वास्तुशास्त्र घर का!

(उत्तरार्ध)
स्नानगृह
स्नानगृह के लिए सब से बढिया स्थान माने पूर्व दिशा, क्यों कि सबेरे स्नान करते समय सूर्यकिरणें बदनपर फैलना माने उनमें से अतिनील किरणें बदनपर तथा बाथरूम पर फैलना लाभदायक होता है। पूर्व दिशा के अतिरिक्त पूर्व से उत्तर होनेवाला हिस्सा विकल्प के रूप में ठीक होता है। स्नानगृह का निर्माण करते समय कुछ बातों पर विचार करना आवश्यक होता है। बाथरूम का द्वार पूर्व, उत्तर या ईशान्य दिशा में होना उचित होता है।

बाथरूम की ढलान ईशान्य या पूर्व की ओर हो और वहीं से आउटलेट का पाईप बढाया जाए। बाथरूम में गीझर, हीटर, पानी गरम करने का बंब, स्विच बोर्ड आदि उपकरण आग्नेय दिशा में हों। पानी की टोंटी तथा शॉवर का कनेक्शन पूर्व या उत्तर में हो, जिससे स्नान करते समय मुख का पूर्व दिशा में होना अधिक लाभदायक होता है। बाथरूम में से पानी का संचय उस कमरे की नैऋत्य में हो। साबुन, शांपू, वॉशिंग पाउडर, फिनेल, झाडू, ब्रश आदि चीजें वायव्य कोने में रखी जाएँ। बाथरूम में एक खिडकी होना निहायत जरूरी होता है। पश्चिम या नैऋत्य दिशा टाली जाए। पूर्व से उत्तर इस हिस्से को छोड अन्य किसी भी दिशा में बाथरूम न हो, अन्यता आर्थिक हानि अथवा रोकथाम करने में वह कारण बन सकती है। स्वास्थ्य के लिए भी वह हानिकारक होता है। सफाई, सुंदरता एवं प्रसन्नता की दृष्टि से बाथरूम की दीवारों में छत तक टाइल्स बिठाना हितकारक होता है

शौचालय

शौचालय के लिए सर्वोत्कृष्ट स्थान माने पश्चिम और वायव्य दिशा होती है, क्योंकि सूर्यप्रकाश में से अतितीव्र ताम्र किरणें कीटनाशक के रूप में, तो वायव्य का वायुतत्व दुर्गंधि को बहाले जाने की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गणित में जैसे शून्य का महत्त्व होता है, वैसे ही वास्तुशास्त्र में शौचालय का महत्त्व होता है। शौचालय की स्थापना यदि गलत दिशा में हुई, तो उसके बुरे परिणाम बहुत बडे पैमाने पर हानिकारक होते हैं। पूर्व ईशान्य अथवा उत्तर दिशा में होनेवाला शौचालय स्वास्थ्य के लिए शैक्षिक प्रगति पर तथा आर्थिक आय पर आघात करनेवाले साबित होते हैं, तो आग्नेय एवं नैऋत्य दिशा में होनेवाले शौचालय भारी मात्रा में आर्थिक हानि और साथ ही भात, दुर्घटना, तनावपूर्ण अवस्था निर्माण करते हैं।
शौचालयों की दृष्टि से निम्न बातों पर विचार होना जरूरी होता है-

शौचालय घर की जमीन के स्तर के कुछ नीचे हो।
शौचालय की जमीन की ढलान पूर्व सा उत्तर दिशा में हो।

शौचकूप में बैठने की रचना ऐसी हो, जिससे बैठने- वाले का मुख पूर्व या उत्तर दिशा में होगा।
पानी के नल की टौटी पूर्व या उत्तर में हो।
पश्चिम या नैऋत्य में खिडकी या व्हेंटिलेटर हो।

शौचालय का आउटलेट पश्चिम या वायव्य दिशा में हो। गढा बनाना हो, तो वह बहुत ही छोटा हो।
किसी भी हालत में शौचालय पूर्व, ईशान्य, उत्तर, आग्नेय, दक्षिण या नैऋत्य दिशा में न हो।
शौचालय की सफाई के हेतु इस्तेमाल किये जानेवाले ब्रश, फिनाईल आदि साहित्य वायव्य दिशा में हो।
शौचालय में बिठाई टाइम्स हल्के नीले अथवा भूरे रंग की हों।

वायव्य उत्तर ईशान्य
पश्चिम ब्रह्मतत्त्व पूर्व
नैऋत्य दक्षिण आग्नेय

ब्रह्मतत्त्व अथवा मध्यबिंदू

वास्तुशास्त्र की दृष्टि से वास्तु के मध्यभाग को ब्रह्मतत्त्व कहा जाता है। आम तौर पर फ्लॅट स्वरूप में होनेवाले घर, ये आकार मे कभी चतुष्कोणी या आयताकृति कुछ हिस्सा आगे, तो कुछ पीछे-उससे कट्स या ऑफसेटस् निर्माण होते हैं। ऐसी अवस्था में पहले घर का चित्र खींचकर उसे चतुष्कोण या आयताकृति में परिवर्तित किया जाए। और उसके अनुसार मध्यबिंदू निश्चित किया जाए। यह हुई भौमितिक पद्धति, तो वास्तुशास्त्र की दृष्टि से 81 पदमंडल संख्या के अनुसार मध्यभाग में से 9 पदों का जो हिस्सा बनता है, उसे ब्रह्मतत्त्व कहा जाता है। वैसे तो वास्तू की नाभि माने वह ‘ब्रह्मतत्त्व’ और वह पंचमहाभूतों में से आकाश तत्त्व का स्थान है यह हिस्सा पूरी तरह खुला होना चाहिए। यहाँ किसी भी प्रकारका भारी सामान, दीवार या भवन निर्माण में से खंभे या कॉलम न हों। फिर भी आजकल की भवन निर्माण शैली में संपूर्ण ब्रह्मतत्त्व पूण तया खुला मिलना सरासर असंभव दिखाई देता है, क्यों कि कुल निर्माण में से एक नवमांश हिस्सा खुला मिलना बडा ही कठिन माने हरएक घर में पाये जानेवाले आम वास्तुदोषों जैसा ही यह एक वास्तुदोष। अपने शरीर में से नाभि के ऊपर अगर दबाब डाला तो आदमी बेचैनी महसूस करता है। उसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वमेंसे वास्तुदोष के कारण वास्तू के वायुमंडल पर दबाब आकर वास्तुदोष निर्माण होता है।

खासकर ब्रह्मतत्त्व के स्थान में बाथरुम या शौचालय हरगिज न हो अथवा किसी बडे निर्माण प्रकल्प के अंतर्गत ब्रह्मतत्त्व में गढा और पानी न हो। यह बडे ही गंभीर प्रकार का वास्तुदोष होता है, जिससे वंशनाश, सर्वनाश अथवा वंशवृद्धि में बाधा निर्माण होती है। ब्रह्मस्थान में कभी निद्रा न ली जाए। ग्रामीण क्षेत्र में से गृहपद्धति के अंतर्गत बडीबडी हवेलियाँ मध्य में खुली और छत में खिडकी के रूप में-झरोखे जैसी रचना की हुई होती है, जिससे मध्यान्ह काल की सूर्यकिरणें सीधे घर के अंदर आती हों।

डायनिंग रूम :

भोजनकक्ष की (डायनिंग रूम की) रचना यह स्थापना वास्तू के वायव्य हिस्से में हो तथा भोजन करते समय मुँह पूर्व या उत्तर दिशा में हो। डायनिंग टेबल चतुष्कोणी अथवा आयताकृति ही हो।

अभ्यासिका :

अध्ययन करने का कमरा वायव्य दिशा में होना सर्वशा उचित होता है, अन्यथा किसी भी कमरे की नैऋत्य दिशा में बैठकर ईशान्य या पूर्व-उत्तर दिशाकी ओर मुख करके बैठना अत्यंत लाभदायक होता है। ईशान्य दिशावाले कमरे में उसी दीवार की ओर मुँह कर बैठना बहुत अच्छा होता है। अध्ययन करने का कमरा खुला एवं प्रसन्न वायुमंडल होनेवाला हो। अध्ययन करते समय सिर के ऊपर बीम या दीवार में से बाहर आई हुई अलमारियाँ न हों। वे हानिकारक होती हैं। सरस्वति यंत्र कां प्रयोग ईशान्य दिशा वास्तुदोष मुक्त हो या की जादा तो शैक्षणिक प्रगति संतोषजनक की जा सकती है।

कट्स :

आजकल भवन निर्माण में जानबूझकर भवन की सुंदरता को बढाने एलिव्हेशन के माध्यमद्वारा कट्स या ऑफसेट्स निर्माण होते हैं और उससे वास्तुदोष निर्माण होते हैं, जिसको तकलीफ वहाँ के निवासियों को जिंदगीभर होती रहती है। फिर भी भवन अगर चतुष्कोणीस अथवा आयताकृति-किसी बक्से जैसा निर्माण किया गया, तो उसमें किसी प्रकार की आकर्षकता नहीं होती। उससे ऐसी वास्तुओं को बेचना बिलुर्स या प्रवर्तकों को परेशान करनेवाला होता है, ऐसा माना जाता है।

जलस्थान :

हर एक वास्तू में भूमिगत एक और छत के ऊपर एक ऐसे दो जलकुंभ (टेकियाँ) होते हैं। उनमें से भूमिगत टंकी ईशान्य हिस्से में बन न सकी, तो पूर्व या उत्तर हिस्से में होना गैर नहीं, परंतू वह टंकी ईशान्य दिशाके अक्ष पर न हो, तो छतपर होनेवाली टंकी नैऋत्य दिशा में हो। फिरभी उस टंकी में से किसी भी हालत में पानी रिसनान चाहिए। वास्तु के अंदर के हिस्से में ईशान्य दिशा में पानी का संचय होना उचित होता है, परंतू उससे वहाँ का भार बढे नहीं, इसे देखना जरूरी होता है।

व्हरांडा और पोर्च :

ये दोनों स्थान पूर्व के उत्तर दिशा में होना काफी फायदेमंद होता है, जिसके द्वारा अधिकाधिक सूर्यप्रकाश वास्तूपर फैलता है और उसके कई लाभ वास्तुधारकों को संतोष देते हैं।

गैरजरूरी चीजों की कोठरी :

असल में रद्दी चीजों की कोठरी ही न हो, तो अच्छा। फिर भी कई बार दो पीढियों में से स्थित्यंतर की अवधि में पुराने-नये का मेल अथवा मेलजोल निभाते समय कुछ गैरजरुरी अथवा शायद कभी उपयोगी होनेवाली सामग्री पास रखना जरूरी होता है। गैरजरुरी-अतिरिक्त चीजें नैऋत्य या वायव्य दिशा में होना उचित होता है, फिर भी बंगले जैसे मकानों में मकान के नैऋत्य कोने में, पश्चिम और दक्षिण कंपाऊंड वॉल का उपयोग करते गैरजरूरी चीजों की कोठारी लंबाई-चौडाई में छोटी लेकिन मूल वास्तू की अपेक्षा ऊँचाई में कम, गैरजरूरी चीजें रखने बनवा ली जाए। इस कमरे का फर्श मूल मकान से ऊँचा हो और उसमें खिडकी वगैरह कुछ न हो। इस कमरे को बहुत कम बार खोला या बंद किया जाए। वह किसी को भी निवास करने सौंपा न जाए। इस प्रकार की गैरजरूरी चीजों की कोठरी सिर्फ नैऋत्य दिशा में ही हो, दूसरी किसी भी दिशा में वह न हो।

सीढी :

वास्तुशास्त्र नियमों के अनुसार सीढी के लिए उचित स्थान नैऋत्य दिशा और उसके बाद का विकल्प वायव्य दिशा। सीढी पूर्व से पश्चिम की ओर अथवा उत्तर से दक्षिण की ओर चढती जा रही होना आवश्यक होता है।

सीढी के नीच स्नानगृह, शौचालय अथवा किसी भी प्रकार का निवास योग्य कमरा न हो। सीढी मंडलाकार या वास्तू की प्रदक्षिणा करनेवाली न हो। सीढी की पैंडियों की संख्या सम हो, लेकिन 10,20,30 जैसे एकम् स्थान में शून्य होनेवाली न हों। कई जगह सीढी के पास ही लिफ्ट होती है। इसके माने यही, कि लिफ्ट नैऋत्य दिशा में रखी, तो गढा होने से बडी गंभीर मात्रा का वास्तुदोष निर्माण होता है। इसलिए वास्तुविशारदों से सलाह लेकर सीढी और लिफ्ट का मेल बनाना उचित होता है। सीढी अगर आग्नेय दिशा में हो, तो मामूली दुर्घटना, चोट-जख्म, झगडे-फिसाद होते हैं, तो ईशान्य दिशा में होनेवाली सीढीसे बडे पैमाने पर तकलीफ सहनी पडती है

पार्किंग :

पार्किंग के लिए सबसे बढिया जगह माने वास्तू में से वायव्य दिशा। दूसरे विकल्प के रूप में आग्नेय दिशा का स्वीकार हो सकता है। कहीं कहीं स्थान के अभाव से दुपहिया वहानों का पार्किंग ईशान्य दिशा में और बडे बहानों के लिए नैऋत्य दिशा का एक समझौते के रूप में स्वीकार किया जाता है। कुछ इमारतों के बेसमेंट में पार्किंग दिया जाता है। ऐसी जगहों पर भी समझौते के रूप में विकल्प के नाते ईशान्य का स्वीकार किया जा सकता है।

नौकरों के लिए निवासस्थान:

इसे बाँधने के लिए सबसे उचित स्थान माने वास्तू का आग्नेय हिस्सा तथा विकल्प के रूप में वायव्य दिशा भी ठीक।

ऑफिस और घर की रचना:

अपने निवासी मकान के साथ ही ऑफिस हो, तो तलमंजिल पर नैऋत्य हिस्से में ऑफिर- तथा ऊपरी मंजिर पर नैऋत्य दिशा में शयन कक्ष होना उचित होता है।

घर और कारखाना :

घर कौन कारखाना अगर एक ही अहाते में होंगे, तो नैऋत्य हिस्से में घर और आग्नेय एवं वायव्य हिस्से में कारखाना हो। संभव हो, तो नैऋत्य के उपलब्ध हिस्से में ऑफिस बनाया जा सकता है।

पेडों का स्थान:

घर के ईशान्य हिस्से में छोटे छोटे पौधे, तो नैऋत्य और उसके पश्चात् अग्निय एवं वायव्य हिस्से में बडे पेड लगाये जाएँ। घर के कंपाऊंड में केला, सहजन, जामुन, कटहल, नींबू तथा अन्य कँटीले पेड (गुलाब छोडकर), कॅक्टस और बोनसाय बिल्कुल न रोपे जाएँ।

सेप्टिक टँक :

सेप्टिक टँक के लिए उचित स्थान माने वायव्य दिशा। ईशान्य और नैऋत्य दिशा में हरगिज न हों।

तुलसी :

यह बहुउपयोगी वनस्पति वास्तू में बहुत ही आवश्यक है। इसके लिए विशेष रूप से आग्नेय दिशा उत्तम, परंतू और स्थानों में भी होना उचित।

तळघर :

तळघर माने वैराग्य का प्रतीक। संत महात्माओं ने ली हुई समाधि अथवा जमीन के नीचे मुस्लिम एवं ईसाई धर्म के अनुसार दफनयोग्य। वास्तुशास्त्र के अनुसार तळघर को मान्यता नहीं। फिर भी आधुनिक वास्तुपद्धति के अनुसार वह एक अविभाज्य हिस्सा बना हुआ है। उस हालत में ईशान्य हिस्से में पानी की भूमिगत टंकी के साथ तळघर एवं दुपहिया वहानों का पार्किंग होना ठीक होता है। मध्यममार्ग के रूप में आग्नेय एवं वायव्य विशिष्ट वास्तुदोष निवारण के साथ स्वीकारार्ह मानी जाती हैं। फिर भी नैऋत्य दिशा में तळघर होना यह संकट मालिकाओं के लिए निमंत्रण होने से टाला जाना उचित होता है। कई जगहों में कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में इस प्रकार के व्यापारी खानों में शुरू शुरू में कुछ व्यवसाय बनता है, लेकिन बाद में धीरे धीरे वह ठप्प होता है।

ऊपरी मंजिल एवं अटारी :

घर के ऊपरी हिस्से में अगर मंजिल बनानी हो, तो नैऋत्य हिस्सा में सर्वथा उचित होती है और उसके अतिरिक्त आग्नेय एवं वायव्य का दुय्यम स्थान। फिर भी ईशान्य में खुली टेरेस होना सबसे बढिया।

सोने की स्थिति:

सोते समय सिर दक्षिण की ओर तथा पाँव उत्तर की ओर होना अच्छा। केवल वयस्क व्यक्ति और छात्रों के लिए पूर्व में सिर और पश्चिम में पैर फैलाकर सोना सही होता है।

पालतू पशुओं का स्थान:

पालतू पशुओं को प्रधान वास्तू में निवास कराने स्थान देना उचित नहीं। उन्हें विशेष रूप से वायव्य दिशा में प्रबंध करा देना उचित एवं लाभदायक होता है।

तस्वीरें अथवा चित्र:

प्रसन्नता निर्माण करनेवाले चित्र वास्तू में लगाए जाएँ। हिंसा, क्रूरता, उदासी, बीभत्सता दर्शानेवाले चित्र बिल्कुल ही न हों। मूलत: दिशा, पंचमहाभूत तथा उनसे मेल खानेवाले रंग आदि तालमेल कर फोटो, चित्र लगाना उचित होता है।
वायव्य दिशा में राधाकृष्ण की पवित्र प्रीति का चित्र, माखनचोर नंदकिशोर माने बाळकृष्ण, नैऋत्य दिशा में शिवराज्याभिषेक, प्राकृतिक सौंदर्य तथा ईशान्य दिशा में बहता हुआ पानी ऐसे कई दूसरे छायाचित्र, चित्र वास्तुशास्त्रियों से परामर्श कर स्थापित करना बडा ही लाभदायक होता है।

रंगसंगती कैसी हो?:

वास्तू में दीवारों को रंगाते समय रंगसंगती इस प्रकार होना लाभदायक होता है। पूर्व और ईशान्य हरा अथवा पिस्ता रंग से संबंधित रंग छटाएँ उचित होती हैं, तो उत्तर और वायव्य भागों में सफेद, नीला, भूरा, जैसे रंग ठीक होते हैं, तो पश्चिम, नैऋत्य, दक्षिण और आग्नेय भागों में रतनारा, गुलाबी, बादामी, गेहुँआ आदि रंग लाभदायक होते हैं।

उपसंहार : वास्तुशास्त्र-आपके घरका इस विषय का ऊहापोह करते समय आवश्यक होनेवाली सभी बातों का निर्देश एवं आवश्य विश्लेषण यहां देणे का प्रयास किया है। आखिर यहाँ ‘उचित एवं शास्त्रसंगत क्या है’ इसीका ऊहापोह किया है। इसलिए इनमेंसे कितने बिंदू अपने अभी के निवासी-घर के साथ मेल खाते हैं, इसे जरा जाँचिए। उसीसीे अपने घर का वास्तुशास्त्र गुणांकन कीजिए। फिर भी कई बार अपने घर की रचना और यहाँ बताये हुए नियम इनके बीच जब असंगति दिखाइ देती है। तब ज्यादा न उलझते अपने संदेह हमारे ‘वास्तुशास्त्र एज्युकेशन अ‍ॅण्ड रिसर्च फाऊंडेशन’ के पास भेजिए। आपको उचित मार्गदर्शन करने के प्रयास जरूर किये जाएँगे। आखिर जाकर एक तथ्य का विशेष रूप से निर्देश करना जरूरी है, कि वास्तू मिलना यह प्रारब्ध योग होता है। परंतू वास्तू निर्माण अपने हाथों में है, जिसके द्वारा हम सुख-शांती-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

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