कालिदास की बरखा रानी

आकाश में छाये काले-काले बादल, तेज बहती हवाएं, बीच में चमकती बिजुरिया और अचानक क्षण भर में सारी सृष्टि को भीगो कर प्रसन्न करने वाले वरुण राजा का आगमन….! केवल कल्पनाभर से मन पर एक आल्हाददायी छिड़काव का आभास होता है! चिलचिलाती धूप में चार माह झुलसने के बाद जब साल भर बिछुड़ी बरखा रानी लौटती है तब सारे ताप-संत्रास विलुप्त हो जाते हैं और अंग-अंग शीतलता से भर जाता है! आसपास का सब कुछ शीतल हो जाता है, और ऐसे ही किसी शांत क्षण में अचानक मन में उतरता है कविश्रेष्ठ कालिदास!
संस्कृत कवियों की शृंखला में महाकवि कालिदास का स्थान अग्रणी है। लेकिन इससे भी महत्वप्ाूर्ण यह कि रसिकों के मन में कालिदास का स्थान धुव तारे जैसे अटल है। उनकी सात कलाकृतियों का इंद्रधनुष पीढ़ी-दर-पीढ़ी रसिकों को आनंदविभोर कर रहा है।

कालिदास के काव्य की विशेषताएं हैं उसका अनोखा सृष्टि वर्णन और प्रकृति के प्रति उसका चिर स्नेह। इसमें भी वर्षा ॠतु और प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन करते समय वह और अधिक खुलता चलता है। शायद, इसी कारण उसके प्रसिध्द काव्य ‘मेघदूत’ का नायक अपनी पत्नी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए एक बरसाती बादल का चयन करता है। महाराष्ट्र में नागप्ाुर के निकट रामटेक से हिमालय की तराई में स्थित काल्पनिक नगरी अलकाप्ाुरी के अपने आवास तक इस दूत को भेजते समय कालिदास का नायक जिस आत्मीयता से सभी स्थानों का वर्णन करता है उसे पढ़ते समय पाठक भी इस आनंददायी यात्रा का एक अंग बन जाता है।

यह बरसाती बादल पहाड़ का सामना करने के लिए तत्पर किसी मदमस्त हाथी की तरह केवल अपने अस्तित्व से ही महिलाओं, प्ाुरुषों, चातकों, बग्ाुलों, राजहंसों जैसे पक्षियों, नदियों, वृक्ष-लताओं सब में उत्साह का संचार कर देता है। वास्तव में, जैसे कि कालिदास ने कहा है, धुआं, बिजली, पानी और हवा से बने निर्जीव बादल के पास इतनी क्षमता कहां से हो? लेकिन प्रेम में व्याकुल नायक को जैसे बादल को दूत के रूप में चुनते समय सजीव-निर्जीव का विवेक नहीं होता, वैसे ही पाठकों के रसास्वाद में मेघ का अचेतन होना कहीं बाधा नहीं बनता। कालिदास ने कहा है-

कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषू।

हम हमारे प्रिय व्यक्ति के सौंदर्य के विभिन्न एवं अनोखे पहलुओं की जिस तरह प्रशंसा करते हैं उसी तरह कालिदास न केवल इस कृष्णमेघ का वर्णन भावविभोर होकर करता है, बल्कि इस सारे वर्णन में विहंग द़ृष्टि अपनाता है। यह विहंग द़ृष्टि ही उसके काव्य-सौंदर्य का बलस्थान है। इंद्रधनुष के साथ मेघ को देख कर कभी उसे सांवले कृष्ण की याद आती है, तो कभी चर्मण्वती नदी के श्ाुभ्र प्रवाह पर झुके काले बादल की ओर देखते समय उसे पृथ्वी के गले में पहनी इंद्रनील मणियों से ग्ाूंथी मोतियों की माला का आभास होता है।

एकं मुक्तागुणमिव भुव: स्थूलमध्येन्द्रनीलम।

वर्षा की बूंदों से सराबोर मेघ को हिमालय के सफेद सानिध्य में देखते हुए कभी उसे शंकर के वाहन नंदी के पैर से उकेरे कीचड़ का आभास होता है, तो कभी उसे गौरवर्णीय बलराम के कंधे पर धरे काले कम्बल का स्मरण हो आता है, तो कभी उसे बलि को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए विष्ण्ाु के कदम की याद आती है।

यही कृष्णमेघ गंगा नदी की श्ाुभ धारा पर जब झुकता है तब उसे लगता है कि गंगा और यमुना का संगम कहीं गलत जगह पर हो गया है।
वर्षा और नदी के भौगोलिक अथवा वैज्ञानिक रिश्ते की श्ाुष्कता कालिदास की कलम के स्पर्श से ही एक रम्य सौंदर्यानुभूति में बदल गई है। कालिदास ने नदी को वरुण (वर्षा) की प्रेयसी कहा है और उसके वियोग में वह किसी चोटी की तरह कृश हो गई है। वर्षा की फुहारों के उतरने का मतलब है नदी का उसके प्रियतम से मिलन। नदी अपनी लहरों, प्रवाह के भंवरों जैसे प्यारभरे कटाक्षों से अपने प्रियतम को आकर्षित कर रही है। नदी के प्रवाह के तरंगों को प्रेयसी व्दारा प्रियतम से किए संकेतों की उपमा देते हुए कालिदास कहता है कि इस तरह के प्यारभरे कटाक्षों का माने है प्रियतमा से प्रणय का मिला पहला आश्वासन।

मेघ की हल्की धाराओं के बरसते ही काले-काले पत्थरों को चीर कर नर्मदा का दूधिया प्रवाह निकला है। इस प्रवाह को आकाश से देखे तो ऐसा लगता है मानो किसी हाथी की काली देह पर दूधिया नक्काशी की गई हो।

कालिदास के महाकाव्य ‘मेघदूत’ का नायक मेघ को अपना मित्र मान कर उसे सलाह देता है कि किस परिस्थिति में किस तरह बर्ताव करें। वह कहता है, उज्जयिनी के महांकाल मंदिर के पास पहुंचने पर ऐसी गर्जना करना मानो शिव की आरती में डमरू बज रहा हो। लेकिन इतनी भी गड़गड़ाहट न करना कि रात के अंधेरे में प्रियकरों से चोरी-छिपे मिलने जा रही प्रेमिकाएं ही डर जाएं। इसके बजाय अपनी रागिनी बिजली की सहायता से घने अंधेरे में भी थोड़ा-सा प्रकाश फलाते रहना और मिलन को उत्सुक उन प्रियतमाओं की सहायता करना। काले अंधेरे में चमकने वाली यह बिजली मानो कसौटी के पत्थर पर खिंची कालिदास की सोने की रेखा है।

कालिदास नायक के जरिए मेघ से कहता है, हे मेघ अपनी यात्रा की राह में आने वाले राहगीरों, खेतों में फल तोड़ने वाली महिलाओं, किसानों की कुल वधुओं आदि की मेघ से जो अपेक्षाएं होती हैं उन्हें हल्की फुहारों को छोड़ कर आंशिक ही क्यों न हो, परंतु अवश्य प्ाूरी करना।
हे बादल, पति वियोग से तड़प रही प्रिया को जलमिश्रित हवा के शीतल झोंकों से थोड़ा आश्वस्त कर देना। इसी तरह दावानल से तप्त अरण्य को अपनी वर्षा से शांत कर देना।

हे बादल, मेघ के लिए आनंदाश्रु बहाने वाले मोरों को संतुष्ट कर आगे बढ़ना।
मेघ को चाहिए कि इन सभी के कष्टों का निवारण करें, क्योंकि पीड़ितों के दुखों का निवारण करना ही वास्तविक सम्पन्नता है। कालिदास के शब्दों में कहना हो तो-

आपन्नार्तिप्रशमनफला: सम्पदो ह्युत्तमानाम् ।

बरखा ॠतु प्रेमीजनों की ॠतु है। इसलिए प्रियतमा को मनाने का यही काल है। इसीलिए इस नाजुक कार्य में मेघ ही प्रेमियों की सहायता करें।

इस तरह की नाजुक भावनाएं व्यक्त करते समय कालिदास का नायक मेघ को सतर्क भी करता है कि शरभ यानी जंगली हाथी यदि अपना मार्ग छोड़कर अपने जैसा ही दिखने वाला कोई दुश्मन मान कर तुम पर धावा बोल दें तो ओलों की वर्षा कर उसे भगा देना! वह मेघ से यह भी कहता है कि जिस तरह कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने तेज तीरों की बारिश की थी उसी तरह वहां अपनी तेज धाराओं की झड़ी लगा देना।

नायक मेघ से कहता है, शिव के तेज को धारण करने वाले कार्तिकेय का स्वर्गंगा के पवित्र जल और फूलों से अभिषेक करना। इसी तरह कार्तिकेय के वाहन मोर को अपनी गड़गड़ाहट के ताल पर नृत्य करने का अवसर देना।

हिमालय के कृत्रिम क्रीड़ा पर्वत पर चढ़ते समय पार्वती को कोई दिक्कत न हो हे इसलिए मेघ अपना जलवर्षाव रोक रखना और स्वयं को मानो सीढ़ियों में परिवर्तित कर उसे चढ़ने में सहायता देना!

कालिदास की कल्पना की उड़ान देखिए। वह कहता है, देवस्त्रियों के हाथ के कंकणों में जड़ित रत्नों के कारण यदि हे मेघ तुममें अनेकानेक छेद हो जाए तो अपने को स्नान के लिए बना धारायंत्र (आधुनिक शावरबाथ) मान लेना।

नायक अपने मेघ दूत को कुछ विश्रांति भी देना चाहता है। वह कहता है, घर की पनौती में थोड़ा आराम कर लेना। तुम्हारी प्रिया अर्थात बिजली भी चमकचमक कर थक गई होगी! इस तरह प्रकृति पर मानवी भावनाओं को आरोपित करते हुए कहीं कृत्रिमता न आने देना कालिदास की शैली की विशेषता है।

कभी जोरदार और कभी हल्की धाराएं बरसाते हुए मेघ जिस तरह ‘मेघदूत’ के नायक के अपेक्षित स्थल पर पहुुंचता है, उसी तरह कालिदास का लेखन पाठकों को रसास्वाद के आनंद-स्वर्ग में पहुंचा देता है।

इसी तरह षड्ॠ तुओं को समर्पित ‘ॠ तुसंहार’ काव्य भी कालिदास के असाधारण प्रकृति वर्णन का अनुपम उदाहरण है। ग्रीष्म ॠ तु में गर्मी के संताप का वर्णन करने के बाद जब वर्षा ॠ तु का वर्णन आरंभ होता है तब मन को आल्हादित और शांत करने का औचित्य भी प्ाूरा हो जाता है।

यहां वरुण आते भी हैं तो किसी दिग्विजयी समाट की तरह! साथ में होते हैं बादलों के हाथी, बिजली के बैनर और मेघगर्जनाओं के नगाड़ों के गंभीर नाद!

ससीकराम्भिधरमत्तकुन्जस्तडित्पताकोऽशनिशब्दमर्दल:।
समागतो राजवदुध्दतद्युतिर्घनागम: कामिजनप्रिय: प्रिये॥

प्रेमियों के प्रिय ॠ तु में जब काले-काले बादल बिजली की प्रत्यंचा से सज्जित इंद्रधनुष से तेज तीर छोड़ने श्ाुरू करते हैं तब परदेस में बसे प्रेमियों के मन में तूफान उठता है। सारी सृष्टि में प्रसन्नता का माहौल होता है और पृष्टवी भी हरी घास के कारण वैदूर्य जैसी, इंद्रगोप कीड़ों के कारण नीलमणि जैसी और कर्दली के चमकीले पत्तों के कारण विभिन्न रंगों के रत्नों से आभूषित किसी स्त्री जैसे लगने लगती है।

प्रभिन्नवैदूर्यनिभैस्तृणाकुंरै: समाचिता: प्रोत्थितकन्दलीदलै:।
भिाति शुक्लेतररत्नभूषिता वरांगनेव क्षितिरिन्द्रगोपकै:॥

मयूर अपने पंख फलाकर नृत्य कर वर्षा के आनंद को प्रकट करता है।
सुश्राव्य ग्ाुंजन करने वाले भौंरे उत्साह में असली कमल को छोड़कर मोर के फैले पंखों में स्थित मोरपंखों को ही कमल मान कर उन पर झपटतेे रहते हैं! महिलाएं नए खिले केशर, केतकी और कदम्ब के फूलों की मालाएं बालों में ग्ाूंथती हैं और ककुंभ के फूलों के कर्णफूल परिधान करती हैं।

बारिश की धाराओं से खिल उठी पेड़ों की शाखाओं को देखकर कालिदास को मानो सारा जंगल ही नृत्य करता जान पड़ता है। धूल, मिट्टी, घास, कीटक मिल जाने से बदले रंग और सर्पिली मोड़ के कारण नदी का प्रवाह सांप की तरह महसूस होता है और मेंढक उससे डरते हैं। दावानल से क्लांत विंध्याचल वर्षा की धाराओं से शीतलता अनुभव करता है और बेहद प्रसन्न होता है।
वर्षा ॠ तु को कालिदास ने ‘बहुग्ाुणरमणीय’ और ‘कामिनीचित्तहारी’ अर्थात सौंदर्य के ग्ाुणों से भरप्ाूर और स्त्रियों के मन को मोहित करने वाला कहा है।

वास्तव में कालिदास निसर्ग कवि ही है। वह वर्षा को सकारात्मक आरंभ के रूप में देखता है। वर्षा नवसृजन का आरंभ है, यह वैज्ञानिक सत्य भी है। लेकिन, वर्षा के कारण सम्प्ाूर्ण स़ृष्टि में संचारित होने वाला चैतन्य जब कालिदास की कलम से उतरता है तब उसका सौंदर्य कई ग्ाुणा बढ़ जाता है।

पति वियोग में झुलस रही पत्नी को रेखांकित करते हुए कालिदास कहता है-
महिलाओं का हृदय मूलतया ही कोमल होता है। लेकिन, वियोग के समय आशा का अटूट धागा उन्हें सम्हाल लेता है और विरह की वेदनाएं सहने की क्षमता देता है। वर्षा के बारे में वर्णन में कालिदास की यही विचारधारा झलकती है। ग्रीष्म का कितना भी ताप हो अर्थात जीवन में कितने भी दुख हो, फिर भी इसके बाद बारिश होगी और सारा संत्रास दूर होगा अर्थात जीवन में चाहे जितने दुख हों फिर भी सुख का सवेरा अवश्य आएगा। यह आशा व्यक्ति को दुख सहने की शक्ति देती है। यह संदेश कालिदास की कृतियों से पाठकों तक पहुुंचता है। उसने ‘मेघदूत’ में स्वयं ही कहा है-

कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दु:खमेकान्ततो वा।
नीचैर्गच्छत्युपरि च दशां चक्रनेमिक्रमेण॥

अर्थात, किसी भी व्यक्ति के भाग्य में केवल दुख या केवल सुख ही नहीं होता। जीवन के सुख-दुख की अवस्थाएं किसी चक्र की भांति ऊपर- नीचे होती रहती हैं।

कालिदास ने ‘मेघदूत’ में कहा है, विरह में प्रेम कम नहीं हो जाता, उसकी मिठास अधिक बढ़ती है। उसकी यह विचारधारा जीवन के सुख-दुख को लाग्ाू होती है, क्योंकि दुख सहन करने के बाद आने वाला सुख वाकई अधिक आनंद देने वाला होता है।

इस बुनियादी विचारधारा के कारण ही कालिदास की वर्षा के प्रति द़ृष्टि रुक्ष नहीं है। उसके लिए वर्षा की नवसंजीवनी सभी दुखों को सहलाने वाली, जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली है।
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