभाषा दी गई है। इसके मुताबिक सेवा से किसी भी वर्णन की कोई सेवा अभिप्रेत है जो उसके संभावित प्रयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है। यदि सेवा शुल्क देकर प्राप्त की गई है तो सेवा में कमी होने पर उपभोक्ता अदालत में दस्तक दी जा सकती है। उपभोक्ता संरक्षण कानून की धारा 2(6) में सेवा में कमी की परिभाषा दी गई है। इसके मुताबिक कमी से कार्य की गुणवत्ता, प्रकृति और निष्पादन के तरीके के कोई दोष, अपूर्णता, कमी या ऐसी अपर्याप्तता अभिप्रेत है जिसे कि उस समय लागू किसी कानून के तहत बनाए रखा जाना जरूरी है या जिसके ऐसी किसी सेवा के संबंध में किसी संविदा के अनुसरण में अन्यथा किसी व्यक्ति द्वारा निष्पादित किए जाने का वचनबद्ध किया गया है।
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