नेता गढ़नेवाला शिल्पकार

‘वर्ष प्रतिपदा के लिए पू. डॉ. हेडगेवारजी पर एक लेख चाहिये’ ऐसा संदेश ‘हिंदी विवेक’ से आया। मैं सोच में पड़ गया कि डॉ. हेडगेवार जी पर क्या लिखूं? क्योंकि डॉ. हेडगेवार जी पर मैंने एक पुस्तक लिखी है‡ ‘डॉ. हेडगेवार मेरी दृष्टि में’। इस पुस्तक में पू. डॉक्टर जी के बारे में मेरा जो आकलन है उसे शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है। इसलिए नया क्या लिखें? यह प्रश्न मन में उत्पन्न हुआ।

लेकिन डॉक्टर साहब का जीवन ऐसा था कि जितना उनके बारे में सोचे उतने नये नये पहलू ध्यान में आते हैं। परिस्थितियां बदलती रहती हैं और नयी परिस्थिति के संदर्भ में कल जो बात ध्यान में नहीं आयी वह बात ध्यान में आती है। डॉक्टर साहब का एक नया दर्शन हो जाता है।

सर्वथा अलग नेतृत्व

नेतृत्व तथा नेतृत्व गुण इस विषय पर मेरा आजकल थोड़ा अध्ययन चलता है। इस अध्ययन के दौरान डॉक्टर साहब का नेतृत्व तथा उनके नेतृत्व गुण के संदर्भ में ही मन में विचार तरंग उठते रहते हैं। वैसे देखा जाये तो बीसवीं सदी में भारत में एक से बढ़ कर एक नेता उत्पन्न हुए। हर नेता का अपना एक भक्त संप्रदाय है। भक्त संप्रदाय बनने के बाद श्रद्धेय नेता दुनिया का सबसे महान नेता लगता है। अन्य किसी के साथ उसकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसा भक्त-संप्रदाय मानता है।

एक उदाहरण से यह विषय स्पष्ट होगा। 2005 में महाराष्ट्र में ‘समरसता यात्रा’ का आयोजन किया गया था। लोकसत्ता (मराठी दैनिक) में एक लेख प्रकाशित हुआ। उस लेख में ‘समरसता पंचक’ यानी महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, राजर्षि शाहू महाराज, गाडगे बाबा तथा डॉ. हेडगेवार जी की तसवीरें थीं। महात्मा फुले और डॉ. बाबासाहब के भक्तगणों को यह पंचक अच्छा नहीं लगा। एक अतिविद्वान ने लिखा कि कस्तुरी मृग के झुंड में अवांछनीय प्राणी को रखा गया है। इस संकुचित विद्वान की टिप्पणी पर अंत्यत कडवी प्रतिक्रिया आयी। बेचारे संपादक को माफी मांगनी पड़ी।

वैसे भी डॉक्टर हेडगेवार बीसवीं सदी के सभी नेताओं से एकदम अलग हैं। उनकी तुलना उनके समकालीन किसी भी नेता से नहीं हो सकती। इसका मतलब वे अतुलनीय एकमेवाद्वितीय हैं, ऐसा मुझे नहीं कहना है। महात्मा गांधी, स्वा. सावरकर, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर आदि नेता अपने-अपने क्षेत्र के हिमालय हैं। उनका कार्य भी आनेवाली पीढ़ियों को सदियों तक प्रेरणा देता रहेगा। लेकिन इन सबसे हेडगेवार जी का कार्य और नेतृत्व सर्वथा अलग है।

भविष्यद्रष्टा

आश्चर्य की बात है कि उनके महान व्यक्तित्व को समझने का प्रयास एक मुसलमान विव्दान ने किया है। महाराष्ट्र के तथाकथित विद्वानों का बौनापन मुझे तो कई बार खटकते रहता है। मौका मिले तो मैं एक-एक का बौनापन खोलने वाली किताब लिखूं। मुसलमान विव्दान के भाषण का प्रसंग तमिलनाडु का है। तिथि है 20 नवम्बर 2010 और विव्दान का नाम है अलुशहा नवाज, डॉयरेक्टर ऑफ डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म। विषय है‡ मुस्लिम कल, आज और कल। इस विचार गोष्ठी का आयोजन पल्लापट्टी की उषा लायब्ररी ने किया था।

अलुशहा नवाज अपने भाषण में कहते हैं, ‘‘1925 में डॉक्टर हेडगेवार जी ने संघ की नींव रखी। संघ की शुरुआत करते समय उनका सपना भारत का प्रधानमंत्री या महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने का नहीं था। उनके सामने सौ साल आगे का सपना था। उनका लक्ष्य दीर्घकालीन था। 1925 में उन्होंने बीज बोया, योजना बनायी और उस पर काम करना प्रारंभ किया। उन्होंने अपनी कार्यपद्धति की शिक्षा आनेवाली पीढ़ी को दी। इस कारण संघ शिक्षा प्राप्त वाजपेयी 1997 में प्रधानमंत्री बन गये। क्या डॉ. हेडगेवार जैसा भविष्यकालीन योजना बनाकर उसे सफल बनानेवाला कोई नेता हमारे पास है? हेडगेवार सच्चे नेता हैं या हमारे नेता सच्चे नेता हैं।’’ इस प्रश्न का संकेत मुस्लिम नेताओं की तरफ है।

अलुशहा नवाज ने और भी कहा कि हमारे नेताओं ने जो बोया है उसका फल खाना चाहते हैं। इस जीवन में ही सत्ता का उपभोग करना चाहते हैं। जो बोया है उससे कई गुना अधिक प्राप्त करने की इच्छा वे रखते हैं। हेडगेवार जैसे किंगमेकर बनने की किसी की चाह नहीं।

श्री अलुशहा नवाब जी का भाषण मुस्लिम नेतृत्व की कमियों को सामने लानेवाला है। एक अर्थ में उनका भाषण मुस्लिम केंद्रित है। फिर भी वे डॉ. हेडगेवार जी के बारे में जब बोलते हैं तब शाश्वत सत्य को ही उनको कहना पड़ता है। कौन सी बातें उन्होंने कही हैं?

‡डॉ. हेडगेवार दीर्घदृष्टि वाले नेता थे।
‡वे अपने लिए कुछ नहीं चाहते थे।
‡उन्होंने एक अजेय संगठन खड़ा किया।

‡एक ऐसी व्यवस्था बनाई कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ध्येय संक्रमित हो।
‡अपने जैसी ही सोच रखने वाले कार्यकर्ता खड़े किये।
मेरी दृष्टि से भी अलुशहा नवाज जी ने डॉ. हेडगेवार जी का जो मूल्यांकन किया है वह अपने आप में बेमिसाल है। किसी दृष्टा पुरुष को समझने की, उसे परखने की योग्यता व्यक्ति में होनी चाहिये। योग्यता विहीन विद्वान डॉ. हेडगेवार जी को कभी मुसोलिनी का शिष्य बताते हैं या हिंदू फंडामेंटलिस्ट कहते हैं।

मूल्यांकन

आजकल मैनेजमेंट सायन्स में लीडरशिप के विषय में बहुत कुछ चर्चा होती है। विद्यार्थी को पढ़ाया जाता है। किसी विषय को जब पाठ्यक्रम में लाया जाता तब विद्वान अपने शास्त्र के अनुसार उसको समझने का और समझाने का प्रयत्न करते हैं। लीडरशिप के बारे में मैनेजमेन्ट में आठ प्रकार के सिद्धांत बताये जाते हैं। वे आठ सिद्धांत हैं‡

1) महान पुरुष सिद्धांत 2) वंशवाद सिद्धांत 3) विशेष परिस्थिति सिद्धांत 4) परिस्थितिजन्य सिद्धांत 5) जन्मना नेतृत्व सिद्धांत 6) समूह नेतृत्व सिद्धांत 7) मैनेजमेन्ट सिद्धांत 8) परस्पर संबंध सिद्धांत। इस लेख का विषय ‘मैनेजमेन्ट में लीडरशिप’ न होने के कारण इस पर ज्यादा लिखना यहा संभव नहीं।

यह जो श्रेणीकरण ऊपर किया गया है उनमें से किसी एक अनुक्रम में डॉ. हेडगेवार जी को नहीं बैठाया जा सकता। इसलिए मैनेजमेन्ट का यह लीडरशिप सिद्धांत अपने आप में अधूरा है। डॉ हेडगेवार नेतृत्व करनेवाले किसी ऊंचे घराने में नहीं जन्मे थे। परिस्थिति के कारण उनका नेतृत्व नहीं खड़ा हुआ था। हम देखते हैं कि आजकल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन देशभर में जोरों से चला है और अण्णा हजारे से लेकर गली तक अनेक नेता खडे हुये हैं। यह परिस्थितिजन्य लीडरशिप है। डॉ. हेडगेवार जी के नेतृत्व का मूल्यांकन इस प्रकार नहीं हो सकता।

नेतृत्व की तनिक भी इच्छा न रखनेवाले डॉ. हेडगेवार नेताओं के नेता थे। वे जब सरसंघचालक बनाये गये तब उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि स्वंयसेवकों की इच्छा से मैं सरसंघचालक हूं। अगर मुझ से भी अधिक लायक और योग्य व्यक्ति मिले तो उसे सरसंघचालक बनाना चाहिये। मैं एक स्वंयसेवक के नाते संघ-कार्य करूंगा। नेताओं के बारे में हम अनुभव करते हैं कि उनका लक्ष्य होता है कि ‘प्राण जाय पर कुर्सी न जाय’। डॉ. हेडगेवार नेतृत्व तो करते ही थे, लेकिन नेतृत्व की उनकी कोई अभिलाषा नहीं थी। बीसवीं सदी में केवल इस गुण से डॉ. हेडगेवार सबसे अलग बन जाते हैं।

आडम्बरों से परे

दूसरी बात यह है कि डॉ. हेडगेवार जी के सामने एक विजन (दृष्टि) थी। उन्होंने एक सपना देखा कि भारत फिर से विश्वगुरु के स्थान पर बैठा है। रघुवंश में कालिदास कहते हैं कि रघुवंश के राजा ऐसे-ऐसे महान कार्यों को प्रारंभ कर देते थे कि जिसका फल लोककल्याणकारी होता था। लेकिन कार्य के प्रारंभ का वे जरा सा भी आडम्बर नहीं करते थे। कार्य के परिणाम से ही लोगों को पता चल जाता था कि अमुक-अमुक कार्य प्रारंभ हो चुका है। डॉ. हेडगेवार जी की पद्धति ऐसी थी। कार्य का प्रारंभ कब हुआ?, कैसे हुआ?, क्यों हुआ? इत्यादि की चर्चा परिणाम निकलने के बाद प्रारंभ होती है। जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब दुनिया को धक्का लगा। लगता है कि कम्यूनिस्टों ने कुछ दिन खाना खाना भी छोड़ दिया होगा। यह परिणाम निकलने के बाद जनसंघ कैसे प्रारंभ हुआ?, भाजपा कैसे प्रारंभ हो गयी?, इनकी राजनैतिक ताकद किसमें हैं? इत्यादि विषयों की चर्चा प्रारंभ हो गयी।
चित्रकूट में नानाजी देशमुख जी का निवास रहा। मंदाकिनी के तट पर उनकी कुटिया थी और कुटिया के बाहर ही डॉ. हेडगेवार जी की प्रतिमा है। डॉक्टरजी, नानाजी के प्रेरणास्रोत थे। डॉ. हेडगेवार जी ने नानाजी को यह कभी नहीं कहा कि वे चित्रकूट में जाकर सेवा कार्य प्रारंभ करें। लेकिन नानाजी मानते थे कि वे हेडगेवार जी का ही कार्य कर रहे हैं। जो कहा नहीं, कभी सुना नहीं ऐसा कार्य डॉक्टरजी का है। इसका मतलब क्या होता है? मतलब यह होता है कि डॉक्टर साहब ने अपनी दृष्टि अपने कार्यकर्ताओं को इस प्रकार दी है कि उसके कारण कार्यकर्ता स्वयंदृष्टा बन जाता है। वह देखने लगता है। आध्यात्मिक परिभाषा में उसको ज्ञानचक्षु खोजना कहा गया है।

यह दृष्टि सामान्य से सामान्य स्वयंसेवक तक गई है। सभी को प्रचारक बनना संभव नहीं होता। लेकिन मन में डॉक्टर जी का कार्य करने की प्रबल इच्छा रहती है। इस इच्छा के कारण योग्य समय में घर और गृहस्थी से निवृत्त होकर समाज कार्य कें लिए कार्यकर्ता निकलते हैं।

समर्पण

सारी मानव जाति के कल्याण का सामर्थ्य भारत ने अर्जित किया है। अपनी त्याग‡तपस्या और धर्ममय जीवन से विश्वमानव को भारत आसनस्थ कर रहा है। ऐसे भारत को गढ़ने के लिए अपना पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति, हिंदू दर्शन नित्य जीवन में जीने वाले लाखों-करोडों लोगों को खड़ा करना पड़ेगा। यह काम भाषणबाजी से नहीं होगा। सब के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करना पड़ेगा। डॉ. हेडगेवार जी स्वंय आदर्श बन गये। अपने ध्येय के प्रति उन्होंने खुद को समर्पित किया। ध्येय और देह इनका अंतर समाप्त हो गया। डॉ. हेडगेवार ध्येय की प्रतिमा बने। इस दृष्टि से भी बीसवीं सदी के डॉ. हेडगेवार एकमेवाद्वितीय हैं।

डॉ. हेडगेवार जी ने एक व्यक्ति की दृष्टि पूरे संगठन की दृष्टि बनाई। लाखों कार्यकर्ताओं की दृष्टि बनाई। डॉ. हेडगेवारजी का देहान्त 1940 में हुआ और संघ की स्थापना को इस साल 86 वर्ष हो रहे हैं। इन 86 वर्षों में संघ का ध्येय जो पहले था, वही आज है। कार्य पद्धति जैसे पहले थी, वैसी आज है। संगठन के आयाम बढ़ गये हैं। डॉ. हेडगेवार खुद किसी भी प्रकार का नेतृत्व करना नहीं चाहते थे। नेता की पहचान होती है कि वह भाषण करता है, अपने अनुयाइयों को आदेश देता है। ‘‘मेरा अनुसरण करो’’ यह उसका आदेश होता है। डॉक्टर हेडगेवार एक ऐसे अजब नेता हो गये जिन्होंने कहा कि ‘‘जाओ सभी क्षेत्रों का नेतृत्व करो।’’ इसलिए आज हम देखते हैं कि डॉ. हेडगेवार जी ने राजनीतिक क्षेत्र, मजदूर क्षेत्र, धार्मिक क्षेत्र, कला क्षेत्र, साहित्य क्षेत्र जैसे अनगिनत क्षेत्रों में नेतृत्व करनेवाले स्वयंसेवक खड़े किये हैं। ये सब लोग डॉ. हेडगेवार जी की दृष्टि का अपने-अपने क्षेत्र में प्रकटीकरण कर रहे हैं। डॉ. हेडगेवार जी के समकालीन बीसवीं सदी के किसी भी नेता के लिए ऐसा कार्य करना संभव नहीं हुआ।

‘फलानुमेया प्रारंभ:’ ऐसा संस्कृत में एक वचन है। कोई कार्यकर्ता पूर्वांचल जाता है। कोई दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में जाता है। कोई घुमंतू जाति में जाकर बैठता है। पांचगणी के डॉ. श्रीहरि देशपांडे पूर्वांचल में गये। रत्नागिरी के डॉ. केतकर सेवा कार्य के लिए देशभ्रमण करने लगे। शिरूर के डॉ. कुंठे वनवासी क्षेत्र में गये। धुले के भाऊराव पाटील आज यमगरवाडी में आकर बैठे हैं। मैनेजमेन्ट की परिभाषा में ऐसे हजारों बंधु अपने‡अपने क्षेत्र का नेतृत्व करते हैं।
वर्ष प्रतिपदा डॉ. हेडगेवार जी का जन्म दिवस है। इसलिए उनके अलौकिक व्यक्तित्व का स्मरण हमने यहां पर किया। उनका सपना अभी पूरा होना है। हम सब को मिलकर यह सपना पूरा करना है। डॉक्टर साहब का जीवन संदेश बिलकुल सीधा‡सादा है। हम जहां, जिस क्षेत्र में हो वहां तन से, मन से, धन से समाज का उत्तरदायित्व निभाना चाहिये। खुद के लिए ही नहीं जीना चाहिए। समाज के कारण हमारा अस्तित्व है, उसे कभी नहीं भूलना चाहिये।
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