तू जी ऐ दिल जमाने के लिए…

मन्ना डे चले गए और मन भी पचास के दशक के अतीत में चला गया। उस समय हम भाई-बहन भी किशोर वयीन थे। फिल्म ‘सीमा’ देखी थी। दो गानों ने हमें दीवाना बना दिया था- सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी और तू प्यार का सागर है। एक था नूतन पर और दूसरा था बलराज साहनी पर फिल्माया गया। इसके पहले फिल्में ही नहीं देखी थीं। ‘सीमा’ इसलिए देख पाए क्योंकि घर के बड़ों की राय में वह ठीक फिल्म थी। उन दिनों राजकपूर, नर्गिस के नाम भी घरों में वर्ज थे। महाराष्ट्र में उन दिनों ना. सी. फड़के के उपन्यासों को पढ़ने पर जैसी पाबंदी थी वैसी ही फिल्मों पर भी थी।

कुछ बड़ी हुई तो पता चला कि क्या कोई पौधा मात्र भूमि के खनिजों या पानी पर ही बड़ा होता है? उसे बाहर की हवा, हवा में मौजूद जीवनतत्व, हवा के संग बहकर आने वाले बाहर की दुनिया के गंध-सुगंध, सुरों की लहरें, चैतन्य जगाने वाली प्रकाश की तरंगें… सब कुछ चाहिए होता है। उसके पोषण के लिए। हमारी पीढ़ी के हम सब बड़े हुए तलत, रफी, मन्ना डे, किशोर, मुकेश, लता, आशा और कुछ मात्रा में शमशाद- सुरैया के सुरों के साथ। मौज करनी हो तो गाने सुनते थे… उस समय का मुख्य स्रोत था रेडिया सिलोन। बड़े उपकार हैं रेडियो सिलोन के हमारी पीढ़ी पर! खर-खर आवाज के साथ छनकर आता गाना सुनते थे, उसे लिख लेते थे और शब्दों को जोड़ते चलते थे। हमारी उस उम्र को समृद्ध किया इन सभी गायकों ने। उनके स्वरों ने। इन लोगों के जाने से कहीं वह रेशमी धागा टूटता है। सही है, तलत, रफी, किशोर सभी हमारे घर के ही तो बाशिंदे थे! यही क्यों, मेंहदी हसन ही हमारा ही था। पियानो जैसी बटनों वाला टेपरिकार्डर उनकी कैसेटों के लिए ही तो लिया था- वे कैसे जा सकते हैं! मन्ना भी नहीं, क्योंकि उनकी जगह तो हमारे दिलों में है। उसके सुर हमारे हृदयों में हैं। (मन्ना दा जिस अस्पताल में थे उसका नाम भी नारायण हृदयालय था!)

अपने आर्त स्वर में मन्ना दा ने कहा था-
तेरी इक बूंद के प्यासे हम। तू प्यार का सागर है…
घायल मन का पागल पंछी। उड़ने को बेकरार
पंख है कोमल, आंख है धुंधली। जाना है सागर पार
अब तू ही इसे समझा, राह भूले थे कहां से हम…

कौनसा गाना लोकप्रिय होता है? मन्ना दा कहते थे, ‘जब नायक या नायिका परदे पर अपने अभिनय कौशल से प्रभावी रूप से जिसे पेश करते हैं वह गाना लोकप्रिय होता है।’

कितने विनम्र थे वे। श्रेय लूटने की रत्तीभर भी वृत्ति नहीं थी उनमें। आज दुर्लभ होता जा रहा यह गुण उस कलोपासक के पास विपुल मात्रा में मौजूद था। बलराज साहनी के अभिनय में कमोबेशी नहीं थी, लेकिन गाने में ही भाव न हो तो अभिनेता को अभिनय की दिशा कैसे मिलेगी? शब्द बेहतर होंगे (और पहले वैसे होते भी थे!) फिर भी बेहतर तर्ज, बेहतर गायकी और जान उंडेल कर गाना जिंदा करने की जादू न हो तो किसी अभिनेता पर न भी फिल्माया गया हो तब भी वह गाना लोकप्रिय होता ही है।

इसके लिए मैं यहां मन्ना डे के दो गानों की याद दिलाती हूं। हमारी पीढ़ी में वे लोकप्रिय तो रहे ही; लेकिन युवाओं को आज भी भरमाएंगे। खास यह कि इससे एक नये संगीतकार की पहचान होगी यानि मन्ना डे की! हां, कुछ गीत उन्होंने कम्पोज किए हैं; कुछ फिल्मों को संगीत भी दिया है। इस तरह यह है संगीत का हरफनमौला कलाकार। निम्न गीत मधुकर राजस्थानी ने लिखा है-

सुनसान जमना का किनारा। प्यार का अंतिम सहारा।
चांदनी का कफन ओढ़े सो रहा किस्मत का मारा
किससे पूछूं मैं भला अब देखा कहीं मुमताज को
मेरी भी इक मुमताज थी…

यमुना का किनारा हो तो हमारे मन की संगत करता है ताजमहल ही। शायर वहीं बैठा है; उदास, अकेला। किस तरह? चांदनी का प्रेमवस्त्र ओढ़कर। शब्दों का खेल इस तरह है कि उससे अनेक बातें स्पष्ट होती हैं- न कहते हुए भी। शायर को किनारा सुनसान लगता है, उसके पास कोई नहीं है। क्योंकि उसकी ‘वह’ वहां नहीं है। वह कहीं खो गई है, कहीं चली गई है हमेशा के लिए। कितनी मुहब्बत थी उसे उससे? शाहजहां की मुमताज पर जितना थी उतनी! वह शायद ताजमहल न बना पाए, फिर भी वह उसकी मुमताज ही थी। वह पूछता है- ‘क्या देखा मेरी मुमताज को कहीं?’

पत्थरों की ओट में महकी हुई तनहाइयां, कुछ नहीं कहतीं
डालियों की झूमती और डोलती परछाइयां, कुछ नहीं कहतीं
खेलती साहिल पे लहरें ले रही अंगडाइयां, कुछ नहीं कहतीं
चे जानके चुपचाप हैं मेरे मुकद्दर की तरह,
हमने तो इनके सामने खोला था दिल के राज को
किससे पूछूं मैं भला अब… मेरी भी इक मुमताज थी…

यमुना के किनारे, इन पत्थरों की ओट में हम बैठा करते थे; उन्हें पूछो तो वे कोई जवाब नहीं देते। उसी तरह ये परछाइयां और वैसी ही ये लहरें… जानबूझकर मौन हैं… बिल्कुल जैसे मेरी किस्मत.. वे भी मेरे (जीवन के) प्रश्नों का उत्तर नहीं देते… वास्तव में हमारी मुहब्बत तो इन्हीं को बताई थी हमने! लेकिन अब किससे पूछें? शायर ने कहा है, पत्थरों की ओट में मिला एकांत भी मधुमय था। वृक्षों की शाखाएं भी उन दोनों को देखकर, उनकी मुहब्बत देखकर खुशी से झूम उठती थीं… लेकिन आज सब चुप हैं…

ये जमीं की गोद में कदमों का धुंधलासा निशां, खामोश है
ये रुपहला आसमां, मद्धम सितारों का जहां, खामोश है
ये खूबसूरत रात का खिलता हुआ गुलशन जवां, खामोश है
रंगीनिया मदहोश हैं, अपनी खुशी में डूबकर
किस तरह सुनाऊं अब मेरी आवाज को…
किससे पूछूं मैं भला…

पूरी प्रकृति, यह जमीन, ये आकाश मौन है… और आज सभी अपने में ही मशगूल हैं… किसे पूछूं, देखा मेरी मुमताज को कहीं?
देखा आपने, कितना विरही, व्याकुल है शायरी का प्रेमी?

सच कहें तो इस मुक्त शायरी की तर्ज बनाने के लिए उसका चयन अनेक संगीतकार नहीं करते! और नहीं भी किया। लेकिन उसकी व्याकुलता ने मन्ना दा के दिल को छू लिया होगा। उसकी तर्ज इतनी सुंदर है कि बार-बार सुनने पर भी मन नहीं भरता… इसके साथ मन्ना दा के आर्त सुर… वह मधुमय आवाज… गीत के मूड के अनुकूल व्याकुल, आंसुओं में आकंठ डूबा स्वर! सब कुछ अप्रतिम। आप भी इसे ‘यू ट्यूब’ पर सुन सकते हैं। हमारी पीढ़ी को रेडियो सिलोन का वरदान था, अब ‘यू ट्यूब’ ने सब को वैसा वरदान दिया है।

बहुत बार ऐसा लगता है कि हम संख्या के कितने गुलाम हो गए हैं। बड़ी संख्या की हमें चाह होती है! (लाख मिले तो करोड़ चाहिए, उसके आगे हजारों करोड़ चाहिए; बिल्कुल प्रकाश की गति जैसी बड़ी संख्या चाहिए।) फलां ने पंद्रह हजार गीत गाये, फलां को इतने मिले… क्या केवल संख्याओं पर गुणवत्ता होती है? दिल से सुनिए तो आपका संख्या के प्रति दृष्टिकोण बदल जाएगा।

दूसरा गीत देखिए। इसका संगीत बलसारा का है। पहले यह गीत ‘गैरफिल्मी’ श्रेणी में था; बाद में इसे मन्ना दा की आवाज में जैसा था वैसा ही फिल्म ‘आलिंगन’ में लिया गया। (लेकिन यह फिल्म कब आई और कब गई पता ही नहीं चला।)
प्यास थी, फिर भी तकाजा न किया,
जाने क्या सोचके ऐसा न किया…

यादें जी उठीं

मन्ना डे (1 मई 1919- 24 अक्टूबर 2013) अद्भुत सुरीली आवाज के धनी थे। फिल्मी दुनिया में पार्श्वगायकी में उनका कोई मुकाबला नहीं था। उनका वास्तविक नाम प्रबोध चन्द्र डे था, लेकिन मन्ना डे नाम से ही वे विख्यात हुए। उन्होंने 1942 में फिल्म ‘तमन्ना’ से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की और 2013 तक कोई 4000 गानों को अपनी जादुई आवाज दी।

मन्ना डे ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा के.सी.डे से ली और 40 के दशक में सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। उनका विवाह सुलोचना कुमारन से हुआ था। उनकी दो बेटियां हैं- शुरोमा और सुमिता। उनकी पत्नी का बंगलुरु में कैंसर से 18 जनवरी 2012 को निधन हो गया। वे मुंबई में 50 से अधिक वर्षों तक निवास के बाद बंगलुरु में आ बसे और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।

उनकी गायकी के साथ कई यादगार बातें जुड़ी हुई हैं। 1943 में उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला था, हालांकि इससे पहले वे फिल्म ‘रामराज्य’ में समूह गान में गा चुके थे। दिलचस्प बात यह कि यही एकमात्र फिल्म थी, जिसे महात्मा गांधी ने देखा था।

उन्हें कई सम्मानों से अलंकृत किया गया। 1969 में फिल्म मेरे हुजूर, 1971 में बांग्ला फिल्म निशि पद्मा और 1970 में मेरा नाम जोकर के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन का फिल्मफेयर पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म श्री और 2005 में पद्म भूषण प्रदान की। 2004 में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की। 2007 में फिल्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया। उन्होंने बांग्ला में अपनी आत्मकथा भी लिखी है, जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ।

बढ़के हाथों पे उठा लेना था, तुझको सीने से लगा लेना था
तेरे होठों से तेरे गालों से, हर रंग चुरा लेना था
पर, जाने क्या सोचके ऐसा न किया…
इसके बाद गीत का प्रेमी कहता है-
तेरे सीने पे मुड़ी जुल्फों को चूम लेता तो करार आ जाता,
दिल हंसी आग में ढल सकता था, मेरा अरमान निकल सकता था
तेरे मरमर से तराशा ये बदन, गर्म हाथों में पिघल सकता था
पर, जाने क्यों सोचके ऐसा न किया…

कितना संयमी, सुसंस्कृत है इसका पुरुष! स्त्री के प्रति कितना अदब है उसके मन में। वह उसकी प्रेमिका है। लेकिन एकांत का ‘नाजायज’ फायदा उठाकर उसका अवमान करना उसके सुसंस्कृत विचारशील मन को नहीं सुहाता। वह कहता है, ‘सोचके ऐसा न किया…’

मन्ना डे का यह खास गीत है। भावविभोर कर देने वाला। ‘गर्म हाथों में…’ यह पंक्ति उन्होंने इतने संस्पर्श से गाई कि उसे सुनना ही चाहिए।

जहां जरूरी है वहां शब्दों पर कम-अधिक बल देकर वे गीत को रेशमी बना देते थे। इसके लिए ‘नवरंग’ का वह गीत याद आता है-

तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां। तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां..
इस धु्रपद के बाद आशा भोसले के गाये तीन छंद हैं। वे भी उन्होंने व्याकुल स्वर में गाये हैं। वी. शांताराम की ‘नवरंग’ फिल्म में यह गीत था। इसका नायक शायर है। उसकी पत्नी जमुना उसकी ‘प्रतिभा’ होती है। शायरी की तंद्रा में वह उसे मोहिनी कहता है। यह मोहिनी कौन? इस गलतफहमी में वह उसे छोड़कर चली जाती है। परंतु, वह उसके लिए छटपटाता रहता है।
नायिका भी उससे मिलने के लिए उत्सुक है… और उसे खोजते-खोजते वह उस महफिल में धीरे से पहुंच जाती है जहां नायक गा रहा है। उसके व्याकुल आवाज से सभा स्तंभित होती है। उसकी शांति में केवल उसके घुंगरुओं की मात्र खनक ही नायक को सुनाई देती है… मन्ना डे गाते हैं-

ये कौन घुंगरु झनका, ये कौन चांद चमका।
ये धरती पे आसमान आ गया पूनम का।

ये पंक्तियां मध्य-सप्तक के षड्ज पर खत्म होती हैं। अगली पंक्तियों के आरोही सुर क्रमवार चढ़ते जाते हैं-

ये कौन फूल महकाया, ये कौन पंछी चहका।
महफिल में कैसी खशबू उड़ी, दिल जो मेरा बहका।

तभी नायिका संध्या (फिल्मी नाम जमुना व शायर की कल्पना की मोहिनी) महफिल में आकर बैठती है… उसके आने से ही महफिल जादुई हो गई… नायक महिपाल की जान में जान आ गई…

लो तन में जान आई, होठों पे जान आई।
मेरी चकोरी चांदनी में करके स्नान आई।
बिछड़ा वो मीत आया, जीवन का गीत आया।
दो आत्माओं के मिलन का दिन पुनीत आया…

इनमें से पहली दो पंक्तियां मध्यम तक और तीसरी-चौथी पंक्तियां पंचम तक पहुंचती हैं। अगली दो पंक्तियां देखें-

सूरत है सपनों की तू सोहिनी
जमुना तू ही है तू ही मेरी मोहिनी!!

इसमें से पहली पंक्ति निषाद पर खत्म होती है, जबकि अंतिम ‘मोहिनी’ शब्द तार-षड्ज तक पहुंचता है… नायक की आर्तता को और गहरा रंग देती है। उस तार षड्ज पर गाना खत्म होता है… ये सभी पंक्तियां मन को खूब आनंद देती हैं; मिलन के उस क्षण में हमारा हृदय भी भर आता है; और महिपाल जैसे अभिनेता का अभिनय व संध्या का कृत्रिम झटका भी हमें सुसह्य होता है… क्योंकि हम होते हैं मन्ना दा के तार-षड्ज की समाधि में! मुझे नहीं लगता कि मन्ना डे के अलावा इस गीत के साथ कोई न्याय कर पाता।

आपने उनकी कई कव्वालियों को पढ़ा होगा, लेकिन क्या ये दो आपको याद हैं? इस कव्वाली में भिन्न-भिन्न गायकों की आवाजों में तीन छंद हैं। उनमें से एक छंद मन्ना डे का है- (यह फिल्म थी रुस्तम-सोहराब और संगीतकार थे सज्जाद)

हाले-दिल यार को लिखूं कैसे
हाथ दिल से जुदा नहीं होता
किस तरह उनको सुनाए अपना गम, ऐ सनम…
हम न भूलेंगे तुम्हें अल्ला कसम!
फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम…

रफी का छंद सुंदर है। अगली कव्वाली महेंद्र कपूर के साथ गाई है-

बदल जाएंगे तेरे अश्क गौहर में
यहां दामन फैलाना ही काफी है
जुबां से कुछ कहने की जरूरत क्या है
तेरा इस दर पे आ जाना ही काफी है
मुरादें लेके सब आते हैं मैं दिल लेके आया हूं…

1966 की फिल्म ‘जौहर इन कश्मीर’ की यह कव्वाली है। आज भी सुनने को। यह कैसा जादू है? उसी वर्ष ‘बादल’ फिल्म मन्ना दा का यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ और आज भी चाव से सुना जाता है-

अपने लिये जिये तो क्या जिये
तू जी ऐ दिल, जमाने के लिये…
चल, आफताब लेकर चल। चल माहताब लेकर चल।
जुल्मो-सितम मिटाने के लिए। तू जी ऐ दिल जमाने के लिये…

इस गीत का संदेश चिरंतन है। अन्य के लिए जीना ही असली जीना है। अन्य के जीवन में प्रकाश की रोशनी फैलाने के लिए हमारे साथ सूर्य होना चाहिए; और दुख को शीतल बनाने के लिए चंद्र भी चाहिए! अत्याचारों से लड़ने के लिए क्रांति का साहस भी चाहिए…

ऐ प्यारे वतन, कसमें वादे जैसे उनके गाने तो हमारे फिल्मी संगीत की धरोहर है। आविष्कार फिल्म में मन्ना दा का एक स्पेशल गीत है… इस गीत को संगीत दिया है कनु रॉय ने।

हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है
कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है…
सपने चलते ही रहे रोज नई राहों से
कोई फिसला है अभी अभी वहां से…

जीवन में ऐसी बहुत सी बातें होती हैं, कितनी भी चाह हो, कितना भी सम्हाले फिर भी हाथ से निकल जाती हैं। एक हंसी के लिए कई बार रोना पड़ता है। हमारे पास ऐसे गीत होते हैं, उन्हें सुनकर उनमें डूबकर हम हमारे दुख को कुछ राह बना देते हैं। गाने का यह हमें आधार देना क्या यह किसी को बताया जा सकता है?

विरह यदि घर, समाज ने लादा हो तो मन को मन्ना दा के सुर गाते हुए मैंने देखा है…
चली राधेरानी अंखियों में पानी, अपने मोहन से मुखड़ा मोडके..
1953 की मीना कुमारी की ‘परिणिता’ को आधुनिक रिमेक पैबंद बिल्कुल शोभा नहीं देता। उसका राधेरानी गीत एक साधु (सच पूछें तो भिखारी) पर फिल्माया गया है। फिर भी उस गीत ने महत्वपूर्ण स्थान पा लिया है।

मन्ना दा के रोमांटिक गीत तो आज भी नई पीढ़ी को भी लुभाते हैं। गाने वाले गु्रप अनेक हैं। उन्हें अक्सर ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम’, ‘ये रात भीगी भीगी’, ‘मस्तीभरा है समा’ जैसे गीतों की अक्सर फर्माईश की जाती है। तब लगता है समय आगे बढ़ गया लेकिन ये गाने विस्मृत नहीं होंगे और मन्ना दा भी कभी भुलाये नहीं जा सकेंगे।

मन्ना डे ने हरिवंशराय बच्चन की ‘मधुशाला’ की कुछ रुबाइयां गाई हैं। उसके जगह-जगह कार्यक्रम भी होते रहे हैं।
लेकिन अंत में यही सच है, ‘जीवन से लम्बे हैं बंधु, ये जीवन के रास्ते…’
इसका अर्थ यह लें कि यह जीवन भले ही खत्म हो लेकिन जीवन का रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ है… यह जीव अनेक जन्मों तक इन रास्तों से चलता ही रहता है… नूर की बूंद है यह आत्मा…
राहों से राही का रिश्ता कितने जनम पुराना
एक को चलते जाना आगे, एक को पीछे जाना
मोड़ पे मत रुक जाना बंधु, दो राहों में फंस के… ये जीवन के रास्ते…
मन्ना दा को भावपूर्ण वंदन; और उनके आभार भी; क्योंकि उन्होंने हमारा जीवन समृद्ध किया है…!!

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