भोजपुरी फिल्मों की जय हो

भारतीय फिल्मों का सौंवा वर्ष चल रहा है। भारतीय फिल्म के जनक दादासाहेब फाल्के ने सिनेमा के उत्कर्ष के लिए अनेक परिश्रम भी किए। इस परिश्रम फल के रुप में राजा हरिश्चंद्र का निर्माण किया गया। हिन्दी फिल्मों के लंबे इतिहास के बाद भोजपुरी फिल्मों के प्रति भी रुझान  बढ़ा और धीरे- धीरे भोजपुरी फिल्मों ने कब अर्द्धशतक पूरा कर लिया, किसी को पता तक नहीं चला । हिन्दी सिनेमा की अब तक की विकास यात्रा में बहुभाषिक तथा बहुसांस्कृतिक क्षेत्र में प्रादेशिक फिल्मों ने अपना विशिष्ठ स्थान बनाया है। वर्तमान में मराठी फिल्मों का अच्छा-खासा व्यवसाय चल रहा है। मराठी फिल्में तेलुगु, तमिल, मलयालम की ही तरह चर्चित हो रही हैं, लेकिन इन सब विभिन्न भाषाओं की फिल्मों से कहीं ज्यादा भोजपुरी फिल्में सफलता के झंडे गाड़ रही है।

भोजपुरी फिल्मों के प्रति बढती रुचि के कारण इन फिल्मों के दर्शक लगातार बढ़ते जा रहे हैं। भोजपुरी फिल्मों को मिल रही सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाजा जा सकता है कि साल लगभग सौ भोजपुरी फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन जिस तरह फिल्मों की संख्या बढ़ी, क्या उसी तरह उनका स्तर भी बढा है,क्या, यह भी सोचा जाना जरुरी है। भोजपुरी फिल्मों की पचास वर्ष की अब तक की यात्रा में फिल्मों की संख्या पर ज्यादा ध्यान दिया गया, पर उसके स्तर में सुधार की ओर ज्यादा ध्यान न दिए जाने से भोजपुरी फिल्में सुशिक्षित दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकी, ऐसे में पचासवें वर्ष तक पहुंची भोजपुरी फिल्मों के निर्माताओं को कई विषयों पर विचार-विमर्श करना होगा। आने वाले समय में भोजपुरी फिल्मों के समक्ष आने वाली चुनौतियों पर चिंतन करना नितांत जरूरी है। हिन्दी फिल्मों की चमकदार दुनिया के बीच भोजपुरी फिल्मों को खड़ा करना आसान काम नहीं है।

जानकारों का दावा है कि भोजपुरी फिल्मी दुनिया का सृजन अचानक हुआ। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक बार जब िंंबहार के दौरे पर गए हुए थे, उस दौरान उन्होंने फिल्म निर्माण के बारे में स्थानीय लोगों को जानकारी दी। बिहार से मुंबई जाकर स्थानीय भाषा में फिल्म बनाने का साहस दिखाना सचमुच चुनौतीपूर्ण साबित होगा, इसलिए स्थानीय लोग अपनी भोजपुरी भाषा में अगर फिल्मों का निर्माण करेंगे तो उसको जनता का व्यापक समर्थन मिलेगा। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की इस उत्सुकता को देखकर बिंहारवासी काफी प्रसन्न हुए तथा फिल्म निर्माण में रूचि रखने वाले लोग एकत्रित हुए तथा उन्होंने सोचा कि अगर भोजपुरी में फिल्म बनी तो स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर के साथ- साथ भोजपुरी फिल्म निर्माण केंद्र के रुप में बिहार का नाम दर्ज हो जाएगा। इतना ही नहीं, बिहार से बाहर रहने वाले लोगों को भी भोजपुरी में कार्य का अवसर मिलेगा। फिल्म निर्माण में उतरने पर धन की भी आवश्यकता होगी, इस बारे में भी विचार करना जरुरी था। प्रादेशिक फिल्मों का बजट हिन्दी की तुलना में बहुत कम है, इसलिए प्रादेशिक फिल्मों के निर्माण में खर्च पर बहुत गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। भोजपुरी या किसी अन्य प्रादेशिक फिल्म की प्रिमियर पार्टी पर ज्यादा खर्च करना संभव नहीं है, इसलिए ऐसे खर्च को टालना ही उचित है। गंगा- मैया तोहे पियरी चढाइबै नामक पहली भोजपुरी फिल्म जब परदे पर आई तो बिंहारवासियों ने उसकी जबर्दस्त सराहना की। इस फिल्म के बाद बिहारवासियों का विश्वास भोजपुरी फिल्म निर्माण के प्रति बढा।

इसके बाद भोजपुरी फिल्म निर्माण का जो सिलसिला चला, वह आज भी जारी है। एक के एक करके कई सफल भोजपुरी फिल्में बनाने वाले लोगों ने दुगुनी गति से काम करना शुरु किया। बिहार के साथ- साथ उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की संभावनाओं को तलाशा जाने लगा। हिन्दी फिल्मों के बीच भोजपुरी फिल्मों के प्रति दर्शकों की बढ़ती रुचि से यह तस्वीर सामने आई कि धीरे-धीरे भोजपुरी फिल्मों का कारोबार बढ़ेगा, इसी आस में भोजपुरी फिल्मों के निर्माण के कार्य में तेजी लाई गई। भोजपुरी फिल्मों की ओर हिन्दी फिल्मों के अभिनेता सुजीत कुमार का ध्यान गया तो उनकी भोजपुरी फिल्म में काम करने की इच्छा हुई और एक दिन ऐसा आया, जब सुजीत कुमार की भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार के रुप में पहचान बन गई। राकेश पांडे ने हिन्दी फिल्म एक गांव की कहानी में अच्छा अभिनय करके सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराया था। फिल्म क्षेत्र में कब किसका भाग्य चमक जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता, कुछ समय तक कुणाल सिह सुपर स्टार रहा, उसके बाद भोजपुरी फिल्म में मुकेश तिवारी का युग शुरु हुआ। वर्तमान में मुकेश तिवारी भोजपुरी फिल्म क्षेत्र का सबसे बड़ा कलाकार है। भोजपुरी फिल्मों की नायिका के बारे में जहां तक सवाल है, इस बारे में भी भोजपुरी फिल्म निर्माताओं को काफी सोचना होगा। पद्मा खन्ना जैसी नायिका ने भी भोजपुरी फिल्मों में काम किया है।

फिल्म निर्माता विजय आनद ने पद्मा खन्ना पर रोमांटिक गीत फिल्मा कर तहलका ही मचा दिया था। राजश्र प्रोडेक्शन की फिल्म सौदागर में अमिताभ बच्चन की दूसरी नायिका बनने का मौका पद्मा सिन्हा को मिला। पद्मा खन्ना ने कई फिल्मों में जबर्दस्त अंग प्रदर्शन किया। गरीब फिल्म निर्माताओं के मिथुन चकवर्ती के रूप में पहचाने जाने वाले रवि किशन ने भी भोजपुरी फिल्मों में अच्छा नाम कमाया है। वर्तमान में भोजपुरी के चमकदार सितारों में दिनेश राय यादव, शेखर राय यादव, पवन सिंह का समावेश है तो भोजपुरी फिल्म की नायिकाओं में रिंकू घोष, रानी चटर्जी, पारवी हेगड़े का समावेश है। भोजपुरी फिल्मों से जुड़े कलाकारों का कहना है कि उन्हें भोजपुरी फिल्मोें में काम करने में काफी आनंद आ रहा है और दर्शकों की ओर से भी उन्हें जबर्दस्त सराहना मिल रही है। कुछ वर्ष पहले तक भोजपुरी फिल्मोें की हालत मराठी फिल्मों से कुछ अलग नहीं थी। भोजपुरी फिल्मों के प्रति दर्शकों का रुझान काफी कम था, पर ससुरा बड़ा पैसावाला फिल्म से भोजपुरी फिल्म निर्माण में नई चेतना आ गई।

इसके बाद बनी भोजपुरी फिल्मों ने तो रिकार्ड बना दिए। दर्शकों को पसंद आने वाले सभी निकर्षों पर बनी भोजपुरी फिल्मोें का निर्माण कर उसे जब सिनेमाघरों पर प्रदर्शित किया गया तो भोजपुरी भाषा की फिल्में देखने वाले सभी दर्शक प्रसन्न हो गए। सीमा सिंह नामक अभिनेत्री ने लगभग 150 फिल्मों में काम कर दर्शकों की वाहवाही लूटी। इस तरह अगर देखा जाए तो भोजपुरी फिल्मों में भी वह सब कुछ है, जो हिन्दी फिल्मों में है। भोजपुरी भाषा कुछ अलग तरह की लगती जरुर है, पर यह सबको मिलाकर चलने वाली भाषा है। एक भोजपुरी फिल्म के निर्माण में 75 हजार से दो लाख रुपए खर्च होते हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार की तरह अब मुंबई- पुणे में भी भोजपुरी फिल्मों का अच्छा खासा व्यवसाय जारी है, इस अधार पर अगर यह कहा जाए कि आने वाले समय में भोजपुरी फिल्म जगत एक बहुत बड़ी दुनिय बन जाएगी, तो इसे गलत नहीं कहा जाएगा।

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