चीन के शह की काट भारत

भारत और चीन के बीच तनाव की स्थिति निरंतर बढ़ती जा रही है। लद्दाख की ओर की सीमाओं का तय न होना दोनों देशों के विवाद का मुख्य कारण है। 2014 के पूर्व तक भारत की ओर से इस जनविहीन भूमि की ओर अधिक ध्यान न देने के कारण चीन ने धीरे-धीरे इस ओर से भारत की जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। परंतु केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से इस भूमि के सामरिक महत्व पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाने लगा। भारत ने इस क्षेत्र में सड़क और पुलों का निर्माण कार्य शुरू किया जिसके कारण भारतीय सेना का भारत-चीन सीमा तक पहुंचना अधिक सरल हो गया। भारत-चीन सीमा पर चीन की सामरिक गतिविधियां तेज होने का मुख्य कारण यही है।

भारत और चीन के बीच युद्ध होगा या नहीं यह तो कुछ दिनों में पता चल ही जाएगा, परंतु इस समय चीन और भारत के सामर्थ्य की तुलना जिस तरह चीन के द्वारा की जा रही है और जिस तरह चीन खुद को मासूम सा दिखा कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिमा को पाक-साफ दिखाने की कोशिश कर रहा है उसके पीछे का कारण और षड्यंत्र दोनों ही समझने की आवश्यकता है। चीन अपने आधिकारिक अखबारों और मीडिया के द्वारा यह संदेश देता है कि वह दूसरे देशों पर कब्जा नहीं करना चाहता बल्कि भारत उसकी सीमा में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है। जबकि सारा विश्व चीन के विस्तारवादी और कूटनीतिक स्वभाव से अवगत है। वह अपने व्यापार और सूचना तंत्र का उपयोग करके सम्पूर्ण विश्व की बड़ी-बड़ी हस्तियों जिसमें कई देशों प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति और उद्योगपति शामिल हैं, का डाटा इकट्ठा करने का काम कर रहा है। जिससे समय आने पर वह इनके विरुद्ध सभी आवश्यक कार्रवाई कर सके। जैसे ही भारत में उसके इस प्रयास की जानकारी सूचना मंत्रालय को आधिकारिक तौर पर मिली भारत सरकार ने उसके लगभग दो सौ एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके कारण चीन का व्यावसायिक नुकसान तो हुआ ही भारतीय लोगों का डेटा प्राप्त कर जो वह जासूसी कर रहा था उस पर भी प्रतिबंध लग गया।
दुनिया भर में कोरोना वायरस को फैलाने के कारण वैसे ही चीन बदनाम हो चुका है। वो चाहे जितना मना कर लें परंतु इस मामले में कोई भी देश उसके साथ सहानुभूति दिखाने के पक्ष में नहीं है। विश्व की कई बड़ी कंपनियां चीन से अपना व्यवसाय निकालने की तैयारी में है। उसके कई सारे एप्स को जाजूसी करने के संदेह के आधार पर प्रतिबंधित किया जा रहा है।

पाकिस्तान और नेपाल की आड़ लेकर वह जिस प्रकार भारत के विरुद्ध मोर्चा बांधने की कोशिश में था, उसे भी भारत की कूटनीति ने कुछ समय के लिए तो विफल कर ही दिया है। शी जिनपिंग के विरोध में चीन में वहां की जनता के स्वर मुखर होने लगे हैं। हालांकि वे स्वयं को आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर चुके हैं और वहां के लोग सत्ता की दमनकारी नीतियों से परिचित हैं परंतु फिर भी विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। चीन की परिस्थिति एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई की तरह हो गई है। ऐसे में अंतरकलह से बचने के लिए और अपने खोखलेपन को छुपाने के लिए उसे बाहरी मोर्चे पर अपनी मजबूती दिखना आवश्यक है, जो कि वह भारत-चीन सीमा पर आए दिन खुराफातें कर दिखाने की कोशिश कर रहा है।

चीन अपने इस दिखावे के बीच एक बात भूल रहा है कि अब भारत में वह सरकार नहीं रही जिसने पंचशील समझौते का उल्लंघन करने के बावजूद भी लद्दाख तक घुस आने की छूट दे दी थी। वर्तमान केंद्रीय सरकार का दृष्टिकोण सीमा विस्तार या बिना वजह पड़ौसियों को परेशान करने का भले न हो परंतु अपनी सीमा का उल्लंघन करने वालों को उनकी अपेक्षा से अधिक करारा जवाब देने का जरूर है। अहमदाबाद में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ झूले पर बैठने वाले शी जिन पिंग को यह कतई नहीं समझना चाहिए कि आवभगत के चक्कर में प्रधानमंत्री अपनी थाली उसे ले जाने देंगे।

भारत ने कभी भी युद्ध नहीं चाहा। वह हमेशा ही एक अंतिम विकल्प रहा है। गलवान में हुए हमले के बाद अभी तक भारतीय तथा चीनी सेना तथा विदेश मंत्रालयों के अधिकारियों की कई बार बैठकें हुईं। भारत के रक्षा मंत्री के साथ भी बैठक हुई। इनमें भी दोनों देशों के बीच पांच सूत्रों पर अमल करने का प्रस्ताव मान्य हुआ है। परंतु इसके बाद भी चीन के द्वारा सीमा पर सैनिकी कार्रवाइयां रुक नहीं रही हैं। वह भारत की सीमा के अंदर घुस आया था, उसे इन बैठकों के माध्यम से वापस जाने के लिए कहा गया, परंतु अभी भी वह उन्हीं स्थानों पर डटा हुआ है। एक तरह से उसने भारतीय स्थानों पर कब्जा कर रखा है। अत: इस बार भारत के लिए सैन्य कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। तीनों सेना के प्रमुख पहले ही भारत सरकार को अपने पूरी तरह से तैयार होने का विश्वास दिला चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन की तुलना में भारत की स्थिति बहुत मजबूत है। युद्ध की परिस्थिति निर्माण हुई तो भी अन्य राष्ट्र या तो चीन को समझाने की कोशिश करेंगे या फिर भारत का साथ देने के लिए खड़े होंगे।

जहां तक सेना की तैयारी का प्रश्न है, भारतीय सेना किसी मामले में चीन से पीछे नहीं है। भारत सरकार ने विगत छ: वर्षों में अपनी सेना को मजबूत करने के लिए सारी कोशिशें की हैं। चाहे वह हथियारों के मामले में हो या रसद पूर्ति के मामले में। और अब तो पुलों और सड़कों के निर्माण के कारण आवागमन भी आसान हो गया है। सेना को आवश्यक हर वस्तु की आपूर्ति बिना किसी परेशानी के की जा सकती है। परंतु इस युद्ध से दोनों ही देशों और साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व को हानि ही होगी। कोरोना के कारण वैसे ही पूरी दुनिया थम सी गई थी। ऐसे समय में युद्ध की परिस्थतियां और अधिक तनाव उत्पन्न करेंगी। अब यह भविष्य ही तय करेगा कि चीन अपने स्वभाव के विरुद्ध जाकर पीछे हटता है या सम्पूर्ण विश्व को युद्ध की आग में झोंक देता है।
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This Post Has One Comment

  1. Brahma singh Mavi

    We are proud of our PM and have great faith in him. He would always give suitable reply to China and Pakistan. These both countries will not dare to fight with Bharat.

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