Everything About Kailash Mansarovar In Hindi | कैलाश मानसरोवर

महादेव का निवास परम पवित्र कैलाश पर्वत है और निकटस्थ है पवित्र झील मानसरोवर। सदाशिव, महेश्वर, रुद्र, पशुपतिनाथ, अमरनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बक, मृत्युंजय, ओंकार, निरंकार, महाकाल, नटराज न जाने कितने नामों, अनंत रूपों और क्रियाओं द्वारा महादेव को जाना गया है। आस्था के आयामों के पंख लगा भक्तगण इस तीर्थक्षेत्र की यात्रा करते हैं।

कैलाश का शिखर समुद्रतल से 22028 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। मानना है कि पुराणों में वर्णित मेरू पर्वत यही है जो नाना लोकों व पातालों को अपने में समेटे है, जो एक नाना आयामी भौतिक व आध्यात्मिक प्रणाली की केंद्रीय धुरी पर अवस्थित है, जिसके वातावरण में अनेकों देवी देवता वास करते हैं और जिसके शिखर पर देवाधिदेव महादेव ( Shiva Temple In India )अपनी संगिनी पार्वती, गणेश व कार्तिकेय तथा गणों के साथ विराजमान हैं। यहीं प्रकाश पुंजों के अनुपम और विविध संस्करण सूक्ष्म रूप में अठखोलियां करते हुए जगत-नियंता विधाता का समवेत स्वरों में गुणगान कर रहे हैं। पुराणों के अनुसार कुबेर ही राजधानी अलकापुरी कैलाश के निकट ही स्थित थी। रामायण और महाभारत कैलाश पर सभी देवताओं और दानवों का जमघट होना स्वीकार करते हैं। हिमाचल सर्वश्रेष्ठ पर्वत है क्योंकि कैलाश और मानसरोवर यहीं पर स्थित हैं। ‘जैसे प्रभात का सूर्य ओस की बूंदों को सुखा डालता है, वैसे ही सारे संसार के पाप हिमाचल दर्शन से नष्ट हो जाते हैं।’

जैन साहित्य कैलाश को अष्टपद नाम से पुकारता है। जैनियों के मतानुसार उनके प्रथम तीर्थंकर भगवान ॠषभदेव को यहीं मोक्ष प्राप्त हुआ था। बौद्ध कैलाश को अपने तांत्रिक इष्टदेवता देमचोग (संस्कृत: चक्रसम्वर) और इष्टदेवी दोरजे फामो (संस्कृत: वज्रवाराही) से जोड़ते हैं। कुछ का यह भी मानना है कि भगवान बुद्ध अपने पांच सौ बोधिसत्वों के साथ इस पवित्र पर्वत पर रहते आए हैं। प्राचीन बॉन पो संप्रदाय पर्वतों को देवलोक और पृथ्वी के बीच की जोड़ने वाली कड़ी मानते हैं।

कैलाश मेें कोई मंदिर नहीं है, अनेकों गुफ़ाएं हैं और ऊपर हिममंडित शिखर है। यदि वायुमान से देखे तो लगता है मानो एक विराट ज्वालामुखी के क्रेटर के बीचोंबीच शक्ति की जलहरी पर एक विशाल शिवलिंग स्थापित हैं।

विश्वप्रसिद्ध एलोरा में सोलह नम्बर की गुफ़ा कैलाश पर्वत का एकमात्र मंदिरीकरण है। इसे राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण प्रथम द्वारा केवल एक विशाल चट्टान को पहाड़ी में तीन ओर से कटवा कर तराशवाया गया है। इसके निर्माण में आठवी से नौंवी शताब्दियों तक का समय लगा माना जाता है। यही कैलाश पर विराजमान शिव-पार्वती को रावण द्वारा उठाकर हिलाने और कैलाश-च्युत करने के असफल प्रयास का जग-विख्यात भव्य स्थापत्य-चित्रण है। एलोरा की गुफ़ाएं यूनेस्को द्वारा 1983 में वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित की गई थीं।

मानसरोवर ताजे पानी की विश्व की सबसे ऊंची झील है। समुद्री सतह से इसकी ऊंचाई 14950 फुट है। इसकी पड़ोसी झील राक्षस ताल मानसरोवर से 50 फुट कम ऊंची है। मानसरोवर का क्षेत्रफल 200 वर्ग मील और राक्षस ताल का क्षेत्रफल 140 वर्ग मील के लगभग है। मानसरोवर की परिक्रमा 80 से 100 किलोमीटर के लगभग है। मानसरोवर का तिब्बती नाम माफाम-त्सो है, इसे माभाम-त्सो भी कहते हैं। त्सो का अर्थ है सरोवर। राक्षस ताल को तिब्बती भाषा में लागांक-त्सो कहते हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शेषनाग और उनके वंशज आज भी मानसरोवर में रहते हैं।

अंतत: सर्दी, ऑक्सीजन की कमी और मार्ग की भयंकर बाधाओं से जूझते हुए सभी तीर्थयात्री किसी प्रकार पांचवें दिन मानसरोवर के किनारे स्थित चिउ गुम्फ़ा के निकट बने मड-हाउस में जा ठहरे। अगले दिन सूरज के सातों घोड़े ऐसे दौड़े कि धूप का स्वर्णिम जाल हर ओर बिखर गया। नाचते-गाते तीर्थयात्री चैतन्य महाप्रभु के मूड में मानसरोवर के एक बढ़िया से स्पॉट पर पहुंचे। उस दिन वह पवित्र झील समुद्र के समान ठाठें मार रही थी। पारदर्शी जल की सम्पूर्ण सतह एक नहीं, वरन् अनेकों रंगों से जगमगा रहा थी। बस देखने भर की आवश्यकता थी, ऐसा लग रहा था जैसे प्रभु के आदेश से विश्वकर्मा ने अपनी भरपूर कारीगरी का चमत्कारिक कैलिडोस्कोप रच डाला हो। स्नान-ध्यान व पूजा-अर्चना के पश्चात यात्री राक्षस-ताल होते हुए वापिस चिउ गुम्फ़ा के पास अपने पड़ाव पर लौट आए। राक्षसताल ही वह स्थान है जहां लंकाधिपति महापंडित रावण ने तपस्या करके चन्द्रहास तलवार सहित भगवान शंकर से अनन्य वरदान प्राप्त किये। राक्षसताल से चिउ-गुम्फ़ा तक के मार्ग से हिम-मंडित कैलाश और उसके आकाश में मंडराते रंग बिरंगे बादलों की शोभा देखते ही बनती थी।

भोजनोपरांत सभी यात्री कैलाश परिक्रमा के आधार शिविर दारचन की ओर चल पड़े। लगभग डेढ़ घंटे की छोटी सी यात्रा थी। पता लगा कि कैलाश और उसके आसपास खराब मौसम के कारण कुछ पहाड़ी सेतु बह गए थे, इसलिये ऊपर परिक्रमा के लिये जाने में, जान-माल का खतरा था। घोड़े और सामान उठाने वाले मज़दूर न मिलने के कारण अधिकांश यात्री दारचन में ही ठहर गए। जिन्होंने ऊपर पैदल जाने का निर्णय किया, उनमें से भी केवल छ: को छोड़कर शेष सभी पहले या दूसरे दिन परिक्रमा अधूरी छोड़कर दारचन वापिस लौट आए। चार पुरुषों और दो महिला तीर्थयात्रियों ने तीसरे दिन दल के दो वीर शेरपाओं की सहायता से परिक्रमा पूरी की। इन छ: सफलतापूर्वक परिक्रमा संपन्न करने वालों में दो सगे भाई-बहिन विदेशी थे।

अब सभी यात्री मानसरोवर की परिक्रमा पूरी करने के लिये निकल पड़े। अंतिम छोर पर आंधी तूफ़ान चल रहा था। एक यात्री ने यहां भी नहाने की हिम्मत कर डाली। कइयों ने भारत लाने के लिये मानसरोवर का पवित्र जल अपने अपने बर्तनों में भर लिया। वर्षा आरंभ हुई तो सभी मानसरोवर के किनारे अपनी अंतिम रात तंबुओं में बिताने के लिये लौट पड़े। वह एक यादगार शाम थी। उस रोज़ विधाता ने उन्हें एक अनोखा सरप्राइज़ दिया और परिचित करवाया अपने उस कला-कौशल से जिस क्षमता के कारण वह जल, पवन और अग्नि का कोई भी रूप धारण करने की अद्भुत सामर्थ्य रखते थे। काठमांडू तक पहुंचने में इस बार तीन दिन ही लगे। रास्ते के सभी तिब्बती बौद्ध गुम्फ़ा वीरान पड़े थे। इसका दुक्का कुत्ते उनकी पहरेदारी करते दिखाई पड़े। चीन बॉर्डर पार करने पर नेपाल में सभी कुछ भीगा था। वर्षा ही वर्षा थी।

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