मिस्र व तुर्की में उफनता जन आक्रोश

इस्लामी दुनिया के दो प्रमुख देशों मिस्र व तुर्की में इस्लाम के नाम पर सत्ता में आयी ताकतों के खिलाफ जन आक्रोश उफान पर है। मिस्र में तो दो साल पहले हुई कामयाब क्रान्ति के बाद लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये पहले राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी को पद से हटाकर नजरबन्द कर दिया गया है । उनकी जगह देश के चीफ जस्टिस अदली महमूद मंसूर को आन्तरिक तौर पर कमान सौंपी गयी है। सेना प्रमुख जनरल अब्दल फतह सिसी ने सरकारी टी.वी. चैनल पर संविधान को निलम्बित करने और नया नेता चुने जाने तक मंसूर को अन्तरिम राष्ट्रपति नियुक्त करने की घोषणा की है । अब देश में फिर से चुनाव होंगे।

अभी दो साल भी नहीं हुए जब मिस्र व तुर्की में इस्लामी ताकतों ने चुनावों में जीत का परचम फहराया था। तब लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी खुशी का इजहार किया था। मिस्र में तीन दशकों से सत्तारूढ़ होस्नी मुबारक के भ्रष्ट, बदनाम और कुनबापरस्त अत्याचारी शासन से त्रस्त मिस्र की जनता ने मोहम्मद मोरसी में एक नया मसीहा देखा था। 30 जून 2012 को उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। दूसरी ओर तुर्की की जनता ने इस्लामी पार्टी एकेपी के नेता रकब तैय्यब एर्दोगान को 2011 में लगातार तीसरी बार विजयी बनाया था। एर्दोगान की पार्टी को 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल हुए थे। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अब लाखों लोग एर्दोगान और मौरसी के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। यह बात उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही देशों में सेक्युलर राजनीति की एक लम्बी परम्परा रही है। सत्ता के हाथों धार्मिक कट्टरपंथियों को लगातार दमन का सामना करना पड़ा है। दोनों ही मुल्कों में धार्मिक कट्टरपंथियों पर कानूनी रोक रही है।

मिस्र की सेना द्वारा राष्ट्रपति मोरसी को सत्ता से हटाकर हिरासत में ले लेने के साथ ही पूर्व शासक राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के हटने के बाद बनी इस्लामी ताकतों की साल भर पुरानी सत्ता खत्म हो गयी। सवाल यह है एक एक साल में ही मिस्र की जनता अपने पहले निर्वाचित राष्ट्रपति से आजिज क्यों आ गयी। हालात इतने क्यों बिगड़े कि मोरसी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। मोरसी के विरोधियों का आरोप है कि वे देश पर इस्लामी कट्टरपंथ थोप रहे थे। सामाजिक न्याय के पैमाने पर वे खरे नहीं उतरे। और तो और जो खस्ता आर्थिक हालात होस्नी मुबारक के शासन के दौरान थे, मोरसी देश को उनसे उबार पाने मे नाकाम रहे। मिस्र में बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी का हल ढूंढ़ पाने में भी वे कुछ नहीं कर पाये।

दूसरी ओर मोहम्मद मोरसी ने खुद को बहुत सारे कानूनी अधिकार देकर विवादों को हवा दी। उनके राज में देश का क्राइम ग्रफ तेजी से बढ़ा। मोरसी ने भावनात्मक तौर पर देश को कमजोर करने की ही कोशिश की। वर्ष 2011 में होस्नी मुबारक को सत्ता से हटाने के बाद मिस्र एक नये युग की राह पर दिखा था। लेकिन अब उत्तरी अफ्रीका के इस देश में लोकतंत्र दूर का सपना बन गया है। लोकतंत्र की राह में मिली नाकामियों के आरोप मुस्लिम ब्रदरहुड और सेना पर लग रहे हैं।

अरब बसंत के दौरान होस्नी मुबारक को हटाने के लिए जिस तरह से लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया, पिछले दिनों हुआ विरोध प्रदर्शन उससे कहीं बड़ा था। महज चार दिन तक सड़कों पर बैठकर लोगों ने सेना को बैरकों से बाहर निकलकर सत्ता सम्भालने पर विवश कर दिया। सेना ने फिलहाल भले ही मोरसी से मुक्ति दिलायी है, लेकिन यह आशंका बहुतों के मन में है कि क्या सेना देश को लोकतंत्र की ओर ले जाएगी।
तुर्कीका मामला कुछ विचित्र लग सकता है। एर्दोगान तीसरी बार चुनाव जीतने के बाद यह भ्रम पाल बैठे थे कि वे आधुनिक तुर्की के जनक अतातुर्क कमाल पाशा से भी ज्यादा शक्तिशाली हो गये हैं । उन्होंने लगभग सात दशक से भी ज्यादा समय तक देश का भाग्य तय करने वाली, कमाल पाशा और अन्य युवा तुर्कों को सेक्युलर परम्पराओं में विकसित हुई सेना की चूलें हिला डालीं। उन्होंने सेनाध्यक्ष, थल सेना, नौसेना और वायु सेना के कमाण्डरों समेत बड़ी संख्या में फौजी अफसरों से इस्तीफा लिखवा लिया या वे गिरफ्तार कर लिये गए। पूरे देश में विरोध का एक भी स्वर नहीं फूटा। फिलहाल तुर्की में कोई नया आर्थिक संकट भी नहीं पैदा हुआ है। दुनिया की 17वीं सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था तुर्की की है। वहां तीन प्रतिशत की दर से आर्थिक विकास हो रहा है। अधिकांश यूरोपीय देशों के मुकाबले तुर्की के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं।

दरअसल तुर्की में एर्दोगान की छवि अब एक दागी नेता की बन चुकी है। कई महीनों से अन्दर ही अन्दर तुर्की की जनता का गुस्सा सुलगता रहा था। सरकार ने देश की पुरानी राजधानी इस्तांबुल के तकसीम चौक से सटे पार्क गेजी में शॉपिंग मॉल बनाने का ऐलान कर दिया। इस पार्क के बगल वाले पार्क में मस्जिद निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गंजी पार्क को बचाने के लिए इस्तांबुल मे शुरू हुआ आन्दोलन अब पूरे देश में फैल चुका है। पुलिस दमन और गिरफ्तारियों से लोगों का हौसला पस्त होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। राजधानी अंकारा और इस्तांबुल समेत देश के सभी शहरों मे शाम होते ही थालियां बजने लगती हैं तथा कारों के हॉर्न से पूरा माहौल गूंजने लगता है। सत्तारूढ़ एकेपी पार्टी के नेता एर्दोगान को इस्लामी फासिस्ट बताकर उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है। एर्दोगान की दागी छवि निर्मित होने के ठोस कारण हैं। गेजी पार्क में मॉल बनाने का ठेका उनके दामाद को मिला है। एर्दोगान के नजदीकी और इस्तांबुल के मेयर एक बड़ी रिटेल श्रंखला के मालिक हैं। प्रस्तावित मॉल से उनको भी फायदा होगा। देश की बड़ी‡बड़ी कम्पनियों पर एर्दोगान के सहयोगियों या मित्रों का नियंत्रण है। सरकार इन कम्पनियों के काम को हर तरह की प्राथमिकताएं देती रहती है। किसी समय खुद को शरिया का ताबेदार बताने वाले एर्दोगान फिलहाल हकीकत में थैलीशाहों के ताबेदार बन चुके हैं। अंकारा स्थित अमेरिकी दूतावास ने 2010 में अपनी सरकार को भेजी गयी एक गुप्त रिपोर्ट में लिखा कि एर्दोगान ने अवैध तरीके से भारी रकम जुटा रखी है। इस्तांबुल की जनता में इस बात की चर्चा जोर पकड़ती जा रही है कि गेजी में शॉपिंग मॉल से खुद एर्दोगान को भी फायदा होने वाला है।

जनता के गुस्से की परवाह न करते हुए एर्दोगान ने अपने ट्विटर पर लिखा कि विरोध के पीछे विदेशी हाथ है। उनका स्पष्ट इशारा ईरान, सीरिया और इराक की ओर है। तुर्की के आन्दोलन में इन तीन देशों का हाथ हो या न हो पर अमेरिकी हाथ होने के स्पष्ट संकेत आ रहे हैं।
अमेरिका इधर कुछ अरसे से एर्दोगान को अपनी प्रबन्धन क्षमता से बाहर पाता रहा है। एर्दोगान की उत्तरी अफ्रीकी देशों की यात्रा के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति अब्दुल्ला गुल और उप प्रधानमंत्री बुलंद अर्निक ने विरोधियों से सम्पर्क साधकर कहा कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर सख्ती बरती थी। इस पर उदारवादी और अतातुर्क कमालपंथी ताकतों ने राष्ट्रपति अब्दुल्ला गुल की तारीफ कर डाली। अफवाह है कि एर्दोगान के बिल्कुल असहनीय हो जाने की स्थिति में राष्ट्रपति गुल पूरी तरह सत्ता सम्भाल सकते हैं। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ‘नाटो’ के सदस्य तुर्की में अमेरिका किसी भी सूरत में अराजकता पैदा होने से रोकने की हर सम्भव कोशिश करेगा।

इस बीच पिछले 14 साल से अमेरिका के फिल्गडेल्फिया में ग्रीन कार्ड पर रह रहे फताउल्ला गुलेन ने एकेपी के नेताओं से अपील की है कि वे एर्दोगान को उखाड़ फेंके। फताउल्ला गुलेन की कहानी भी काफी दिलचस्प है। वे सूफी मत के प्रचारक हैं। सेक्युलर सरकार को पलटने की कोशिश के आरोप में उन्हें 1999 में तुर्की से निष्कासित कर दिया गया था। तुर्की की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने के बजाय चुपचाप अमेरिका निकल जाने दिया। तब से वे अमेरिका में रह रहे हैं। पर तुर्की में उनका मीडिया तंत्र आज भी मजबूत है। उनके अखबार ‘जमां’ ने एर्दोगान के खिलाफ विद्रोह का आह्वान किया है।

एर्दोगान बचे रहें या जायें, यह बात साफ हो चुकी है कि अब धर्म की खाल उन्हें सुरक्षित नहीं रख पा रही है। पिछले 10 सालों में तुर्की सरकार ने स्कूल और अस्पताल कम मस्जिदें ज्यादा बनवायीं हैं। साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले इस मुल्क में 85 हजार मस्जिदें हैं, जबकि स्कूलों की संख्या 67 हजार तथा अस्पतालों की संख्या 1220 है। सरकार तुर्की में धीरे‡धीरे शरिया प्रेरित कानून लागू करती रही। पर तुर्क जनता इन सबसे प्रभावित नहीं हुई। अप्रैल 2013 में पिव संस्थान के एक सर्वे से जाहिर होता है कि महज 12 प्रतिशत तुर्क शरिया आधारित राज्य चाहते हैं।

मिस्र और तुर्की की घटनाओं से यह बात साबित होती है कि प्रबल मुस्लिम बहुमत के बावजूद धर्म के नाम पर जनता को लम्बे समय तक बहलाया नहीं जा सकता। इन दोनों ही मुल्कों में इस्लामी रियासत पर जनता के सेक्युलर सरोकार भारी पड़ रहे हैं।

आपकी प्रतिक्रिया...