महाराष्ट का सांस्कृतिक वैभव पंढरपुर की ‘वारी’

‘वारी’ यानी पैदल यात्रा। पंढरपुर तीर्थक्षेत्र। पंढरपुर की ‘वारी’ महाराष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव और पारमार्थिक ऐश्वर्य है। इस ‘वारी’ की प्राचीन परम्परा व इतिहास है। पंढरपुर की ‘वारी’ का जिक्र चौथी और पांचवीं सदी में मिले ताम्रपटों में मिलता है। ‘वारी’ के बारे में यह सबसे प्राचीन प्रमाण है। इसके बाद होयसल सम्राटों के काल शके 1159 (इ.स. 1237) का एक शिलालेख भी ‘वारी’ के बारे में विवरण देता है। तामपट, शिलालेखों के बाद दस्तावेजों के रूप में ठोस प्रमाण संत ज्ञानेश्वर के अभंगों से मिलता है। संत ज्ञानेश्वर के परिवार में पंढरी की ‘वारी’ की प्रथा थी। इन प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट होता है कि पंढरपुर की ‘वारी’ पिछले हजार- बारह सौ वर्षों से निरंतर जारी है।
‘वारी’, भक्ति और पंढरपुर का अटूट रिश्ता है। इस रिश्ते को संत ज्ञानेश्वर ने इस अभंग में प्रकट किया है-

‘माझी जिवीची आवडी । पंढरपुरा नेईन ग्ाुढी ॥’

अर्थात, पंढरपुर की ‘वारी’ की चाह मन की चाह है। इसे आगे बढ़ाते हुए फिर वे आगे कहते हैं-

‘भेटेन माहेरा आपुलिया ।’

इस तरह संज्ञ ज्ञानेश्वर ने पंढरपुर को अपना ‘मायका’ करार दिया है। इस संबोधन में ही पंढरपुर की महानता सम्मिलित है। पंढरपुर छोड़कर अन्य किसी भी तीर्थक्षेत्र को किसी भी संत ने ‘मायका’ निरूपित नहीं किया है। यही पंढरपुर की विशेषता है। पंढरपुर मायका और भक्त वत्सल पंढरीनाथ- विट्ठल या विठोबा संतों की ‘विठुमाऊली’ (माता) !

सामूहिक ‘वारी’ का महत्व

पंढरपुर की ‘वारी’ अकेले नहीं करनी होती। यह सामूहिक यात्रा है। यहां व्यक्तिगत नहीं अपितु सामूहिक भक्ति का महत्व है। और, यह यात्रा कैसे हो? अभंग गाते- गाते, हिलमिलकर, प्रसन्नता से नाचते हुए। हाथ में झांझर लिए मृदंग के ताल पर नाचते हुए, विट्ठल की जयजयकार करते हुए यह पैदल यात्रा भक्त करते हैं। ‘वारी’ करने वाले ये भक्त यानी ‘वारकरी’। पंढरपुर जाने वाली वारकरियों के इन नाचते-गाते समूह यानी ‘दिंडी’। चैतन्य का एक प्रवाह! इनके दर्शन से ही चित्त प्रसन्न होता है।

संत ज्ञानेश्वर की तरह ही संत नामदेव, संत जनाबाई, संत चोखोबा, संत एकनाथ, संत तुकाराम, संत बहिणाबाई आदि संतों ने भी पंढरपुर की ‘वारी’ और ‘दिंडी’ का वर्णन करने वाले अनेक अभंग रचे हैं। संत ज्ञानेश्वर के समकालिन ही संत नामदेव थे। उनका यह अभंग देखिए-

नाम म्हणे धन्य झाले ते संसारी ।
न सांडिती पंढरीची वारी ॥

अर्थात, नामदेव कहते हैं कि जो पंढरपुर की ‘वारी’ नहीं चूकते वे संसार में धन्य हैं। गृहस्थी को छोड़कर या तुच्छ मानकर परमार्थ करने वालों को नामदेव इस अभंग के जरिए गृहस्थी और परमार्थ दोनों सफल करने का संदेश देते हैं। पंढरपुर की ‘वारी’ कर गृहस्थी को परमार्थरूप किस तरह किया जा सकता है इसका बेहतर उदाहरण ये संत हैं। संत नामदेव, संत एकनाथ, संत दामाजी, संत तुकाराम, संत बहिणाबाई, संत निलोबा ये सभी संत गृहस्थ थे। परमार्थ साधने के लिए गृहस्थी छोड़कर भागने की जरूरत नहीं है यह इन संतों ने अपने उदाहरणों से साबित कर दिया है।

तुकाराम महाराज की ‘वारी’

पंढरी की ‘वारी’ परमार्थ का सब से सरल मार्ग है, यह संतों ने समाज को बताया है। पंढरपुर की ‘वारी’ वारकरी का पत, उपासना है, साधना है। संत जीवनीकार महिपति ने लिखा है कि संत तुकाराम वारकरियों की ‘दिंडी’ लेकर आषाढ़ी ‘वारी’ करते थे। उनके साथ कोई 1400 वारकरी होते थे। संत तुकाराम के बाद उनके भाई और सुपुत्र नारायण महाराज ने ‘वारी’ की परम्परा जारी रखी। संत ज्ञानदेव और संत तुकाराम की चरणचिह्नोेंं को पालकी में रख कर उसके साथ वे ‘वारी’ करते थे। उसे उत्सव का रूप था। बाद में इसमें कुछ जरूर पड़ता है, लेकिन ‘वारी’ कहां रुकती है? सन 1832 में ज्ञानदेवभक्त हैबत बाबा ने आलंदी से पंढरपुर तक पुन: पालकी-उत्सव श्ाुरू किया। इस उत्सव को देखकर विभिन्न संत स्थलों से पालकियां आरंभ हुईं। त्र्यंबकेश्वर से संत निवृत्तिनाथ, एदलाबाद से संत मुक्ताबाई, सातारा से संत रामदास स्वामी, सासवड़ से संत सोपानदेव, शेगांव से संत गजानन महाराज, पैठण से संत एकनाथ, पुणतांबा से संत योगी चांगदेव, सुदुंबरे से संत संताजी व संत गवरशेठ इत्यादि सैंकड़ों पालिकियां आषाढ़ी ‘वारी’ के दौरान पंढरपुर पहुंचने लगीं।

ज्येष्ठ माह आते ही वारकरियों को पंढरपुर की याद आती हैं। ससुराल गई युवती को जिस तरह सावन में अपने मायके की याद व्याकुल करती है उसी तरह वारकरी पंढरपुर के विट्ठल के दर्शन के लिए व्याकुल हो जाते हैं। वारकरी आलंदी, देहू, सासव.ड, त्र्यंबक, पैठण, शेगांव के संत क्षेत्रों में इकट्ठा होते हैं और सम्बंधित संतों की पालिकियों के साथ कदम- दर- कदम चलते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। महाराष्ट्र के विभिन्न स्थलों से विभिन्न संतों की करीब 250 से 300 पालकियां ज्येष्ठ माह में निकलकर आषाढ़ में पंढरपुर पहुंचती हैं।

‘वारी’ की प्रमुख विधि

कोई भक्त जब पंढरपुर जाकर विधिप्ाूर्वक तुलसी की माला गले में पहनता है और ‘वारी’ का संकल्प करता है वह ‘वारकरी’ कहलाता है। पंढरपुर में साल भर में चैत्र, आषाढ़, कार्तिक और माघ में चार ‘वारियां’ होती हैं। इनमें से आषाढ़ और कार्तिक की ‘वारियां’ प्रमुख मानी जाती हैं। आषाढ़ी ‘वारी’ से चातुर्मास आरंभ होता है और कार्तिक ‘वारी’ से चातुर्मास की समाप्ति होती है। आषाढ़ और कार्तिक ‘वारी’ के उत्सवों जैसा ही पंढरपुर का चातुर्मास भक्तों, साधकों को आत्मानंद देने वाला होता है। पंढरपुर के सैंकड़ों मठों में प्रवचन, कीर्तन, भजन, हरिजागर जैसे ज्ञान और भक्ति के उत्सव होते हैं। भाविकों, अध्ययनकर्ताओं को इसके जरिए गीता, ज्ञानेश्वरी, भागवत, तुकाराम गाथा जैसे संत साहित्य पर आधिकारिक व्यक्तियों के प्रवचन सुनने का सुनहरा अवसर मिलता है। शर्त यही है कि भक्तिभाव से इस श्रवणसुख को आत्मसात करना चाहिए।

आलंदी-देहू-पैठण, शेगांव, त्र्यंबकेश्वर से पंढरपुर जाने वाली विभिन्न संतों की पालकियां महाराष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव है। यह केवल एक धार्मिक घटना नहीं है, बल्कि जनजागरण करने वाला भक्ति आंदोलन है। पंढरपुर की ‘वारी’ का सैंकड़ों वर्ष का इतिहास है। महाराष्ट्र पर मुगलों और अंग्रेजों का सैंकड़ों वर्ष राज्य रहा, कई संकट आए लेकिन वारकरियों ने पंढरपुर की ‘वारी’ कभी रुकने नहीं दी। इस वारकरी निष्ठा को प्रणाम! 1944 में अंग्रेजों ने खाद्यान्न के संकट के नाम पर पाबंदी लगाई थी, किंतु सावरकर के मार्गदर्शन व नेतृत्व में प्रदर्शित निष्ठा के आधार पर इस पाबंदी को हटाने के लिए अंग्रेजों को बाध्य किया और ‘वारी’ हमेशा की तरह पुरी हुई।

गोपालकाला का महत्व

पंढरपुर की ‘वारी’ दशमी से पौर्णिमा तक होने वाला महोत्सव है। चंद्रभागा का स्नान, नगर प्रदक्षिणा, भजन, प्रवचन, कीर्तन श्रवण, संत सत्संग और विट्ठल दर्शन ‘वारी’ की मुख्य विधियां हैं। ‘वारी’ के लिए पंढरपुर में कोई 10 से 12 लाख वारकरी- भक्त जमा होते हैं। वे सभी ‘वारी’ के तीन- चार दिनों में मंदिर में जाकर विट्ठल दर्शन नहीं कर पाते। इसलिए चंद्रभागा का स्नान कर नगर प्रदक्षिणा करते हैं व कलश का दर्शन कर धन्य हो जाते हैं। वारकरी संतों को भजन, कीर्तन, प्रवचन सुनना, सत्संग करना आदि को वारकरी बहुत महत्व देते हैं। एकादशी के प्रमुख दिन दोपहर में श्री विट्ठल का रथ निकलता है व नगर प्रदक्षिणा होती है। इस रथ का दर्शन कर ही कई वारकरी ‘वारी’ पूर्ण होना मानते हैं। व्दादशी के दिन वारकरी डेरों पर भजन के बाद प्रसाद लेकर बहुसंख्य वारकरी पंढरी से विदा लेते हैं। लेकिन ‘वारी’ का वास्तविक समापन होता है पूर्णिमा को गोापलकाला से। गोपालकाला किसी भी वारकरी उत्सव का विशेष समापन होता है। पूर्णिमा के दिन सभी वारकरी पंढरपुर से दो कि.मी. दूर गोपालपुर में जमा होते हैं। वहां गोपालकाला मनाया जाता है। इसके बाद सभी वारकरी अपने घरों को लौटते हैं। सामाजिक समरसता का यह अद्भुत महोत्सव अपने आप में अनोखा है।

 

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