‘ऊर्जावान युवक’ ही भारत को महाशक्ति बनाएगा

पिछले कुछ सालों से एक बात बड़ी तीव्रता से ध्यान में आ रही है कि स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस युवाओं की सहभागिता अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय उत्सव की छुट्टियां कहीं पिकनिक या घर में आराम करते हुए बिताते हैं, पर राष्ट्रध्वज को प्रणाम करने से दूर रहते हैं। भारत मेरा देश है। सभी भारतीय मेरे भाई-बहन हैं। मुझे अपने देश से प्यार है। अपने स्कूल के दिनों में हर रोज 10 वर्ष तक यह प्रतिज्ञा हम करते आए हैं। उस प्रतिज्ञा का विस्मरण युवकों को हो रहा है। प्रश्न स्मरण शक्ति का नहीं है, प्रश्न राष्ट्र के प्रति आत्मीयता का है, अभिमान का है। इस विषय पर युवकों से संवाद करने पर वे कहते हैं कि ‘ध्वजारोहण के लिए हम जाते नहीं, देश की स्वतंत्रता से हमें क्या मिला है? भ्रष्टाचार, बेरोजगारी,’ कोई कहता है कि ‘अरे हम नहीं गए तो क्या ध्वजारोहण नहीं होगा?’ कोई कहता है कि ‘अरे भाईयों भ्रष्ट आचरण करने वाले नेता हमें राष्ट्र भावना क्या होती है? यह सिखाते हैं, क्यों सुनें, हम उन्हें? इस प्रकार के अनेक उलझे हुए जबाव आज के युवाओं से मिलते हैं।
‘रंग दे बसंती’ जैसा सिनेमा देखकर या क्रिकेट में विश्वकप जितने पर उबालने वाला खून दूसरे ही दिन शांत हो जाता है, ऐसी स्थिति में युवाओं का बहाव कहां हो रहा है, उनके मन मस्तिष्क में क्या चल रहा है? इस बात का कोई ठिकाना नहीं होता?

भारत को युवाओं का देश माना जाता है। भारत में करीब 60 करोड़ युवा हैं, जो कि अमेरिका की कुल आबादी से दुगुनी है और यूरोपीय महाद्वीप की कुल आबादी के बराबर है। भारत देश के युवा हमारी बड़ी संपत्ति हैं, हमें यह याद रखना चाहिए कि रचनात्मक और सकारात्मक दिमाग का युवा वर्ग इस युग में बहुत शक्तिशाली साधन बन गया है। भारत में कुल जनसंख्या से 50 प्रतिशत से अधिक युवा 25 वर्ष की औसत आयु से कम उम्र के हैं और 15 वर्ष की आयु वाले युवा तो एक तिहाई हैं। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि आधे से ज्यादा युवाओं को आपात्काल मालूम नहीं है। पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 में हुए युद्ध मालूम नहीं। कुल जनसंख्या के एक तिहाई युवा लोगों की दृष्टि से इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग ऐतिहासिक विभूति हैं, क्योंकि इनके जन्म से पहले ही इन महानुभावों का निधन हो गया है, इतनी ही बात नहीं, बहुमत से चुनी हुई और पांच साल की एक पार्टी की सरकार का अनुभव भी उन्होंने लिया नहीं है। विगत 15-16 सालों से केंद्र के साथ कई राज्यों में एक-दूसरे के सहारे चली सरकारें ही काम कर रही हैं। इस प्रकार की स्थिति में खुद का सबलीकरण हो रहा है, इस तरह का विश्वास आज के युवाओं के मन में पैदा नहीं हो रहा है और जब तक युवा वर्ग अपने आप को इस देश में सक्षम नहीं मानते, तब तक बलशाली भारत, ‘इस घोषणा का कोई अर्थ नहीं निकलता।

हम युवा समर्थ, सशक्त और सक्षम हैं, दुनिया के विकसित देशों के युवाओं की तरह ही हमारा भी सबलीकरण हो रहा है, यह भावना भारत के युवा-वर्ग में पैदा होनी चाहिए। पिछले 10- 15 सालों में भारत के युवाओं में एक अहम परिवर्तन आया है, उनमें निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ है। करियर हो या जीवन साथी का चुनाव, पहनावा हो या भाषा, जीवन शैली हो या अपनी बात रखने का अंदाज, इन सभी में एक बेहद आकर्षक आत्मविश्वास के साथ भारतीय युवा चमक रहा है। आश्यर्चजनक रुप से उसके व्यक्तित्व में निखार आया है, उसमें जूनून और जोश की दमदार अभिव्यक्ति है। इस प्रकार का भारतीय युवा यानि ऊर्जा से भरपूर संसाधन, जो अपने सम्मान की अपेक्षा करता है, समाज से क्षणिक प्रतिष्ठा की मांग करता है और न्याय की जिद्द करता है तो उसे पाने के लिए संघर्ष के लिए उतरता है, ऐसे ही युवाओं की भीड़ जब सत्ता के हो रहे दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर- मंतर पर हुए अण्णा हजारे के अनशन के पीछे तेजी से उमड़ी थी, इसी युवा भीड़ ने सरकार को तुरंत घुटने टेंकने पर मजबूर किया था।

किसी भी आंदोलन की सफलता उसकी जय-पराजय से नहीं नापी जा सकती है, उस आंदोलन से उस देश के युवाओं में कौन सी प्रेरणा जगी है। युवाओं में किस तरह का परिवर्तन हुआ है, यह बात महत्वपूर्ण है। अब तक युवाओं को तथा आत्मकेंद्रित कहा जाता था, ऐसा माना जाता था कि युवा और सामाजिक विषय एक-दूसरे के साथ चल ही नहीं सकते। लेकिन युवा शक्ति के सहयोग के आधार पर इस आंदोलन ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को भी सबक दिया है, जो समीक्षक युवाओं और उनके सहयोग की आलोचना करते नहीं थकते थे, वे अब उनकी शान में बोलते नजर आ रहे हैं। कुछ तो यहां तक कहने लगे हैं कि युवा पहले भी जागृत था, आज भी है, लेकिन उन्हें साफ-सुथरी छवि वाला नेतृत्व नहीं दिखाई दे रहा है। मगर, यह सिक्के का एक पहलु है, इसके दूसरे हिस्से में जिंदगी की समस्याओं से परेशान युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज आज अपने देश में खड़ी दिखाई दे रही है, यही समस्याग्रस्त युवाओं की फौज जंतर-मंतर के आंदोलन में शामिल हुई थी। पल-पल की अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को देखते हुए, महसूस करते हुए या खुद अनुभव लेते हुए, आज के युवा पीढ़ी का मतिष्क खौल उठता है। सही जगह पर उनका आक्रोश व्यक्त नहीं हो पाता है। फलस्वरुप यह कहां और किसी अन्य रूप में निकलता है। आज भारत में करीब 67 प्रतिशत बेरोजगार युवा हैं। सरकारी दफ्तरों और मल्टीनेशनल कंपनियों में उनके लिए रोजगार नहीं है। युवाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। आज भी बहुत सारे युवक-युवतियां हैं, जो सिर्फ दसवीं तक ही पढ़ पाते हैं। कॉलेज की शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं। सवाल यह है कि इन युवाओं के सामने विकल्प क्या हैं?

आज का युवा क्रूर बाजारवाद का शिकार हो रहा है। देश की मीडिया का ध्यान भी युवा की ओर ही ज्यादा लगा हुआ है। चाहे कॉस्मेटिक हो या मोटरबाईक्स, महंगी जिंस, मोबाइल के दिनों-दिन आने वाले मंहगे मॉडेल आज यह सब फैशन कम और जरुरत ज्यादा बन गई है। यहां तक कि विज्ञापनों में सामान्य जरुरतों को भी आकर्षक रुप-रंग में ढाल कर इस तरह पेश किया जा रहा है, मानो उस उत्पाद को खरीदे बगैर जीवन ही बेकार है,अधूरा है और ऐसे उपभोक्तावाद की ओर युवा वर्ग के बढ़ते रुझान के दुष्परिणाम भी आज सामने आने लगे हैं। आसानी से पैसे कमाने की गलत राह पर आज का युवा वर्ग दिखाई दे रहा है। पिछले दिनों तिहाड़ जेल के कुछ आकड़े जारी किए गए। इस समय वहां भी सबसे ज्यादा युवा कैदी की सजा काट रहे हैं, जिसमें युवक और युव तियां दोनों ही हैं। आज का भारतीय युवा दो वर्गों में बंटा हुआ है। एक तरफ कुछ कर गुजरने का असीम जोश है तो दूसरी तरफ स्वच्छंदता और उच्छंखलता को ही आजादी मानने वाला युवा है। असली आजादी की परिभाषा ‘मर्यादा’ है, न कि सिर्फ डिस्को कल्ब में अपना समय गुजारना और सेक्स तथा हिंसा को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बनाना किसी भी काल में आजादी नहीं समझी जाती है। यह बात रही भारत के शहर से जुड़ी पर यह भी एक सुखद तथा तथ्य सामने आ रहा है कि गांव का युवा अब सूचना और संचार जैसे क्षेत्र में सहज पकड़ हासिल कर रहा है।

अब अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर गांव के युवकों ने बरसों से उनमें पनप रही हीन भावना और संकोच पर विजय हासिल कर ली है। प्रतियोगी परीक्षा से लेकर चिकित्सा, इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का परचम लहराया है। आज शहर का युवा जहां उपभोक्तावादी, बेरोजगार, अपराध, व्यसनाधीनता जैसी गलत बातों का शिकार हो रहा है, वहीं अधिकांश ग्रामीण युवाओं ने अपने लक्ष्य पर निगाह टिका रखी है, ऐसे युवकों की रचनात्मक शक्ति को सही नजरिए से पहचानना जरुरी है, ताकि ऐसी रचनात्मक सोच रखने वाला युवा भारत की ऊंची उड़ान में शामिल हो सके। शिक्षा, रोजगार, आर्थिक सबलीकरण, युवा विकास नीति सिर्फ मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता समेत अन्य कई राज्यों की राजधानी से बाहर निकल कर छोटे शहर, गांव- गांव तक पहुंचनी चाहिए। एक बार विकास की लहर देश के हर क्षेत्र तक पहुंची तो युवाओं में विश्वास जगेगा। भारत का सपना है कि हम 2020 तक एक विकसित देश बन जाए। हमारे लिए एक विकसित देश होने के मायने क्या हैं? जिसमें देश के सभी नागरिकों के साथ- साथ युवा वर्ग भी गरीबी रेखा से ऊपर का जीवन बसर करें, उन्हें मिलने वाली शिक्षा,स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर ऊंचा हो और एक राष्ट्र के रूप में हम पूरी तरह सुरक्षित बने रहें।

भ्रष्ट राजनैतिक, सामाजिक नेतृत्व के कारण सभी क्षेत्र में असुरक्षित अवकाश से अस्वस्थ युवा मन एक तरफ है, तो दूसरी ओर सबसे ज्यादा युवा संख्या भारत में निवास करती है। आने वाला समय इन युवाओं का ही होगा, उन्हें अपने सपने पूरे करने के साथ- साथ शक्तिशाली भारत निर्माण में जुटाना होगा, उनके ऊपर देश के नव-निर्माण की भारी जिम्मेदारी है। हमें इस बात की गांठ बांधनी होगी कि जब देश शक्तिशाली बनता है तो न केवल दुनिया में उस देश की कद्र बढ़ती है, बल्कि उसके निवासियों का रूतबा भी बढ़ता है। हमें इस तथ्य को ध्यान में रखकर अगले संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। 2003 में भारत में एक नेशनल यूथ पॉलिसी (भारतीय युवा नीति) बनाई गई थी, जिसमें तीन लाख गांवों में यूथ क्लब बनाने की घोषणा की गई थी, इन क्लबों के जरिए डेढ़ करोड़ युवाओं को कृषि और सर्विस सेक्टर से जोड़ने का दावा किया था। अब तक 9 वर्ष बीत गए हैं, युवाओं के सामने की समस्याएं जस की तस हैं। जरुरत है बदलते आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को ध्यान में रखकर नए सिरे से युवाओं के लिए योजनाएं बनाने की, जो युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा दे सकें, क्योंकि रोजमर्रा की दर्द भरी जिंदगी से परेशान और चिंतित युवा नहीं, बल्कि ‘ऊर्जावान युवक’ ही भारत को ‘महाशक्ति’ बना सकते हैंं। भारत देश का युवा वर्ग नकारात्मक दृष्टिकोण से, विचारों से बाहर आकर अपने आप को इस भारत देश में सक्षम महसूस करने लगेगा, तभी बलशाली भारत की घोषणा को अर्थ आएगा। भारत के युवाओं और देश को इस आदर्श स्थिति तक ले जाने की यह जिम्मेदारी सिर्फ नेताओं पर छोड़कर काम नहीं बनेगा। समाज के सभी वर्ग के सामूहिक सकारात्मक योगदान से ही सपना सच हो सकता है।
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