फिल्मों में स्त्री-शक्ति दर्शन

हमारी हिंदी फिल्में स्त्री-शक्ति को कितने रूपों में दिखाती हैं क्या आप जानते हैं?
नायिका और खलनायिका उसके दो रूप तो हैं ही, परंतु यह उसकी मोटी व्याख्या है।
लेकिन इससे यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि यदि यहीं पर यह विषय खत्म होता तो सौ साल के भारतीय फिल्मों के इतिहास के सम्पन्न, बहुरंगी, बहुढंगी और हरफनमौला मार्गक्रमण पर नजर डालने की जरूरत ही क्या थी?

जितनी किस्म की फिल्में उतनी किस्मों के स्त्री-रूप परदे पर दिखाई देते है यह ‘फोकस’ उचित ही है।
प्रेम कथाओं से लेकर पौराणिक कथाओं तक अनेक किस्मों की फिल्में हमारे यहां आती जाती रहती हैं। (दुनिया के किसी भी देश में किसी भी समय में इतनी फिल्में न बनती होंगी इसका कुछ गर्व रखेंगे कि नहीं!) ऐसा ही कुछ स्त्री-रूपों के बारे में भी है।

लेकिन मसाला हिंदी फिल्मों में नायिका की छवि ‘मात्र शोभा की गुड़िया’ या ‘ग्लैमर डॉल’ की ही बनी है। ‘फिल्मों की नायिका यानी देखने की चीज’ इस तरह का समीकरण बन गया है। फलस्वरूप कई अभिनेत्रियां अपने अभिनय की अपेक्षा अपने ‘लुक व फिटनेस’ का बहुत ध्यान रखती है। ‘यह जवानी है दीवानी’ की दीपिका पदुकोण, ‘जब तक है जान’ की कैटरिना कैफ, ‘जंजीर’ की प्रियंका चोपड़ा जैसे कुछ ‘सुंदर’ उदाहरण तुरंत सामने आते हैं। फिल्मी दुनिया, मीडिया व फिल्मी रसिकों की नजरों के सामने रहना उन्हें अधिक प्रिय है। शायद इस क्षेत्र में बढ़ने और फलने-फूलने का वही ‘ऑक्सीजन’ उन्हें दिखाई देता हो। नायिका ‘मैं सुंदर हूं’ का पैंतरा लें अन्यथा वह कौन लेगा यह सारा मामला दिखाई देता है।

नायिका का मतलब सत्कृत्य करने वाली और खलनायिका का मतलब षड्यंत्र रचने वाली कपटी स्त्री! इस सहज सरल व्याख्या के अनुसार काफी समय तक हमारी फिल्में चलती रहीं। इस तरह की कल्पना को मजबूती से पकड़ कर रखने वाली ‘अभिनेत्रियों की जमात’ और ‘दर्शकों की भीड़’ ने कभी इस बारे में शिकायत नहीं की। गढ़मार्ग न तोड़ने की हिंदी फिल्मी दुनिया की काफी समय तक जिद थी ही!
फिर भी ‘स्त्री-शक्ति’ की कल्पना देने वाली कुछ फिल्में आई हैं उन पर ही ध्यान केंद्रित कर अन्य मुद्दों की ओर मुड़ेंगे। इन फिल्मों को हम स्त्री-केंद्रित कहानियों की फिल्में अथवा नायिका-प्रधान फिल्में कह सकते हैं।

इसकी एक झलक से यह मुद्दा और स्पष्ट होगा-

मदर इंडिया (राधा), आंधी (आरती देवी), अर्थ (पूजा), दामिनी, मुत्युदंड (केतकी), वास्तव (शांता), अस्तित्व (अदिती), कहानी (विद्या बागची), इंग्लिश विंग्लिश (शशि गोडबोले) के अलावा कुछ नायिका प्रधान फिल्मों के नाम अवश्य बताने होंगे जैसे ‘अछूत कन्या’ (1936) से ‘डर्टी पिक्चर’ (2012) इस तरह की यह प्रदीर्घ यात्रा है। इनमें साहिब, बीबी और गुलाम, बंदिनी, गाईड़, उमराव जान, सुजाता, आराधना, दुनिया न माने, बिराज बहू, अनुपमा, मेम दीदी, गुड्डी, निशांत, भूमिका, मंथन, मम्मो, सरदारी बेगम, जुबैदा, दो बिघा जमीन जैसी फिल्में एक ओर तो दूसरी ओर सिलसिला, लम्हे, चांदनी बार, फैशन, कार्पोरेट जैसी फिल्मों पर भी विचार करें। इन दोनों के बीच मर्डर, मर्डर-2, जिस्म जैसी कुछ फिल्में भी आती हैं। जख्मी औरत जैसी बदला लेने वाली फिल्म को भी कैसे भूल सकते हैं?

हमारी फिल्मी दुनिया नायक-प्रधान फिल्मों के लिए ही जानी जाती है। अतः क्या नायिका-प्रधान फिल्मों की संख्या कम होती दिखाई देती है?

विशेष रूप से ‘गल्ला पेटी’ पर नायक का ही जादू चलता है फिर नायिका-प्रधान फिल्में बनाने में कितना लाभ है, क्या यह व्यावहारिक विचार भी काम करता है?

कुछ हीरों स्वयं ही निर्माता हैं। उनमें से कुछ हीरो अपने प्रिय फिल्मी लेखक को ही ‘रजत अवसर’ देते हैं। कुछ हीरों उन्हें की ‘कम्पनी’ देने वाली अथवा उनकी मर्जी की नायिका को ही अवसर देते हैं। क्या ऐसे कुछ कारणों से नायिका-प्रधान फिल्मों की संख्या लगातार कम होती जा रही है? कुछ नायिकाएं भी अपने कर्तृत्व की अपेक्षा किसी हीरो की खुशामत करने में अपने कर्तृत्व को सफल मानती है। ऐसी नायिका स्त्री-शक्ति दिखाने वाली फिल्मों के साथ किस तरह न्याय कर पाएगी?

खलनायिका का क्षेत्र भी बहुत बड़ा है। उनमें नादिरा, शशिकला, बिंदु, पद्मा खन्ना, फरियाद जैसे कुछ उग्र अथवा विस्फोटक नाम लिए जा सकते हैं। कहानी में विष घोलने का काम वे करती हैं। अब पाप करना हो तो अपना चेहरा भी उतना ही कड़ा होना चाहिए यह बात क्यों कायम हो गई यह निश्चित रूप से कहना कठिन है। लेकिन खलनायिकाओं को कम, उत्तेजक, फिट्ट कपड़े पहनाना जरूरी है (अर्थात वे नायिकाओं की अपेक्षा अलग दिखाई देंगी) यह पहले के फिल्मवालों की शायद राय रही होगी और वह कायम भी हो गई।

इन दो रूपों में अंतर कम होना कब शुरू हुआ जानते हैं? परवीन बाबी, जीनत अमान, रीना रॉय जैसी हॉट नायिकाओं का आगमन हुआ और उनमें शोभा आनंद, जाहिरा, किम, किमी काटकर, टीना मुनिम आदि जुड़ गईं तब नायिकाओं की एक नई संस्कृति पनपने लगी। उनमें से बहुत-सी मॉडलिंग की दुनिया से आई थीं। मॉडलिंग करने के लिए किंचत अभिनय लगता है यह अब भी (लगभग चालीस वर्ष बाद भी) हम नहीं मानते। मॉडलिंग के लिए मुख्य रूप से पश्चिमी किस्म का चेहरा व उत्तम सुडौल शरीर रचना लगती है यह ‘दृष्टि’ व ‘कोण’ दोनों हैं। फिल्मों में आते समय वे यही शास्त्र और शस्त्र लेकर वे आती हैं ऐसी राय बनी है। ऐश्वर्या राय व सुष्मिता सेन जैसी विश्व सुंदरी और जगत सुंदरी का फिल्मी दुनिया में आगमन हुआ। तब हिंदी फिल्मों के नायकों की ‘स्वप्न सुंदरियों’ में और आकर्षक जुड़ाव के रूप में ही उन्हें देखा गया। लेकिन, ‘हम दिल दे चुके सनम’ की नंदिनी की व्यक्तिरेखा से ऐश्वर्या राय ने साबित कर दिया कि मॉडल भी अभिनय जानती हैं और इस तरह आलोचकों की बोलती बंद हुई। किसी भी कार्य के जरिए आलोचकों को सीधा जवाब देना हमेशा अच्छा होता है और उसका परिणाम अधिक समय तक होता है।

बिपाशा बसु जैसी हॉट प्रापर्टीज ने ‘जिस्म’दर्शन को महत्वपूर्ण माना। उसे प्रभावशाली बनाने के लिए व्यायाम जरूरी हो गया। चेहरे के उचित भावों से भूमिका को बल देने के बजाए ‘ब्लैक इज ब्यूटी’ का अनुभव देनेवाली शरीर रचना का इसमें अधिक हिस्सा है यह मानसिकता बन गई। ऐसी ‘बोल्ड अभिनेत्रियां’ बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं डालतीं, लेकिन वे वेबसाइट व कार्पोरेट क्षेत्र के टेबल कैलेण्डरों में आकर शौकिनों की ‘भूख’ पूरी करती हैं।

स्त्री की संवेदनाएं, राय, निर्णय क्षमता, उसके अस्तित्व का परिचय देने वाली कहानियां बढ़नी चाहिए। स्त्री का भी मन होता है यह बहुत से फिल्म वालों के समझ में क्यों नहीं आता? इसके लिए स्त्री पटकथाकरों व निर्देशकों की मात्रा बढ़नी चाहिए। वितरक और फाइनेंसर को भी ऐसी स्त्री विषयक फिल्मों का महत्व समझ में आना चाहिए। लेकिन इस तरह का सकारात्मक परिवर्तन होना कठिन लगता है।

नृत्य के जरिए भी बहुत सी अभिनेत्रियां स्त्री भावनाओं को व्यक्त करती हैं। वहिदा रहमान, वैजयंतीमाला, हेमा मालिनी, श्रीदेवी व माधुरी दीक्षित इस सम्बंध में कुछ महत्वपूर्ण नाम हैं। हिंदी फिल्मों में सफल होने के लिए नायिका को नृत्य आना जरूरी है। गीत-संगीत-नृत्य देश की बहुत बड़ी सामाजिक व सांस्कृतिक विरासत होने से उसका बड़े पैमाने पर सहभाग जरूरी है। लेकिन कहानी में गलत स्थान पर गाना नहीं होना चाहिए। हमारी नायिकाओं को अपने को साबित करने के लिए नृत्य सर्वाोत्तम माध्यम है। नृत्य में प्रेम, विरह, आनंद, दुःख, आक्रमण, त्वेष, चुनौती, आशा, अपनापन इत्यादि सारे घटक आते हैं। इस तरह के अक्षरशः ढेरों नृत्यों ने फिल्मों की प्रदीर्घ यात्रा प्रफुल्लित की है। इस तरह के बहारदार नृत्यों ने नायिका-प्रधान फिल्मों की कमी बहुत महसूस नहीं होने दी। अपवाद है केवल आइटम डांस!

पौराणिक फिल्मों की नायिका भी दुर्लक्षित लेकिन महत्वपूर्ण घटक है। कई देवी-देवताओं पर हमारे यहां फिल्में बनती हैं। उनमें से देवी पर बनी फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने उस समय प्रचंड लोकप्रियता पाई। मुंबई में एक ही बार में अलंकार थिएटर में मैटिनी शो का रजत महोत्सव हुआ। यही नहीं कालबादेवी के एडवर्ड व प्रभादेवी के किस्मत थिएटरों में इस तरह तीन थिएटरों में जूबिली सफलता मिली। इन दो थिएटरों में दिन में चार शो हुए। उन दिनों मुंबई की सड़कों पर संतोषी मां के मंदिर खड़े हो गए। कुछ गांवों में तो ‘भक्त रसिक’ थिएटर के बाहर चप्पल उतारकर ही थिएटर में जाते थे। किसी फिल्म का समाज पर किस तरह प्रभाव पड़ता है इसका यह सुंदर उदाहरण है। स्त्री में देवी होती है और देवी पर बनी फिल्म को खूब सफलता मिलती है यह समन्वय कौतूहल का विषय है।

जिस तरह का फिल्म का स्वरूप उस तरह का उसमें स्त्री-रूप यह बात अब तो मान लेंगे?
‘रंगीला’ में एक मध्यम वर्गीय युवती का फिल्म अभिनेत्री बनने की यात्रा देखने को मिली। ‘भूत’ में भूत से पीड़ित युवती की जीवन की जद्दोजहद देखने को मिली। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में एक फक्कड़ अनिवासी भारतीय युवक के प्रेम में उलझी प्रेमिका को हमने देखा। ‘सत्य’ में एक गैंगस्टर के प्रेम की दीवानी चाल में रहने वाली एक मध्यम वर्गीय युवती भी दिखाई दी। ‘कॉकटेल’ में ई-कॉमर्स पीढ़ी की दोस्ती व प्रेम के बारे में युवती की फहमी और गलतफहमी देखी।

ये उदाहरण इसी तरह बढ़ाए जा सकते हैं। इसकी अपेक्षा वे बेहतर ढंग से बढ़ें यही अपेक्षा है। स्त्रीत्व का सम्मान बढ़ाने का एक मार्ग फिल्मों से भी जाता है…। हिंदी फिल्मों को स्त्री की आकर्षण की वस्तु के रूप में छवि को नहीं बढ़ने देना चाहिए। क्योंकि इसीसे मानसिक दृष्टि से दुर्बल छीछोरों की स्त्री पर जबरदस्ती करने, उसके अकेलेपन का गैरलाभ उठाने की भावना बढ़ती है।
स्त्री-शक्ति समाज का निर्माण करती है। हिंदी फिल्मों को उनका सम्मान करना चाहिए।
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