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भारत रत्न सचिन

भारत रत्न सचिन

by pallavi anwekar
in खेल, दिसंबर -२०१३, सामाजिक
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भारत का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’, वायु सेना का ‘विंग कमांडर’ राज्यसभा का सदस्य और क्रिकेट का महान खिलाड़ी इन सभी का पर्यायवाची नाम हैं सचिन रमेश तेंडुलकर। सचिन ने अपने खेल से सचमुच खुद को उस बुलंदी पर ला खड़ा किया है जहां से ईश्वर उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये केवल ‘तथास्तु’ कहते होंगे। लेकिन इस बुलंदी तक पहुंचने में उन्हें लगभग 24 साल लगे। अपने जीवन की लगभग पाव सदी क्रिकेट को समर्पित करने वाले सचिन ने अपना पहला टेस्ट क्रिकेट 15 नवम्बर 1989 को भारत के चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के खिलाफ खेला था और इसे इत्तेफाक ही कहें कि इस साल 15 नवम्बर को ही वेस्ट इंडीज के खिलाफ उन्होंने अपनी आखरी पारी खेली।

उस 15 नवम्बर से लेकर इस 15 नवम्बर तक 22 यार्ड के क्षेत्र पर सचिन ने जो कमाल दिखाया उसने उन्हें क्रिकेट का भगवान बना दिया। लेकिन इसके पीछे थी उनकी कड़ी मेहनत, क्रिकेट के प्रति लगन और देश के लिये खेलने का जज्बा। 24 अप्रैल 1973 को मुंबई में जन्मे सचिन बचपन से ही शरारती थे और अकसर उनकी मां के पास उनकी शिकायतें आती थीं। सचिन ने अपने विदाई भाषण में इस बात के लिये अपनी मां से माफी मांगी और उनकी शैतानियों को सहन करने के लिये उन्हें धन्यवाद भी दिया।

सचिन का नाम उनके पिता रमेश तेंडुलकर ने उनके पसंदीदा संगीतकार सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा था। रमेश तेंडुलकर मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। सचिन का बचपन बांद्रा की साहित्य सहवास को-आप. हाउसिंग सोसायटी में बीता। क्रिकेट में रूचि और उनकी शरारतों को देखकर उनके बड़े भाई अजित तेंडुलकर ने उन्हें रमाकांत आचरेकर से मिलवाने का फैसला किया। 1984 में जब सचिन पहली बार आचरेकर सर के सामने खेले तो कुछ भी नहीं कर पाये। अजित तेंडुलकर ने आचरेकर सर से कहा कि आप उसे देख रहे हैं इसलिये शायद वह अपना स्वाभाविक खेल नहीं खेल पा रहा है। कृपया उसे एक मौका और दें। आचरेकर सर ने उन्हें एक मौका और दिया। पेड़ के पीछे छुपकर उन्होंने जब सचिन का खेल देखा तो प्रभावित हुए और उन्हें अपनी क्रिकेट अकादमी में शामिल कर लिया। यह सचिन के जीवन का वह मोड़ था जहां से उनके क्रिकेट ने एक निश्चित दिशा पकड़ी।

आचरेकर सर के साथ सचिन ने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं। वे सचिन को अधिक से अधिक प्रेक्टिस कराने के लिये अपनी स्कूटर पर बिठाकर ले जाया करते थे। उनके ही कहने पर सचिन का नाम दादर के स्कूल में लिखवाया गया, जहां अच्छी क्रिकेट टीम भी थी और उन्हें प्रेक्टिस की जगह पहुंचने में वक्त भी कम लगता था। एक दिन में दो-दो तीन-तीन प्रेक्टिस सेशन चलते थे। सचिन को ज्यादा से ज्यादा खेलने के लिये प्रोत्साहित करना ही आचरेकर सर का मुख्य उद्देश्य था। इसके लिये वे स्टम्प पर एक सिक्का रखते थे। जो भी गेंदबाज सचिन को आउट कर देता था वह सिक्का उसे मिल जाता था और अगर उस दिन सचिन आउट नहीं होते तो वह सिक्का सचिन का होता था। अपने लंबे अभ्यास के दौरान अर्जित किये 13 सिक्के सचिन के लिये बहुत मायने रखते हैं।

सन 1989 में राज सिंह डूंगरपुर ने उन्हें पहली बार पाकिस्तान दौरे के लिये चुना। उस वक्त उनकी उम्र महज 16 साल थी। उसी मैच से अपने करियर की शुरूआत करने वाले वकार युनुस ने उन्हें उस मैच में 15 रन बनाने के बाद ही आउट कर दिया था। परंतु इन 15 रनों को बनाने के दौरान भी सचिन के खेलने का जो अंदाज था वह देखने लायक था। कम उम्र और कम उंचाई के बावजूद भी पाकिस्तान की तेज गेंदबाजी का सामना करना बहुत महत्वपूर्ण बात थी। युनुस की एक बाउंसर गेंद नाक पर लगने के कारण उन्हें चोट भी लगी थी परंतु उन्होंने इसकी चिंता न करते हुए अपना खेल जारी रखा। सचिन की यह लगन उनके अंतिम टेस्ट तक जारी रही।

सन 1990 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेलते हुए उन्होंने अपना पहला टेस्ट शतक जमाया था। अपनी इस पारी में उन्होंने बिना आउट हुए 119 रन बनाये थे। सचिन एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले हर देश के विरुद्ध शतक जमाया है। जिम्बाबे को छोड़कर प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलनेवाले देश के मैदान पर शतक जमानेवाले खिलाड़ी भी तेंडुलकर हैं। अपने 200 मैचों के कुल करियर में सचिन ने 51 शतक और 68 अर्धशतक जमाये। अपने करियर का अधिकतम स्कोर और दोहरा शतक सचिन ने बांग्लादेश के खिलाफ 2004 में जमाया। इसमें उन्होंने 248 रन बनाये थे। उनके नाम कुल छह दोहरे शतक भी हैं।

एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सचिन का पदार्पण 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध हो चुका था परंतु पहला एक दिवसीय शतक बनाने के लिये उन्हें 5 साल और 79 मैच खेलने पड़े। सन 1994 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ 110 बनाकर उन्होंने अपना पहला एक दिवसीय शतक जमाया। अंतरराष्ट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट मुकाबले में दोहरा शतक बनाने वाले वे पहले बल्लेबाज हैं। 463 एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेलने वाले इस लाजवाब खिलाड़ी ने 49 शतक और 96 अर्धशतक बनाये हैं।
रनों का अंबार लगाने वाला यह खिलाड़ी जब क्रिकेट में पदार्पण कर रहा था तो उसकी पहली पसंद गेंदबाजी थी। सन 1987 में चेन्नई में तेज गेंदबाजों के लिये आयोजित किये गये एम आर एफ पेस फाऊंडेशन में जब उन्होंने हिस्सा लिया तो उसमें आस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज डेनिस लिलि प्रशिक्षक के रूप में उपस्थित थे। लिलि ने जब उनका खेल देखा तो उन्होंने सचिन को बॉलिंग के बजाय बैटिंग पर ध्यान केन्द्रित करने की सलाह दी। उसके बाद सचिन ने जो बल्ला थामा तो उसे रन मशीन की तरह ही इस्तेमाल किया।

सचिन उभयहस्त हैं। वे बैटिंग, बालिंग और गेंद फेंकने के लिये दाहिने हाथ का प्रयोग करते हैं परंतु लिखते बायें हाथ से है। हालांकि वे नेट प्रेक्टिस के दौरान बायें हाथ से खेलने का भी अभ्यास करते हैं। साउथ अफ्रीका और आस्ट्रेलिया की सख्त और उछाल वाली पिचों पर सचिन की बल्लेबाजी बेहतरीन दिखाई थी। पंच स्टाइल में बॉल को स्क्वेयर पर खेलना सचिन की खास स्टाइल थी। स्ट्रेट ड्राइव भी उनका पसंदीदा शॉट रहा है। उनकी इसी स्टाइल के कारण सर ब्रेडमेन को उनमें अपना वजूद नजर आता था। वे अक्सर अपनी पत्नी से पूछा करते थे क्या सचिन मुझ जैसा है और उनकी पत्नी का जवाब भी सकारात्मक होता था।

शुरुआती दौर में उनकी शैली काफी आक्रामक हुआ करती थी। लेफ्ट आर्म पेस बॉलिंग के अलावा सभी गेंदों को बाउंड्री के पार पहुंचाने की क्षमता उनमें थी। सन 2004 में चोटग्रस्त होने के कारण उनकी आक्रामकता में कमी आ गई परंतु रन बनाने की निरंतरता वैसी ही रही।

आस्ट्रेलियन स्पिन के जादूगर शेन वार्न की गेंदों की मार से सभी भारतीय बल्लेबाज डरते थे परंतु 1998 में हुई शारजहा सीरीज को कौन भूल सकता है जिसमें सचिन ने शेन वार्न की गेंद की खूब धुनाई की दी थी।

हालांकि उन्हें नियमित गेंदबाज के रूप में नहीं खिलाया जाता था परंतु उनकी गेंदबाजी भी सटीक थी। अक्सर उनकी गेंदबाजी का प्रयोग तब होता था जब बहुत देर से चलने वाली बल्लेबाजों की जोड़ी तोड़नी हो। 1998 में ही कोची में हुए आस्ट्रेलिया के विरुद्ध एक दिवसीय मैच में सचिन ने 32 रन देकर 5 विकेट लिये थे। स्टीव वा, डेरेन लेहमेन, माइकल बेवन जैसे दिग्गज खिलाड़ियों को पेवेलियन का रास्ता दिखाकर सचिन ने उस मैच का रुख पलट दिया था।

सचिन के साथ अकसर ये आलोचनाएं जुडी रहीं कि वे कभी मैच विनिंग प्लेयर नहीं बने। जिन मैचों में वे अच्छी पारी खेले उनमें से अधिकतर मैचों में भारत को हार का सामना करना पड़ा। सचिन ने आलोचकों और आलोचनाओं पर कभी ध्यान नहीं दिया। उनकी हमेशा यही कोशिश रही कि उनका बल्ला ही इसका जवाब दे। मैच के दौरान भी विपक्षी खिलाड़ियों से उन्हें कभी उलझते नहीं देखा गया। आजकल के युवा खिलाड़ियों को उनसे इसकी प्रेरणा लेनी चाहिये। क्रिकेट भद्र लोगों का खेल माना जाता रहा है। परंतु आजकल इसमें भी अभद्रता देखी जा रही है। सचिन ने अपने पूरे करियर में कभी भी इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया।

कहा जाता है जिस पेड़ पर ज्यादा फल लगते हैं वह ज्यादा झुकता जाता है। उसी तरह सचिन जितनी ऊंचाई पर चढ़ते गये अधिक विनम्र होते गये। उनके आसपास के लोगों ने हमेशा इसका अनुभव लिया है। टीम में अगर कोई नया खिलाड़ी आये और संकोचवश सचिन से बात न करे तो सचिन खुद उनसे बात करने जाते थे जिससे उसका संकोच कम हो। उनके साथ आचरेकर सर के गुरुकुल के विद्यार्थी प्रवीण आमरे कहते हैं कि सचिन के इस स्वभाव का कारण उनका परिवार और उनके संस्कार हैं। उनके पिता ने सदैव उन्हें सबसे पहले एक अच्छा इंसान बनने के लिये प्रेरित किया। एक बार वे अपनी पुरानी सोसायटी के लोगों से मिलने पहुंचे। सचिन से मिलने के लिये सभी लोग सोसायटी के प्रांगण में आये। वहां उपस्थित सब लोगों से तो वे मिले ही परंतु जब उन्हें पता चला कि एक वृद्ध व्यक्ति और एक बालक अस्वस्थता के कारण नीचे आने में असमर्थ हैं तो वे खुद उनसे मिलने पहुंचे। इसे सचिन की विनम्रता और बडप्पन ही कहा जा सकता है।

खिलाड़ी को फिट रहने के लिये अपने खान-पान पर ध्यान देना जरूरी होता है। सचिन इस बात का ध्यान अवश्य रखते हैं; परंतु वे खाने के शौकीन भी हैं। मांसाहार और खासकर सी-फूड उन्हें बहुत पसंद है। दुनिया में वे जहां भी जाते हैं वहां के खास व्यंजन खाना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने इस शौक के चलते होटल की चेन भी शुरू की थी।

क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद दूसरे ही दिन हुई प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि आज की सुबह काफी आरामदायी थी। उनके इस वक्तव्य से लगता है कि वे अपनी दूसरी पारी का आनंद उठाना चाहेंगे।

एक शानदार खिलाड़ी और एक आदर्श व्यक्ति के रूप में सचिन की छाप अमिट रहेगी। क्रिकेट के इतिहास के पन्नों पर सचिन रमेश तेंडुलकर का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है जो सदैव चमकता रहेगा और अन्य खिलाडियों के लिये वे सदैव प्रेरणा स्त्रोत रहेंगे। उनके लिये केवल इतना ही कहा जा सकता है कि-

खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर पहले,
खुदा बंदे से ये पूछे, बता तेरी रजा क्या है।

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