कोंकण के ललित जैन

वर्तमान में विश्व एक गांव बन गया है। आज वैश्वीकरण के युग में विश्व के किसी भी कोने में जाकर वहां उद्योग-व्यवसाय करना बहुत बड़ी बात नहीं मानी जाती, लेकिन आज से 70-80 साल पहले राजस्थान से कोंकण में आकर अपना उद्योग शूरू करना किसी आश्चर्य से कम नहीं था, क्योंकि उस वक्त कोंकण उद्योग भूमि के रूप में परिचित नहीं थी, लेकिन कहते हैं कि जहां न जाये गाड़ी, वहां जाये मारवाड़ी। इसी उक्ति को चरितार्थ करते हुए ललित सुरेश जैन के प्ाूर्वज कोंकण के मंडनगढ़ में आकर बस गये। उस समय मंडनगढ़न तो औद्योगिक और न ही व्यापारिक द़ृष्टि से अनुकूल था। इन परिस्थितियों में भी वहां उद्योग खड़ा करने की इच्छा लेकर वहां कई उद्योग श्ाुरू करना किसी आश्चर्य से कम नहीं माना जा सकता। ’हम होंगे कामयाब’ का द़ृढ़निश्चय सामने रखकर राजस्थान के इस जैन परिवार ने कोंकण की भूमि को उद्योग की धरा के रूप में तब्दील कर दिया। कोंकण में अपना उद्योग खड़ा करने के लिए राजस्थान से आये जैन परिवार की चार पीढ़ियों ने दिन-रात एक कर दिया।

राजस्थान के मेवाड़ परिक्षेत्र की राजसमंध तहसील के टिकरवाड़ गांव से आये एक राजस्थानी परिवार को मंडनगढ़जैसे ग्रमीण भाग में धन-दौलत, मान-सम्मान कमाना आसान नहीं था, जितना समझा जा रहा था, लेकिन जैन परिवार ने अर्हनिश परिश्रम करके कठिन काम को भी आसान बना दिया। आज ललित जैन का नाम कोंकण क्षेत्र में स्टील तथा फर्नीचर व्यवसाय में चर्चित हो चुका है। भगवान उद्योग समूह के नाम से उनका उद्योग मंडनगढ़ परिसर सुपरिचित है।

ललित जैन 30 वर्षीय युवक हैं। इतनी कम उम में भी उन्होंने अपने व्यवसाय को ऊं चाइयां दिलाने में अहम योगदान दिया है। विजन तथा परिश्रम के साथ-साथ समाज सेवा करना उनका विशेष ग्ाुण है। आज मंडनगढ़परिसर में केवल दस राजस्थानी परिवार रहते हैंं, पर ललित जैन का कहना यह है कि मेरे परिवार का इस कोंकण की माटी से कुछ इस तरह से जुड़ाव हो गया है कि लोग हमारे परिवार को राजस्थानी नहीं मानते। कोंकण का गणेशोत्सव, धार्मिक जुलूस, अन्य पर्व सभी हम लोग अपने घर में मनाते हैं। सभी लोगों के साथ मेरे परिवार से सौहार्दप्ाूर्ण रिश्ता है। दूध में चीनी के घुलने के बाद जिस तरह चीनी का अस्तित्व खत्म हो जाता है, उसी तरह हम लोग कोंकण की संस्कृति में इस तरह से घुल-मिल गये हैं कि कोई हमें राजस्थानी परिवार का नहीं मानता।

सबको साथ लेकर चलने के स्वभाव के कारण ही ललित जैन को उद्योगपति के रूप में कम पर समाज सेवक के रू प में
ज्यादा पहचाना जाता है। जैन का मानना है कि उन्होंने परिसर में जो कार्य किये हैं, वे स्तुति करने योग्य नहीं हैं, बावजूद इसके स्थानीय लोग उनके कार्यों की सराहना करते नहीं थकते। लोगों का कहना है कि जैन अर्हनिश पसीना बहाकर थके शरीर के लिए आरामगाह खोेजते हैं। जो खेतों, बागों में मेहनत करते हैं, वे पल-दो पल विश्राम भी करना चाहते हैं, ऐसे परिश्रमियों के लिए ललित जैन ने मंडनगढ़ में कुछ स्थानों पर प्याऊं श्ाुरू किये हैं। इसके माध्यम से लोगों को ठंडा पानी दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, जैन समय-समय पर रक्तदान शिविरों का भी आयोजन करते रहते हैं। स्थानीय स्तर पर होने वाले उत्सवों का आयोजन भी जैन की अग्ाुवाई में होता है। स्कूली विद्यार्थियों को आवश्यक शैक्षणिक सामग्रियों का वितरण तो जैन की ओर से किया ही जाता है, इसके साथ ही साथ स्थानीय मन्दिरों में होने वाले धार्मिक आयोजन में ललित जैन बढ़-चढकर हिस्सा लेते हैं। समाज सेवा से जुड़े कार्य वे अक्सर किया करते हैं। मंडनगढ़ बस डिपो में यात्रियों के लिए आवश्यक सुविधाएं ललित जैन के सद्प्रयासों के कारण ही सम्भव हो पायी है। जैन अपने द्वारा दी गयी सेवाओं का उल्लेख करना उचित नहीं मानते। उनका मानना है कि किसी की मदद करके उसे समाज में प्रचारित करना सेवा नहीं कहलाती। जैन सेवा करते हैं, उसकी कोई कीमत पाने की मंशा नहीं रखते, इसीलिए ललित जैन दिये गए दान तथा समाज कार्य का उल्लेख करना टालते हैं।
रत्नागिरी-रायगढ़ जिलों में लगभग 500-550 राजस्थानी परिवार रहते हैं। ये राजस्थानी परिवार मुख्यत: उद्योग क्षेत्र से ही जुड़े हुए हैं। विविध उद्योगों के माध्यम से प्राकृतिक रू प से सुन्दर कोंकण को और अधिक सुन्दर बनाने का प्रयत्न यहां के उद्योग क्षेत्र से जु.डे राजस्थानी परिवारों ने किया है। ये राजस्थानी परिवार के लोग भारी पैमाने पर समाज सेवा के अनेक उपक्रमों से जुड़े हुए तो हैं, पर राजनीति के क्षेत्र में इन लोगों की कोई खास रुचि दिखायी नहीं देती। कोंकण-मेवाड़ मण्डल की स्थापना यहां के राजस्थानी लोगों का एक सशक्त संगठन है। इस संगठन के बैनर तले वार्षिक सम्मेलन, विविध उत्सव तथा सेवा कार्य होते रहते हैं। ललित जैन का कहना है कि राजस्थान की संस्कृति, पराक्रम, सम्पन्नता, धार्मिक स्वरू प विशाल है और राजस्थानी संस्कृति पर मुझे गर्व है, लेकिन जिस भूमि ने हमें बड़ा किया, उस महाराष्ट की कोंकण की सरजमीं ही हमारी कर्मभूमि है और इस कर्मभूमि को मैं अपने श्रम से सुन्दर तथा उद्योग कुशल बनाने को अपना प्रथम कर्तव्य मानता हूं।

अत्यन्त कम आयु में बड़ी समझ रखने वाले ललित जैन अपने सफलता का प्ाूरा श्रेय अपने पिता सुरेश जैन को देते हैं। वे कहते हैं कि 10-12 की आयु से ही मैं अपने पिता जी के साथ उद्योग क्षेत्र में प्रविष्ट हो गया था। उद्योग क्षेत्र का ककहरा सिखाते समय पिता जी ने मुझे समाज में कैसे रहना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, इन बातों को अच्छी तरह से सिखाया। जैन का मानना है कि पिताजी ने मुझे बताया कि एक बार समाज से संवाद स्थापित हो गया तो फिर सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। पिताजी ने बचपन में उद्योग के बारे में जो सीख दी, उसके कारण मैं निरन्तर अपने कार्यों में सफलता हासिल करता चला गया।
—–

आपकी प्रतिक्रिया...