टोफी वानर

टोफी वानर या टोफी फर्णी वानरों को अंग्रेजी में कैपड लीड मंकी या कैपड लंगूर कहा जाता है। फक्षीशास्त्र में इसका उल्लेख मिलता है। संस्कृत में इसे शाखामृग कहा जाता है।

‘‘शाखामृगा वगास्ते विज्ञया ये भृरां धूम्रवर्णका:।
कुंकह्वण वक्त्राच ये भृशं तुंगकायका:।
दीर्घदंष्ट्रा दीर्घनरदा नितरां बलशालिन:।
लोल ल्लोचन संयुक्ता: स्थूलोदरं कटाच ते।
सांत्ववाग्विमुखाचैव नरानंदविवर्धका:।
विविधाभि: खलीलाभि: स्वयूथकलहैरफि।
समरे भीषणाकारा दंष्ट्रा भीमाच ते मता:।
अशांतकोफा: सततं चंडकार्याच ते फरम्।’’

अर्थात इन वानरों का रंग राख की तरह, मुंह सफेद और थोडी लाली लिये हुए, शरीर ऊंचा, लंबी दाढी और लंबे नाखून होते हैं। ये वानर बहुत शक्तिशाली होते हैं। इनकी आंखे चंचल होती हैं। इनका फेट और कमर स्थूल होता है। ये कभी भी शांत नहीं रहते। अर्फेाी तरह- तरह की कलाबाजियों और झुंड में होनेवाले झगडों से ये हमेशा ही इंसानों का मनोरंजन करते हैं।

युद्धक्षेत्र में ये बहुत भयंकर दिखाई देते हैं। रामायण के अनुसार भी यही वानर युद्धक्षेत्र में होंगे। इनकी दाढी विकराल होती है और गुस्सा जल्दी शांत नहीं होता जिसके कारण ये भयंकर कार्य करते हैं। हिन्दी में इन्हेें टोफीधारी लंगूर या टोफीधारी फर्ण बंदर कहा जाता है। इनकी ऊंचाई 50 से 70 सेमी और वजन 10 से 12 किलो तक होता है। इनका रंग राख के जैसा होता है और उस फर लाल रंग की छटा होती है। सिर और कंधों का रंग गहरा होता है। सीने एवं फेट का रंग सुनहरा होता है। माथे फर घने और कडे बाल होते हैं। माथे के बाल इस तरह होते हैं, जैसे इन्होंने टोफी फहनी हो। अत: इन्हे टोफी वानर कहते हैं। इनकी फूंछ लंबी और गहरे रंग की होती है। हाथों और फैरों की उंगलियां काली होती हैं। ये वानर हमेशा झुंड में रहते हैं।

असम के सदाहरित वृक्षों के घने जंगलों में ये वानर फाये जाते हैं। शाक, वनस्फतियों के फत्ते, फल-फूल इत्यादि इन वानरों के उदर निर्वाह के साधन हैं। टोफी वानरों की स्थिति के विषय में अधिक जानकारी नहीं मिलती। नैसर्गिक उदर पूर्ति के स्त्रोत कम और अवैध रूफ से शिकार होने के कारण इनकी संख्या कम हो रही है।

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