‘गीता’ जीवन के उच्च उद्देश्यों की प्रेरणा

अर्जुन के मन में जो भ्रम की स्थिति निर्माण हुई थी, उस स्थिति के कारण अर्जुन अपने कर्तव्य से दूर हो रहा था। इस प्रकार की अवस्था में हर व्यक्ति को उसी समय उसके कर्तव्य और जिम्मेदारी का आभास कराना अत्यंत आवश्यक होता है, यह सर्वोच्च शिक्षा गीता के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को मिली है।

गीता मानवी संस्कृति का आधार है। इसमें अर्जुन एक निमित्त मात्र है। गीता का मुख्य उद्देश्य मोह और आसक्ति दूर करना है। विश्व की आज की सभी समस्याएं जैसे प्रदूषण, पर्यावरण, संप्रदायिकता, हिंसा, आतंकवाद, जातीयता, भ्रष्टाचार आदि सभी समाप्त हो सकती हैं, यदि सभी प्राणी अनासक्त भाव से अपना कर्म करें। गीता का मानवीय कर्मों से जो संबंध है, उसी के कारण गीता विस्तृत मानव समाज के लिए धर्मशास्त्र बन गयी है और समस्त भारतीयों के लिए समाजशास्त्र बन गयी है। मानवी मन और समाज को सही राह दिखाने और उसे अनुशासित रूप से कार्यरत कराने का महानतम कार्य गीता युग-युग से करती आ रही है। संथ गति से मार्ग क्रमण करने वाली मानवीय संस्कृति की उत्क्रांति में भगवत गीता का मार्गदर्शन अमूल्य है।

आज भी पढ़ने में भगवद् गीता लगभग उतनी ही ताजी और अपने यथार्थ तत्व में बिल्कुल नूतन ही लगती है। इसका कारण यह है कि उसका मानवीय जीवन के प्रश्नों के साथ सीधा संबंध है। यथार्थ में गीता की प्रासंगिकता उस समय से ही है जब वह सर्वप्रथम प्रकट हुई अथवा महाभारत की रचना में सम्मिलित की गई। तब से आज तक हर युग में नई दृष्टि और चिंतन के साथ उसे दोबारा पढ़ने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं और हर बार यही महसूस होता है कि मानवी जीवन में हमें जो कुछ भी करना आवश्यक है; वह सब गीता में उपलब्ध है।

अर्जुन युद्ध से विमुख हो गया था। उसके मन में निर्माण हुए तर्कों ने अर्जुन को युद्ध से विन्मुख कर दिया था। मन में निर्माण हुए इन तर्कों ने अर्जुन को यह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया कि वह युद्ध नहीं करेगा। इन सभी घटनाओं में सबसे अधिक हितकर बात यह थी कि अतीव विनम्रता के साथ अर्जुन परामर्श के लिए भगवान श्री कृष्ण की शरण में गया। भगवान श्री कृष्ण के कुछ निश्चित शब्दों से अर्जुन का मोह दूर हो सका और वह सही रूप में कर्म करने के लिए समर्थ हो सका। श्रीकृष्ण की सहायता अचूक सिद्ध हुई थी। अर्जुन का मोह दूर होकर अर्जुन जब युद्ध के लिए तैयार हो गया, सही मायनों में गीता का प्रयोजन उसी समय समाप्त हो गया था। अर्जुन को खुद पर विश्वास हो गया था। उसने अद्भुत पराक्रम के साथ कौरवों को पराजित किया। पांडवों का राज्य उन्हें पुन: प्राप्त हो गया। गीता का अवतार कार्य उसी समय सफल हो गया था।

अब इस घटना को 5,000 साल हो गए, परंतु आज भी गीता प्रासंगिक क्यों है? गीता का कार्य तत्कालिक स्वरूप का था, यह आंशिक सत्य है; लेकिन कृष्ण ने अर्जुन को गीता में जो तत्व ज्ञान दिया है वह तत्वज्ञान कालातीत है। इसी के कारण इतने सालों बाद भी गीता की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है।

सिर्फ अर्जुन को ही मोह ग्रस्त स्थिति से बाहर निकालने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता का कथन नहीं किया है। अर्जुन के मन में जो भ्रम की स्थिति निर्माण हुई थी, उस स्थिति के कारण अर्जुन अपने कर्तव्य से दूर हो रहा था। इस प्रकार की अवस्था में हर व्यक्ति को उसी समय उसके कर्तव्य और जिम्मेदारी का आभास कराना अत्यंत आवश्यक होता है, यह सर्वोच्च शिक्षा गीता के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को मिली है। भावनाओं के भ्रम में जो बहते हैं, उन्हें कर्तव्यनिष्ठ बनाने का काम श्रीकृष्ण ने सिर्फ अर्जुन के लिए किया है, ऐसा नहीं है। उन्होंने समस्त मानव जाति को गुरु, मित्र, उपदेशक बनकर गीता के रूप में यह अमूल्य उपहार दिया है।

संस्कृति कोई स्थायी वस्तु नहीं है। वह समय के साथ अपने भीतर कई तत्वों को शामिल करती चलती है। प्रत्येक संस्कृति के अपने कुछ बुनियादी मूल्य होते हैं, लेकिन समय के मुताबिक उन्हें बार-बार परिभाषित किया जाता है। जिससे उसका नया रूप सामने आता है। हमारे प्रतीकों पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। दरअसल इससे हमें अपनी प्रतीकों को फिर से परखने और उसे नए नजरिए से देखने का अवसर मिलता है। समय-समय पर तटस्थ होकर नए सिरे से गीता को पढ़ने की चुनौती भारतीय समाज ने दर्शाई है। हम गीता पर कोई भी बात करने से बचने के बजाय उस पर खुलकर एवं स्वस्थ बहस करते आए हैं। गौर करने की बात यह है कि गीता को पूजने वाला या गीता के तत्वज्ञान से प्रभावित होने वाला हिंदू जन समुदाय अपने सामाजिक व्यवहार में कभी भी आक्रमक या हिंसक नहीं रहा है। दरअसल भारतीय जनमानस ने गीता को आत्मविश्वास या आशावाद के एक स्रोत के रूप में देखा है।

वर्तमान समय में भी प्राचीन गीता उपदेश का विश्वसनीय स्थान है। उसे अधोरेखित करते हुए महान आध्यात्मिक संत और गीता के प्रचारक आचार्य विनोबा भावे जी ने कहा है, पुराने शब्दों पर नए अर्थ कलम करने की विचारकों की अहिंसक प्रक्रिया होती है। इसी कारण गीता पर समय-समय पर सटीक चर्चा उपस्थित हुई है। इसी कारण गीता इसके वर्तमान में भी ताजी और सजीवमहसूस होती है।

भारत देश की संस्कृति पर जब भी कोई हमला हुआ है, तब भारतीयों के पुनर्जागरण आंदोलन समय-समय परतंत्रता के खिलाफ खड़े हुए हैं। उस समय समाज में हुए जागरण का प्रतीक गीता को ही बनाया गया है। हमें यह बात जरूर महसूस करनी होगी कि भगवान कृष्ण के मुख से प्रस्तुत हुई गीता भारतीयों के और समस्त मानव जाति की सभी तरह की मुक्ति की अग्रदूत रही है। यह गीता कभी भी रूढ़िवाद या बंधन के लिए प्रेरित करनेवाली नहीं रही। यह गीता तत्व ज्ञान की प्रमुख उपलब्धि रही है।

आदि शंकराचार्य से लेकर संत ज्ञानेश्वर तक सभी संतों, विद्वानों के लिए गीता सदैव आदर्श जीवन दर्शन की पथप्रदर्शक रही है। अनेक आचार्य एवं मध्यकालीन हिंदू विद्वानों ने इस अमृतधारा को निरंतर गति से प्रभावित रखने में अपना योगदान दिया है। वर्तमान युग में स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे मान्यवरों ने गीता पर समय-समय पर अपनी टीका प्रस्तुत की है। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारियों की प्रेरणा चेतना तथा आत्मबलिदान का स्रोत गीता रही है। खुदीराम बोस तथा मदनलाल ढिंगरा गीता हाथ में लेकर देश के लिए बलिदान हो गए थे। महर्षि अरविंद ने स्वयं गीता को भारतमाता के चित्र सहित छपवाया। यहां तक कि जब ब्रिटिश सरकार को गीता में बम बनाने का ज्ञान दिया हुआ है, यह भ्रम हो गया था, तब उसकी जांचके लिए अधिकारियों की नियुक्ति की गई। भगवद् गीता में जांच अधिकारियों को बम बनाने का तरीका तो नहीं मिला। लेकिन भगवद् गीता में भारतीयों को आत्मबल देने का सामर्थ्य है, यह बात ब्रिटिशों को महसूस हो गई। गीता भक्ति, आत्मगौरव तथा आत्मसम्मान का भाव भारतीयों में निर्माण करने में सहायक रही है।

1950 में जब भारत का संविधान बना तब इसमें भारतीय संस्कृति तथा दर्शन के 22 उद्बोधन चित्र भी थे। इसमें एक चित्र संविधान के नीति-निर्देशक तत्व में भगवान श्री कृष्ण का गांडीवधारी अर्जुन को गीता उपदेश देते हुए भी था। यह सर्वविदित है कि देश के संविधान में राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत ,राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रपुरुष, राष्ट्रीयपशु तथा राष्ट्रीयपक्षी आदि को निश्चित किया गया था। परंतु भारत के राष्ट्रीय धर्म ग्रंथ पर चिंतन नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि 10 सितंबर 2007 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय में सरकार को संविधान के अनुच्छेद 51 (क) के अंतर्गत धर्म ग्रंथ को घोषित करने को कहा। इसके लिए आधार स्वरुप में भारतीय जीवन पद्धति तथा राष्ट्रीय आंदोलन के प्रेरणा स्रोत ‘गीता’ को बतलाया। यह भी कहा गया कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करे और इसके आदर्शों के अनुकूल चले।

आचार्य विनोबा भावे ने गीता प्रवचन के माध्यम से कई व्याख्यान भारतीय समाज को दिए। इन सभी व्याख्यानों में केवल अध्यात्म नहीं है, केवल भक्ति नहीं है, केवल श्रद्धा नहीं है। बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की कला विनोबा जी के व्याख्यानों में समय-समय पर प्रस्तुत हुई है। विनोबाजी स्वयं एक कर्मयोगी थे और उनके कर्मयोग की प्रेरणा भगवद् गीता थी। महात्मा गांधी जी कहा करते थे ‘कुरुक्षेत्र का युद्ध तो निमित्त मात्र है। सच्चा कुरुक्षेत्र तो हमारे शरीर के अंदर है। हमारे शरीर के अंदर ही कुरुक्षेत्र और धर्मक्षेत्र भी है।’ गांधी जी के शब्दों में गीता और महाभारत का महत्व इस प्रकार से है, वे कहते हैं कि ‘गीता उस तरह का धर्मग्रंथ नहीं है, जैसे कि बाइबल या कुरान है। सत्य यह है कि गीता में हिंदू शब्द एक बार भी नहीं आया है। कृष्ण-अर्जुन के संवाद से बनी गीता अनासक्त कर्मयोग सिखाने वाला एक महानतम वैज्ञानिक ग्रंथ है। जिसका उद्देश्य केवल अखिल मानवता का हित ही है। इस कारण गीता मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। आत्मज्ञान और उस ज्ञान को प्राप्त करने के साधनों का मूल स्त्रोत है गीता।

शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्यमाचार्य, संत ज्ञानेश्वर से लेकर वामन पंडित, लोकमान्य तिलक, योगी अरविंद, महात्मा गांधी, विनोबा भावे तक महान पुरुषों ने गीता का भावार्थ अपने-अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है। श्री शंकराचार्य जी ने अद्वैत वेदांत अंग से गीता पर कर्म संन्यास का ज्ञान प्रस्तुत किया है। रामानुजाचार्य ने विशिष्ट द्वैत पर, मध्यमाचार्य ने केवल द्वैत पर गीता का अर्थ निकाला है। किसी ने द्वैत पर तो किसी ने अद्वैत पर गीता का अर्थ निकाला है। श्री संत ज्ञानेश्वर जी को पूर्णद्वैत के माध्यम से गीता में प्रकाश का साक्षात्कार हुआ है। वामन पंडित जी को भक्ति योग अध्यात्म का अर्थ प्राप्त हुआ है। लोकमान्य तिलक जी ने ’कर्मसन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’ कहकर कर्मयोग का प्रतिपादन किया है। महात्मा गांधी जी को अनासक्ति योग का और विनोबा भावे जी को साम्ययोग का शोध हुआ है। उस समय की समस्याओं के निर्मूलन के लिए जो भावना साधकों को गीता के माध्यम से महसूस हुई हैं, उसको उन्होंने अपने संदर्भ की सुसंगत भाषा के द्वारा प्रस्तुत किया है। उस समय की समस्या निर्मूलन के लिए गीता को उपयोग में लाया है। गीता निर्मिती के प्रयोजन समय से लेकर गीता के कार्य को अलग-अलग अर्थों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। समय-समय पर पंथ प्रवर्तकों एवं समाज सुधारकों ने अपनी-अपनी भाषा में उसे प्रस्तुत किया है परंतु इस प्रस्तुति के समय गीता की मूल प्रकृति को कहीं भी हानि पहुंचाने का प्रयास किसी ने नहीं किया। गीता का मूल अर्थ कायम रखकर समय के अनुसार अर्थ प्रस्तुत करने में यह सभी भाष्यकार यशस्वी हुए हैं।

आज केवल आधुनिकता को बढ़ावा देकर हम भौतिक अपचन की ओर बढ़ रहे हैं। इसी कारण वर्तमान में मानव और मानवता की बुनियाद कमजोर होती दिखाई दे रही है। वर्तमान समय की सामाजिक स्थिति की ओर देखने पर हमें यह महसूस होता है कि आज मनुष्य और समाज असंख्य समस्याओं से ग्रस्त है। व्यक्तिगत जीवन में सुख, शांति, नीति, निर्भरता किस प्रकार प्राप्त हो सकती है? सामाजिक जीवन में प्रेम, ऐक्य, प्रामाणिकता, समरसता किस प्रकार से निर्माण हो सकती है? वर्तमान युग के समाज एवं मानव के सम्मुख उपस्थित इन समस्याओं का निराकरण करने के लिए अर्थ संस्था, विज्ञान संस्था, राजनैतिक संस्था, शिक्षा संस्था और धर्म संस्था अपना-अपना योगदान दे रही है। लेकिन वर्तमान में उपस्थित इन समस्याओं का निराकरण करने के बजाय उनका कार्य ही एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आज फिसलती हुई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थिति का सामना किस प्रकार किया जा सकता है? यह प्रश्न सर्व सामान्य व्यक्ति के सामने उपस्थित हो रहा है। क्योंकि आज के समाज का चित्र ही बदल गया है। प्रत्येक व्यक्ति डरा हुआ, सहमा हुआ, तनाव ग्रस्त और भ्रमित मन:स्थिति में जीवन जी रहा है। समाज की इस स्थिति को देखते हुए हजारों साल पहले कौरव पांडवों के बीच लड़े गए महाभारत युद्ध की याद आती है। अर्जुन को भ्रमित मानसिक अवस्था से बाहर निकालने के लिए और उसे पुन: कर्तव्यनिष्ठ बनाने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि पर ही गीता का कथन किया था। बात सही है कि गीता निर्मिती का काल अब नहीं है। लेकिन गीता में जो तत्व प्रस्तुत हैं, वे अभी भी काल बाह्य और परस्थिति बाह्य नहीं हुए है। कारण वह अक्षर साहित्य का एक कालातीत तथा अमर उदाहरण है। साथ ही जीवन के उदात्त तत्वों को सिखाने एवं संवारने वाला भी है। परिवर्तन ही संसार का नियम है। परिवर्तन के बिना समाज निरंतर आगे बढ ही नहीं सकता।

भारत आज विश्व के सामने स्वाभिमान से खड़ा है। इसमें महाभारत, रामायण, गीता जैसे आध्यात्मिक साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। इनमें से एक भी ग्रंथ भारत में निर्माण नहीं होता, तो भारत का अस्तित्व कब का समाप्त हो चुका होता। अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भी समय-समय पर दैनंदिन व्यवहार में भी गीता आंशिक रूप से कहीं ना कहीं जरूर होती है। हम गीता के बिना जी नहीं सकते। गीता के इस सार्वकालीन महत्व को पहचानकर भारत के साथ सारा विश्व गीता को अपना रहा है। नई ऊंचाई छूने को बेताब भारत के कर्ता-धर्ताजनों को प्राचीन ग्रंथ की शरण में जाना अत्यंत आवश्यक है। गीता केवल सफलता का अर्थ नहीं बताती बल्कि जीवन के उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी प्रेरित करती है। गीता हमारे प्रत्येक के जीवन में प्रकाश लाने में सहायक हो सकती है।

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  1. सुरेश गोविंद घरत

    गीता ग्रंथ धर्म का मतलब बताता है।और धर्म के उपर लिखा आर्टिकल अपने अंदर के ईश्वरत्व को भाता है।

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