नक्सलवाद के आगे समर्पण की मुद्रा में सरकार

(नक्सलवाद अपना सिर फिर से उठाने लगा है। इस बार वह संगठित रूप में अधिक शक्तिशाली होकर उभर रहा है, जब केन्द्र सरकार सहित राज्य सरकारें समर्पण की मुद्रा में हैं। इस खतरनाक स्थिति का विश्लेषण कर रहे हैं उमेश सिंह)

जिस समय भारत की संसद की पहली बैठक के साठ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दोनों में चर्चा चल रही थी, उसी समय दन्तेवाड़ा में स्थित नेशनल मिनरल डेवलपमेन्ट कार्पोरेशन के एक लौह अयस्क प्लान्ट में माओवादी नक्सलियों द्वारा घात लगाकर हमला किया गया। उस हमले में केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी आई एस एफ) छ : जवान और एक ड्राइवर मारे गये। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के हथियार और गोली-बारूद भी लूट ले गये। बताया जा रहा है कि नक्सली बैलाडीला पहाड़ियों की ओर से आये थे और किरनडुल पुलिस स्टेशन के समीप स्थित प्लान्ट में वादात को अंजाम देकर फिर उसी ओर भाग गये।

ऐसी घटनायें देश के विभिन्न भागों में पिछले कई वर्षों से हो रही हैं। लाख कोशिशों के बावजूद भी नासूर बन चुके नक्सलवाद को समाप्त करने में हमारे देश की सरकारें नाकाम साबित हो रही हैं। हम सड़क से लेकर संसद तक विश्व शक्ति बनने की बातें करते हैं। विदेशी शक्तियों से युद्ध की स्थिति में स्वयं को पूरी तरह सक्षम घोषित करते हैं, किन्तु देश की सीमा के भीतर ही बाहरी शत्रु से भी अधिक खतरनाक बन चुके माओवादी वामपंथी नक्सलियों का सफाया करने में हमारे सुरक्षा बलों को नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। कई बार ऐसी स्थिति अब तक बन चुकी है कि उनके सामने हम समर्पण की मुद्रा में होते हैं। यह देश के लिए बड़ी खतरनाक स्थिति है। आज देश के लगभग आधे भू-भाग पर उनके पदचिन्ह दिखाई देने लगे हैं। कई नये क्षेत्रों में विस्तार करने की उनकी योजना है। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने राज्यसभा में बताया है कि नक्सली अब कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में सक्रिय हो रहे हैं। नक्सलियों की कोशिश है कि केरल और कर्नाटक की सीमा पर अपना एक आधार केन्द्र बनाकर वे पश्चिमी घाट से पूर्वी घाट को जोड़ लें। यह योजना सफल हो जाने पर सुरक्षा बलों के लिए एक नयी गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जायेगी। एक तरफ नक्सली संगठित रूप से कार्रवाई करते हुए दबाव बनाये हुये हैं, जबकि दूसरी तरफ देश की केन्द्र व राज्य सरकारें एन सी टीसी जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी एकमत नहीं हो पा रही हैं और प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की कई दौर की बैठक के बाद भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पा रहा है।

पिछले दिनों मिली सफलता- वर्ष 2011 में सरकार को नक्सलविरोधी अभियान में उल्लेखनीय सफलता मिली थी। केन्द्र और राज्य सरकारों के संयुक्त अभियान की सफलता का यद्यपि समुचित प्रचार नहीं हो पाया। उस समय नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 223 से घटकर 182 हो गयी थी। इसके अलावा हिंसा की घटनाओं की संख्या में भी महत्वपूर्ण गिरावट हुई। जहॉ वर्ष 2010 में 2213 घटनाएं हुई थीं, वहीं वर्ष 2011 में केवल 1745 घटनाएं हुई। नक्सली हिंसा में मारे जाने वालों की संख्या वर्ष 2010 में 1005 के विरुद्ध वर्ष 2011 में केवल 606 रही। वर्ष 2010 में 285 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे, जो वर्ष 2011 में घटकर केवल 142 हो गयी थी। रेलवे पर वर्ष 2010 में 54 हमले हुए थे, जबकि वर्ष 2011 में मात्र 31 घटनाएं हुई।

सुरक्षा बलों द्वारा नक्सल नेतृत्व को भी भारी नुकसान पहुंचया गया। पोलित ब्यूरो के 16 सदस्यों में से दो-आजाद और किशन मारे गये, जबकि सात अन्य सदस्य पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए। केन्द्रीय समिति के भी 31 सदस्यों में से पांच मारे गए और 13 गिरफ्तार हुए। शीर्ष नेतृत्व के इतने सदस्यों का मारा जाना या गिरफ्तार होना नक्सलियों के लिए निश्चित ही बड़ा धक्का था। इस साल के मार्च महीने में सुरक्षा बलों ने एक बड़ा काम किया। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ क्षेत्र में, जिसका क्षेत्रफल लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर है, सुरक्षा बल के दस्तों ने एक अभियान चलाया। अपनी तरह का यह पहला अभियान था। उल्लेखनीय है कि अबूझमाड़ क्षेत्र को नक्सली अपना ‘मुक्त क्षेत्र’ कहते थे। इस क्षेत्र का कोई अधिकारिक मानचित्र भी नहीं है। पूरे क्षेत्र में न तो कोई सरकारी कार्यालय है, न कोई पुलिस थाना। वहां के निवासी नक्सलियों के भरोसे ही रहते थे। सुरक्षा बलों के उस क्षेत्र में पहुंचने पर नक्सली घबराकर उस क्षेत्र से भाग गये।

फिर बढ़ा नक्सलियों का हौसला – नक्सल विरोधी अभियान अच्छी तरह से चल ही रहा था कि ओडिसा में हुए घटनाक्रम से नक्सलियों के हौसले बुलन्द हो गये। 14 मार्च को इटली के दो नागरिकों का कन्धमाल जिले में अपहरण कर लिया गया। उसके दस दिन बाद ही 24 मार्च को बीजू जनता दल के विधायक झिन्न हिक्का का कोरापुट जिले से अपहरण हो गया। इन दोनों अवसरों पर ओडिसा और केन्द्र सरकार ने पहले ही दिन से कमजोरी दिखाया। नक्सलियों से सौदेबाजी होने लगी। अन्ततोगत्वा इटली के दोनों नागरिकों को छोड़ दिया गया कि वे विधान सभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे देंगे। ओडिसा की इन दोनों घटनाओं से सरकार ने कोई सबक सीखा हो या नहीं, किन्तु नक्सलियों ने अवश्य सीख लिया। उन्होंने यह देखा कि मांगों को मनवाने, अपने सहयोगियों को जेल से छुड़वाने और लगाये गये अभियोगों को खत्म करवाने का सबसे आसान उपाय किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का अपहरण करना है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए न अदालत में जाने की जरूरत है, न जेल तोड़ने की कोई आवश्यकता है और न ही सुरक्षा बलों से टक्कर लेने की। सरकार में लड़ने का दम खम नहीं है, वह बड़ी आसानी से झुक जाती है।

यही कारण है कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर पाल मेनन को 21 अप्रैल को अपहरण किया। सुकून की बात है कि छत्तीसगढ़ की डॉ. रमण सिंह की सरकार ने सुनियोजित तरी के से स्थिति का सामना किया और सही ढ़ंग से वार्ता आयोजित करके अपने अधिकारी को छुड़ा लिया …………. वस्तुत: जब अपहरण की कोई घटना होती है तो उससे निपटने के क्या नीति अपनायी जानी चाहिए, इसे केन्द्र सरकार ने अभी तक परिभाषित नहीं किया है। यह खेद की बात है कि आये दिन कोई न कोई घटना होने के बावजूद भी केन्द्र सरकार ने इस विषय पर कोई नीति निर्देश नहीं दिये हैं।
एक आश्चर्य की बात यह भी है कि नेशनल सेक्यूरिटी गार्ड्स (एन. एस. जी.) का प्रयोग अपहृत व्यक्तियों को बचाने के लिए अभी तक क्यों नहीं किया गया? दुर्भाग्य की बात है कि इसका केवल विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा में दुरुपयोग हो रहा है। राज्यों के अधिसूचना विभाग और केन्द्र के खुपिया ब्यूरो के पास इकट्ठा सूचनाओं का भी सही समय पर सही इस्तेमाल नहीं हो पाता है।

इन दिनों केन्द्र सरकार एनसीटीसी के गठन पर जोर दे रही है। इससे वह राज्यों के नक्सली केन्द्रों पर सीधे कार्रवाई कर सकेगी। किन्तु देश की सभी गैर कांग्रेसी सरकारें इसे शिरे से खारिज कर रही हैं। उनका मानना है कि इसके जरिये केन्द्र सरकार राज्य की कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप करेगी, जो देश के संघीय ढ़ांचे के लिए ठीक नहीं है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। किन्तु उहापोह की स्थिति में रहने से नक्सलियों के खिलाफ सही कार्रवाई नहीं हो पा रही है। यह एक प्रकार से सरकारकी समर्पण की मुद्रा है, जो देश के लिए बहुत ही खतरनाक है।

 

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