प्रलय में नव निर्माण

जून और जुलाई के बरसाती मौसम में प्रकृतिने फिर एक बार अपनी ताकत सभी को दिखा दी है। केदारनथ की दुर्दशा को हम सभी देख चुके हैं। एक-दो घण्टों में ही सब कुछ तबाह हो गया। कई घर तथा लोग बह गये। फिर शुरू हुआ राहत कार्य। इसमें सबसे ज्यादा मदद कर रहें हैं हमारे सैनिक जो किसी भी नैसर्गिक और मानवीय आपदा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हालांकि इस नैसर्गिक आपदा की कोई भी पूर्व सूचना नहीं मिली थी, परन्तु आधुनिक तकनीकी के कारण बचाव कार्य बड़े पैमाने पर, जल्दी और आसानी से शुरू किया जा सका। सेना के हेलीकाप्टरों ने भारी बारिश में ही अपने कामों की शुरुवात की। जिस जगह पर हेलिकाप्टर नहीं उतर सकता था, वहां सैनिकों ने उतरकर फंसे हुए लोगों को बचाया। पानी के जबरदस्त बहाव के बीच किसी एक जगह पर जहां बहुत से लोग फंसे हुए थे, वहां से उन्हें रस्सी के सहारे से ऊपर खींचा गया। उनकी मदद के लिए डीआरडीओ में आविष्कृत एक पुल की भी मदद ली गयी। यह पुल केवल 5 मिनट में बनाया जा सकता है। जो पुल बह गया था उसकी जगह इस नये पुल को बनाया गया। इसके कारण फंसे हुए लोगों को बचाया भी जा सका और सुरक्षा सामग्री भी पहुंचायी जा सकी।

‘‘नेत्र’’ नामक मानव रहित स्वचलित हवाई जहाज के कारण इस पूरे प्रदेश का व्यवस्थित मुआयना करके बचाव कार्य की योजना बनायी गई , साथ ही दलदली भू‡भाग में आवश्यक वस्तुएं जैसे अनाज,पानी, दवाइयां, कीटनाशक, बिजली इत्यादि पीड़ितों को समय पर उपलब्ध करायी गई । आज भी अनेक लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, परन्तु जो लोग बच गये, अपने घर वापस आ सके वे केवल अपनी सेना के कारण और सेना को मिले नये आविष्कारों के कारण।

दुनिया में इस तरह की आपत्ति के बाद उसका पुनरागमन न हो और इन संकटों की पूर्व सूचना प्राप्त हो सके, इस उद्देश्य से कई शोध कार्य किये गए। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। इस आवश्यकता ने ही ‘रिक्टर स्केल’ अर्थात भूकम्प के पैमाने का आविष्कार किया। सीधे हवा में उड़ने की आवश्यकता ने ही हेलीकाप्टर को जन्म दिया। पीने के पानी को हवा बंद बोतलों में भरकर उन्हें आवश्यकता पड़ने पर उपयोग करने के हेतु से ही पानी की बोतलों का आविष्कार किया गया। आपदा के समय सबसे महत्वपूर्ण है भोजन। भोजन से पानी निकालकर उस पर विशिष्ट रासायनिक प्रक्रिया करने से वह भोजन भी कई दिनों तक खाने योग्य रहता है। चिकित्सा क्षेत्र में हुए संशोधनों के कारण आपदा के समय बढ़ने वाले विषाणुओं के प्रभाव से बचना भी आसान हो गया।

उपग्रहों से लिये जाने वाले छाया चित्रों के द्वारा ऐसी घटनाओं के दौरान भूमि में होने वाले प्राकृतिक बदलावों का अभ्यास किया जा सकता है जिसके कारण भविष्य में इसका ध्यान रखा जा सके। उत्तराखण्ड में आयी आपदा के बाद इसरो ने उत्तराखण्ड पुलिस को अत्याधुनिक वीडियो कान्फ्रेंसिंग सुविधा मुहैया करवायी । जिसके कारण देहरादून के मुख्यालय को गुप्तकाशी स्थित अपने बेस कै म्प से सीधे सम्पर्क साधना आसान हो गया। इस प्रणाली के द्वारा गुमशुदा लोगोंसे लेकर सामान तक, सबकी खबर मुख्यालय तक पहुंचने लगी। साथ ही मृत देहों की पहचान करने का काम भी आसान हो गया। इस प्रणाली में सैटेलाइट फोन से लेकर सोलर और इनवर्टर से चलने वाले कम्प्यूटर का भी समावेश है। सेना के शोध विभाग ने कुछ ही मिनटों में तैयार होने वाले तथा एक छोटे से ऑपरेशन थियेटर से सुसज्जित तम्बू अस्पताल का निर्माण किया। इसकी एक विशेषता यह है कि इसकी विद्युत प्रणाली सूर्य क े प्रकाश और बैटरी पर चलने वाली है जिसके कारण अनेक आपदा और दुर्घटनाओं के स्थानोंपर ये हॉस्पिटल उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इस अस्पताल में ई.सी.जी., एक्स रे जैसे सारी मशीनें एक ही बैटरी पर चलती हैं और यह बैटरी चार्ज होती रहती है।

उत्तराखण्ड जैसी आपदाओं के समय मुख्य समस्या होती है पीने के पानी की। आपने सुना ही होगा कि ऐसे समय में स्वार्थी लोग 10 रुपये की पानी की बोतल के लिए 500 रुपये लेते हैं। डेनिश इनोवेटर टार्बेन फ्रन्डसेन ने ‘लाइफ स्ट्रा’ नामक पेन के आकार के स्ट्रा का निर्माण किया है। इसकी खास बात यह है कि यह स्ट्रा गन्दे से गन्दे पानी को भी स्वच्छ करके पीने योग्य बना देता है। अत: इस स्ट्रा के जरिये गन्दे पानी को भी सीधे पीया जा सकता है। हमें आवश्यकता है नव निर्माण की, सामान्य व्यक्तियों की मूलभूत आवश्यकताओं को तुरन्त पूरा करने की, हम सभी को डिजास्टर मैनेजमेंट का प्रशिक्षण लेने की। सिविल डिफेन्स जैसी अनेक सरकारी संस्थाओंसे लेकर अनिरुद्धाज एकेडमी ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट नामक कई सामाजिक संस्थाएं इस तरह का प्रशिक्षण निशुल्क प्रदान करती हैं। आवश्यकता है वह प्रशिक्षण लेने की। यही प्रशिक्षण आपात काल में हमें, हमारे सहचरों को और देश को भी बचा सकता है। आखिर प्यास लगने पर कुंआ खोदने से क्या फायदा?

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