वैद्य पाटणकर आयुर्वेदिक काढा और सेवाभावी कार्य

 अपने पड़दादा वैद्य गंगाराम पाटणकर द्वारा 110 वर्ष पूर्व तैयार किये गये आयुर्वेदिक वैद्य पाटणकर काढ़ा की जतन करते-करते नाती अभिमन्यु पाटणकर भविष्य में ‘वैद्य पाटणकर टैबलेट’ के निर्माण में व्यस्त हैं। इसके साथ ही पाटणकर परिवार की समाजसेवा की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए ‘पाटणकर फार्मेसी’ के माध्यम से ‘वैद्य पाटणकर पुनर्वसन केन्द्र’ की स्थापना करने का उनका विचार है।

अपने यहाँ एक कहावत प्रचलित है, ‘सौ रोगों की एक दवा, वैद्य पाटणकर काढा।’ यह कहावत केवल कहने के लिए ही नहीं है, बल्कि यह काढ़ा सचमुच में अनेक प्रकार की व्याधियों को हर लेता है। यही कारण है कि लगभग एक शताब्दी से यह काढ़ा आयुर्वेदिक औषधि के रूप में घर-घर में उपयोग किया जाता है। इसके प्रयोग के लिए न किसी वैद्य के नुस्खे की जरूरत होती है और न खरीदने के लिए किसी पर्चे की।

वैद्य पाटणकर काढ़ा का इतिहास- आज से लगभग 113 वर्ष पूर्व सन् 1899 में कोंकण के सिन्धुदुर्ग से गंगाराम पाटणकर मुंबई आये। आयुर्वेद के माध्यम से लोगों की सेवा करना उनका लक्ष्य था। आज संता की चाल के नाम से मशहूर तत्कालीन वासुदेव बलवंत चाल में उन्होंने ‘पाटणकर आयुर्वेदिक काढ़ा’ का निर्माण शुरू किया। उस समय उनके कपड़ा मिल के कर्मचारी भाई वैद्य शिवराम कृष्णाजी पाटणकर उनके साथ ही थे। धीरे-धीरे अपने गुणकारी प्रभाव के कारण पाटणकर काढ़ा की प्रसिद्धि और बिक्री बढ़ने लगी। मुंबई के धनी पारसी समाज के लोग चांदी के रथ पर बैठकर संता की चाल में काढ़ा लेने के लिए आते थे। वैद्य गंगाराम पाटणकर के निधन के उपरान्त वैद्य शिवराम पाटणकर के ऊपर इसकी जिम्मेदारी आ गयी। उन्होंने जल्दी ही ‘वैद्य पाटणकर आयुर्वेदिक दवाखाना’ की शुरूआत की।

वर्ष 1950 में वैद्य शिवराम पाटणकर के पुत्र भाऊसाहेब पाटणकर ने काढ़े के उत्पादन, प्रचार और बिक्री का दायित्व सम्हाला। उन्होंने उस समय पाटणकर काढ़े के 30 प्रकार के उत्पाद बाजार में उतारा। 1984 में उनका देहावसान हो गया। इससे पूर्व 1982 में 24 वर्षीय उनके पुत्र विलास पाटणकर ने कार्य को अपने कंधे पर उठाया। यह तीसरी पीढ़ी थी। उनके समय तक काढ़ों की संख्या बढ़कर 75 तक पहुॅच गयी। उसकी ख्याति व बिक्री गोवा सहित महाराष्ट्र के 35 जिलों में होने गयी। महाराष्ट्र से बाहर गुजरात आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, प. बंगाल, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह तक बिक्री होने लगी। विदेशों में दक्षिण अफ्रीका, दुबई तक निर्यात किया जाने लगा।

वर्तमान स्थिति- इस समय वैद्य पाटणकर काढ़ा का प्रचार-प्रसार बड़े पैमाने पर होने लगा है। इसके व्यवसाय में अब चौथी पीढ़ी लगी है। अभिमन्यु पाटणकर ने कार्य अच्छी तरह से शुरू कर दिया है। उन्होंने बैचलर आफ आयुर्वेदिक मेडिसीन एण्ड सर्जरी (बी ए एम एस) की डिग्री प्राप्त की है। उनकी इच्छा जर्मनी में जाकर मास्टर आफ डाग्नोसिस (एम.डी.) डिग्री पूरी करने की है। इनका उद्देश्य भी अपने पड़दादा की तरह आयुर्वेद और पंचकर्म द्वारा गरीबों और असहायों की सेवा करना है। आयुर्वेद काढ़ा के क्षेत्र में होने वाली स्पर्धा को ध्यान में रखकर नये-नये अनुसंधान इनकी देख-रेख में किये जा रहे हैं। अभिमन्यु पाटणकर के नेतृत्व में वैद्य पाटणकर काढ़ा के अगले स्वरूप टैबलेट (गोली) का उत्पादन शुरू हो गया है। बेटी यशस्विनी इस समय कम्पनी में सहायक केमिस्ट के पद पर कार्यरत है। आगे चलकर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) का दायित्व सम्हालने की उनकी इच्छा है।

अन्न और औषधि प्रशासन विभाग के गुड मैन्यूफैक्चरिंग प्रैक्टिस के अन्तर्गत वैद्य पाटणकर आयुर्वेदिक काढ़ा का उत्पादन हो रहा है। इनका उद्देश्य आगेचलर ‘आई एस ओ-1000’ प्राप्त करने का है।

सेवाभावी यशस्वी कार्य- शुरू से पाटणकर परिवार सेवा भाव से गरीब और असहाय लोगों को उपचार में सहायता करता रहा है। जैसे-जैसे वैद्य पाटणकर काढ़ा का व्यवसाय बढ़ता गया, पाटणकर परिवार की समाजसेवा में भी वृद्धि होती गयी। समाज सेवा में किसी प्रकार के यश की कामना न करते हुए इस परिवार ने जिन लोगों की आर्थिक एवं मानसिक सहायता की है, वे आज भी उनके आभारी हैं। वैद्य पाटणकर की ख्याति गरीबों की सहायता करने वाले उद्यमी के रूप् में फैली हैं। अनेक गरीब बच्चों की आर्थिक मदद, व्यसनमुक्ति केन्द्र, वृद्धाश्रम, अनाथश्रम, व्यामशाला की सहायता, मतिमंद और विकलांग लोगों के पुनर्वसन में योगदान, वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण हेतु लाखों रुपये की सहायता उनके द्वारा हमेशा की जाती रहती है।

समाज में ऐसे अनेक लोग इनका गुणगान करते रहते हैं, जिनकी गाढ़े समय में वैद्य पाटणकर ने सहायता की है। इनके सेवा कार्य को बताते हुए गुरूनाथ शिरोडकर कहते हैं कि कुछ वर्ष पूर्व उनका सोने का कारोबार डूब गया। मानसिक तनाव के कारण वे व्यसनी हो गये। ऐसे समय में पाटणकर की सहायता से उनकी बेटी का आई टी इंजीनियर बनने का स्वप्न साकार हो गया। उनका बेटा ऋतुराज शिरोडकर मल्लखम्भ में उनकी सहायता से ही विजेता बन सका। इसी तरह चिपलुन के रूपेश राजाराम पाष्टे, दसवीं में 91% अंक पाने के बावजूद आर्थिक तंगी के कारण आगे नहीं पढ़ सकते थे। वैद्य पाटणकर की सहायता वह आगे की पढ़ाई जारी रख सके और आज इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के विद्यार्थी हैं। वैभव वेद पाठक विल्सन कालेज से बी.एससी अच्छे अंकों से पूरा करके अब जेवियर्स कालेज से माइक्रोबायोलाजी से पोस्ट ग्रैज्यूएशन कर रहे हैं। महंगी शिक्षा होने के कारण वे आगे नही पढ़ सकते थे। वैद्य पाटणकर की मदद मिली तो आज पढ़ रहे हैं।

किसे सहायता चाहिए, ऐसा पूछकर कोई मदद करने वाला आगे आता है, तो सबको आश्चर्य होता है। एक अखबार में पढ़कर शारीरिक सौष्ठव खिलाड़ी हर्षद से स्वयं सम्पर्क करके उसकी सहायता वैद्य पाटणकर ने की। उनकी स्पर्धा की तैयारी का पूरा खर्च पाटणकर ही उठाते हैं। वर्ली सी फेस पर रेखाचित्र बनाकर अपनी जीविका चलाने वाले अपंग दीपक जाधव की भेंट वैद्य पाटणकर से हुयी। दयालु पाटणकर ने उनकी कला की कद्र करते हुए उनकी सहायता की। आज दीपक के साथ पचासों अपंग बच्चे मुफ्त में एनीमेशन और ग्राफिक डिजाइनिंग की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उनके लिए पाटणकर ने ‘अपंग निवारण केन्द्र’ की स्थापना की है। उनके लिए अच्छी तकनीक से सम्पन्न कम्प्यूटर की व्यवस्था भी की है। उनकी सहायता से आज अनेक मूक-बधिर, किन्तु सृजनशील व्यक्ति अनेक कम्पनियों में नौकरी कर रहे हैं।

वैद्य पाटणकर आयुर्वेदिक काढ़ा द्वारा सेवा भावी कार्यों को सम्हालने में विलास पाटणकर को अपनी पत्नी सुलक्षणा (सुधा) पाटणकर का भरपूर सहयोग मिलता है। अपने परिवार की पारम्परिक सेवावृत्ति और असहायों की सहायता के संस्कार उन्होंने अपने बच्चों को भी दिये हैं। सुधा पाटणकर गृहलक्ष्मी और यशस्वी उद्योगपति दोनों भूमिकाओं को सम्हालते हुए अपने पति के सेवाकार्यों में भी हाथ बंटाती रहती हैं।

आज वैज्ञानिक शोध कार्यों द्वारा अनेक वैद्यकीय औषधोपचार आयुर्वेद के पर्याय के रूप में उपलब्ध हैं। फिर भी आयुर्वेद का महत्व सर्वोपरि बना रहेगा, क्योंकि इसका कोई, ‘साइड इफेक्ट’ नहीं होता है। आयुर्वेद की परम्परा चिरकाल तक बनी रहेगी, यद्यपि वनौषधियां धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। कम मात्रा में मिलने और अधिक उपयोगी होने के कारण वनौषधियों की मांग बढ़ती जा रही है। इसलिए इन वनौषधियों को स्वयं उत्पादन करने का निश्चय सुधाताई पाटणकर ने किया है। उनका उद्देश्य लोगों को अच्छी किन्तु अच्छी औषधि उपलब्ध कराना है। सौ साल से अधिक समय से चिकित्सा के साथ सेवा कार्य की पाटणकर परिवार की परम्परा आज भी अच्छी तरह चल रही है।

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