दु:ख मुक्ति: तथागत, विवेकानन्द और बोधिसत्व

हमारे देश में एक महान व्यक्ति, भगवान गौतम बुद्ध हुए थे। उनका कार्य इतना महान एवं बड़ा था कि उन्हें ईश्वर का अवतार माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि स्वयं भगवान गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार किया है। जिसने ईश्वर का अस्तित्व ही नकार दिया, वही ईश्वर के सदृश हो गया। यह भारतीय जनमानस की एक अद्भुत क्रिया है। स्वयं भगवान बुद्ध अपने को मनुष्य ही मानते थे। वे कहा करते थे कि मेरी ही भाँति प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होगा और निर्वाण प्राप्त होगा।

प्रभाव- स्वामी विवेकानन्द के जीवन पर भगवान गौतम बुद्ध के चरित्र का बहुत प्रभाव पड़ा है। उनके बालपन का एक प्रसंग है, वह उनके शब्दों में इस प्रकार है- ‘‘विद्यार्थी जीवन में एक रात मैं दरवाजा बन्द करके ध्यान लगाकर बैठा था कि कमरे की दक्षिणी दीवार से ज्योतिर्मय आकृति निकलकर मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी। उस मूर्ति के मुखमण्डल से अलौकिक तेज फूट रहा था। निर्विकार, महाशांत, गम्भीर सन्यासी की मूर्ति-मुंडित मस्तक, हाथ में कमण्डल धारण किए क्षण भर मेरी ओर एकटक देखती रही। मैं भी आश्चर्य चकित क्षणभर उसकी ओर देखता रहा। तभी मुझे अव्यक्त भय अनुभव हुआ। जल्दी से कमरे का दरवाजा खोलकर मैं बाहर निकल गया’’ (विवेकानन्द बनने के उपरान्त विवेकानन्द कहते है) ‘‘आज मुझे इेसा लगता है कि भगवान बुद्ध का दर्शन प्राप्त हुआ था।’’

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि भगवान बुद्ध के साथ लगाए जाने वाले सभी विशेषणों में मुझे सबसे उत्कृष्ट विशेषण ‘जातिभेद भंजक, विशेषाधिकारनाशक, सभी प्राणियों में समानता के उपदेशक’ लगता हैं। दुनिया में गौतम बुद्ध की तरह नीतिमान, चरित्रवान, व्यक्ति पारखी व मिलनसार की मानसिकता मेरी है। सगुण ईश्वर अथवा देहाभिमानी आत्मा पर उनका विश्वास नहीं था। इसमें उन्हें कभी आकर्षण नहीं रहा। उनका जन्म ही विश्व के कल्याण के लिए हुआ था, विश्व के आशीर्वाद के रूप में हुआ था। दुनिया में इतने दु:ख क्यों हैं? इस बात का चिन्तन-मनन उनके मन में जीवन भर चलता रहा।

डॉ. बाबा साहब आंबेडकर को बोधिसत्व कहा जाता है। डॉ. आंबेडकर को मैट्रिक की परीक्षा पूरी होने के उपरान्त रावसाहेब बोले द्वारा लिखित ‘गौतम बुद्ध का चरित्र’ पुस्तक भेंट में मिली थी। उनके मन पर भगवान गौतम बुद्ध का प्रभाव बचपन से ही था। भगवान गौतम बुद्ध ने समता का महान संदेश दिया। वे जातिभेदनाशक थे। प्राणीमात्र के प्रति उनके मन में अपार करुणा थी, ऐसा बाबा साहब का मत था। डॉ. आंबेडकर गर्व के साथ कहते थे कि स्वतन्त्रता समता और भातृत्व- तत्वत्रयी उन्होंने भगवान गौतम बुद्ध से सीखा था। हम सभी जानते हैं कि वर्ष 1956 में उन्होंने नागपुर में बौद्ध मत अंगीकार कर लिया था।

प्रेरक शक्ति- भगवान गौतम बुद्द्ध, स्वामी विवेकानन्द और डॉ. आंबेडकर के जीवन में प्रचंड प्रेरक शक्ति कौन सी थी? इसका उत्तर है कि ‘मानवता को दु:ख से मुक्त करना’ उनकी प्रेरक शक्ति थी। तरुणावस्था तक गौतम बुद्ध एक राजकुमार थे। सभी वैभव उनके कदमों में पड़े थे। किन्तु उसमें उनका मन नहीं रमा। उन्हें एक प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था कि ‘मनुष्य को जरा (बुढापा), रोग और मृत्यु का दु:ख क्यों मिलता है। दु:ख का कारण और दु:ख से मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए उन्होंने घर का परित्याग कर दिया और नौ वर्ष तक कठोर तप किया, जिसके लिए हम तपश्चर्या शब्द प्रयुक्त करते है। अंततोगत्वा उन्होंने दु:ख, दु:ख का कारण और उसका उपाय खोज ही लिया।

स्वामी विवेकानन्द एक सम्पन्न परिवार में जन्मे थे। तरुणावस्था में वे स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में आये, एक अर्थ में वह उनका नया जन्म था। सन् 1886 में स्वामी रामकृष्ण परमहंस का स्वर्गवास हो गया। उसके उपरान्त विवेकानन्द ने पूरे देश का भ्रमण किया। उन दिनों देश अंग्रेजों के आधीन था। उद्योग धंधे, व्यापार नष्ट हो गये थे। लोग दरिद्रता से पीड़ित थे। दुर्भिक्ष के समय लाखों लोगों की मृत्यु हो जाती थी। रोग के कारण असंख्य लोग कष्ट सह रहे थे। दरिद्रता के साथ ही उन्होंने देश में घोर अज्ञानता के दर्शन किए। धनी लोगों द्वारा समाज की उपेक्षा का साक्षात्कार किया। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त उच्च वर्ग द्वारा समाज की घोर उपेक्षा को देखा। सर्वसामान्य जनता के प्रचंड दुखों को देखकर उनका मन व्याकुल हो उठा। वे सतत् चिन्तन करने लगे कि इन दु:खों की मुक्ति का मार्ग क्या है?

डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने देखा कि करोड़ो लोग अस्पृश्यता तथा गुलामी के व्यवहार से दु:खी हैं। उन्हें किसी प्रकार का अधिकार नहीं है। उन्हें पशुओं से भी दयनीय जीवन जीना पड़ रहा था। सामाजिक तथा धार्मिक रूढ़ियों में वे जकड़े थे और आगे बढ़ने हेतु उनके सारे मार्ग बन्द थे। डॉ. आम्बेडकर ने स्वयं भी अस्पृश्यता का कष्ट भोगा था। उनके सामने यह प्रश्न या कि इस समाज की मुक्ति का मार्ग क्या है? इससे वे बहुत ही व्याकुल रहा करते थे।

मुक्ति का मार्ग- भगवान गौतम बुद्ध ने दु:ख से मुक्ति का मार्ग खोजा। ज्ञान साधना की कठोर तपश्चर्या करके उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में दु:ख व्याप्त है। यह दु:ख जन्म, बुढापा, रोग, मृत्यु, अप्रिय वस्तुओं के उपभोग इत्यादि के कारण उत्पन्न होता है। सभी दु:खों का मूल कारण तृष्णा है। तृष्णा अर्थात उपभोग की वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा। यह तृष्णा नष्ट कर देना चाहिए। दु:ख का कारण समाप्त होते ही व्यक्ति दु:ख से मुक्त हो जाता है। इसके लिए उन्होंने अष्टांगिक मार्ग बताया। इस मार्ग में सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक जीवन, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि इत्यादि आठ अंग आते हैं।

भगवान बुद्ध ने मनुष्यों में हीनता लाने वाली जाति प्रथा को नकार दिया। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, वह कर्म से होता है। अच्छे कर्मों वाला ज्ञानी व तपस्वी व्यक्ति चाहे जिस जाति में जन्मा हो, असे ब्राह्मण मानना चाहिए। ऐसा कहने वाले गौतम बुद्ध के अनेक उपदेश हैं। सुख प्राप्त करने के लिए शीलवान होना चाहिए, जीवन में नैतिकता होनी चाहिए, जीवों की हिंसा नहीं करनी चाहिए दूसरों को दु:ख देने की जरूरत नहीं है। निरर्थक यज्ञादि कार्य की आवश्यकता नहीं है। यही उनके उपदेश का सार है। उनके व्यापक प्रभाव से यज्ञादि कर्म कम हो गये। पशुहत्या घट गयी। गोहत्या को निषिद्ध कर दिया गया। उन्होंने भारत के धर्मचक्र में परिवर्तन ला दिया। वैदिक कर्मकांडी धर्म को उन्होंने व्यक्ति के दु:ख का निवारण करने, मनुष्य के सुप्त सामर्थ्य को जगाने और समता युक्त धर्म को जगाने वाला स्वरूप दिया।

भारत के निवासियों के दु:खों का निवारण करने का विचार स्वामी विवेकानन्द ने किया। भगवान गौतम बुद्ध और स्वामी विवेकानन्द के समय में ढ़ाई हजार वर्षों का अन्तर है। सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया है, किन्तु दु:ख यथावत है। अज्ञानता ही दु:ख का कारण है, यह बताते हुए महात्मा बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। स्वामी विवेकानन्द ने बताया कि अज्ञानता ही सभी दु:खों का कारण है। यह अज्ञान कैसा? वे ही उत्तर देते हैं कि हम अपना ‘वेदान्त’ भूल गये। वेदान्त कहता है कि ‘मैं’ विश्व निर्माण करने वाली तेजस्वी शक्ति का एक अंश हूं। सभी प्राणी ऐसे ही अंश हैं। इस लिए चैतन्य शक्ति के रूप में एक-दूसरे प्राणी में भेद नहीं है। हम सभी एक ही महाशक्ति के अलग-अलग स्वरूप हैं। यह तथ्य भूलकर हम स्वयं को दीन-हीन, पतित और पापी समझने लगे हैं। ऐसा समझना उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर का घोर अपमान है।
इसे स्पष्ट करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने बकरी के दड़बे में पल रहे एक शेर के बच्चे की कथा का उदाहरण दिया। एक शेर का बच्चा बकरी के बच्चों के साथ उसके दड़बे में पहुंच गया और उनकी ही तरह घास-पात खाते और में-में बोलने लगा। एक दिन एक शेर ने बकरी के दड़बे पर हमला कर दिया और बकरियों को छोड़कर उस शेर को ही पकड़ लिया। उसे जंगल में ले गया और बोला, ‘‘तुम मेरी ही तरह वनराज हो, बकरी नहीं हो। बकरी अपना आहार है।’’ ऐसा कहते हुए शेर ने उसे अपना विकराल रूप दिखाया। आध्यात्मिक भाषा में कहा जाए तो उसे अपने सही स्वरूप का साक्षात्कार करवाया। विवेकानन्द कहते हैं कि भारत की दीन-दुर्बलों, दलित-वंचितो को उनके सही स्वरूप का साक्षात्कार कराने की जरूरत है। प्रत्येक के भीतर उसका आत्मतेज जागृत करने की आवश्यकता है। आज की भाषा में कहें तो उनमें आत्मबल जगाने की जरूरत है। उनकी अस्मिता जगाने की आवश्यकता है।

विलायत से शिक्षा पूरी करके, पूरा ज्ञान प्राप्त करके डॉ. बाबा साहेब भारत आये। उच्च शिक्षा प्राप्त करके विदेश में स्थायी रूप से बस जाने का पाप उन्होंने नहीं किया, क्योंकि उन्होंने पूरी शिक्षा अस्पृश्यों की अस्पृश्यता किस तरह से मिटाई जाए, इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्राप्त किया था। धन कमाने के लिए नहीं। उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया कि अस्पृश्य समाज स्वयं को हीन समझता है, यह उसकी भूल है। अस्पृश्यता मानवता के लिए कलंक है। इसे हमें धो डालना चाहिए। उन्हें दूसरा ज्ञान हुआ कि धर्मशास्त्र व धार्मिक रूढ़ियों को आधार मानकर लोग अस्पृश्यता का पालन करते है। अतएव इन रूढ़ियों को उखाड फेंकना चाहिए। तीसरा ज्ञान उन्हें हुआ कि आज या कल भारत में सत्ता परिवर्तन होगा। सत्ता परिवर्तन के समय दलित बन्धुओं को उनका अधिकार मिलना चाहिए। उन्हें नियम-कानून बनाने की शक्ति मिलनी चाहिए। उन्हें संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। कानून बनाने की शक्ति और संवैधानिक संरक्षण मिलने पर ही अस्पृश्यता दूर हो सकती है।

लोक शिक्षण- भगवान गौतम बुद्ध ने दु:ख से मुक्ति के लिए लोक शिक्षा पर जोर दिया। भिक्षुओं से वे कहते थे कि बहुजनों के हित में और बहुजनों के लिए उन्हें चारों दिशाओं में जाना चाहिए। लोगों को धर्म का ज्ञान देना चाहिए। यह कार्य करते हुए कभी-कभी लोग गालियां देंगे, मारपीट करेंगे, भिक्षा नहीं देंगे, भूखे रखेंगे, किन्तु हमें यह सब सहन करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने कहा कि मैत्री, करुणा, उपेक्षा और आनन्द इत्यादि चार मनोभावों को अपने मन में धारण करना चाहिए। लोगों से मित्रता करनी चाहिए। उनके दु:खों के प्रति मन में करुणा भाव रखना-चाहिए। जो दुष्ट प्रवृत्ति के लोग हैं, उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जो धन-धान्य से सम्पन्न है, उनके प्रति आनन्द व्यक्त करना चाहिए। सभी लोगों को धर्म का ज्ञान देकर सुशिक्षित करना चाहिए। गौतम बुद्ध के समय में शिक्षा का यही अर्थ था। धर्म का ज्ञान करना ही शिक्षा थी।

स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके युवकों व सन्यासियों को जनता के बीच जाने के लिए कहा। उन्होंने कहा, ‘भारत माता ही हमारी देव हैं। दरिद्रनारायण ही हमारे देवता है। सभी गरीबों में नारायण का दर्शन करो। और कल्याण की भावना से जीवों की सेवा करो। सेवा ही साधना है, अन्य किसी साधना की आवश्यकता नहीं है। सेवा से ही तुम्हें मुक्ति मिलेगी। मुक्ति के लिए हिमालय में जाने की जरूरत नहीं है। लोगों से दूर मत जाओं, उन्हें अपना परम प्रिय मानों। उनके दु:खों को दूर करने के लिए जीवन समर्पित कर दो। लोगों को शिक्षित करो, उन्हें भूगोल, गणित व अन्य शास्त्रों की शिक्षा दो। शिक्षा का तात्पर्य अपने भीतर स्थित पूर्णता के विकास का ज्ञान है। एक बार लोगों को अपनी शक्ति का ज्ञान हो जाने पर अपने प्रश्नों का हल वे स्वयं ढूढ़ लेंगे। स्त्रियों को शिक्षित करने से वे अपनी समस्या का निदान तलाश लेंगी। उनकी समस्याओं को हल करने वाले हम कौन होते है? अपनी समस्या का हल ढूढ़ने की शक्ति उनमें है।’’

डॉ. बाबा साहेब ने अपने अनुयायियों से कहा कि स्वयं को दीन-हीन मत समझो। शिक्षा प्राप्त करो, संगठित हो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो। ज्ञान के साथ ही चरित्र का विकास करो। किसी के साथ बैरभाव मत रखो। अधिकार पूर्वक पद प्राप्त करो और उसका उपयोग अपने बन्धुओं का दु:ख दूर करने के लिए करो। विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान प्राप्त करो। गुणी और कतृत्ववान बनो। उन्होंने लोगों को ज्ञान देने हेतु राजनीतिक क्षेत्र में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन, मजदूर पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना की। शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालयों की स्थापना की। लोगों को संगठित करने के लिए जीवन के आखिरी क्षण तक प्रयत्न करते रहे।

वैश्विक आयाम- भगवान गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की दु:खमुक्ति का आयाम वैश्विक है। भगवान गौतम बुद्ध भारत वर्ष के बाहर नहीं गये। वे भारत के दक्षिणी भाग में भी नहीं गये, किन्तु उनके ‘धम्म’ का प्रभाव उस समय ज्ञात सभी प्रमुख स्थानों पर पड़ा। भारत ने विश्वविजय किया, किन्तु कोई करके नहीं बल्कि लोगों का दिल जीतकर उन्होंने सच्चे धर्म का मार्ग दिखाया। स्वामी विवेकानन्द विदेश गये। शिकागो की सर्वधर्म परिषद में भाषण से पूर्व उन्होंने किसी भी सार्वजनिक व्यासपीठ कभी भी व्याख्यान नहीं दिया था। 11 सितम्बर, 1893 उनका प्राकट्य दिवस था। तीन वर्ष तक वे अमेरिका में रहे। इंग्लैण्ड तथा यूरोप का भ्रमण किया। उन्हें दिग्विजयी सन्यासी कहा जाता है। विश्वभर के मनुष्यों की दु:खमुक्ति का मार्ग खोजना है, तो उसका एकमात्र माध्यम वेदान्त है, यह बात उन्होंने अमेरिका में और भारत पर राज कर रहे इंग्लैण्ड में जाकर कहा। इसी तरह डॉ. आंबेडकर का संघर्ष दुनियाभर के दलितों के लिए प्रेरणादायी बना। संविधानपरक और अहिंसक मार्ग पर चलकर अधिकार के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए तभी सफलता मिलती है, डॉ. बाबा साहेब ने इस मार्ग पर चलकर दिखाया।

छ: सूत्र- ऐसा कहा जा सकता है कि भगवान गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर- तीनों ने दु:ख मुक्ति के लिए एक समान सूत्र बताए। पहला सूत्र यह है कि तीनों ने स्वीकार किया है कि मनुष्य को दु:ख है। दूसरा सूत्र यह कि दु:ख का कारण है। इसकी मीमांसा तीनों ने एक ही तरह से की है- अर्थात अज्ञानता ही दु:ख का कारण है। यह तीसरा सूत्र है। चौथे सूत्र में वे प्रश्न करते है कि अज्ञानता किस चीज की। पुन: वे कहते हैं कि अपने शुद्ध स्वरूप की जानकारी न होना ही दु:ख का कारण है। हम स्वयं को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इत्यादि समझते हैं, यह घोर अज्ञान है। पाँचवें सूत्र के रूप में तीनों ने ही कहा है कि सर्वप्रथम हम मनुष्य हैं और हमारे भीतर अपार शक्ति हैं। छठा सूत्र है कि दु:ख से मुक्ति के लिए हमें अपने स्वरूप को पहचानना चाहिए। भगवान गौतम बुद्ध और स्वामी विवेकानन्द ने ‘ध्यानधारणा’ मार्ग का निरुपण किया है। इसके साथ ही लोकसेवा को भी एक मार्ग बताया है। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने कहा स्वयं को बन्धन से मुक्त करने के लिए रूढि, परम्परा और धर्मशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

सामान्य अर्थों में भगवान गौतम बुद्ध और डॉ. आंबेडकर वेदान्ती नहीं थे। उन्हें वेदान्ती कहने पर वर्तमान काल में स्वीकार्य नहीं होगा, फिर भी एक बात स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होगी कि दु:ख मुक्ति, जो अन्तिम स्थान है, वहां पहुंचने के लिए अनेक मार्ग है। भक्ति तथा वेदान्त दोनों का अपना अलग-अलग मार्ग है। स्वामी विवेकानन्द ने जिस भाषा में वेदान्त की व्याख्या की है और जिस प्रकार से भगवान बुद्ध ने लोगों के सम्मुख दु:ख मुक्ति का मार्ग व्यक्त किया है। वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भगवान गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द और डॉ. बाबा साहब आंबेडकर तीनों के विचार, दर्शन और उपदेशों की व्याख्या करने और उन पर लेख लिखने की आवश्यकता है।

आपकी प्रतिक्रिया...