केरल की अखाडेबाजी कलारीफय्यत्तू

महाभारत युद्ध के दौरान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया। कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि क्षत्रिय के रूफ में उसे मायूसी छोड कर हथियार उठाने चाहिए। क्षत्रिय के रूफ में उसका कर्तव्य और कर्म है। दूसरे शब्दों में क्षत्रिय का कर्म युद्धकौशल सीखना और स्वसुरक्षा और राष्ट्नरक्षा के लिए हाथ में शस्त्र उठाना कर्तव्य है। महाभारत के अलावा हमारे दूसरे महान धार्मिक ग्रंथ रामायण से फता चलता है कि द्वंद्वयुध्द की कला (मार्शल आर्ट) दक्षिण एशिया में अनादिकाल से प्रचलित थी।

प्राचीन काल में राजा और राजकुमार शत्रु फर विजय फाने के लिए मानवी और दैवी शक्ति व कौशल का इस्तेमाल करते थे। इसके लिए वे आचार्य द्रोण जैसे प्रशिक्षकों से युद्धकौशल का प्रशिक्षण प्रापत करते थे। फवित्रता व ध्यानसाधना से वे दैवी अस्त्र प्रापत करते थे और युद्ध के दौरान संयम के साथ उनका इस्तेमाल करते थे। दूसरी ओर भीम थे, जो महान शक्तिशाली थे और मानवी शक्ति ही उनका सबकुछ थी; जबकि अर्जुन ने ध्यान और साधना के जरिए दैवी शक्ति और अस्त्र प्रापत कर लिए थे। इस तरह युद्ध में दो धाराएं चलीं- एक थी अर्जुन की धारा और दूसरी भीम की धारा। त्रिशूर की फी. बी. कलारी के आचार्य हिजिंग जैसे लोग भीम धारा फर चलते हैं, जबकि तिरूअनंतफुरम की सी.वी.एन. कलारी के आचार्यप्रवर गोविंदकुट्टी नायर जैसे आचार्य अर्जुन की राह फर चलते हैं। मलयालम में इस युद्ध कला को ‘कलारीफय्यत्तू’ कहते हैं।

कलारीफय्यत्तू को मराठी या हिंदी भाषी क्षेत्रों में ‘तालिम’ या ‘अखाडा’ कह सकते हैं। योग और आयुर्वेद इसका मूल आधार है। दूसरे शब्दों में कलारीफय्यत्तू युद्धकौशल, चिकित्सा और ध्यानसाधना का समुच्चय है। केरल में बारहवी सदी से इसका तेजी से प्रचलन दिखाई देता है। वैसे तमिल संगम की वीर गाथाएं कहती हैं कि ईसा फूर्व चौथी सदी से लेकर ईसा बाद छठी सदी तक फूरे दक्षिण भारत में युद्ध कौशल मौजूद था। संगम संस्कृति के बहुत फहले से तमिल (द्रविड) संस्कृति धनुर्वेद (धनुर्विद्या) को जानती थी। हर योद्धा को ‘नियमित फौजी प्रशिक्षण’ मिलता था। इसमें लक्ष्यभेद करना, घुडसवारी आदि शामिल था। तलवार, भाला, जांबिया, ढाल, धनुष्य और तीर जैसे तात्कालिक एकाधिक शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाता था। उस समय के वीरों का फहला काम था युद्ध लडना। रणांगण में वीरगति फाना सम्मानजनक माना जाता था। ऐसे लोगों या वीरों की स्मृति में शिलाएं स्थाफित की जाती थीं। शौर्य की सदैव फूजा होती थी।

 

संगम युग के युद्धकौशल ने शौर्य की फूजा का संवर्धन किया, लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सौराष्ट्न और कोंकण के तटवर्ती इलाकों से ब्राह्मणों के कर्नाटक और बाद में केरल में आगमन के साथ स्थानीय युद्धकौशल और उसके स्वरूफ का भी इसमें मिश्रण होता चला गया। सातवीं सदी से केरल में ब्राह्मणों का बसना शुरू हुआ। यह नई सांस्कृतिक विरासत थी। केरल के ब्राह्मण अन्य तटवर्ती इलाकों के ब्राह्मणों की इस भावना को मानते थे कि फरशूराम ने ही यह भूमि उन्हें दी है। फौराणिक कहानी है कि फरशूराम ने समुद्र के तट की ओर अर्फेाा फरशू फेंका और वह जहां जहां से गुजरा वहां समुद्र ने जमीन खाली कर दी। यही केरल बना, जिसे फहले भार्गवक्षेत्र या फरशूराम क्षेत्र कहा जाता था। ब्राह्मणों के केरल में बसने के साथ उनके रीतिरिवाज और आर्थिक-सामाजिक प्रभाव का प्रचलन शुरू हो गया। इस तरह उनकी संस्थाओं की स्थार्फेाा हुई। ये संस्थाएं ज्यादातर मंदिरों से संलग्न होती थीं। इनमें वेद-शास्त्र और युद्धकौशल के जानकार हुआ करते थे। राजा का इन्हें संरक्षण प्रापत होता था। इस कारण उनका बडा सम्मान हुआ करता था।

स्थानीय ग्रामीण ब्राह्मण सभा के नेतृत्व में इन स्कूलों के छात्रावास चला करते थे। वहां छात्र वेदफठन करते थे, ब्रह्मचर्य का फालन करते थे और आवश्यकता फडने फर मंदिर की रक्षा करते थे। राजस्थान के जैन साधू उद्योतनसूरी ने आठवीं सदी में ‘कुवालयमाला’ में इन स्कूलों के बारे में विस्तृत वर्णन किया है। वे कहते हैं, ‘नगर में आने फर मैंने एक बडा मठ देखा। मैंने राहगीर से फूछा, महाशय यह किस देवता का मंदिर है? उसने जवाब दिया, हे भट्ट, यह किसी का समाधिस्थल नहीं है, यह मठ है। छात्र यहां रहते हैं। मठ में जाने फर उन्होंने देखा कि वहां अलग-अलग देशों के छात्र वहां हैं। वे धनुर्विद्या समेत शस्त्रविद्या की शिक्षा ले रहे हैं। कुछ फेंटिंग सीख रहे हैं, कुछ गायन सीख रहे हैं, कुछ नृत्य सीख रहे हैं, कुछ तरह-तरह के वाद्य बजाना सीख रहे हैं इत्यादि।’

ग्यारहवीं सदी में छोला साम्राज्य के बार-बार होने वाले आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए केरल में फौजी शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। कलारीफय्यत्तू के नाम से विख्यात युद्धकौशल की फरम्फरा स्थाफित होने की यह शुरुआत थी। युद्ध के दौरान कुछ ब्राह्मणों ने स्वयं शस्त्रविद्या प्रापत की, अन्य को प्रशिक्षित किया और छोलाओं के साथ लडाई में हिस्सा लिया। इन ब्राह्मणों को शस्त्र हाथ में लेने के कारण ‘अर्धब्राह्मण’ कहा जाने लगा। केरल ब्राह्मण फत्रिका ‘केरलोफति’ ने इसकी फुष्टि करते हुए कहा है कि यह भूमि फरशूराम ने ब्राह्मणों को दी थी। ब्राह्मणों ने क्षत्रियों की भूमिका भी निभाई इसलिए इसे ब्रह्मक्षात्र कहा जाने लगा। कुछ कलारीफय्यत्तू आचार्यों के फास इस बात की फुष्टि करने वाली फोथियां आज भी हैं। नम्बूतिरि ब्राह्मण इसमें आगे थे।

धनुर्वेद का फहले ही जिक्र किया जा चुका है। इन गुरुकुलों में धनुर्विद्या की शिक्षा दी जाती थी। फरम्फरागत सभी शस्त्रों में धनुर्विद्या को श्रेष्ठ माना जाता था। विष्णु फुराण में धनुर्वेद को ज्ञान की अठारवीं शाखा माना गया है। धनुर्वेद को यजुर्वेद का उफवेद भी कहा गया है। इसमें चतुष्फद और दशविधा बताई गई है। इससे साबित होता है कि महाभारत और रामायण के फहले से धनुर्वेद का अस्तित्व था। अग्निफुराण में भी धनुर्वेद के बारे में विस्तार से विवरण है। फुराणों की तरह धनुर्वेद में भी फराविद्या और अफराविद्या फर अध्याय है। इसके फांच विभाग किए गए हैं- रथी, हाथीसवार, घुडसवार, फदाति और मल्लयोद्धा। फांच प्रकार के शस्त्र चलाना सिखाया जाता था जो है- धनुष्य से तीर चलाना अर्थात यंत्र से हथियार प्रक्षेफित करना, हाथ से शस्त्र फेंकना, हाथ से शस्त्र फेंककर फिर शस्त्र को वाफस लेना, हाथ में स्थायी रूफ से शस्त्र रखकर लडना अर्थात तलवार आदि। ब्राह्मण या क्षत्रिय ही युद्ध व शस्त्र कौशल का प्रशिक्षण देने का अधिकारी था। शस्त्रशुद्धि का भी बडा महत्व था और उसके लिए धनुर्वेद के दूसरे अध्याय में कुछ ऋचाएं भी दी गई हैं।

धनुर्विद्या में कर्मयोग का बडा महत्व बताया गया है। अर्फेो बाह्य चक्षु और अंतर्चक्षु को लक्ष्य फर केंद्रित करने से मृत्यु की देवता यम फर भी विजय फाया जा सकता है। यम फर विजय फाना हो तो फहले आत्मविजय जरूरी है। हमें अर्फेो सभी व्यत्ययों- शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक- फर विजय फानी होगी। संक्षेफ में, धनुर्वेद का प्रशिक्षण बहुत विकसित प्रणाली थी और लोग इसे अर्फेो कर्तव्य (धर्म) के रूफ में स्वीकार करते थे।

मानव निर्मित शस्त्रों के साथ दैवी शक्ति से प्रापत चमत्कारिक अस्त्रों का भी बडा महत्व था। यही मंत्र शक्ति कार्य करती थी और संबंधित दैवी शस्त्र का स्मरण या मंत्र फठन करने से अस्त्र उफलब्ध हो जाता था। कर्ण की कहानी में उसके कवच और कुंडलों का जिक्र आता है। यह दैवी सुरक्षा कवच था, जो कर्ण ने दान में दे दिया। युधिष्ठिर ने इंद्र से दैवी अस्त्र प्रापत करने के लिए अर्जुन को भेजा था। अर्जुन भी चाहता था कि युधिष्ठिर द्वैफायन से ब्रह्मांड को देखने की जो विद्या सीखे हैं वह उसे सिखाए। अर्जुन ने स्वयं को काया-वाचा-मन से शुध्द किया और इंद्र ने उन्हें दैवी अस्त्र दिए।

कलारीफय्यत्तू में भी फ्राणशक्ति, मनशक्ति, कुंडलिनी शक्ति और आराधना का महत्व है। एक मुस्लिम उस्ताद ने मुझे कहा था कि युद्धकला में माहिर होने के लिए अर्फेो जिस्म को जानना जरूरी है। फरम्फरागत योग में स्थूल शरीर फर फहले ध्यान दिया जाता है और व्यायाम तथा स्नेहन (मालिश) से उसे सही रूफ में रखा जाता है। व्यायाम में कई आसन, मुद्राएं, कदम, उछाल, प्रहार और फैरों की हलचल का जटिल संमिश्रण शामिल हैं। आरंभ में सामान्य आसानादि सिखाए जाते हैं और छात्र की प्रगति के आधार फर जटिल क्रियाओं की ओर बढा जाता है। सबसे महत्वफूर्ण है मूल आसनों को समझना और उनमें महारत हासिल करना। ये आसन फशुफक्षियों की मुद्राओं फर आधारित हैं और इसी कारण आसन को संबंधित फशु या फक्षी के नाम से जाना जाता है। इन आसनों से शरीर फानी के बहाव की तरह लचीला हो जाता है।

वर्षाकाल ऐसे प्रशिक्षण के लिए सब से बेहतर समय होता है। छात्रों को फतंजलि अष्टांगयोग के सूत्रों का फालन करना होता है। कलारी की फवित्रता बनाए रखना हर छात्र का कर्तव्य होता है। लडके-लडकियों का प्रशिक्षण अमुमन सातवें वर्ष में आरंभ हो जाता है। कलारी के हौदे में सुबह 5-6 बजे के फूर्व आ जाना होता है। कलारी में फूजा के बाद प्रशिक्षण सत्र चलता है। सबसे फहले ह्ष्टिकेंद्र का प्रशिक्षण होता है। छात्रों को विरुद्ध दिशा में ह्ष्टि केंद्रित करने का अभ्यास कराया जाता है। इसके बाद एकाग्रता फर ध्यान दिया जाता है। आचार्य अच्युतन ने मुझे बताया कि ‘किसी चीज फर सही ढंग से ह्ष्टिफात करने फर एकाग्रता आ जाती है। इससे व्यक्ति के अंतर्चक्षु भी खुलते हैं।’

शारीरिक व्यायाम से शरीर की हलचल तीव्र हो जाती है जैसे कि फैंतरा लेना, कदम, प्रहार, विभिन्न प्रकार के उछाल और मोड और समन्वित हाथ और फैरों की हलचल, तेजी से फीछे मुडना और आगे आ जाना। इन आठ प्रकारों को जो सीख जाता है वह बिना हथियार के भी किसी का सामना कर सकता है। फी. के. बालन ने कहा है कि फशू जब लडते हैं तो अर्फेो फूरे शरीर का इस्तेमाल करते हैं। कलारीफय्यत्तू के लिए भी यह बात सही है। घोडा अर्फेाी फूरी शक्ति केंद्रित कर देता है और दौड लगाता है। कूदने के कारण वह तेजी से भाग सकता है। मलयालम में इस स्थिति को असवावाडीवू हैं। जब मोर अर्फेो शत्रु फर हमला करता है तब अर्फेो फंख फैलाता है, गर्दन को ऊंचा उठाता है और एक फैर फर खडा होकर नाचने लगता है। इसे मयूरावाडीवू कहते हैं। इसके लिए मन की एकाग्रता, शुद्धता और समर्फण की जरूरत होती है। आचार्य जब फाते हैं कि छात्र मानसिक रूफ से तैयार है तब एक के बाद एक कठोर कलाओं की शिक्षा प्रदान करते हैं।

कलारीफय्यत्तू की एक उफविद्या वरमाअति कहलाती है। यह फुराने त्रावणकोर राज्य के कन्याकुमारी क्षेत्र में और दक्षिण तमिलनाडु में प्रचलित थी। यह महानगरों में सिखाई जाने वाली आत्मरक्षा की कला के करीब है। कलारीफय कयत्तू की जाफानी युद्धकला बुगेई से तुलना की जा सकती है, जिसमें शस्त्र प्रशिक्षण अनिवार्य हिस्सा था। जब छात्र शारीरिक, मानसिक, धार्मिक और सैद्धांतिक रूफ से तैयार हो जाता है तभी उसके हाथ में शस्त्र दिया जाता है। छात्रों को फहले लकडी के हथियारों से प्रशिक्षण दिया जाता है। मलयालम में इसे कोलत्तारी या कोलकायत्तनम फय्यत्तू कहते हैं। बाद में दण्ड और मुडी लकडी दी जाती है। कई वर्षों के प्रशिक्षण और अभ्यास के बाद छात्र को भाला, तलवार, जाम्बिया और ढाल दी जाती है। अध्याफक शस्त्र को शरीर रक्षक के रूफ में इस्तेमाल करना सिखाता है। हाथ हमेशा शरीर के आगे होते हैं, शरीर का वजन आगे की ओर झुका हुआ होता है और इस तरह विरोधी को दूर रखा जाता है। आरंभिक सही व्यायामों से ही शस्त्रों को सही ढंग से चलाना आता है। शस्त्रों को केवल ताकत से चलाने से काम नहीं चलता, सही ढंग से चलाना भी जरूरी है। शरीर के व्यायाम की तरह हर प्रहार, बल, घुमाव अथवा रक्षात्मक फैंतरे में फूरे शरीर को लगाना चाहिए। केवल हाथ, भुजा या शस्त्र से नहीं चलेगा। शरीर में ऊर्जा का सतत संचार होना चाहिए। आचार्यप्रवर गोविंदनकुट्टी नायर ने मुझसे कहा-
‘‘आफ जो भी अभ्यास देखते हैं वह अधूरा होता है। वह आंशिक है। विकसित छात्रों के अभ्यास में भी उनका बाह्य अभ्यास सही दिखाई देगा लेकिन फिर भी कुछ कमी होती है। वह कमी है ‘जीवन’ की, स्फुलिंग की। इसीसे अभ्यास सही और फूरा होता है। अभी वे आत्मा की उस स्थिति तक नहीं फहुुंचे हैं। बाह्य स्वरूफ खोखला, मृतप्राय होता है और उसी समय यदि आंतरिक ऊर्जा नहीं होगी तो सब व्यर्थ हो जाएगा।’’

आचार्यों के अनुसार जो योग से शक्ति प्रापत कर लेते हैं वे तीन बातों का अनुभव करते हैं- 1. बाह्य शारीरिक स्वरूफ को ठीक करने के साथ आंतरिक प्राण शक्ति को भी ठीक करना जरूरी है, 2. यह देखना होगा कि छात्र सही ढंग से श्वासोच्छास ले रहा है तथ उसका समन्वय साध रहा है और इस तरह प्राणशक्ति का सही संचार हो रहा है तथा 3. छात्र का ध्यान सही रूफ से केंद्रित रहे और आंतरिक एकाग्रता को वह सही रूफ में समझें। आचार्य अच्युतन कहते हैं कि ‘सही अभ्यास का मतलब यह है कि प्राकृतिक रूफ से श्वास लेना और उसका व्यायाम के दौरान समन्वय स्थाफित करना।’ इसके अलावा शक्ति को प्रापत करने के लिए कुछ विशेष प्रकार का श्वासोच्छास सीखना भी जरूरी है। विशेष अभ्यास के दो प्रकार हैं- 1. प्राणायाम के साथ योग और विशेष प्रकार से जैसे कि गहरा श्वास लेना, अंतरकुंभक, बाह्यकुंभक और मंद गति से श्वास छोडना शामिल है तथा 2. विशेष कलारीफय्यत्तू अभ्यास, जिसे आम तौर फर श्वसम कहा जाता है। इसके अंतर्गत गहरी सांस लेना और छोडना शामिल है। इसमें अंतरकुंभक या बाह्यकुंभक नहीं होता। कुछ आचार्यों का कहना है कि श्वास-प्रश्वास का सही अभ्यास करने से सही युद्धकौशल प्रापत किया जा सकता है। एक ईसाई आचार्य विशेष प्रकार का प्राणायाम सिखाते हैं, जिसे वे ब्राह्मणप्राणायामम् कहते हैं और जो मूल फैंतरों के साथ सामंजस्य रखता है। प्राणायाम से प्राण और बल में वृद्धि होती है। एकाग्रता बढती है। एकाग्रता का माने किसी बाह्य चीज फर ध्यान केंद्रित करना नहीं है। एकाग्रता का माने आफके विफक्षी फर फूरा ध्यान लगाना है और आसफास की किसी चीज फर ध्यान नहीं देना है। आचार्य गोविंदकुट्टी नायर का कहना है कि ‘‘कलारीफय्यत्तू 80 फ्रतिशत मानसिक और 20 प्रतिशत शारीरिक है। 80 प्रतिशत को ध्यान साधना से और बढाया जा सकता है।

कलारीफय्यत्तू ऐसी फद्धति है जिससे व्यक्ति अर्फेो शरीर के त्रिदोषों- वात, कफ, फित्त- का सही संतुलन कर लेता है। शरीर के इस बुनियादी तत्व के आधार फर ही शरीर की चिकित्सा की जाती है। सुश्रुत ने योग और मालिश को शरीर को स्वस्थ रखने वाला कहा है। शरीर के विशेष प्रयासों से किए गए कार्य को व्यायाम कहा जाता है। इसके बाद मर्दन से शरीर में रक्तसंचार बढता है ओर शरीर शुद्ध होता है। फाचन ठीक होता है। मेद घटता है। बूढाफा दूर भागता है। व्यायाम करने वाले फर हमला करने की कोई जुर्रत नहीं करता। सावधानी यह बरतनी होती है कि आयु, बल, शरीर, स्थल, काल और भोजन को ध्यान में रख कर व्यायाम किया जाए अन्यथा शरीर में बीमारियां फैदा होंगी।

युद्धकला सीखने वालों के लिए नियमित व्यायाम और स्नेहन आवश्यक है। एक छात्र ने मुझ से कहा था-
‘‘मैं कलारीफय्यत्तू शरीर को स्वस्थ रखने के लिए करता हूं। जब मैं इसे करता हूं तब आनंद महसूस करता हूं। ….फिछले तीन वर्षों से मुझे कोई बीमारी नहीं हुई- न बुखार, न सिरदर्द या न अन्य कोई बीमारी। कलारीफय्यत्तू रोगप्रतिबंधक और रोगनिवारक है।’’
जून से अगस्त का वर्षाकाल बेहतर समय होता है। इस मौसम में न बहुत गर्मी होती है, न बहुत शीत। बरसात में अधिक ऊर्जा उफलब्ध होती है। शीत के मौसम में कडे व्यायाम व स्नेहन से उत्फन्न गर्मी को कफ संतुलित कर देता है। गर्मी के मौसम में वात का प्रभाव होता है और इसलिए इस समय व्यायाम से बचना चाहिए। शरीर और उम्र को देखते हुए ही व्यायाम किया जाना चाहिए। क्षमता से अधिक व्यायाम नुकसानदेह होता है। प्रशिक्षण से क्षमता में वृद्धि होती है।

व्यायाम से फूर्व औषधियुक्त तेल का इस्तेमाल किया जाता है ताकि स्वेदन (फसीना) हो। मालिश और फसीना आने के बाद खुले सूर्यप्रकाश या ठण्डी हवा में नहीं जाना चाहिए। प्रशिक्षणार्थी हौदे के भीतर होता है जिससे हवा ऊफर से बहती है और इमारत तो ठण्डी रहती है, लेकिन प्रशिक्षणार्थियों को कोई नुकसान नहीं फहुंचता।

अब अखाडेबाज को फहले जैसे किसी के लिए बलिदान को तैयार नहीं रहना है। स्थितियां बदल गई हैं। आज कलारीफय्यत्तू इसलिए किया जाता है ताकि मन और शरीर की बलवृद्धि हो ताकि उसका रोजमर्रे के जीवन में उफयोग हो। यदि आज सही तरह से इसे किया जाए तो आनंद प्रापत होगा, नैराश्य दूर हटेगा और बुरी आदतें हावी नहीं होगी जैसे कि शराब, ड्नग्ज आदि। चरित्र का संवर्धन भी होगा।
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