बलात्कार व कानूनी प्रावधान

पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में, चलती बस में एक छात्रा के साथ हुए सामुहिक बलात्कार ने पूरे देश की सोयी हुई चेतना को झकझोर कर रख दिया। उक्त घटना इस लिए भी गंभीर हो गई क्योंकि अपराधी केवल बलात्कार करके समाधानी नहीं हुए बल्कि उस छात्रा और उसके साथी को निर्भय व आततायीपना से बड़े ही विभत्स रुप से मारापीटा था। उक्त घटना के विरोध में स्वस्फूर्त बड़े पैमाने पर दिल्ली व देशभर में कई दिनों तक आन्दोलन हुए। सरकार द्वारा न्याय दिलाने का भरोसा दिया गया। अतिशीघ्र आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया गया और अब व मुकदमा फास्ट ट्रैक कोर्ट में न्याय प्रविष्ट हो चुका है, जिसकी सुनवाई बंद कमरे में होगी।

बलात्कार के संदर्भ में वर्तमान कानूनी व्यवस्था क्या है यह जानना आवश्यक है। भारतीय दंडे संहिता की धारा 375 बलात्कार के विभिन्न पहलुओं को पारिभाषित करती है जबकि धारा 376 उसके दंडनीय पहलुओं को दर्शाती है। बलात्कार के सामान्य केस में सात साल से कम नहीं और आजीवन कारावास या दस साल तक का कारावास की सजा का प्रावधान है। लेकिन यदि बलात्कार करने वाला पोलीस अधिकारी है और वह पोलीस स्टेशन या उसकी कस्टडी में महिला से बलात्कार करता है, या कोई सरकारी कर्मचारी अपने पद का गलत उपयोग करके बलात्कार करता है, या जेल अधिकारी या रिमांड होम, या बच्चों या महिलाओं के लिए संस्थान का अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर बलात्कार करता है, या किसी अस्पताल का स्टाफ अपने पद का दुरुपयोग कर बलात्कार करता है या किसी गर्भवती महिला या 12 वर्ष की कम आयु की महिला के साथ बलात्कार होता है, या सामुहिक बलात्कार किसी महिला पर होता है तो उस परिस्थिती में 10 साल से कम नहीं लेकिन आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

निर्भया के साथ सामुहिक बलात्कार की घटना एक और नये आयाम को जन्म देती है कि यदि बलात्कारी हिंसा के बल पर बलात्कार करता है और उसे शारिरीक क्षति पहुँचाता है तो उसे आजीवन कारावास से कम नहीं जो मृत्युदंड तक हो सकता है। ऐसा कानून बनाने की आवश्यकता आज की तारीख में निर्भया का केस केवल सामुहिक बलात्कार का केस न होकर सामुहिक बलात्कार व हत्या का केस बन चुका है अत: अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुचाने का प्रावधान धारा 302 में है क्योंकि अपराधियों ने बड़े ही घृणित व विभत्स रुप से उसे मारा है और वे केवल मृत्युदंड के ही भागी है।

उपरोक्त वर्तमान कानून के अंतर्गत भी कई मामलों में गुनाहगारों को फांसी की सजा तक हुई है। बंगाल के चटर्जी का केस इस संबंध में एक मिसाल है। कुछ वर्ष पहले पुणे में एक बड़ी कंपनी में काम करने वाली लड़की को टैक्सी ड्राइवर द्वारा बलात्कार व हत्या के मामले में फांसाी की सजा सेसन्स कोर्ट व मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया लेकिन पिछले हफ्ते उसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उसे आजीवन कारावास में बदल दिया, कारण आरोपी शराब के नशे में था।

वर्तमान कानून भी बलात्कारी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने में समर्थ है, यदि जाँच ऐजेन्सी मामले की सही व वैज्ञानिक जाँचकर सबूत इकट्ठा करे और उसे कोर्ट में सही ढंग से पेश किया जाय। हर मामला एक अलग केस होता और हर केस की अपनी मौलिकता होती है अत: सबूत भी उसी तरह से इकट्ठा करने की आवश्यकता है। जो सबूत इकट्ठा किये जाय वह विश्वास जगाने वाला और सामान्य बुद्धि को पटनेवाला होना चाहिए। और आज के युग में आरोप को सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक सबूत को अधिक सतर्कता से इकट्ठा कर कोर्ट में पेश करने की आवश्यकता है। व्यक्ति विशेष की गवाही को कई कारणों से झुठलाना आसान होता है लेकिन वैज्ञानिक सबूत को झुठलाना बहुत कठिन होता है। अनुभव यह भी बताता है कि केस की सुनवाई में देरी व लड़की या महिला का पहचान प्रसारित होना केस के लिए घातक होता है। उदहारणार्थ किसी लड़की के साथ जब बलात्कार हुआ तब वह 15 या 16 साल की थी और जब केस सुनवाई के लिए आया तो लड़की अपने माँ-बाप के घर न होकर अपने ससुराल अपने पति व बच्चों के साथ है। इस परिस्थिती में जब माँ-बाप का कोर्ट का गवाही का समन्स मिलता है तो वह कोर्ट में आकर हाथ जोड़कर कहता है कि मैं अपनी लड़की को नहीं बुला सकता और न ही उसका पता सकता हूं क्योंकि उसका बसा हुआ घर उजड़ जायेगा। और यदि घटना के समय उस लड़की या परिवार के बारे में ज्यादा प्रचार-प्रसार हो गया तो आगे चलकर यही समाज उसे अपनाने को तैयार नहीं होता है। अत: बलात्कार केवल एक कानूनी अपराध ही नहीं तो यह सामाजिक अपराध भी है। कानून तो सजा देता है लेकिन समाज इस बलात्कारी को सजा न देकर उस पिड़िता को सजा देता है। यह कहां का न्याय है। सच पूछिये तो हमें सामाजिक व्यवस्था में उस बलात्कारी का बहिष्कार व तिरस्कार करना चाहिए और उस पिड़िता को अपनाने के लिए आगे आना चाहिए।
एक सुचना। कई मामले ऐसे भी देखने में आये हैं, जिससे प्रतिद्विन्दी को फसाने के लिए बलात्कार के केस भी दर्ज किये गये और जाँच के बाद वह केस झूठा पाया गया। अत: जाँच ऐजेन्सी की जिम्मेदारी बनती है कि इस तरह के मामलों में बहुत ही गम्भीरता व सजगता से जाँच की जाय जिससे किसी षडयंत्रकारी को बल न मिले।

अंतत: बलात्कार जैसे गुनाहों को रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधानों के साथ साथ सामाजिक सोच भी बदलने की आवश्यकता है और उस सोच बदल के लिए सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है, केस की वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता है, और केस की सुनवाई शीघ्राति शीघ्र तय समय में होने की आवश्यकता है। हम इन थोड़े से उपायों को भी कर सके तो बलात्कार जैसे गुनाह पर लगाम लग सकती है।
आईये स्वामी विवेकानन्द की शीर्घशती वर्ष मातृेशक्ति को जागृत करें व एक संस्कारित भारत का निर्माण करें।

आपकी प्रतिक्रिया...