भारतीयता की वाहक हिंदी

लगभग एक दशक पहले सात समुद्र पार अमेरिका में भारतीय साहित्य पर एक संगोष्ठी हुई थी, जिसमें भारत की सोलह भाषाओं के शीर्ष रचनाकारों ने हिस्सा लिया था। यह भारतीय साहित्य की मूल धारा और उसकी अन्तर्निहित एकात्मकता को रेखांकित करने का एक अनुकरणीय प्रयास था। कुछ साल बाद महाराष्ट्र में भी ऐसा ही एक और प्रयास हुआ है। महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी द्वारा आयोजित ‘सर्वभाषा सम्मेलन’ में देश की बाईस मान्यता प्राप्त भाषाओं के प्रमुख रचनाकारों ने तीन दिन तक भाषा‡मंथन किया और जो अमृत निकला वह यह था कि राष्ट्रीय एकात्मकता का कारगर हथियार हमारी भाषाएं और उनका विपुल साहित्य ही हो सकता है। यह संयोग ही है कि इसी महाराष्ट्र में पिछले एक अरसे से भाषा को राजनीति का हथियार और शिकार, दोनों बनाया जा रहा है। निश्चित रूप से इस सन्दर्भ ने सर्वभाषा सम्मेलन की महत्ता को बढ़ाया है।

हालांकि इस बात को बार‡बार रेखांकित किया जाता रहा है कि हमारा बहुभाषीय, बहुधर्मी, बहुजातीय होना हमारी ताकत है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि भाषा, धर्म, जाति या क्षेत्र को अक्सर बांटने वाले कारक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। देश की विभिन्न भाषाई संस्कृतियों को जीवित रखने एवं उनके संवर्धन को महत्ता देते हुए हमने भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया था। दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया को गलत अर्थ और गलत दिशा देने वालों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के काम में लिया और सहोदर भारतीय भाषाओं को एक‡दूसरे के मुकाबले में खड़ा कर दिया। इस राजनीति का एक परिणाम यह निकला कि भारत का नागरिक भाषाई सीमाओं का बन्दी सा बन गया। यह सही है कि देश की आम जनता इस भाषाई कुरुक्षेत्र का हिस्सा नहीं है, लेकिन स्वयं को जनता का नेता बताने वाले इस सन्दर्भ में आम आदमी को बरगलाने में अक्सर सफल होते रहे हैं। उनकी इन करतूतों का ही फल है कि विभिन्न भारतीय भाषाएं एक‡दूसरे की पूरक होने के बजाये अक्सर प्रतिस्पर्धी बनकर खड़ी होती दिखती हैं। कभी असम में हिंदी‡भाषियों का विरोध होता है और कभी तमिलनाडु में। कभी महाराष्ट्र में मराठी माणूस का नाश लगता है और कभी गुजरात की अस्मिता और गौरव की दुहाई दी जाती है। कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि एक साबुत भारत की तस्वीर भाषाई टुकड़ों में बंटी दिखने लगी है।

मुंबई में हुए इस सर्वभाषा सम्मेलन में भाषाई आधार पर हुए मतों के बंटवारे के साल इस बात को भी रेखांकित किया गया था कि देश की सभी भाषाओं को पुलों के रूप में स्वीकारने और मजबूत करने की जरूरत है ताकि राजनीति के सौदागर अपने स्वार्थों के लिए न तो हमारी भाषाओं को हथियार बना सकें और न ही उन्हें शिकार बना सकें।

जब हमारा देश आजाद हुआ था तो एक विदेशी पत्रकार ने महात्मा गांधी से पूछा था, वे इस अवसर पर विश्व को क्या सन्देश देना चाहते हैं? गांधी ने एक वाक्य में जवाब दिया था- ‘‘दुनिया से जाकर कह दो, गांधी अंग्रेजी भूल गया है।’’ यह सन्देश जितना दुनिया के लिए था, उससे अधिक भारत के लिए था। बापू मानते थे कि इस देश की भाषाओं के बल पर ही देश की पहचान और देश की ताकत को बनाये रखा जा सकता है।

वे अंग्रेजी के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे भारतीय भाषाओं के पक्षधर अवश्य थे। भूमण्डलीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी की वकालत करने वाले यह भूल जाते हैं कि अपनी भाषाओं की कीमत पर अंग्रेजी को बढ़ावा देने की नीति आत्मघाती है। अंग्रेजी आज की आवश्यकता है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क की भाषा है अंग्रेजी। अंग्रेजी सीखना और उसका उपयोग, दोनों हमारी जरूरतें हैं। इस बात को समझना जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि हमारी अपनी भाषाएं हमारी पहचान भी हैं और हमारी संस्कृति की संवाहक भी। उनकी अवहेलना करके अथवा उनकी कीमत पर वैश्वीकरण या अन्तरराष्ट्रीय आवश्यकता के नाम पर अंग्रेजी को ओढ़कर हम अपनी पहचान को खोने का खतरा ही मोल लेंगे।

इसके साथ ही एक खतरा और भी है : दुनिया भर में भाषाएं विलुप्त हो रही हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल दुनिया की भाषाओं की संख्या कम होती जा रही है। इसका एक अर्थ यह भी है कि उस भाषा के बोलने वालों की पहचान भी खोती जा रही है। इस पहचान की रक्षा का तकाजा है कि हम अपनी भाषा की रक्षा की आवश्यकता को महसूस करें‡ और यह भी महसूस करें कि भारत के सन्दर्भ में समस्त भारतीय भाषाओं के एक साथ पलने‡बढ़ने की आवश्यकता है। उन्हें एक‡दूसरे से लड़ाने वालों का स्वार्थ भले ही सधता हो, इस महाभारत में देश की पहचान लगातार, धुंधली हो रही है। संकट भाषाओं के अस्तित्व का नहीं, हमारे अस्तित्व का है।

इसी अस्तित्व रक्षा का तकाजा है कि हम अपनी भाषाओं के प्रति अपने भीतर एक विशेष भाव पैदा करें। अपनी भाषा में बोलने, अपनी भाषा में पढ़ने में गर्व महसूस करें। इसके साथ ही यह अहसास भी जरूरी है कि जब मैं अपनी भाषा की बात करूं तो उसका अर्थ देश की सारी भाषाएं हों। हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगू, बांग्ला, गुजराती…समान रूप से मुझे अपनी भाषाएं लगें। यह अपनापन ही देश को जोड़ेगा। हमें जोड़ेगा।
राजनीति और राजनेताओं के चलते यह जोड़ने‡जुड़ने की बात हम भूल गये हैं। कभी हम मराठी बन जाते हैं, कभी तमिल, कभी कश्मीरी और कभी तेलुगू। राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सेंकने वाले हमें भारतीय नहीं रहने देना चाहते। वे हमें कभी मराठी अस्मिता की याद दिलाते हैं कभी असमी अस्मिता की। वे कभी मुंबई से गैरमराठियों को बाहर निकालने की बात करते हैं और कभी पंजाब से बिहारियों को बाहर निकालने की। वे यह भूल जाते हैं कि मुंबई या कोलकाता या चेन्नई इस देश के बाहर नहीं है। यह सारा देश हमारा है। आसेतु‡हिमालय हम सब भारतीय हैं।

भारतीयता का यह अहसास तो हमें अपनी भाषाओं को अपना कर सफलता की प्रेरणा दे सकता है। स्वयं को भारतीय समझकर ही हम मराठी या तमिल या तेलुगू आदि की संकुचित सीमाओं से बाहर निकलकर वह विस्तार पा सकते हैं जो पाना हमारा अधिकार है। मुंबई में हुए सर्वभाषा सम्मेलन में एकमत से यह प्रस्ताव पारित हुआ था कि 17 दिसम्बर को हिंदी दिवस को बजाये भारतीय भाषा दिवस मनाया जाना चाहिए। यह छोटा‡सा कदम लम्बी दूरी नापने वाला होगा। तब हमें सभी भारतीय भाषाएं समान महत्व की लगेंगी, अपनी लगेंगी। तब भाषा के नाम पर कोई राजनेता अपने स्वार्थ साधने के लिए आम भारतीय का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। हमें सिर्फ यह निर्णय करना है कि हम अपना इस्तेमाल नहीं होने देंगे‡ यह हमारी भारतीय पहचान की शर्त है।

भारतीय पहचान की यही शर्त हमारी भाषाओं के कंधों पर भी एक बोझ डालती है‡ यह लोक अपना दायित्व भारतीयता की भाषा बनने का। हिंदी चूंकि देश की राजभाषा और सर्वाधिक बोली‡समझी जाने वाली भाषा है, इसलिए भारतीयता को परिभाषित करने और इस भारतीयता को जन‡मानस की भाषा बनाने का सर्वाधिक दायित्व भी उसी का है। भाषा का दायित्व होने का मतलब होता है भाषा‡भाषियों का दायित्व। इसलिए हिंदी बोलने, समझने, हिंदी की वकालत करने वालों का दायित्व बनता है कि वे उसे देश‡समाज को समझने‡समझाने वाली भाषा के रूप में विकसित करने में योगदान दें। कैसे होगा यह काम? इस प्रश्न का एक उत्तर यह है कि हिंदी भारत की शेष भाषाओं के खजाने को पहचानने का माध्यम बने। भारतीय भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य से समूचे भारत को परिचित कराने वाला पुल बने। सच तो यह है कि हिंदी किसी क्षेत्र‡विशेष या किसी सीमित सांस्कृतिककी, समूह की भाषा है ही नहीं, यह तो समूचे भारत की भाषा है‡ कहीं यह मुंबइया हिंदी बन जाती है, कहीं पंजाबी हिंदी, कहीं बांग्ला हिंदी और कहीं तमिल या मलयाली हिंदी। हिंदी के इन सब रूपों को स्वीकारना होगा। हिंदी का यह विस्तार ही उसे भारतीयता का वाहक बनाएगा। तब हिंदी क्षेत्र‡विशेष की भाषा के लहजे से ही नहीं जुड़ेगी, बल्कि वहां की सोच, वहां की संस्कृति से भी जुड़ेगी। यही जुड़ाव किसी भाषा को विशिष्ट और सार्थक बनाता है। इसी जुड़ाव का सम्प्रेषण भाषा का दायित्व होता है। सवाल यह है कि हम अपना दायित्व कितना समझते हैं, और कितना निभाते हैं उसे।

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