पाकिस्तानी शिक्षा पर तालिबानी कहर


‘शिक्षा’ के द्वारा आज तक मानव का सांसाारिक और व्यक्तिगत उत्थान ही हुआ है, फरंतु यही शिक्षा फाकिस्तान में मृत्यु और मानवीय संवेदनाओं के फतन का कारण बन रही है। एक ओर जहां मदरसों में जिहाद के नाम फर युवकों का ‘ब्रेन वाश’ किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर शिक्षा की ओर अग्रसर हो रही युवतियों को मृत्यु के हवाले किया जा रहा है। मलाला युसुफजई इस घटना का ताजा उदाहरण है। मलाला का नाम किसी के लिये अफरिचित नहीं है।

मलाला से पूर्व भी कई लोगों ने इस तरह के कार्यों की शुरूवात की। कुछ लोगों के नाम सामने आये और कुछ को वहीं दबा दिया गया। अप्रैल,2012 में भारत आई तवाकुल कारमान ने यमन जैसे देश में जहां महिलाओं पर सैकड़ों बंदिशें होती हैं, नारी उत्थान के लिये काफी प्रयत्न किया। 33 वर्षीय तवाकुल कारमान शांति के लिये नोबल पुरस्कार जीतनेवाली सबसे कम उम्र की पहली अरबी और दूसरी मुस्लिम महिला है। पेशे से पत्रकार और मानव अधिकार की पैरोकार तवाकुल यमन में ‘आयरन वुमेन’ और ‘मदर आफ रिवाल्यूशन’ के नाम से जानी जाती है। किसी मुस्लिम समाज के द्वारा किसी महिला को इस तरह की उपाधियां देना अपने अप में बड़ी बात है। हालांकि तवाकुम कहती कि,‘‘किसी भी अन्य धर्म की तरह इस्लाम भी सहिष्णुता,लोकतंत्र और सहअस्तित्व पर यकीन करता है, परंतु कुछ लोग धर्म को गलत ढ़ंग से परिभाषित करके कट्टरता को बढ़वा दे रहे हैं।’’ यह बात सच है कि कुछ लोगों के कारण धर्म का विकृत रूप सामने आ रहा है, परंतु मुस्लिम समाज में इस तरह के लगोगों की संख्या बढ़ रही है और महिलाओं पर हो रहे अत्याचार भी बढ़ रहे हैं। तवाकुम ने यमन में ‘वुमेन जर्नलिस्ट विदाउट चेन’ नामक आंदोलन की शुरुवात की थी और जब धीरे-धीरे इसका असर बढ़ने लगा तो कई महिलायें उनके साथ जुड़ने लगी।

पकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर और राजनेता इमरान खान भी लोकतंत्र की राह पर अग्रसर होनेवाले पकिस्तान के सवप्न देखते हैं। उन्होंने अपने लेखन और सामाजिक कार्यों के द्वारा लोगों को भी प्रेरित करने की कोशिश की परंतु पकिस्तान में इस तरह के कार्य करनेवालों की राह में कई तरह की बाधायें डाली जाती हैं। लीक से हटकर कार्य करनेवालों को वहां की राजनीति और समााज में विशेष महत्व नहीं मिलता।
ऐसा नहीं है कि पकिस्तान में यह सब आज हो रहा है। पाकिस्तान के जन्म से ही वहां ऐसे हालात हैं,और अब ये हालात और बदतर हो रहे हैं। पकिस्तान के जिन क्षेत्रों में तालिबान ने अपना कब्जा जमाया है उन क्षेत्रों में तो महिलाओं पर कई तरह के अत्याचार किये जा रहे हैं। महिलाओं के द्वारा ही इस तालिबानी शासन के खिलाफ आवाज उठाना जितना मुश्किल था, उतना ही घातक भी। परंतु मलाला युसुफजी ने यह काम कर दिखाया। तालिबानी शासन के दौरान इस तरह के कार्यों को अंजाम देना मामूली बात नहीं है।

बच्चों के अधिकारों के लिये कार्य करनेवाली मलाला युसुफज़ई का जन्म 1997 में पाकिस्तान के स्वात जिले के मिंगोरा में शहर हुआ। पाकिस्तान में स्वात घाटी वह क्षेत्र है जहां पर तालिबानियों ने कई वर्षो तक अपना कब्जा जमा रखा था। तालिबानी कब्जे का अर्थ साफ था कि वहां महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई थीं। जिनमें स्कूल जाना, टी.वी. देखना आदि शामिल था। मलाला भी इस फरमान के कारण लंबे समय तक स्कूल से वंचित रही, परंतु उसने अपनी डायरी के माध्यम से न सिर्फ अपने क्षेत्र के लोगों के जागरुक किया बल्कि तालिबान के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये तैयार भी किया। तालिबानी शासन के दौरान मलाला ने ‘गुल मकई’ नामक छद्म नाम से ब्लाग लिखकर तालिबानियों के कुकृत्यों को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की। अपने लेखों और विचारों के माध्यम से वह लोगों को जागृत करने का प्रयत्न करती थी। मलाला का जोर मुख्य रूप से बच्चों के अधिकारों और महिलाओं की शिक्षा पर था। वह स्वयं भी डाक्टर बनना चाहती है। शिक्षा का महत्व और उसका प्रसार करने की ललक उसके खून में ही है, क्योंकि उसके पिता जिया उद्दीन यूसुफजई भी शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। वे स्वयं विद्यालयों की शृंखला चला रहे हैं। मलाला के पिता उसे पेशावर ले गये थे। जहां स्थानीय प्रेस क्लब में उसने भाषण दिया। मलाला ने अपने भाषण में सभी से यह प्रश्न किया था कि, ‘तालिबान ने मेरे शिक्षा के अधिकार को छीनने की कोशिश कैसे की।’ उसके इस भाषण को स्थानीय मीडिया ने छापा और पूरे क्षेत्र में प्रसारित भी किया।

सन 2009 में मौलाना फजलुल्ला स्वात घाटी में तालिबान का नेतृत्व कर रहा था। उसके आतंक के तांडव के भय से लोग उसके फरमान मानने को बाध्य थे। उसने टीवी देखने, संगीत सुनने, लडकियों के स्कूल जाने इत्यादि पर पाबंदी लगा दी। इस दौरान बीबीसी उर्दू के द्वारा मलाला के पिता जियाउद्दीन से पूछा गया कि क्या उनके स्कूल की कोई छात्रा तालिबानी सेना के कब्जे और अपने जीवन के बारे में लिखवाने के लिये तैयार है। स्कूल की सभी लड़कियों से पूछा गया। कोई लड़की राजी नहीं हुई। एक छात्रा इस काम को करने के लिये राजी हुई, परंतु उसके माता-पिता ने उसे मना कर दिया। अंत में मलाला में इसे अपने हाथों में लिया और वह बीबीसी उर्दू के लिये नियमित लेख लिखने लगी।

तालिबानी सैनिकों ने विद्यालयों को नष्ट करना शुरू कर दिया और यह आदेश दिया कि 15, जनवरी 2009 से कोई भी लड़की विद्यालय नहीं जायेगी। मलाला के विद्यालय की प्राचार्या ने उनसे कहा कि कोई भी विद्यालय का गणवेश न पहने और विद्यालय वातावरण भी घर जैसा तब्दील कर दिया जाये। मलाला की शिक्षा कुछ दिन इसी तरह छुपते-छुपाते चलती रही। वह अपनी किताबों को अपने कपडों में छुपाकर ले जाती थी।

इन सब गतिविधियों का असर उसके बालमन पर नहीं पडता था, ऐसा नहीं हैं। मलाला कहती है कि उसने कई बार बहुत बुरे सपने देखे, जिसमें सेना के हेलिकाप्टर और युद्ध के दृष्य होते थे। एक बार विद्यालय से आते समय उसने सुना कोई धमकी दे रहा था कि ‘मै तुम्हे जान से मार दूंगा।’ मलाला ने अपने चलने की गति धीमी की और मुडकर उस व्यक्ति की ओर देखा, परंतु वह व्यक्ति फोन पर बात कर रहा था और किसी को धमका रहा था।

9 अक्टूबर, 2012 को उसने साक्षात मृत्यु को अपने सामने देखा। विद्यालय से लौटते समय, कुछ तालिबानियों ने उस पर गोलियां दागी। मलाला को सिर पर और गले पर गोलियां लगी थी। उसे उपचार के लिये ब्रिटेन ले जाया गया। वहां के डाक्टर राजर ने के अनुसार वह अब ठीक है और सहारा लेकर खड़ी हो सकती है। पन्द्रह वर्ष की उम्र में इतना सब कुछ सहन करना एक अविश्वनीय घटना है। परंतु हम सब इन घटनाओं को देख सुन रहें है। अत: हमें न केवल इन पर विश्वास करना है, बल्कि इनसे सीख भी लेनी है। पाकिस्तान के छोटे से जिले के छोटे से गांव की मलाला ने वह कार्य कर दिखाया, जो बडे-बडे लोग नहीं कर पा रहे है। इस घटना को केवल एक मलाला और तालिबानी आतंकवादियों के रूप में देखा जाये, तो मुद्दा वही खत्म हो जाता है। उसके ठीक होने के बाद कोई उसके कार्यों की ओर ध्यान नहीं देगा। क्या लोगों की सहानुभूति केवल इसलिये उसके साथ है क्योंकि वह एक लडकी है? क्या यह सहानुभूति इसलिये है कि उस पर तालिबानियों ने अत्याचार किया? या इसलिये कि उसकी उम्र इन घटनाओं के सामने बहुत छोटी है? उसके लिये अपने मन में केवल सहानुभूति रखने के बजाय अगर हम उसके द्वारा किये गये कार्यों को आगे बढ़ायें तो उसके प्रति सच्ची सहानुभूति होगी।

आज भारत में न जाने कितनी मलालों कार्यरत हैं, जो स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य कर रहीं है और न जाने कितने ही तालिबानी रूपी लोग हैं जो उनके इस कार्य खत्म करना चाहते हैं। स्त्री शिक्षा के अभाव में कई घर पतन की ओर अग्रसर हो रहे है। कन्या भ्रूण हत्या का मामला भी कुछ-कुछ स्त्री की अशिक्षा के कारण ही बढ़ रहा है। अगर स्त्री शिक्षित है और जानती है कि भ्रूण का कन्या या बालक होना उस पर निर्भर नहीं करता, तो उसमें इसका विरोध करने की क्षमता भी बढ़ेगी।

लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिये किये गये प्रयासों में कहीं न कहीं हमें मलाला जरूर नजर आयेगी। सभी उसके जल्द से जल्द ठीक होने की कामना कर रहे हैं।

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