मदरसे: आतंकवाद की नर्सरी

कट्टरपंथ और मदरसे के सम्बन्धों पर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन इनके प्रति राजनीतिक नेतृत्व की नरम स्थिति के कारण, कानून प्रवर्तन एजेंसियां हमेशा कोई कड़ी जांच करने और किसी भी गंभीर कार्रवाई करने में संकोच करती रही हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि नई शिक्षा नीति आने के बाद मदरसा शिक्षा प्रणाली से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढे जाएंगे। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी क्योंकि मदरसे अब केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन गए हैं।

फ्रांस में हाल ही में हुई आतंकवादी घटनाओं को एक वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। सन 2005 में लगभग 1600 पृष्ठों का एक मैनिफेस्टो इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने जारी किया था। यह मैनिफेस्टो मुस्तफा सेतमरियम नासार ने जारी किया था। मैनिफेस्टो का शीर्षक था ”ग्लोबल इस्लामी रेसिस्टेंस कॉल” अर्थात ’वैश्विक इस्लामी प्रतिरोध आह्वान’। इस घोषणापत्र में यूरोप में जेहाद छेड़ने की बात कही गई थी और स्पष्ट कहा गया था कि पश्चिम के खिलाफ इस्लामी जेहाद के लिए यूरोप को लक्ष्य बनाना ज़रुरी है।

इस घोषणापत्र को आप यूरोप में जेहाद का ब्लूप्रिंट भी मान सकते हैं। कुछ दिन पूर्व फ्रांस में जो हुआ, उसकी जड़ें कहीं न कहीं इस दस्तावेज में हैं। इस दस्तावेज में अल-कायदा से अलग रणनीति अपनाने की बात कही गई थी।

अल-कायदा के मॉडल की दो विशेषताएं थीं। पहली, अल-कायदा का मानना था की जेहाद का लक्ष्य अमेरिका पर हमला होना चाहिए और दूसरा मध्य पूर्व से जेहादियों को ले जाकर अमेरिका में आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दिया जाना चाहिए। हमने जो 9/11 का हमला अमेरिका में देखा वह इसी सोच का परिणाम था। लेकिन 2005 के घोषणा पत्र में दिए गए नए मॉडल के अनुसार यह सुनिश्चित किया गया कि लक्ष्य अमेरिका के बजाए यूरोप हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि बाहर से लाने के बजाए यूरोपीय देशों के भीतर से ही जेहादियों को तैयार किया जाए ताकि वे वहां पर विभिन्न आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे सकें।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अलकायदा का ढांचा पिरामिड के मॉडल पर आधारित था, जहां शीर्ष नेतृत्व द्वारा दिए गए निर्देशों को वर्टिकल आधार पर नीचे पहुंचाया कर उसका क्रियान्वयन किया जाता था। लेकिन 2005 में इस दस्तावेज के बाद एक नया मॉडल यूरोप में विकसित हुआ। इस मॉडल में ऊपर से नीचे तक निर्देश आने के बजाय समानांतर स्तर पर कई प्रकार की आतंकवादी कार्रवाईयों को करने का ढांचा बनाया गया। फ्रांस व यूरोप के अन्य देशों में इस्लामी आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं को इसी नजरिए से देखना चाहिए।

अब सवाल ये है कि भारत और भारतीय उपमहाद्वीप इससे क्या सबक सीख सकते हैं। इस क्षेत्र में इस्लामी आतंकवाद की जड़ बहुत हद तक मदरसों में दी जा रही शिक्षा में है। भारत में इन दिनों एक नई शिक्षा नीति को लेकर खासी चर्चा चल रही है। इस सारी चर्चा में मदरसों के माध्यम से चल रही एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था पर वैसा ध्यान नहीं है, जैसा होना चाहिए था। इसका कारण यह है कि आतंकवाद से जुड़े मसलों पर काम करने वाले दर्जनों विशेषज्ञ यह बता चुके हैं कि बढ़ते इस्लामी कट्टरवाद के पीछे मदरसों की भी एक अहम भूमिका है। भारत में इन मदरसों को लेकर पिछले दो-तीन दशकों में कुछ अध्ययन हुए हैं परंतु कट्टरवाद या आतंकवाद में इनकी भूमिका को लेकर तथा इन मदरसों में क्या शिक्षा दी जा रही है, उस पर लगातार नवीनतम जानकारियों के साथ अध्ययन करने की जरुरत है। मदरसों की मौजूदा भूमिका को समझने के लिए उसके इतिहास में जाना आवश्यक है।

मदरसा आम तौर पर कुरान, इस्लामिक न्यायशास्त्र और कानून, पैगंबर मोहम्मद द्वारा कही गई बातों और उनके कर्म (हदीस और सुन्नत) के अनुवाद और व्याख्या सहित इस्लामी विषयों में निर्देश देने वाले एक शैक्षणिक संस्थान को कहा जाता है। ’मदरसा’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘दरसा’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ’अध्ययन’ करना।  समकालीन संदर्भों में देखा जाए तो कागजों पर तो मदरसे अरबी भाषा और संस्कृति सीखने के केंद्र है, हालांकि हकीकत ये है कि इन विषयों की आड़ में उन्हें कट्टरवाद का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप में मदरसे इस्लामिक आक्रमण और उसके बाद सत्ता नियंत्रण करने के साथ में अस्तित्व में आए। सन् 1226 ई. के आस-पास भारतीय उपमहाद्वीप में मुल्तान में स्थापित शुरुआती मदरसों का उद्देश्य प्रशासन में काम-काज के लिए लोगों को प्रशिक्षण देना तथा इसके साथ भविष्य के लिए धार्मिक विद्वानों (उलेमा) को तैयार करना था। बारहवीं से 16 वीं शताब्दी तक मुस्लिम शासकों के संरक्षण में मदरसों की संख्या और उनके आकार में तेजी से वृद्धि हुई।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद राज्य के मामलों में भारतीय उलेमाओं के प्रभाव में भारी गिरावट आई। उनकी भूमिका सत्ता के नियामक और सहयोगी से सत्ता के खिलाफ षड्यंत्रकारी में बदल गई। इसके बाद, मुस्लिम समुदाय को एक अधिक शुद्धतावादी (कट्टर) इस्लामी शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से, देवबंद में दार-उल-उलूम नाम से एक मदरसा 1867 में स्थापित किया गया। देवबंदी स्कूल उप-महाद्वीप में इस्लाम के प्रचार और प्रसार के लिए आज सबसे बड़ा संस्थान है। देवबंदी स्कूल में इस्लामिक मूल्यों में गिरावट का जिम्मेदार एक अनैतिक और भौतिकवादी पश्चिमी संस्कृति और हिंदू परंपराओं को स्वीकार करने को माना जाता है। हालांकि देवबंदियों का दावा है कि वे किसी भी आतंकवादी समूहों से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन विश्व के प्रमुख आतंकवादी संगठन जैसे तालिबान, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-जिहाद इस्लाम और जैश-ए-मोहम्मद देवबंदी मदरसों में पले-बढ़े लोगों द्वारा स्थापित और संचालित है और उनके पीछे देवबंद मदरसों की प्रमुख ताकत रही हैं।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है कि मदरसे मूलत: इस्लामिक स्कूल हैं, जो इस्लामी विचारों और परंपरा को उर्दू, अरबी और फारसी भाषाओं के साथ सिखाते हैं। आम तौर पर इन मदरसों में जो विषय पढ़ाए जाते हैं वे हैं तहरीर, हदीस, शरिया और मतंक। तहरीर में कुरान की शिक्षाएं, हदीस में पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं और जीवन, शरिया में इस्लामिक न्यायशास्त्र और मतंक में इस्लामिक अभियान और विजय इतिहास की शिक्षा दी जाती है। डिग्रियों को इस्लामिक विचारों के क्षेत्र में विशेषज्ञता के अनुसार दिया जाता है। उदाहरण के लिए आलिम या उलमा को माना जाता है कि वे इस्लामिक विद्वान हैं जिनकी लगभग सभी इस्लामिक मामलों में विशेषज्ञता है; जिन लोगों ने कुरान की सभी आयतों को याद कर लिया हो, उन्हें हाफ़िज़ कहा जाता है; और हदीस में विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति को मुहद्दित के रूप में जाना जाता है।

चूंकि इन शैक्षिक संस्थाओं का मुख्य कार्य इस्लाम की आधिपत्यवादी सोच से छात्रों के जीवन को संतृप्त करना है ताकि वे आगे चलकर एक विशुद्ध मुस्लिम बन सकें, इसका परिणाम यह होता है कि यहाँ अध्ययन करने वाले छात्र  स्वतः और सहज ही कट्टरता के वाहक बन जाते हैं।

प्रो. मुशीरुल हक के अनुसार, वर्ष 1950 में, भारत में केवल 88 मदरसे थे, जो अब बढ़कर 5 लाख से अधिक हो गए हैं। 7 मई, 1995 को दिल्ली में आयोजित एक मुस्लिम शिक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्वर्गीय माधवराव सिंधिया ने कहा था कि भारत में मुगल शासनकाल के दौरान भारत में 1,25,000 मदरसे थे। जून 1996 में प्रकाशित हमदर्द शिक्षा समाज द्वारा अखिल भारतीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट ने उक्त आंकड़े की पुष्टि की।

हालाँकि, कट्टरपंथ और मदरसे के सम्बन्धों पर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन इनके प्रति राजनीतिक नेतृत्व की नरम स्थिति के कारण, कानून प्रवर्तन एजेंसियां हमेशा कोई कड़ी जांच करने और किसी भी गंभीर कार्रवाई करने में संकोच करती रही हैं। इस संकट की गंभीरता उस समय प्रकाश में आयी जब 21 अप्रैल, 2017 को दिल्ली और उत्तर प्रदेश को निशाना बनाने के उद्देश्य से एक आतंकी साजिश की योजना बनाने के लिए बिजनौर के एक मदरसे से पांच मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी हुई। इसी तरह की गिरफ्तारियां महाराष्ट्र में मुंबई, पंजाब के जालंधर और बिहार के पूर्वी चंपारण जिलों से भी हुई।  कुछ महीनों पहले संसद द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरुद्ध देश भर में हुई हिंसा, आगजनी और दंगों में इन मदरसों की भूमिका खुलकर सामने आयी।

राजनीतिक नेतृत्व आजादी के बाद से मदरसा शिक्षा प्रणाली को लेकर आंख मूंदे रहा। इसका परिणाम हमारे सामने है। उम्मीद करनी चाहिए कि नई शिक्षा नीति आने के बाद मदरसा शिक्षा प्रणाली से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढे जाएंगे। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी क्योंकि मदरसे अब केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चुनौती बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आतंकवाद से निपटना है, तो संभवत: सबसे पहले मदरसों का नियमन आवश्यक है क्योंकि वे भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में आतंकवाद की नर्सरी बन गए हैं।

 

आपकी प्रतिक्रिया...