रामजन्म भूमि के लिए कारसेवकों का बलिदान

श्रीरामजन्म भूमि पर बने मंदिर को बाबर के सेनापति ने मीरबांकी ने सन 1528 में गिराकर वहां एक गुंबदनुमा ढांचा तैयार कर दिया जिसे बाद में मस्जिद का नाम दे दिया गया। इसके पश्चात से ही हिंदू समाज एक भी दिन शांत नहीं बैठा। वह लगतार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसंबर 1949 को हिंदुओं ने वहां पर रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखंड कीर्तन आरंभ कर दिया।

विश्व हिंदू परिषद द्वारा विषय को अपने हाथ में लेने से पहले 76 बार राम जन्मभूमि को मुक्त करने का प्रयास किया गया था। इस दौरान देश के अलग-अलग भागों से करीब हजारों लोगों ने अपना बलिदान दिया। 02 नवंबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार में कारसेवकों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक गोलियां चलायी थी। इस गोली कांड में अयोध्या के वासुदेव गुप्त, राजेंद्र धरिकार, रमेश पाडेंय और कोलकाता के दोनों कोठारी बंधुओं सहित अनेक कारसेवक बलिदान हो गये थे।

इस घटना के बाद लोगों में केंद्र सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिला। यह आक्रोश उस बाबरी ढांचे के खिलाफ था जो गुलामी का प्रतीक था और राम भक्त उसे किसी भी हालत में देखना नहीं चाहते थे जिसके बाद 6 दिसंबर 1992 को राम भक्त कारसेवकों ने यह ढांचा गिरा दिया। 30 अक्टूबर व 2 नवंबर के दिन अयोध्या पहुंचे बड़ी संख्या में कारसेवकों ने भगवान श्री राम के मंदिर को मुक्त कराने के लिए विवादित ढांचे पर चढ़कर भगवा ध्वज हरा दिया था जिसके बाद वर्तमान की मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या में गोली चलाने का आदेश दे दिया, जिसमें ना जाने कितनी संख्या में कारसेवकों को गोली मारी गई। आज भी अयोध्या की गलियाँ बलिदान कारसेवकों की याद दिलाती हैं।

राम जन्मभूमि से 500 मीटर दूर हनुमानगढ़ी चौराहे से लाल कोठी जाने वाले मार्ग को 1990 की घटना के बाद कारसेवकों की याद में शहीद मार्ग कहा जाने लगा। वही दिगंबर अखाड़ा में बलिदानों के स्मारक स्थापित किए गए जिस पर प्रत्येक वर्ष राम भक्त कारसेवकों को 2 नवंबर के दिन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

देश में हिंदू ने ही हमेशा अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान देने का काम किया है। 1990 में हिंदू और संस्कृति की रक्षा को लेकर देश भर से बड़ी संख्या में राम भक्त उस कलंकित ढांचे पर भगवा ध्वज फहराने अयोध्या पहुंचे थे और विवादित ढांचे पर भगवा फहरा कर भगवान श्री राम की भव्य मंदिर की आजादी की कथा लिखी थी। 4 नवंबर 1990 को शरद और रामकुमार कोठारी का सरयू के घाट पर अंतिम संस्कार किया गया उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग उमड़ पड़े थे। दोनों भाइयों के लिए अमर रहे के नारे हर तरफ से गूंजते नजर आए। कारसेवकों के विशाल बलिदान के बाद आखिरकार राम मंदिर का निर्माण 2020 में शुरू हो गया।

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