संगीतमय सड़कें

कोई माने या न माने, पर मुझे संजय की तरह दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी है और मैं भली भांति देख पा रहा हूं कि निकट भविष्य में क्या होने वाला है। हमारे पड़ोसी (शत्रु?) देश चीन ने ऐसी सड़क का आविष्कार कर लिया है जिस पर वाहनों के गुजरने या लोगों के चलने पर मधुर संगीत की लहरियां उठेंगी और हमने इस ओर अभी तक ध्यान ही नहीं दिया। लानत है।

अरे, हमारा तो संगीत से जैसा जुड़ाव आदिकाल से रहा है, वैसा किसी का क्या रहा होगा। संगीत की उत्पत्ति ही यहीं से हुई। हमारे सभी देवता संगीत की विधाओं में निष्णात थे। भगवान कृष्ण बंसी की तान छेड़ते थे, तो देवादि देव महादेव डमरू से त्रिलोकी को गुंजारित कर देते थे। माता सरस्वती वीणा वादन में दक्ष थीं, तो नारद की तानपुरे के बगैर कल्पना ही नहीं की जा सकती है। कृष्ण में पाञ्चजन्य और अर्जुन को देवदत्त का तुमुल घोष शत्रु सेना को भयभीत कर देता था। और तो और रावण जैसा राक्षस भी कुशल सारंगी वादक था। इस वाद्य यंत्र को पहले रावण-हत्था कहा जाता था। कालांतर में तानसेन, बैजू बावरा, मीरा, सूर, जयदेव, आमीर खुसरो, बुल्लेशाह आदि ने संगीत की प्राचीन परम्परा को अक्षुण्ण रखा। ये लोग दीप राग गाकर जल में आग लगा देते या तानों से पाथर पिघला देते या मेघ मल्हार गाकर पानी बरसा देते थे। हमारे अनप़ढ या अल्प शिक्षित ग्रमीण पूर्वज भजन, रास, फाग और लोकगीत रचते तथा गाते थे।

तो फिर हमारा ध्यान संगीत सुनाने वाली सड़कों की ओर क्यों नहीं गया? कदाचित इसलिए कि हमारे देश की सड़कें ऐसी ऊबड़-खाबड़ और इतनी खस्ताहाल हैं कि उन पर चलने से गले से कराह या आंखों से आंसू ही निकल सकते थे। अभी एकाध माह पूर्व हेमा मालिनी एवं स्मृति ईरानी तथा अन्ना हजारे ने मध्य प्रदेश की सड़कों पर अपना रोष व्यक्त किया था। लालू यादव ने भी बिहार की सड़कों का कायाकल्प करने का वादा किया था, लेकिन एक फर्लांग सड़क भी न बना पाये। किंतु अब फोर लेन, सिक्स लेन, बाइपास आदि बनने लगे हैं। इन पर यदि संगीत प्रसारित करने वाले उपकरण लगा दिये जाएं तो यात्राएं यकीनन बहुत सुखद हो जाएंगी।

यह एक आइडिया जो हमारी दुनिया को अवश्य बदल देगा। हमारी सरकार के किसी मंत्री या अफसर के दिमाग की बत्ती जलने की देर है, बस फिर देखिएगा, भूतल परिवहन, संस्कृति, पर्यटन विभाग, सड़क शोध संस्थान, संगीत-नाटक एकेडेमी आदि अनेक विभागों,‡संस्थानों के मंत्रियों, नेताओं, नौकरशाहों को अवसर मिल जाएगा कि वे चीनी सड़कों की इस अधुनिकतम संगीत प्रणाली का अध्ययन करने के लिए वहां की यात्राएं करें-भले ही गप्पे करें और तानसेन के आलापों के अन्तर का उन्हें ज्ञान न हो। केन्द्र ने की तो राज्यों के नेता, अधिकारी भी क्यों पीछे रहेंगे। इस प्रकार सैकड़ों लोग चीन जाएंगे। कुछ करोड़ स्वाहा करने के बाद उन यंत्रों की खरीदी हेतु टेण्डर निकाले जाएंगे। बिचौलियों की पौ-बारह हो जाएगी। आर्डर निकलेंगे। फिर ए. आर. रहमान को कुछ करोड़ देकर ‘इण्डिया बुला लिया’ जैसा कोई गीत बनाने के लिए अनुबंधित किया जाएगा और जिन सड़कों पर यह संगीत पद्धति इन्स्टाल की जाएगी उनका उद्घाटन या लोकार्पण समारोह धूमधाम से होगा।

फिर राज ठाकरे रुष्ट हो जाएंगे और कहेंगे कि महाराष्ट्र , तमिलनाडु में तो कुछ लोग कोलावरी डी या तमिल गीतों के लिए आत्मदाह भी कर सकते हैं। ममता कहेंगी कि बंगाल की सड़कों पर रवीन्द्र संगीत प्रसारित हो। यह भी मुमकिन है कि पुरानी पीढ़ी के लोग शास्त्रीय संगीत की मांग करें और नयी जनरेशन ‘बीड़ी जलाई ले या’ ‘पप्पू कान्ट डांस साला’ के प्रसारण की मांग करे।

उधर सड़क के लोकार्पण के तुरन्त बाद उस पर सब्जियों, साबूदाने की खिचड़ी, गन्ने के रस के ठेले वालों, पंचर सुधारने वालों, चाय-पोहे वालों का कब्जा हो जाएगा जिनसे नगर निगम, पुलिस वाले तथा गुण्डे हफ्ता वसूल करने लगेंगे। शराब माफिया उस सड़क पर ठेका चालू कर सकते हैं। तब दारू पीकर धमाल मचाएंगे और शरीफों, महिलाओं का जीना दूभर कर देंगे। अनेक टूअर्स वाले अपनी बसों को उस सड़क पर पार्क करने लगेंगे। तत्पश्चात कभी केबल वाले, कभी सीवरेज लाइन वाले तो कभी टेलीफोन वाले खोदा-खादी करेंगे। शीघ्र ही म्युजिक सिस्टम या तो बिगड़ जाएगा या चोरी हो जाएगा। चीनी माल की कोई गारण्टी तो होती ही नहीं है।

हो-हल्ला मचेगा, मीडिया वाले भ्रष्टाचार की कलई खोलेंगे। विपक्ष संसद या विधान सभाओं में मुद्दा उठाएगा। जांच समितियां बनेंगी, अतिक्रमणकर्ताओं को कोर्ट से स्टे मिल जाएगा, रिमूवल गैंग के सामने लोग लेट जाएंगे और अन्त में नतीजा सिफर ही रहेगा, जैसा कि हमेशा होता है।

आपकी प्रतिक्रिया...