फिल्मों में सेवा दर्शन

हमारा हिंदी सिनेमा एक रसायन है!
‘मनोरंजन और प्रबोधन’ (जितना संभव हो) का समन्वय स्थापित करने वाला दूसरा कोई सिनेमा न होगा। उसके गीत, संगीत, नृत्य, व्यंग्य, नाट्य, करुणा, प्रेम, विरह, प्रणय, प्रतिव्दंव्दिता, व्देष, महत्वाकांक्षा, निसर्ग सौंदर्य, आशावाद जैसे गुणों के जोड़ में एक प्रकार सेवा का भी भाव होता है।

क्या आपको आश्चर्य हो रहा है? क्या आपके मन में प्रश्न है कि यह सेवा क्या है?
हिंदी फिल्मों की संस्कृति में ‘सामाजिक सेवा’ परदे पर अवश्य झलकती है। कहीं कोई पूरी फिल्म सामाजिक सेवा को समर्पित दिखाई देती है, तो कहीं सेवा करने वाला चरित्र होता है या फिर किसी प्रसंग में सेवा को सम्मिलित किया जाता है।

‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी’ में डॉक्टर गांव में जाकर अपनी सेवा आम आदमी तक पहुंचाने की कोशिश करता है। हृषिकेश मुखर्जी के ‘आनंद’ में डॉ. भास्कर (अमिताभ बच्चन) नायक (राजेश खन्ना) के कैंसर की चिकित्सा करता है, जो एक सेवा ही है। हम आनंद के संवाद ‘जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं’ को अपनी जिंदगी में उतारने की भावना से फिल्म देखते हैं इसलिए डॉ. भास्कर की सेवा की ओर कम ध्यान जाता है।

शक्ति सामंत निर्देशित ‘अनुरोध’ में भी लाइलाज बीमारी से त्रस्त व्यक्ति (विनोद मेहरा) के मन को सम्बल दिलाने के लिए डॉक्टर (अशोक कुमार) अपने केंद्र में उसे शामिल करते हैं। इस सेवाभावी केंद्र के प्रसन्न माहौल में बीमारी की याद भोथरी हो जाती है।

फिल्मों में कई बीमारियों पर आधारित कहानियां पेश की गई हैं और उसके साथ चिकित्सा सेवाओं का भी दर्शन होता है। फिर वह महेश मांजरेकर की ‘निदान’ हो या चिकित्सा सेवाओं पर आधारित ‘अरमान’ हो।

मनमोहन देसाई की ‘मसाला मिक्स’ फिल्मों की संस्कृति ‘टाइमपास’ होने से उनकी फिल्मों में आई चिकित्सा सेवाओं को इतनी गंभीरता से क्यों लें? उनकी ‘अमर, अकबर, एंथनी’ में रक्तदान का प्रसंग याद आने पर हंसी आती है। मनोरंजन के लिए मनमोहन देसाई सारी सीमाओं को लांघ देते हैं। फिर वह अतिशयोक्ति हो जाती है। इस फिल्म में एक असहाय वृृध्द महिला (निरूपा रॉय) को एक ही समय अमर (विनोद खन्ना), अकबर (ऋषि कपूर) और एंथनी (अमिताभ बच्चन) रक्तदान करते हैं। ये बचपन में लापता हुए उसके पुत्र अर्थात सगे भाई हैं और वह उनकी मां हैं। लेकिन यह सेवा अतिरंजित है।

‘पुलिस की सेवा’ भी हमारी हिंदी फिल्मों का एक सेवा प्रकार है। कभी पुलिस सेवा में सकारात्मक भाग विरुध्द नकारात्मक भाग (अर्धसत्य), मां‡बाप की हत्या का बदला लेने वाला पुलिस इंस्पेक्टर (जंजीर), पिता‡पुत्र के रिश्ते की अपेक्षा पुलिस अधिकारी का कर्तव्य बड़ा और महत्वपूर्ण, साम्प्रदायिक दंगों में सामाजिक भाईचारा बनाए रखने वाला कर्तव्यदक्ष पुलिस अधिकारी (देव), पुलिस के बीच सदाचार और कदाचार का संघर्ष (शत्रु) जैसी असंख्य फिल्मों के जरिए पुलिस विभाग हमारे सामने उपस्थित होता है। कुछ हास्यव्यंग्य के लिए भी पुलिस की फिल्मों में उपस्थिति दर्ज हुई है, जबकि अन्य कुछ फिल्मों में केवल वर्दीधारी के रूप में ही वे हाजिर हुए हैं। लेकिन ‘थानेदार ’ नामक फिल्म हो (इसमें अपराधी गलती से पुलिस अधिकारी बन जाता है और गांव में सुधार करवाता है) अथवा एक कर्तव्यदक्ष अधिकारी अपना निर्दोष होना साबित करने में सफल होता है जैसी कहानी वाली ‘सत्यमेव जयते’ जैसी फिल्में में‡ कभी प्रत्यक्ष रूप से या कभी निहीत अर्थों में‡ पुलिस सेवा का जिक्र होता है। लेकिन परम्परागत फिल्मों में ‘डाक्यूमेंट्री’ का रूप देना संभव न होने से उनमें ‘सेवा दर्शन’ को मनोरंजन का मुलम्मा चढ़ाया होता है।

डाक विभाग भी पुरानी हिंदी फिल्मों का महत्वपूर्ण सेवा प्रकार था। आज एसटीडी, मोबाइल, कूरियर व इंटरनेट के माध्यम से बड़ी ‘सम्पर्क क्रांति’ हो गई। लेकिन कुछ वर्ष पहले डाक विभाग शहर व उससे अधिक ग्रामीण इलाकों का महत्वपूर्ण आधार था। दूरदराज के इलाकों में एकाध दिन अपनी सेवा देने के लिए पोस्ट मास्टर उपलब्ध था। इस सब का फिल्मों में दर्शन होना स्वाभाविक था। वस्तुत: इस तरह की फिल्में जनसाधारण के बहुत करीब होती थीं। लेकिन इस विशेषता का कौतुक बहुत कम हुआ। बिमल रॉय की ‘परख’ में डाक विभाग का दर्शन हुआ। मेराज निर्देशित ‘पलकों की छांव में’ का ‘डाकिया डाक लाया’ गीत बहुत लोकप्रिय हुआ।

देश की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण व चुनौतीभरा सेवा योग है फौजी तेवर। उस ओर खालिस सेवा की दृष्टि से नहीं देखा जाता। चेतन आनंद निर्देशित ‘हकीकत’ इस सेवा की सर्वोत्तम फिल्म है। जे. पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ बहुत लोकप्रिय रही। इसके अलावा ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘ललकार’, ‘फौजी’, ‘एलओसी’, ‘कारगिल’ जैसी फिल्मों में इसका दर्शन होता है। दर्शकों ने भी इन्हें सराहा है।

इसके अलावा तांगेवाले की सेवा (फिल्म तांगेवाला) से लेकर गृहस्थी टूटने तक पहुंचे हालात (जोड़ी ब्रेकर्स) और भवन निर्माण (इमान धरम) से लेकर अंतरराष्ट्रीय अपराध का पता लगाने वाले साहसी अभियान (ब्लड मनी) तथा असहाय स्त्री की सहायता करने वाले वकीली पेशे (दामिनी) तक विभिन्न सेवाओं का फिल्मों में दर्शन होता है। कभी उसमें गहराई होती है तो कभी उथलापन।

पुरानी फिल्मों में सेवा का बड़े पैमाने पर दर्शन होता था, क्योंकि निर्देशक व सिनेमा समाज का विचार करते थे। उन दिनों सिनेमा समाज का प्रतिबिंब हुआ करता था। लेकिन वर्तमान सिनेमा किस समाज का प्रतिबिंब पेश करता है यह अध्ययन का विषय है। पुरानी फिल्मों ने चाकू को धार लगाने वाले (जंजीर) और नेत्रहीन की मदद करने (कोशिश) तक कई तरह की सेवाओं का दर्शन कराया।

पुरानी फिल्मों के दिन लौटने चाहिए क्योंकि समाज को सेवाओं की आज सब से अधिक जरूरत है।

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