विदेशी भाषा अधिगम – आत्मनिर्भरता की सौगात

छठी पीढ़ी का युद्ध परमाणु युद्ध न होकर साइबर, मेडिकल या आर्थिक युद्ध होना है। इसलिए हमारे युवकों को विश्व के लगभग सभी विकसित देशों की भाषाओं का सामान्य परिचय कराना बहुता जरूरी है। विदेशी की भाषा का यह अधिगम हमारे लिए आत्मनिर्भरता की सौगात ही होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हो चुकी है। इस नीति के एक व्यापक बदलाव के रूप में शिक्षण-अधिगम माध्यम के प्रस्तुतीकरण में परिवर्तन, अर्थात सीखने के भाषाई परिवेश में परिवर्तन पर चर्चा हो रही है। चर्चा होना सहज ही है; क्योंकि यह बदलाव ना केवल पाठ्यक्रम के रूप में परिवर्तित होने जा रहा है परन्तु देश में चारों तरफ आत्मनिर्भर सामाजिक जीवनशैली को मान्यता देने का आग्रह किया जाता है।

सामाजिक जीवनशैली को जिस किसी भी वातावरण में पनपने दिया जाए, पर आत्मनिर्भरता रूपी चट्टान में परतंत्रतता का बीज कभी अंकुरित नहीं हो सकता। आज चारों तरफ देशज, विकास और विश्वास के आत्मबल की बात हो रही है, जिसका मूल आधार आत्मनिर्भरता ही है। आत्मनिर्भरता देशज की तत्वगरिमा को अपने में धारण किये रहता है। बात जब देशज स्वावलंबन को अंतरराष्ट्रीय आधार देने की हो तो विदेशी भाषा का देशीय आत्मसमन्वय होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। विदेशी भाषा में आत्मनिर्भर होना केवल विदेशीयत को पूर्णरूपेण अपनाना नहीं होता वरन् उस संस्कृति, कला, विज्ञान, सम्मान, और सरोकार को समझना होता है, जो समसामयिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं होते, वरन् ऐतिहासिक कालखंड के प्रवाह को भूत से उद्गमित कर, वर्तमान के बागवान में लहराते हुए भविष्य को संसाधित करने का दमखम रखते हैं।

आज के इस समसामयिक परंतु तत्क्षण परिवर्तित अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यवहार की दुनिया में दो देश सिमटकर मोबाइल के एक क्लिक मात्र रह गए हैं। हों भी क्यों न, कोई भी देश तरक्की में पीछे नहीं रुकना चाहता और आज के विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने कम से कम इतना तो संभव कर ही दिया है चाहे भले ही हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में पड़ी महसूस कर रही हो। संगणकीय अनुप्रयोग की दिशा ने जहां हमारे देश को पूर्ण रूप से स्वावलंबित होने की दिशा में आगे बढ़ने का मौका दिया है, वहीं हमारे युवाओं की बौद्धिक विरासत नें अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना कर विदेशी मुद्रा भंडार की आगम को स्वदेशी आधार प्रदान किया है।

विदेशी मुद्रा को लाने का सबसे बड़ा श्रेय विदेशों से व्यापार का बढ़ना एवं पर्यटन है। विदेशों से व्यापार जहां हमारी अर्थव्यवस्था को विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने की मुख्य वजह बनता जा रहा है, वहीं पर्यटन विश्व स्तर पर हमारी सनातन पहचान को वास्तविक और सम्मानजनक स्थिति दिलाने का दमखम रखता है, जिसके कमजोर होने पर हम खुद की पहचान के लिए तरसते दिखेंगे।

समसामयिक अंतरराष्ट्रीय परिवर्तन के लिए चाहे वह सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या रणनीतिक किसी भी क्षेत्र में क्यों ना हो, विदेशी भाषाएं बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। विदेशी भाषा के माध्यम से रोजगार की अपार संभावनाएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में तो पैदा होती ही हैं, साथ ही साथ विदेशी भाषा का ज्ञान अपनी प्राचीन संस्कृति और विरासत को अच्छे ढंग से संसार के सम्मुख प्रस्तुत करने का सबसे अच्छा माध्यम भी होता है। विदेशी भाषाओं के प्रफुल्लित प्रयोग से सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्र में पारस्परिक व्यावहार तेज हो जाता है जिसका सीधा, तात्विक और तात्कालिक असर किसी भी देश की समसामयिक प्रगति पर पड़ता है।

21वीं सदी की तुलना यदि पिछली सदियों से की जाए तो दोनों में विदेशी भाषा को सीखने का उद्देश्य एकदम व्यतिरेकी है। पिछली सदियों में विदेशी भाषा को सीखने का प्रमुख उद्देश्य होता था व्यवसाय करना या औपनिवेशिकता को बढ़ावा देना। उदाहरण भारत में मैकाले की शिक्षा नीति (छननी पद्धति से केवल उन लोगों को अंग्रेजी पढ़ाना जिससे कि वे अंग्रेजीयत को सुचारू रूप से चलवाने में मदद कर सकें), अमेरिका में राज्य भाषा के तौर पर मान्यता के लिए अंग्रेजी भाषा का केवल एक वोट से डच (जर्मन) भाषा से जीतना, यूरोप के देशों में फ्रेंच भाषा एलीट भाषा के रूप में उच्च वर्ग के मध्य प्रचलित होना इत्यादि।
आधुनिकता के दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कला और फिल्म जगत का इतना आत्मीय संबंध बनना विदेशी भाषा की पारस्परिक परंतु सापेक्षिक प्रयोग को बयां करता है। 21वीं सदी में विदेशी भाषाएं जानना या यों कहें विदेशी भाषाओं से अपने जनमानस को प्रबुद्ध करना सकल ब्रह्मांड में रणनीतिक हिस्सेदारी में वर्चस्व बनाए रखना है, जो आज के समय की विवशता ही नहीं बल्कि संप्रभुता के लिए सम्मानजनक लड़ाई है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति नें पाठ्यक्रम में विदेशी भाषाओं को ना केवल स्थान दिया है, बल्कि भाषाई परिवेश को समग्र रूप से व्यवस्थित करने के लिए विकल्प के रूप में नए संस्थान का आबंटन भी करने का प्रस्ताव दिया है। इसमें भारतीय अनुवाद संस्थान और संस्कृत, फ़ारसी आदि भाषाओं के लिए अकादिमिक व्यवस्था आदि प्रमुख रूप से हैं। विदेशी भाषाओं के पूर्ण कालिक प्रशिक्षण के लिए विश्वविद्यालय तो दूर, विदेशी भाषाओं की उच्चतर शिक्षा के लिए हमारे देश में बहुत ही कम या यों कहें कि गिने चुने संस्थान हैं। उनमें भी पूर्णरूपेण शिक्षण-अधिगम के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद इत्यादि प्रमुख हैं। जिस प्रकार से नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक क्लस्टर मॉडल बना कर विषयों की दूरस्थ शिक्षा की भी व्यवस्था की जाने की बात कही गई है, उस माध्यम से विदेशी भाषा अधिगम के पूर्ण होने की सफलता में संदेह दिखता है, क्योंकि अन्य विज्ञान विषयों की तरह भाषा विज्ञान प्रयोगशाला का होना अत्यंत आवश्यक होता है। आजकल वर्चुअल लैब की बात कही जा रही है। वर्चुअल लैब विज्ञान विषयों के उच्चतम इंस्ट्रूमेंटेशेन सिमूलेशन के लिए संभव है और हमारे देश में लगभग प्रचुरता से सुलभ करवाया जा रहा है परंतु उच्च कोटि की विदेशी भाषा लैब बहुत ही कम मात्रा में देश में उपलब्ध है। इसका विकास और संवर्धन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में दिए गए प्रावधानों (एनआरएफ के विकल्प तथा संस्थानों और उनके घटकों के विकास) के आधार पर प्रमुखता से शुरू करना होगा।

और अच्छा होता यदि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा साहित्य और संस्कृति संस्थान की तर्ज पर और दूसरे अलग संस्थान पैदा किए जाते। यदि तुरंत यह संभव ना हो तो कम से कम संयुक्त राष्ट्रसंघ कार्यकारी भाषाओं के अध्ययन के लिए संस्थान को प्रमुखता से अविलंब स्थापित किए जाएं। आधिकारिक तौर पर विदेशी भाषाओं को लेकर सीबीएसई द्वारा उठाया गया कदम सराहनीय है परंतु उच्चतर शिक्षा के लिए एक व्यावसायिक पाठ्यक्रम के रूप में विदेशी भाषा शिक्षण को युवा भाषा शिक्षण के रूप में एक संभावना के तहत तराशना पड़ेगा। हमारे देश में दूसरे पाठ्यक्रमों की तुलना में विदेशी भाषा शिक्षण की व्यापक पहुंच की कमी है, जो व्यावहारिक और रणनीतिक समृद्धि के लिए दूर होनी जरूरी है।

रणनीतिक साझेदारी में सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए हमारे रक्षा एकेडमियों में विदेशी भाषाओं को सिखाने की एक प्रशंसनीय व्यवस्था की गई है। हमारे यहां लगभग सभी रक्षा एकेडमी में विदेशी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं। फिर भी कुछ जगहों पर यह पूर्णरूपेण पाठ्यक्रम में शामिल न होकर आंशिक रूप से सिखाई जाती है। इसके पीछे का कारण विदेशी भाषा के प्रशिक्षकों की अनुपलब्धता या प्रशिक्षु के ऊपर अतिरिक्ति बोझ बताया जाता है। पहला कारण तो कुछ हद तक मान भी लिया जा सकता है लेकिन दूसरा कारण एकदम ठीक नहीं प्रतीत होता । लगता है उनके ऊपर दूसरे प्रमुख विषयों के पाठ्यक्रम का बहुत दबाव होता है, या बहुत हद तक शारीरिक प्रशिक्षण के कारण से वे अपने को बहुत थका महसूस करते हैं।

शारीरिक प्रशिक्षण को तो एकदम भी कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह यौवन की मर्यादा को सुरक्षित रखता है। जहां तक रही बात विषयों के पाठ्यक्रम की तो लगता है जैसे यहां मानविकी के पाठ्यक्रम में पूर्णरूप से बदलाव की जरूरत है। ऐसा इसलिए क्योंकि इतिहास, रक्षा विज्ञान, नीति शास्त्र जैसे विषयों को अलग-अलग व्यापक रूप से पढ़ाने से अच्छा होगा कि संस्कृति और सभ्यता नामक अलग विषय समेकित रूप से तैयार कर विशेष रूप से इन्हीं विदेशी भाषाओं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाएं और साथ-साथ उस विदेशी भाषा का सामान्य परिचय भी कराते जाए। संस्कृति और सभ्यता नामक यह पाठ्यक्रम प्रत्येक देश या कुछ देशों के समूह के लिए अलग-अलग तैयार कराए जाएं। इसको तैयार कराने के लिए स्मार्ट इंडिया हेक्टारथन-मानविकी नामक प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रयोग से बहुत से परिणाम सामने आ सकते हैं जिसको बाद में विद्यालय या विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जा सकता है।

इन एकेडिमियों में प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम कम से कम चार वर्षों का होता है। शुरू के दो वर्षों तक तो विदेशी भाषा को सामान्य रूप से पढ़ाया जाए, बाद के दो वर्षों में इसे विषय के रूप में न पढ़ाकर एक टूल के रूप में पढ़ाया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे मेजर और माइनर के रूप में निर्धारित भी किया गया है। इसे टूल के रूप में पढ़ाने से तात्पर्य है बेसिक साइंस के जो भी विषय हों (भौतिकी, रसायन, पर्यावरण, गणित, इंजीनियरिंग आदि) उनके प्रमुख शब्दों या वाक्यविन्यासों का विदेशी भाषाओं में सामान्य परिचय करवाना। इसके लिए दूरस्थ शिक्षा का क्लस्टर मॉडल का उपयोग किया जा सकता है। आखिरकार सिक्स्थ जेनेरेशन का वार एटामिक वार ना होकर साइबर, मेडिकल या इकोनॉमिक वार होना है। विश्व के लगभग सभी विकसित देशों की भाषाओं का सामान्य परिचय करना हमारे देश के इन सपूतों को जरूरी हो गया है जिससे कि हम अपनी भविष्य की पीढ़ी तैयार कर सकें और देश की संप्रभुता को अटल बना सकें।
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