चीन को चाहिए करारा जवाब!

भारत-चीन के बीच लड़ाई हुई भी तो आज 1962 की स्थिति नहीं है। भारतीय सेना काफी अच्छी स्थिति में है और चीन उतनी बड़ी ताकत नहीं है, जितना उसे समझा जा रहा है। चीनी अहंकार और पाकिस्तान के साथ मिलकर की जा रही उसकी साजिशों के कारण भारत को कुछ कड़े राजनयिक निर्णय करने ही होंगे।

पिछले छह महीने से भारत और चीन की सेनाएं लद्दाख में एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं। किसी भी समय युद्ध छिड़ने का खतरा है। हम जानते हैं कि युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं, पर चीन के आक्रामक इरादों का जवाब देने की जरूरत भी है। वह हमारी सीमा में घुसपैठ क्यों करना चाहता है? फौजी ताकत में हम चीन से कम नहीं है। लड़ाई हुई, तो उसे जबर्दस्त सबक मिलेगा। वैश्विक मंच पर बिछी शतरंज की बिसात पर भी उसे मात देने की सामर्थ्य हमारे पास है।

चीनी हरकत के पीछे निश्चित रूप से कोई बड़ी योजना है। उस योजना को समझने और उसे विफल करने की जरूरत है। गत 10 सितंबर को हुआ मॉस्को का समझौता पांच बिंदुओं पर है, जो हमें उस ‘पंचशील समझौते’ की याद दिलाता है, जिसे चीन ने 1962 में तोड़ा था। जवाहर लाल नेहरू और चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के बीच 29 अप्रैल 1954 को हुए समझौते में भी पांच सिद्धांत थे।

भारतीय मीडिया में चीनी घुसपैठ की खबरें मई के महीने में आनी शुरू हुईं। गलवान घाटी इलाके में पेट्रोलिंग पॉइंट-14 (पीपी-14) के पास हुई झड़प के बाद यह टकराव शुरू हुआ है। लगभग उसी समय पैंगोंग झील के पास भी टकराव हुआ। दोनों घटनाएं 5-6 मई की हैं। उसी दौरान क्याम (हॉट स्प्रिंग) क्षेत्र से भी घुसपैठ की खबरें आईं। इसके अलावा सिक्किम से भी तनातनी की खबरें मिलीं। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनातनी रोकने के कुछ समझौते भी हैं। पर सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि दोनों देशों को स्वीकार एक वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी नहीं है। और चीन एक रेखा तय करने से बचता है।

अस्पष्ट सीमा रेखा

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गत 15 सितंबर को लोकसभा में 17 सितंबर को राज्यसभा में बताया, ‘वर्ष 1988 के बाद से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में काफी प्रगाढ़ता आई है। वर्ष 1993 और 1996 के समझौतों में इस बात का जिक्र है कि एलएसी के पास, दोनों देश अपने सैनिकों की संख्या न्यूनतम रखेंगे। समझौतों में यह भी कहा गया है कि, जब तक सीमा रेखा का पूर्ण समाधान नहीं होता है, तब तक एलएसी का सख्ती से सम्मान और पालन करना होगा और उसका उल्लंघन नहीं किया जाएगा। इन धारणाओं में भारत और चीन, एलएसी के स्पष्टीकरण द्वारा एक आम सहमति पर पहुंचने के लिए भी प्रतिबद्ध थे। इसी आधार पर 1990 से 2003 तक दोनों देशों द्वारा एलएसी पर एक आम सहमति बनाने की कोशिश की गई लेकिन इसके बाद चीन ने इस कार्यवाही को आगे बढ़ाने की इच्छा नहीं जताई। इसी वजह से कई स्थानों पर चीन और भारत के बीच एलएसी की धारणाओं में मतभेद है।’

टकराव का नवीनतम केंद्र पैंगोंग त्सो (झील) का फिंगर 4 से 8 के बीच का क्षेत्र है। इस साल मई की शुरुआत से ही चीनी सेना ने भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों को पैंगोंग झील के उत्तरी तट पर फिंगर 4 और फिंगर 8 के बीच के क्षेत्र में गश्त करने से रोका। भारतीय सेनाएं अतीत में फिंगर 8 तक गश्त लगाती रही हैं।

गत 15 जून को गलवान घाटी क्षेत्र में हुई खूनी मुठभेड़ के बाद दोनों देशों के रक्षा सलाहकारों के बीच हुई बातचीत के बाद सेनाएं पीछे हटीं, पर चीनी सेना ने पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे की पहाड़ी ढलान फिंगर 5 तक अपना कब्जा बनाए रखा। चीनी सेना शायद ऊंचे और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्जा बनाए रखना चाहती है, जहां से भारतीय गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।

गलवान प्रकरण के बाद 30 जून को कोर कमांडर स्तर की बातचीत के बाद गलवान घाटी में पैट्रोल पॉइंट 14 पर सेना की वापसी पर सहमति हुई थी। बावजूद इसके 14 जुलाई को बातचीत का चौथा दौर होने तक यह स्पष्ट हो गया कि चीन गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग और पैंगोंग त्सो के फिंगर रिज से अपनी फौज को पूरी तरह हटा नहीं रहा है। जब 2 अगस्त की बैठक में चीन ने यह भी स्वीकार नहीं किया कि उसने पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर सीमा का अतिक्रमण नहीं किया है, तब भारतीय पक्ष को समझ में आने लगा कि इसका समाधान अब सैनिक कार्रवाई से ही हो सकता है।

भारतीय निर्माण

     हाल में भारत ने लद्दाख में सड़कें बनाई हैं, हवाई पट्टियों का निर्माण किया है या पुरानी पट्टियों को सुधारा है। पिछले अक्तूबर में भारतीय सेना ने 1400 फुट लंबे कर्नल चेवांग रिनचेन पुल को खोला। इस पुल से चीन की चिंता बहुत बढ़ गई है। भारतीय सेना अब कम समय में चीन की सीमा तक पहुंच सकती है। बड़े टैंक भी इससे होकर जा सकते हैं। यह पुल लद्दाख में दरबुक और दौलत बेग ओल्डी रोड पर श्योक नदी के ऊपर बनाया गया है।

डीएसडीबीओ (दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी) नाम की 255 किलोमीटर लम्बी यह सड़क शायद चीन को सबसे ज्यादा खटकी है। इस सड़क के बन जाने के बाद भारतीय सेना का काराकोरम दर्रे तक पहुंचना आसान हो गया है। चीन अब गलवान घाटी के जिस इलाके पर कब्जा करना चाहता है, वहां से यह पुल निशाने पर आ जाता है। अब यह बात सामने आ रही है कि इस साल गर्मियों की शुरुआत होते ही चीनी सेना काफी बड़े स्तर पर जमा हो गई और उसने भारतीय गश्ती दलों को उन क्षेत्रों में जाने से रोका जहां वे सामान्यतः जाते रहे हैं। पिछले 15 साल से चीनी सेना ने धीरे-धीरे इस तरह से आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। रक्षा मंत्री ने अपने बयान में सन 2003 का जिक्र किया है और कहा है चीन ने दोनों देशों को स्वीकार्य एक एलएसी बनाने की इच्छा नहीं जताई।

बातों से मानेगा चीन?

भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान को अब यह बात समझ में आ गई है कि एलएसी की इस अस्पष्टता की आड़ में चीन अपना दावा बढ़ाना चाहता है। इस बार वह जितना आगे बढ़ आया है, उससे पीछे जाने को तैयार नहीं है। उसे पीछे भेजने के दो ही रास्ते हैं। या तो वह बातों से मान जाए, वर्ना फौजी कार्रवाई करनी पड़ेगी, जिससे वह दबाव में आए।

भारत ने तेजी से लद्दाख में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाई है और उपकरण भेजे हैं। इस तैयारी को दखते हुए चीन ने इस बीच पैंगोंग के दक्षिणी किनारे पर भी अपनी उपस्थिति को बेहतर बनाने के इरादे से कार्रवाई शुरू की, जो भारत की नजरों में आ गई। इसकी पेशबंदी में 29-30 अगस्त की रात भारतीय सेना ने तेजी से कार्रवाई करके पैंगोंग के दक्षिणी किनारे पर ब्लैक टॉप और हेल्मेट टॉप जैसी ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा करके चीनी सेना को दबाव में ले लिया है। उसके बाद से चीन सरकार इस कोशिश में है कि ऐसा कोई समझौता हो जाए, जिसमें उसकी इज्जत बनी रहे।

सैटेलाइट तस्वीरों से मालूम चल रहा है कि पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर चीनी निर्माण गतिविधियां चल रही हैं। दक्षिणी किनारे पर नई चीनी चौकियों का निर्माण किया जा रहा है। हाल में भारतीय सेना ने मुखपारी में भाले-बरछों से लैस चीनी सैनिकों की तस्वीरें जारी की थीं। इन सैनिकों को जब रोका गया, तो पीछे हटते हुए हवा में कुछ राउंड फायरिंग की, जो कि 45 वर्षों में चीन की सीमा के साथ पहली गोलाबारी की घटना है।

कब्जा बढ़ाने की कोशिश

मीडिया में जो विवरण सामने आ रहा है उनके अनुसार पिछले 15 वर्ष से चीनी सेना किसी न किसी रूप में लद्दाख में घुसपैठ करके धीरे-धीरे अपने कब्जे को बढ़ाती जा रही है। चूंकि यह जन-शून्य क्षेत्र है, इसलिए इस तरफ देश का ध्यान जाता भी नहीं है। 1959 से 1962 के बीच भी चीन ने ऐसी ही हरकतें की थीं। बार-बार यथास्थिति बनाए रखने का समझौता होता और बार-बार चीन उसे तोड़ता है।

सन 2013 में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन ने पूर्वी लद्दाख में इसी किस्म की गश्त से भारत का 640 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हथिया लिया है। श्याम सरन तब यूपीए सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अंतर्गत काम करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे। सरकार ने उनकी बात को स्वीकार नहीं किया, पर यह बात रिकॉर्ड में मौजूद है। बाद में श्याम सरन ने भी इस रिपोर्ट का खंडन कर दिया।

भारत ने उसी साल चीन के साथ बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बीसीडीए) पर हस्ताक्षर किए थे। बीसीडीए प्रस्ताव चीन की ओर से आया था। वह चाहता था कि चीन के प्रधानमंत्री ली खछ्यांग की भारत यात्रा के पहले वह समझौता हो जाए। इस समझौते के बावजूद उसी साल अप्रैल में देपसांग इलाके में चीनी घुसपैठ हुई और उसके अगले साल चुमार इलाके में। दरअसल चीन के साथ 1993, 1996, 2005 और 2012 में भी ऐसे समझौते हुए थे, पर सीमा को लेकर चीन के दावे हर साल बदलते रहे।

मॉस्को समझौता

शंघाई सहयोग संगठन की मॉस्को बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच पांच सूत्री समझौता हो जाने के बाद उसे लागू करने का सवाल है। निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि चीनी सेना अप्रैल-मई की स्थिति पर वापस चली जाएगी। समझौते में यथास्थिति कायम करने की बात है, पर चीनी सेनाओं की वापसी का जिक्र नहीं है। फिर भी समझौता दो कारणों से महत्वपूर्ण है।

पहली बार लगता है कि चीन टकराव के दूरगामी परिणामों को समझता है, और वह दबाव में है। वह फिर भी नहीं माना और टकराव बढ़ाने कोशिश करता रहा, तो उसे कीमत चुकानी होगी। समझौते में संयुक्त घोषणापत्र जारी हुआ है और उसके बाद दोनों देशों की ओर से समझौते की भावना को समझाने के लिए अलग-अलग बयान दिए गए हैं। भारतीय बयान में इस बात पर जोर है कि अप्रैल-मई से पहले की स्थिति कायम होनी चाहिए, वहीं चीनी बयान में ऐसी कोई बात नहीं कही गई है। इसलिए अब देखना होगा कि उसकी सेना की वापसी शुरू होती है या नहीं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि अब भारतीय सेना तब तक पीछे नहीं हटेगी, जब तक वह चीनी सेना के पीछे हटने के बारे में आश्वस्त नहीं हो जाएगी। इसका मतलब है कि भारत अब दबकर नहीं, बल्कि चढ़कर बात करेगा।

रक्षा मंत्री की वार्ता

    भारत का दबाव 29-30 अगस्त की रात की कार्रवाई के बाद बढ़ा, जब भारतीय सेना ने पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे की कुछ ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद चीनी सेना भारतीय तोपों की मार के दायरे में आ गई। इस कार्रवाई का असर था या कोई और बात मॉस्को में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के मौके पर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंगही के बीच 4 सितंबर को दो घंटे से अधिक समय तक अलग से बातचीत हुई। यह बैठक चीनी रक्षा मंत्री के अनुरोध पर हुई थी। इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गतिरोध दूर करने के लिए चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ टेलीफोन पर बातचीत की थी।

इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्वी लद्दाख में यथास्थिति को बनाए रखने और सैनिकों को तेजी से हटाने पर जोर दिया। एक प्रकार से राजनाथ सिंह की उस मुलाकात ने विदेश मंत्रियों की समझौता-वार्ता के लिए आधार तैयार कर दिया। गत 15 जून को गलवान में हुए हिंसक टकराव के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच 5 जुलाई को टेलीफोन पर बातचीत हुई थी। तब फैसला हुआ था कि दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाएंगी।

भारतीय सेना पीछे हट भी गई, पर चीनी सेना कई जगह से नहीं हटी। पैंगोंग झील के तट पर उसे फिंगर 8 के पीछे चले जाना चाहिए था, पर वह फिंगर 5 पर डटी रही। चीनी राजनयिकों की बातों से जबर्दस्त अहंकार की गंध आने लगी थी। टेलीफोन से संपर्क करने पर वे जवाब नहीं देते थे और उनके बयानों से लगता था कि जो हो गया, सो हो गया अब बढ़े हुए कदमों को वापस नहीं लेंगे।

सेना को श्रेय

चीन को लगता था कि भारत के पास अब इस स्थिति को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और भारत की ओर से किसी किस्म की जवाबी कार्रवाई नहीं होगी। उसने भारत की उपेक्षा की, पर सेना की एक कार्रवाई ने कहानी बदल दी। 29-30 अगस्त की रात भारतीय सेना ने पैंगोंग के दक्षिणी किनारे की ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा करके अपनी स्थिति बेहतर बना ली। साथ ही भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत ने बयान दिया कि सैनिक कार्रवाई भी विकल्प है।

भारतीय सेना को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने चीन को समझौते की मेज पर आने को मजबूर किया है। दूसरी तरफ भारत सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में कुछ बड़े फैसले किए और चीनी एप्स पर पाबंदी लगाई गई। इन कदमों के बाद भी चीन को वास्तविकता समझ में नहीं आएगी, तो हमें ज्यादा बड़े टकराव के लिए तैयार रहना होगा। सर्दियां आने वाली हैं। इस इलाके में कई जगह पर तापमान शून्य से 40 डिग्री के नीचे तक चला जाता है। चीन की सेना को इसके लिए भी तैयार रहना होगा।

चीनी अखबार ’ग्लोबल टाइम्स’ के अनुसार यह सहमति दोनों देशों के नेताओं के बीच मुलाक़ात का रास्ता भी प्रशस्त करेगी। यहां नेताओं से आशय नरेंद्र मोदी और शी चिनफिंग से है। क्या इन दोनों नेताओं की जल्द मुलाकात होगी? होगी भी तो क्या रिश्ते वापस उसी धरातल पर आ पाएंगे, जिस पर पहले थे? चीन अब भी दोनों देशों के रिश्तों को सीमा पर की जा रही हरकतों और पाकिस्तान के साथ मिलकर की जा रही साजिशों से हटाकर देखना चाहता है, पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट कहा है कि सारी बातें जुड़ी हुईं हैं। यदि सीमा पर घुसपैठ जारी रही, तो शेष रिश्तों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

क्या है साजिश?

इस बात को साफ होने में समय लगेगा कि चीन ने अप्रैल-मई में घुसपैठ क्यों की थी। इस टकराव का परिणाम यह हुआ कि भारत अब खुलकर अमेरिका के साथ जा सकता है। दक्षिण चीन सागर में चीनी परेशानियां बढ़ी हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चतुष्कोणीय सुरक्षा कार्यक्रम ‘क्वाड’ के साथ जुड़ने में भारत को हिचक थी, जो अब दूर हो गई है। हाल में भारत ने जापान के साथ रक्षा समझौता किया है। इन बातों के दूरगामी परिणाम होंगे।

भारतीय विदेश-नीति के लिए महत्वपूर्ण समय है। टकराव का एक सबक यह है कि चीन पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। लड़ाई हुई भी तो आज 1962 की स्थिति नहीं है। भारतीय सेना काफी अच्छी स्थिति में है और चीन उतनी बड़ी ताकत नहीं है, जितना उसे समझा जा रहा है। हम हरेक देश के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं। पर चीनी अहंकार और पाकिस्तान के साथ मिलकर की जा रही उसकी साजिशों ने भारत को कुछ कड़े राजनयिक निर्णय करने को मजबूर किया है।

आपकी प्रतिक्रिया...