आत्मनिर्भर भारत संकल्प सिद्धि का मूलमंत्र

बेशक आज स्थानीयता का आधार चीन के प्रति नफरत का मनोवैज्ञानिक वातावरण है, लेकिन दीर्धकालिक नजरिये से यह लोकचेतना भारत के आत्मनिर्भर लक्ष्य को सिद्ध करने वाली साबित होगी। भारतीय हुनर के मामले में किसी से कमतर नहीं है। आवश्यकता केवल इस कौशल को सामाजिक अधिमान्यता देने की है। जैसे-जैसे यह अधिमान्यता स्थायीभाव ग्रहण करेगी वैसे-वैसे भारत आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होगा। इसलिए ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ को जनक्रांति मोड़ में आत्मसात करना ही हम नागरिकों का आज राष्ट्रीय कर्तव्य है।

आत्मनिर्भर भारत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान भारत के दीर्धकालिक स्वर्णिम भविष्य की बुनियाद भी है। कोरोना काल के कड़वे अनुभव जहां पूरी दुनियां को डरा रहे थे, तब भारत के प्रधानमंत्री भारत में आत्मनिर्भरता के संकल्प को सिद्धि तक ले जाने की जमीनी रूपरेखा पर अमल करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित कर रहे थे। इस वैश्विक महामारी ने हमें भी एक कटु लेकिन व्यवहारिक अनुभव से रु-ब-रु कराया कि संकट में हमारी दैनंदिन आवश्यकताओं को पूरा करने में हमारे आसपास के लोग ही काम आए। स्थानीय परिवेश और उत्पादक जनसमूह ने ही हमारी सहायता की है। जिन ब्रांडेड औऱ विदेशी कम्पनियों के उत्पादों से हमने अपनी जीवनशैली को अनावश्यक भर रखा था, उनकी उपयोगिता खोखली साबित हुई है। वह केवल विलासिता औऱ पूंजीवादी प्रचार तंत्र के मोहपाश से अधिक कुछ भी नहीं है। बिहार चुनाव परिणामों के बाद देश को दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए प्रधानमंत्री ने ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ का आह्वान फिर जिस दमदारी से किया उसका निहितार्थ भी हमें समझना होगा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जोर देकर कहा कि ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ को अगर भारतीय समाज आत्मसात करने का संकल्प लेता है तो दुनियां का कोई देश भारत को दबा नहीं सकता है। यहां पीएम का इशारा स्पष्ट तौर पर चीन की तरफ ही था, जिसने सस्ते औऱ घटिया उत्पादों से हमारे उपभोक्ता बाजार को पाट रखा है। ‘वोकल फॉर लोकल’ न केवल भारतीय आत्मनिर्भरता का रास्ता सुनिश्चित करेगा बल्कि वैश्विक पटल पर भारत की धमक बढ़ाने का काम करेगा। आज चीन भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है। उसके साथ सामरिक औऱ आर्थिक दो मोर्चों पर भारत को लड़ाई लड़नी पड़ रही है। 70 साल में पहली बार भारत चीन की आंखों में आंखें डालकर बात कर रहा है दोनों ही मोर्चों पर मोदी डटकर सामना कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में हमारा दायित्व बनता है कि ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के प्रधानमंत्री के आह्वान को हम एक जनक्रांति के रूप में आत्मसात कर एक सशक्त औऱ मजबूत भारत की बुनियाद में अपना योगदान सुनिश्चित करें। इस आर्थिक क्रांति के अग्रदूत बनकर हम भारत को वैश्विक व्यवस्था में उसका वास्तविक स्थान दिलाएं। इस राष्ट्रीय यज्ञ में हर नागरिक को अपनी भूमिका खुद तलाशनी है औऱ यह किसी विशिष्ट पुरुषार्थ या बलिदान की मांग भी नहीं करता है, केवल दैनंदिन जीवन में अपने स्थानीय सहोदरों के साथ आर्थिक संव्यवहार की अपेक्षा भर करता है।

जापान और दक्षिण कोरिया के बारे में कहा जाता है कि इन देशों ने बगैर प्राकृतिक संसाधनों के केवल अपने हुनर औऱ नागरिकों की देशभक्ति के बल पर आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। क्या बदले हुए भारत में हम एक मजबूत प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ऐसा नहीं कर सकते है? बेशक भारत के नागरिकों ने हर संकट में गजब की राष्ट्रीयता का परिचय दिया है लेकिन यह भी समानांतर सच है कि राष्ट्रीयता या नागरिकबोध का यह तत्व हमारे लोकजीवन में जापान या कोरिया की तरह स्थायी नहीं है। इस भाव को आज हमें स्थायी न सही नियमित किये जाने की तो आवश्यकता अपरिहार्य है। पिछले दिनों मोदी सरकार ने एक के बाद एक नीतिगत स्तर पर चीनी उत्पादों पर आर्थिक नाकेबंदी का प्रयास किया है। पहली मर्तबा कोई प्रधानमंत्री सीधे चीन को खुले शब्दों में चुनौती दे रहा है और चीन की धमकियां बेअसर साबित हो रही हैं। बेहतर होगा कि हम नागरिक के रूप में ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ के खुद ब्रांड एम्बेसडर बनकर नए भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में सुस्थापित करने के इस अवसर को साकार करने में योगदान दें। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री की इस अपील का नागरिकों पर कोई असर नहीं हुआ है, तथ्य यह है कि चीन के उत्पाद हमारे जीवन से हट रहे हैं। कोरोना संकट के दौरान चीन के घटिया वेंटिलेटर औऱ अन्य सर्जिकल उपकरणों पर भरोसा न करते हुए हमारे देश के उद्यमियों ने खुद अपने स्तर पर कोविड से लड़ने वाले सभी उपकरणों का न केवल निर्माण किया बल्कि दुनिया के 50 से अधिक देशों के लिए इनकी आपूर्ति सुनिश्चित की। यह तब जब ऐसे उपकरण या टेस्टिंग लैब भारत में इस संकट से पूर्व निर्मित ही नहीं होते थे। चीन ने भारत के लगभग हर उत्सव को अपने घटिया उत्पादों के शिकंजे में ले रखा था। कोरोना काल में होली, रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, नवदुर्गा के पर्व बगैर चीनी उत्पादों के इस देश ने हर्षोल्लास के साथ मनाएं हैं। यह प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के आह्वान के अलावा चीन के विरुद्ध हमारे सशक्त प्रतिवाद का ही नतीजा था। वरन दो दशकों से इनमें से हर त्यौहार पर हमारे घर चीनी उत्पादों से भरे रहते थे। इस बार दीवाली का बड़ा पर्व भी हमारे घरों में चीन के लिए निषिद्ध साबित हुआ है।
देश भर में स्थानीय शिल्पकार, कारीगर, बुनकरों औऱ उद्यमियों के हुनर को प्रतिष्ठित करने की स्वप्रेरणा स्पष्ट देखी और समझी जा सकती है। शहरी तबके में नौजवान ही नहीं छोटे-छोटे बच्चों में भी यह चेतना देखी जाने लगी है कि यह माल चीनी तो नहीं है? बेशक आज स्थानीयता का आधार चीन के प्रति नफरत का मनोवैज्ञानिक वातावरण है, लेकिन दीर्धकालिक नजरिये से यह लोकचेतना भारत के आत्मनिर्भर लक्ष्य को सिद्ध करने वाली साबित होगी। भारतीय हुनर के मामले में किसी से कमतर नहीं है। आवश्यकता केवल इस कौशल को सामाजिक अधिमान्यता देने की है। जैसे-जैसे यह अधिमान्यता स्थायीभाव ग्रहण करेगी वैसे-वैसे भारत आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होगा। इसलिए ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ को जनक्रांति मोड़ में आत्मसात करना ही हम नागरिकों का आज राष्ट्रीय कर्तव्य है।

सवाल यह भी है कि क्या हमारे स्थानीय उत्पाद हमारी गुणवत्तापूर्ण आवश्यकताओं कि प्रतिपूर्ति में सक्षम नहीं है? इसका सबसे बेहतरीन औऱ ताजातरीन प्रमाण कोरोना अवधि ख़ासकर लॉकडाउन है। इस अवधि में जब आवागमन, परिवहन औऱ आयात लगभग बन्दप्राय था तब हमारी आवश्यकताओं की सुचारू आपूर्ति किसने की? क्या इस नई आपूर्तिचेन में हमारे स्थानीय उत्पादनकर्ता खरे साबित नहीं हुए हैं? जाहिर है एमेजान या ऑनलाइन के विदेशी प्लेटफॉर्म की जगह हमारे लोकल ने ही हमें दैनंदिन आवश्यकताओं को पूरा किया। कुम्हार के हाथ से बने दीपक औऱ लक्ष्मी जी की प्रतिमाएं हो या हमारी स्वसहायता समूह की महिलाओं द्वारा निर्मित राखियां अथवा ब्रांडेड चॉकलेट्स के स्थान पर स्थानीय मदर/अमूल डेयरी के मीठे उत्पाद। ध्यान से देखें तो हमारी खुशियों के स्तर या उत्सवधर्मिता में लेश मात्र भी कमी नहीं आई है। कोरोना संकट में आज भी लाखों पीपीई किट्स, मास्क, सेनेटाइजर, फेसमास्क, स्थानीय स्तर पर ऐसे लोगों ने निर्मित किये हैं। जिनका कौशल शायद इस संकट के न आने पर सामने ही नहीं आता। यह सब संभव हुआ प्रधानमंत्री के उस आत्मविश्वास भरे आह्वान से जिसमें आत्मनिर्भरता के संकल्प को सिद्धि में परिवर्तित करने का साहस और सामर्थ्य था। आज सच तो यही है कि भारत अपनी आत्मनिर्भरता की उड़ान आरम्भ कर चुका है, लेकिन यह उड़ान अपने गन्तव्य तक तभी पूरी हो सकेगी जब 130 कारोड़ भारतीयों की संकल्प शक्ति इससे जुड़ेगी। संयोग से आज भारत का नेतृत्व एक सक्षम हाथों में है जिसकी जनस्वीकार्यता औऱ विश्वसनीयता असंदिग्ध है। इसलिये चीन की चुनौती के बहाने भारत को उसकी पुरानी आत्मनिर्भर पहचान दिलाने का यह बेहतरीन सुअवसर आज हम सबके समक्ष है। ‘वोकल फॉर लोकल’ के प्रति हर भारतीय की ईमानदार प्रतिबद्धता भारत को कोरियाई औऱ जापानी मॉडल से भी आगे ले जा सकेगी। इसलिए हमें गर्व से इस लोकल के लिए क्रांति मोड़ में अपनी भागीदारी से पीछे नहीं रहना चाहिये। वैसे भी भारतवासी परोपकार के हामी हैं और पुरातन अतीत हमारी आत्मनिर्भर आर्थिकी की गौरवशाली कहानी कहता है। प्रधानमंत्री मोदी के इस आह्वान में आने वाली पीढ़ियों के सपनों को साकार करने का रोडमैप भी है।

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