इतिहास-सत्य का अनावरण करती पुस्तक

भारतीय साहित्य में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अनेक उपन्यासकारों ने उपन्यास लिखे हैं और पाठकों द्वारा उन उपन्यासों को गम्भीरता पूर्वक पढ़ा और सराहा गया है। इन ऐतिहासिक उपन्यासों में उस समय की परिस्थितियों का वर्णन अवश्य होता है, किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वे अत्यन्त प्रासंगिक होते हैं। हिन्दी साहित्य में वृन्दावन लाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, भीष्म साहनी, अमृतलाल नागर, जयशंकर प्रसाद, नरेन्द्र कोहली, मराठी में शिवाजी सावंत, जनार्दन ओक, बाबा साहब पुरन्दरे, गुजराती में क. मा. मुनशी, राजस्थानी में विजयदान देठा इत्यादि साहित्यकारों ने इन उपन्यासों में साहित्य के साथ ही इतिहास का वास्तविक परिचय कराया है। इन ग्रन्थों को पढ़ने से भारतीय इतिहास को समझने व जानने का नया दृष्टिकोण बनता है।

कन्नड़ के प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ. एस. एल. भैरप्पा ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर महत्वपूर्ण उपन्यास ‘आवरण’ की रचना की है। मूलत: कन्नड़ के इस उपन्यास के दो वर्षों में ही तेईस संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। हिन्दी में प्रधान गुरुदत्त द्वारा अनूदित रूप में इसका प्रकाशन अब किताबघर प्रकाशन, दिल्ली द्वारा किया गया है। देश की प्राय: सभी भाषाओं में ‘आवरण’ का अनुवाद प्रकाशित हुआ है।

‘आवरण’ उपन्यास के ऐतिहासिक तथ्यों की सत्यता के विषय में अपनी भूमिका में डॉ. एस. एल. भैरप्पा स्वयं लिखते हैं, ‘‘इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं, उनको साहित्य की कलात्मकता जहां तक संभाल पाती है, वहां तक मैंने उपन्यास के अन्दर ही शामिल कर लिया है।… इस पूरी विषय वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें मेरी मौलिकता है।

एक नया स्वरूप

डॉ. भैरप्पा ने ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित उपन्यास को नये स्वरूप में रखा। उनके इस उपन्यास के भीतर भी एक उपन्यास है। इसके कथानक के वर्तमान जीवन तथा सत्रहवीं सदी के सभी पात्र भारतीय इतिहास के सत्य पर पड़े आवरण को दूर करने का प्रयत्न करते हैं। जहां सत्रहवीं सदी के पात्र अपनी दुर्बलता के कारण हो रहे मुगल दमन की घोर यातना को व्यक्त करते हैं, वहीं इक्कीसवीं सदी की नायिका पूरी निर्भीकता से भारतीय इतिहास के साथ हो रहे वाम-सेकुलर के दमन का पुरजोर विरोध करती है, वह सतत संघर्षरत रही है। इतिहास की रक्षा के लिए उपन्यास के भीतर एक अलग उपन्यास की रचना हो गयी है। प्रथम दृष्ट्या यह ऐतिहासिक उपन्यास लगता भी नहीं, बल्कि हिन्दू नायिका और मुस्लिम नायक के प्रेम और विवाह के बाद के संस्कृति और इतिहास संबंधी मतभेद, दूरी और निकटता का उपन्यास प्रतीत होता है। किन्तु इस उपन्यास में प्रखर बौद्धिकता और भारतीय चेतना से सम्पन्न नायिका लक्ष्मी, विवाह के उपरान्त रजिया बेगम बनकर भी भारतीय इतिहास के गहरे अध्ययन, ध्वंसावशेषों और यथार्थ दृष्टि के आधार पर तुर्क-मंगोल आक्रमण, विध्वंस तथा क्रूर दमन को सामने लाती है। इस उपन्यास में डॉ. भैरप्पा ने नायिका के माध्यम से औरंगजेब कालीन भारत के दमनपूर्ण जीवन के अल्पज्ञात तथ्य को लघु उपन्यास के रूप में अन्तर्भूत कर दिया। फलत: वाम-सेकुलर इतिहासकार तथा शासन सभी लक्ष्मी (रजिया) के विरुद्ध खड्गहस्त हो जाते है, परन्तु सत्य का अनावरण हो ही जाता है। इस दृष्टि से यह ऐतिहासिक उपन्यास वर्तमान से जुड़ा हुआ है।

सत्य पर पड़ा आवरण हटाती दो कथायें

आज भारतीय इतिहास लेखन वाम-सेकुलर दुरभिसन्धि द्वारा जकड़ा हुआ है। षड्यंत्रपूर्ण बौद्धिकता तथा सत्ता-राजनीति के कारण तुर्क-मुगल आक्रमण, ध्वंस व दमन के इतिहास-सत्य को छिपाकर भारतीय जीवनमूल्यों पर प्रहार किया जा रहा है। डॉ. भैरप्पा ने इस उपन्यास में सोलहवीं से उन्नीसवीं सदी के भारतीय इतिहास के सत्य का उद्घाटन दो कथाओं के माध्यम से किया है।

मुख्य कथानक में कर्नाटक के एक गांव कालेनहल्ली की लड़की लक्ष्मी पुणे के फिल्म इन्स्टीट्यूट में मुस्लिम युवक अमीर से प्रेम कर बैठती है। गांव के पुरोहित के पुत्र प्रो. नारायण शास्त्री वामपंथी थे। उन्होंने लक्ष्मी को अमीर के साथ निकाह करने के लिए प्रेरित किया। लक्ष्मी ने अमीर के साथ निकाह कर लिया और रजिया बन गयी। उस पर नमाज पढ़ने, बुरका पहनने और मांस खाने के लिए दबाव डाला जाने लगा। अपने दाम्पत्य जीवन की रक्षा के लिए उसने सब कुछ किया। लक्ष्मी को बीच-बीच में प्रो. शास्त्री का प्रोत्साहन व सामाजिक समर्थन मिलता रहा, किन्तु लक्ष्मी के पिता ने उसका परित्याग कर दिया। मातृहीन लक्ष्मी- रजिया ने इसे भी स्वीकार कर लिया। वह अपने शौहर अमीर के साथ भारत सरकार की ओर से ‘भारतीय अतीत की विरासत’ और राष्ट्रीय पुरुषों तथा प्रसंगों पर क्रमश: आलेख एवं नाट्य लेखन-मंचन के कार्यो में व्यस्त रहने लगी। अमीर ने लक्ष्मी-रजिया को हम्पी के विजयनगर के ध्वंसावशेषों को देखकर शैव व वैष्णव मूर्तियों के विनाश पर वृत्त आलेख तैयार करने को कहा। साथ ही टीपू सुल्तान को राष्ट्रीय वीर के रूप में स्थापित करने वाला लेख लिखने का परामर्श दिया। इन विषयों पर लेखन करते हुए लक्ष्मी-रजिया इन प्रसंगों पर चिन्तन भी करने लगी।

इस कार्य के बीच ही लक्ष्मी-रजिया को अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला। वह अपने गांव जा पहुंची। पिता का दाह संस्कार किया जा चुका था। गांव के पुरोहित शास्त्रीजी से मिलकर उसने प्रायश्चित किया और अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। वह गांव में रहकर अपनी विरासत, खेल-खलिहान, बाग-बगीचों और घर-व्दार की देख-भाल करने लगी। उसे घर में स्व. पिता द्वारा इकट्ठा किया गया ग्रन्थों का भण्डार दिखाई दिया। अब उसने टीपू सुल्तान के इतिहास के साथ ही उसके फरमानों का भी अध्ययन किया। प्राप्त प्रमाणों के साथ लक्ष्मी-रजिया ने टीपू सुल्तान के यथार्थ रूप- हिन्दू विरोध को अमीर के सामने रखा। उसने मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखे गये इतिहास में विजयनगर के विध्वंस को गम्भीरता से पढ़ा। उसे ज्ञात हुआ कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने ही विजयनगर को ध्वस्त किया था। लक्ष्मी-रजिया के द्वारा लिखे वृतान्त को देखकर उसका शौहर अमीर क्षुब्ध हो उठा और वह रजिया से दूर रहने लगा।

तेजस्वी भारतीय नारी

‘आवरण’ उपन्यास की नायिका अपने पिता के गांव में लक्ष्मी के रूप में स्वीकार कर ली गयी, किन्तु बंगलुरु में अमीर के यहां वह रजिया बेगम ही कहलाती रही। लक्ष्मी ने काशी जाकर औरंगजेब कालीन विध्वंस को देखा और समझा। उसने वाम-सेकुलर इतिहासकारों के द्वारा प्रचलित काशी विश्वनाथ मन्दिर के विध्वंस के झूठे आधार को भी अच्छी तरह समझ लिया। वामपंथी प्रो. शास्त्री इसाई लडकी से विवाह करने के कारण गांव और अपने पिता से तिरस्कृत थे और हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति और इतिहास तीनों पर आरोप लगाते रहते थे, ताकि उन्हें यश मिले। प्रो. शास्त्री अपने गांव की बेटी लक्ष्मी से मिलने पर अश्लील हरकतें करते थे। लक्ष्मी उनका आशय समझ रही थी, तब भी अपने मुस्लिम पुत्र नजीर की शादी प्रो. शास्त्री की बेटी से करायी। इस सम्बन्ध के पश्चात भी प्रो. शास्त्री का मन साफ नहीं था। लक्ष्मी ने रजिया के रूप में बंगलुरू में वामपंथियों द्वारा प्रस्तुत तथा अमीर द्वारा निर्देशित राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी ढांचे के ध्वंस पर आधारित नाटक देखा। यह नाटक पूर्णत: विरोध, घृणा और आक्रोश से भरा था। वह इस वामपंथी-मुस्लिम षड्यन्त्र को समझ गयी। अपने इतिहासबोध के आधार पर लक्ष्मी-रजिया ने जब अमीर के सामने अपनी असहमति व्यक्त की तो उसने तलाक देने की धमकी दी, पर उसने इसकी चिन्ता नहीं की।

डॉ. भैरप्पा ने अपनी अद्भुत शैली में लक्ष्मी-रजिया द्वारा एक उपन्यास की रचना करवायी है, जिसमें उसने औरंगजेब कालीन शासन के क्रूर और अमानवीय रूप का वर्णन किया है। उसमें देवगढ़ पर आक्रमण, विध्वंस, अधिकांश गांव-वासियों की हत्या और शेष को कैद करके गुलाम के रूप में बिकते दिखाया। जौहर और मृत्यु से बचने के कारण देवगढ़ के राजकुमार एवं युवराज्ञी के दर्दनाक जीवन का वर्णन किया। इस लघु उपन्यास में शाही हरम की अय्याशी, महिलाओं का यौन शोषण, दास पुरुषों के भयावह दमन की कथा कही गयी है।
दूसरी ओर प्रो. शास्त्री के संयोजकत्व एवं अध्यक्षता में शासन की ओर से इतिहास पर एक संगोष्ठी दिल्ली में हुई। उस संगोष्ठी में लक्ष्मी-रजिया भी आमंत्रित की गयी। लक्ष्मी-रजिया ने अपने शोध पत्र में आद्यन्त भारत-भारतीयता विरोधी आलेख और व्याख्यानों को अकाट्य तर्कों से खण्डित किया। प्रो. शास्त्री और उनके अनुयायी वामपंथी-सेकुलर इतिहासकार यह देख- सुनकर हतप्रभ रह गये। लक्ष्मी-रजिया का पति अमीर भी चकित था। एक राष्ट्रवादी महिला ने सभी वामपंथी-सेकुलरों को निरुत्तर कर दिया, इसलिए उसे दूसरी गोष्ठी में बुलाया ही नहीं गया।
अपने गहन अध्ययन तथा मनन के उपरान्त लक्ष्मी-रजिया ने आलेख तैयार किया, पर वह आलेख किसी ने छापा नहीं। उसका प्रकाशन नहीं किया गया। उसने अपने उपन्यास का स्वयं प्रकाशन करके समीक्षार्थ भेजा। किन्तु किसी सम्पादक ने समीक्षा छापने का साहस नहीं किया। इसके विपरित प्रो. शास्त्री ने छद्म नाम से समीक्षा लिखकर लक्ष्मी-रजिया पर ही आरोप लगाया। लक्ष्मी- रजिया ने वामपंथी-सेकुलर और संचार माध्यमों के भारतीय अस्मिता के विरोध के षड्यन्त्र को भलीभांति समझ लिया। प्रो. शास्त्री ने शासन को परामर्श देकर उसके उपन्यास की प्रतियों को जब्त करा दिया। पुलिस ने गांव में एकत्र सारे मूल ग्रन्थों को भी कब्जे में ले लिया, वह छटपटाती रह गयी। इतना ही नहीं, उसकी गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गयी। क्योंकि उस एक अकेली स्त्री ने पूरी निर्भीकता तथा साहस के साथ वाम-सेकुलर शासन के षड्यन्त्र के विरुद्ध कदम उठाया था और सत्य पर पड़े आवरण को हटाने का प्रभावी प्रयत्न किया था। उसके प्रयत्नों से षड्यन्त्रकारी घबरा गये थे।

आवरण हटा

लक्ष्मी-रजिया से क्षुब्ध अमीर ने बिना उसे तलाक दिये दूसरा निकाह कर लिया। लक्ष्मी-रजिया ने शौहर से उपेक्षित होते हुए भी सत्य की स्थापना के लिए, भारतीय इतिहास की सत्यता तथा भारतीय अस्मिता की रक्षा के लिए तिरस्कार, उपेक्षा और दमन को स्वीकार किया। अमीर एक मुस्लिम बुद्धिजीवी अर्थात भारतीयता से पूर्णत: असहमत कलाकार के रूप में वामपंथियों के सहयोग से आगे बढ़ना चाहता था। किन्तु वह पहली बार एक स्त्री, लक्ष्मी-रजिया में प्रखर बौद्धिकता, निर्भीकता तथा कर्मठता को देखकर प्रभावित हुआ। उसने अपने मन का क्षोभ दूर कर लिया। वह गांव आया और लक्ष्मी-रजिया को गिरफ्तारी से बचाने की कोशिश की। डॉ. भैरप्पा ने अमीर को लक्ष्मी के आगे झुकता हुआ दिखाया है। यह एक मानवीय हृदय परिवर्तन है या सत्य के सम्मुख असत्य की पराजय, यह विचारणीय है। उपन्यासकार ने इस प्रकार से भारतीयता के गम्भीर अध्ययन और मनन के साथ नायिका के द्वारा भारतीय इतिहास के सत्य पर जबरन डाले गये आवरण को अनावृत कर दिया है। यह निर्विवाद सत्य है कि डॉ. एस. एल. भैरप्पा ने अपने उपन्यास ‘आवरण’ में भारतीय चेतना के वर्तमान संघर्ष की गम्भीरता एवं निर्भीक कर्मण्यता को कुशलता के साथ उठाया है। यह उपन्यास समस्त भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित साहित्य को एक दिशा देगा।

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